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Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

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UPSC Current Affairs in Hindi : 18 April 2025

दैनिक समसामयिकी: 18 अप्रैल 2025

1-भारतीय ज्ञान को वैश्विक मान्यता – भारतीय ग्रंथों की पुनर्प्रतिष्ठा का युग

भारत की आत्मा उसकी सनातन सभ्यता में निहित है—एक ऐसी सभ्यता जो केवल भौतिक संरचनाओं से नहीं, बल्कि शाश्वत विचारों, ग्रंथों और सांस्कृतिक मूल्यों से परिपूर्ण है। हाल ही में UNESCO द्वारा श्रीमद्भगवद गीता और भरतमुनि के नाट्यशास्त्र को ‘Memory of the World Register’ में शामिल किया जाना एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। यह निर्णय भारत के प्राचीन ज्ञान को वैश्विक स्वीकृति और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है।

भारत की सांस्कृतिक पूंजी की वापसी

औपनिवेशिक दृष्टिकोण ने लंबे समय तक भारतीय ग्रंथों को उपेक्षित किया या मिथकीय घोषित कर दिया। लेकिन आज वही ग्रंथ, जो सदियों से मानवता का मार्गदर्शन करते आ रहे हैं, मानव सभ्यता की वैश्विक धरोहर के रूप में पुनः प्रतिष्ठित हो रहे हैं। यह भारत की सांस्कृतिक शक्ति और बौद्धिक परंपरा की वापसी है।

गीता: नैतिकता और मानसिक शांति का शाश्वत स्रोत

श्रीमद्भगवद गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि एक दार्शनिक ग्रंथ है, जो कर्म, कर्तव्य, धर्म, और आत्मा जैसे गहन विषयों पर प्रकाश डालता है। आधुनिक युग में, जब दुनिया तनाव, भटकाव और नैतिक संकटों से जूझ रही है, गीता का सिद्धांत — निष्काम कर्म, स्थितप्रज्ञता, और स्वधर्म पालन — आत्मिक स्थिरता और मानसिक शांति के लिए एक प्रेरक मार्गदर्शक बनता है।

आधुनिक महत्व:

  • नैतिक शिक्षा: कॉर्पोरेट नेतृत्व, प्रशासनिक निर्णयों और नीति-निर्माण में गीता के विचार मार्गदर्शक बन सकते हैं।
  • मनोविज्ञान और योग: गीता की शिक्षाएँ आत्म-चिंतन, तनाव प्रबंधन और जीवन संतुलन में सहायक हैं।
  • विश्व दृष्टिकोण: यह मानव मात्र को संबोधित करती है, जिससे यह वैश्विक नैतिक संवाद का हिस्सा बन सकती है।

नाट्यशास्त्र: कला, विज्ञान और सौंदर्य का संगम

भरतमुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्र भारतीय प्रदर्शन कलाओं का मूल आधार है, जो गायन, नृत्य, अभिनय, संवाद लेखन, मंच सज्जा, वाद्य संगीत और सौंदर्यशास्त्र की समग्र दृष्टि प्रस्तुत करता है। यह ग्रंथ न केवल प्राचीन भारत के सांस्कृतिक सौंदर्यबोध को दर्शाता है, बल्कि आज के रंगमंच, फिल्म, और प्रदर्शन कलाओं की तकनीकी नींव भी प्रदान करता है।

आधुनिक महत्व:

  • भारतीय शास्त्रीय नृत्य जैसे भरतनाट्यम, कथक, कुचिपुड़ी आदि की संरचना इसी पर आधारित है।
  • रंगमंच एवं फिल्म निर्माण की आधुनिक विधियों में भी इसकी शिक्षाएँ प्रासंगिक हैं।
  • कला को मानसिक और सामाजिक संतुलन का माध्यम मानने की अवधारणा आज के "Art Therapy" जैसे क्षेत्रों में देखी जा सकती है।

UNESCO की वैश्विक मान्यता और भारत की सांस्कृतिक कूटनीति

UNESCO की ‘Memory of the World’ सूची उन दस्तावेजों को वैश्विक धरोहर का दर्जा देती है जो मानव इतिहास में विशिष्ट भूमिका निभाते हैं। गीता और नाट्यशास्त्र का इस सूची में सम्मिलित होना भारत की सांस्कृतिक कूटनीति और बौद्धिक शक्ति की मान्यता है। यह विश्व को यह संदेश देता है कि भारत केवल अतीत में ही ज्ञान का प्रकाशपुंज नहीं था, बल्कि वह भविष्य का भी पथप्रदर्शक बन सकता है।

परंपरा और नवाचार का संगम

अब समय आ गया है कि इन ग्रंथों को केवल गौरव के प्रतीक के रूप में न देखकर शिक्षा, अनुसंधान और सांस्कृतिक मंचों पर नवाचार के साथ पुनर्प्रस्तुत किया जाए। हमें परंपरा को संग्रहालय में रखने की बजाय जीवन्त संवाद का हिस्सा बनाना चाहिए।


