भारत–संयुक्त अरब अमीरात (UAE) संबंध: आर्थिक, ऊर्जा और रणनीतिक साझेदारी की नई ऊँचाइयाँ
एक मौलिक और विश्लेषणात्मक अध्ययन
भूमिका
21वीं सदी में भारत की विदेश नीति का एक प्रमुख आधार “मल्टी-अलाइनमेंट” बन चुका है—अर्थात् किसी एक गुट पर निर्भर हुए बिना, सभी प्रभावशाली शक्तियों और क्षेत्रों के साथ व्यावहारिक और हित-आधारित संबंध। इसी नीति का सबसे सशक्त उदाहरण भारत और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच तेजी से गहराता रिश्ता है।
20 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और UAE के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नहयान (MbZ) की द्विपक्षीय बैठक केवल औपचारिक कूटनीतिक मुलाकात नहीं थी, बल्कि यह संकेत थी कि भारत और UAE अब पारंपरिक तेल-व्यापार से आगे बढ़कर रणनीतिक साझेदारी के नए चरण में प्रवेश कर चुके हैं। यह बैठक ऐसे समय हुई जब पश्चिम एशिया गाजा संकट, यमन संघर्ष, सऊदी-पाक रक्षा समीकरण और अमेरिका की अस्थिर नीतियों के कारण गहरी अनिश्चितता से गुजर रहा है। ऐसे माहौल में भारत-UAE समझौते स्थिरता और दीर्घकालिक साझेदारी का संकेत देते हैं।
आर्थिक और व्यापारिक साझेदारी: तेल से आगे की कहानी
भारत और UAE के आर्थिक संबंधों की रीढ़ 2022 में हुआ CEPA (Comprehensive Economic Partnership Agreement) है। इस समझौते के बाद दोनों देशों के बीच व्यापार में तेज़ उछाल आया। वित्त वर्ष 2024-25 में द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर से अधिक हो गया, जो यह दिखाता है कि खाड़ी क्षेत्र में UAE भारत का सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार बन चुका है।
2026 की बैठक में दोनों देशों ने 2032 तक इस व्यापार को 200 अरब डॉलर तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा। खास बात यह है कि यह लक्ष्य गैर-तेल व्यापार पर केंद्रित है—जिसमें कृषि उत्पाद, फार्मा, इलेक्ट्रॉनिक्स, MSME उत्पाद, स्टार्टअप सेवाएँ और डिजिटल व्यापार शामिल हैं। ‘भारत मार्ट’, ‘वर्चुअल ट्रेड कॉरिडोर’ और ‘भारत-अफ्रीका सेतु’ जैसी पहलें भारत को UAE के माध्यम से अफ्रीका और यूरोप के बाजारों से जोड़ने की रणनीति का हिस्सा हैं।
निवेश के क्षेत्र में भी UAE भारत के शीर्ष निवेशकों में शामिल हो चुका है। धोलेरा स्पेशल इन्वेस्टमेंट रीजन, GIFT सिटी और लॉजिस्टिक्स व पोर्ट सेक्टर में UAE की कंपनियों की बढ़ती भागीदारी यह दिखाती है कि अब रिश्ता केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि संरचनात्मक विकास से जुड़ गया है। अबू धाबी में ‘House of India’ की स्थापना सांस्कृतिक और व्यावसायिक संपर्क को और गहरा करेगी।
ऊर्जा सहयोग: भारत की ऊर्जा सुरक्षा की रीढ़
भारत जैसी विशाल अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा सुरक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा का ही एक रूप है। UAE इस संदर्भ में भारत के लिए एक भरोसेमंद साझेदार बनकर उभरा है। 2026 की बैठक में हुआ 10-वर्षीय LNG आपूर्ति समझौता ऐतिहासिक है। ADNOC Gas और HPCL के बीच हुए इस करार के तहत 2028 से हर साल 0.5 मिलियन टन LNG भारत को मिलेगी।
इससे दो बड़े लाभ होंगे—
- भारत की ऊर्जा आपूर्ति अधिक विविध और सुरक्षित होगी।
- रूस और कुछ अन्य अस्थिर क्षेत्रों पर निर्भरता घटेगी।