संभावित प्रश्न (भागवत गीता और नाट्यशास्त्र पर आधारित):

भागवत गीता से संबंधित प्रश्न:

  1. श्रीमद्भगवद गीता को ‘Memory of the World Register’ में शामिल किए जाने का क्या महत्व है?
  2. आधुनिक समाज में गीता की शिक्षाओं की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालिए।
  3. गीता में 'निष्काम कर्म' और 'स्थितप्रज्ञता' की अवधारणाएं क्या हैं?
  4. श्रीमद्भगवद गीता के दर्शन और नेतृत्व सिद्धांतों में क्या संबंध है?
  5. गीता का वैश्विक दर्शन और सांस्कृतिक कूटनीति में उसका योगदान क्या है?

नाट्यशास्त्र से संबंधित प्रश्न:

  1. नाट्यशास्त्र क्या है और इसकी रचना किसने की थी?
  2. नाट्यशास्त्र को UNESCO की 'Memory of the World Register' में क्यों शामिल किया गया?
  3. नाट्यशास्त्र का भारतीय कला-संस्कृति में क्या योगदान है?
  4. नाट्यशास्त्र में किन-किन विधाओं की जानकारी दी गई है?
  5. नाट्यशास्त्र को 'संपूर्ण कला शास्त्र' क्यों कहा जाता है?
  6. नाट्यशास्त्र और आधुनिक थिएटर या फिल्म निर्माण में क्या संबंध है?

2-भारतीय अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की यात्रा पर — राकेश शर्मा के बाद भारत का अगला ऐतिहासिक कदम

भारत एक बार फिर अंतरिक्ष इतिहास में नया अध्याय जोड़ने जा रहा है। केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने घोषणा की है कि भारतीय अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला अगले महीने Axiom-4 मिशन के तहत अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) की यात्रा पर जाएंगे। यह भारत के लिए गौरव का क्षण है, क्योंकि यह ऐतिहासिक उड़ान चार दशक बाद होगी, जब 1984 में राकेश शर्मा ने सोयुज टी-11 यान से अंतरिक्ष में कदम रखा था।

अंतरिक्ष मिशन Axiom-4: भारत की वैश्विक सहभागिता

Axiom Space, एक निजी अमेरिकी कंपनी है जो NASA और अन्य अंतरिक्ष एजेंसियों के साथ मिलकर वाणिज्यिक अंतरिक्ष मिशनों को अंजाम देती है। Axiom-4 मिशन के तहत, विभिन्न देशों के अंतरिक्ष यात्री ISS का हिस्सा बनेंगे, जहां वे अनुसंधान, तकनीकी परीक्षण और अंतरिक्ष विज्ञान से जुड़ी परियोजनाओं पर कार्य करेंगे। शुभांशु शुक्ला की यह यात्रा भारत के लिए न केवल वैज्ञानिक उपलब्धि है, बल्कि वैश्विक अंतरिक्ष सहयोग में एक महत्वपूर्ण कदम भी है।

शुभांशु शुक्ला: एक नई पीढ़ी के अंतरिक्ष नायक

शुभांशु शुक्ला एक प्रशिक्षित पायलट और अत्याधुनिक अंतरिक्ष प्रशिक्षण प्राप्त वैज्ञानिक हैं। उन्होंने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों के सहयोग से गहन प्रशिक्षण प्राप्त किया है। उनके चयन से यह स्पष्ट है कि भारत अब अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी और वैश्विक साझेदारियों के साथ मिलकर अपनी क्षमताओं को विस्तार दे रहा है।

भारत की अंतरिक्ष नीति और भविष्य

शुभांशु शुक्ला की यह उड़ान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नई अंतरिक्ष नीति और ‘मेक इन इंडिया’ व ‘अत्मनिर्भर भारत’ जैसे अभियानों को भी मजबूत करती है। भारत अब पारंपरिक सरकारी स्पेस मिशनों से आगे बढ़कर निजी भागीदारी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के क्षेत्र में भी सक्रिय हो चुका है।

निष्कर्ष

शुभांशु शुक्ला की यह अंतरिक्ष यात्रा केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत के अंतरिक्ष सपनों की उड़ान है। यह आने वाली पीढ़ियों को विज्ञान, नवाचार और वैश्विक सहयोग के क्षेत्र में आगे बढ़ने की प्रेरणा देगी। राकेश शर्मा की तरह शुभांशु भी लाखों भारतीयों के लिए एक नया सपना साकार करेंगे।

"सारे जहाँ से अच्छा" की गूंज अब फिर से अंतरिक्ष में सुनाई देने वाली है — इस बार Axiom-4 मिशन के साथ।

3-भारत किन देशों से सबसे ज्यादा सोना आयात करता है?