तेल के अलावा गैस, रिन्यूएबल एनर्जी, ग्रीन हाइड्रोजन और न्यूक्लियर एनर्जी में सहयोग भारत को दीर्घकालिक ऊर्जा संक्रमण (energy transition) की राह पर मजबूती से आगे बढ़ाएगा।
रणनीतिक और रक्षा आयाम: भरोसे की साझेदारी
भारत और UAE अब केवल आर्थिक साझेदार नहीं, बल्कि रणनीतिक सहयोगी भी बन चुके हैं। रक्षा क्षेत्र में ‘Strategic Defence Partnership’ के लिए लेटर ऑफ इंटेंट पर हस्ताक्षर इसका प्रमाण है। इसमें शामिल हैं—
- संयुक्त सैन्य अभ्यास
- रक्षा उद्योग में सहयोग
- उन्नत तकनीक और साइबर सुरक्षा
- आतंकवाद-रोधी समन्वय
पश्चिम एशिया में UAE भारत का सबसे भरोसेमंद रणनीतिक भागीदार बन रहा है, जिससे भारत की समुद्री सुरक्षा, व्यापारिक मार्गों और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा मजबूत होती है।
अंतरिक्ष और AI में सहयोग भविष्य की दिशा तय करता है। UAE का भारत के AI Impact Summit 2026 में सक्रिय भाग लेना दिखाता है कि दोनों देश केवल वर्तमान ही नहीं, भविष्य की तकनीकों पर भी साथ काम करना चाहते हैं।
डिजिटल एम्बेसी का विचार अत्यंत अभिनव है। यह भारत के लिए पहली बार होगा जब वह अपने संवेदनशील डिजिटल डेटा का सुरक्षित ऑफशोर बैकअप किसी मित्र राष्ट्र में रखेगा। यह साइबर युद्ध, प्राकृतिक आपदा या भू-राजनीतिक संकट के समय भारत की डिजिटल संप्रभुता और लचीलापन बढ़ाएगा।
क्षेत्रीय राजनीति और भारत की चुनौती
यह साझेदारी ऐसे समय मजबूत हो रही है जब पश्चिम एशिया अस्थिर है—
- यमन में UAE और सऊदी के हित टकरा रहे हैं।
- गाजा संकट वैश्विक कूटनीति की परीक्षा ले रहा है।
- अमेरिका की ट्रंप-कालीन नीतियाँ अनिश्चितता बढ़ा रही हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा भारत को ‘Board of Peace for Gaza’ में शामिल होने का निमंत्रण भारत के लिए कूटनीतिक दुविधा है। स्वीकार करने से भारत-अमेरिका संबंध मजबूत होंगे, पर संयुक्त राष्ट्र की भूमिका कमजोर हो सकती है। इंकार करने पर अमेरिका के टैरिफ और दबाव की राजनीति का खतरा है।
भारत को ऐसे में वही रास्ता अपनाना होगा जो उसकी विदेश नीति की पहचान बन चुका है—संतुलन, संवाद और स्वायत्त निर्णय। उसे पश्चिम एशिया में अपने आर्थिक हितों, 90 लाख से अधिक प्रवासी भारतीयों और वैश्विक छवि—तीनों को साथ लेकर चलना होगा।
निष्कर्ष
भारत–UAE संबंध अब केवल तेल, प्रवासी और व्यापार तक सीमित नहीं हैं। वे ऊर्जा सुरक्षा, रणनीतिक साझेदारी, उन्नत तकनीक, डिजिटल संप्रभुता और क्षेत्रीय संतुलन तक फैल चुके हैं।
यह साझेदारी भारत की “मल्टी-अलाइनमेंट” नीति की सफलता का उदाहरण है—जहाँ भारत बिना किसी गुट में बँधे, अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार संबंध बनाता है। आने वाले वर्षों में UAE भारत का केवल आर्थिक साझेदार नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया में भारत का सबसे विश्वसनीय रणनीतिक स्तंभ बन सकता है।
हालाँकि, क्षेत्रीय संघर्षों और वैश्विक शक्ति राजनीति के बीच भारत को सावधानी, संतुलन और दूरदृष्टि के साथ आगे बढ़ना होगा। यदि यह संतुलन बना रहा, तो भारत–UAE साझेदारी न केवल द्विपक्षीय हितों को साधेगी, बल्कि बहुध्रुवीय विश्व में भारत की भूमिका को और मजबूत करेगी।
With The Indian Express Inputs
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