जानिए स्विट्ज़रलैंड, यूएई और दक्षिण अफ्रीका की प्रमुख भूमिका

भारत में सोने का उपयोग सिर्फ आभूषणों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक परंपराओं, निवेश और आर्थिक गतिविधियों का भी अहम हिस्सा है। हर साल भारत अरबों डॉलर का सोना आयात करता है। हाल ही में केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़े इस दिशा में बेहद महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं।

2024-25 में सोने के आयात में जबरदस्त बढ़ोतरी

केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, भारत ने वित्त वर्ष 2024-25 में $58 बिलियन मूल्य का सोना आयात किया है। यह आंकड़ा पिछले वर्ष 2023-24 के $45.54 बिलियन की तुलना में 27.27% अधिक है। यह दर्शाता है कि देश में सोने की मांग में लगातार बढ़ोतरी हो रही है।

सबसे अधिक सोना कहाँ से आता है?

भारत जिन देशों से सबसे अधिक सोना आयात करता है, उनमें स्विट्ज़रलैंड पहले स्थान पर है। भारत का लगभग 40% सोना स्विट्ज़रलैंड से आता है। इसके अलावा:

  • संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) से 16%
  • दक्षिण अफ्रीका से 10% सोना आयात किया जाता है।

इन तीन देशों का भारत के स्वर्ण व्यापार में महत्वपूर्ण योगदान है।

सोने की बढ़ती मांग के पीछे के कारण

भारत में सोने की मांग कई कारणों से बढ़ रही है:

  • शादी और त्योहारों का मौसम
  • निवेश के रूप में सुरक्षित विकल्प
  • मुद्रास्फीति से सुरक्षा
  • आर्थिक अनिश्चितताओं में स्थायित्व का स्रोत

निष्कर्ष

भारत में सोने का आयात हर वर्ष नई ऊँचाइयों को छू रहा है। स्विट्ज़रलैंड, यूएई और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश इसमें मुख्य आपूर्तिकर्ता बने हुए हैं। यह न सिर्फ भारत की आभूषण उद्योग की मजबूती को दर्शाता है, बल्कि वैश्विक व्यापारिक संबंधों में इसकी गहराई को भी दिखाता है।


क्या आप सोने में निवेश करने की सोच रहे हैं? या जानना चाहते हैं कि वैश्विक सोना बाज़ार भारत को कैसे प्रभावित करता है? नीचे कमेंट करें और अपनी राय साझा करें!

4-चीन भारत से खरीदना चाहता है ज़्यादा, लेकिन चाहता है “न्यायपूर्ण खेल”

– Arvind Singh, Gynamic GK

भारत और चीन के रिश्तों में एक बार फिर एक नई उम्मीद की किरण दिखाई दी है। इस बार बात सीमा या रणनीतिक मसलों की नहीं, बल्कि व्यापार की है। हाल ही में चीन ने संकेत दिया है कि वह भारत से ज़्यादा प्रीमियम प्रोडक्ट्स खरीदने को तैयार है। लेकिन साथ ही उसने यह भी कहा है कि उसकी कंपनियों को भारत में "फेयर प्ले" यानी न्यायपूर्ण व्यवहार मिलना चाहिए।

क्या बदला है?

पिछले कुछ वर्षों में भारत-चीन व्यापार लगातार बढ़ा है, लेकिन एक बड़ी खामी यह रही है—व्यापार असंतुलन। यानी भारत चीन से जितना आयात करता है, उतना निर्यात नहीं कर पाता। इससे भारत को हर साल अरबों डॉलर का घाटा होता है।

चीन अब यह कह रहा है कि वह भारत के “प्रीमियम” उत्पादों—जैसे फार्मास्यूटिकल्स, ऑर्गेनिक फूड, टेक्नोलॉजी सर्विसेज और आयुर्वेदिक प्रोडक्ट्स—में दिलचस्पी रखता है। इसका मतलब यह हो सकता है कि चीन अपनी खपत में भारत को भी एक अहम हिस्सा देना चाहता है।

पर क्या यह इतना आसान है?

चीन की यह शर्त भी है कि भारतीय सरकार उसकी कंपनियों को भारत में काम करने की समान और निष्पक्ष अनुमति दे। बीते कुछ समय में भारत ने चीन की कुछ मोबाइल और टेक कंपनियों पर निगरानी बढ़ाई है और कई ऐप्स को बैन भी किया है। सुरक्षा और डेटा गोपनीयता को लेकर भारत का रुख सख्त रहा है।

भारत के लिए अवसर

अगर चीन वास्तव में भारत से अधिक सामान खरीदने को तैयार है, तो यह भारतीय निर्यातकों के लिए बड़ा मौका है। खासकर छोटे उद्योग, कृषि क्षेत्र, और हेल्थ-टेक जैसी इंडस्ट्रीज़ को चीन जैसे बड़े बाजार में जगह मिल सकती है।

लेकिन भारत को भी यह ध्यान रखना होगा कि व्यापार में खुलापन हो, लेकिन सुरक्षा और स्वदेशी उद्योगों के हितों की अनदेखी न हो।

निष्कर्ष

चीन का यह नया संकेत निश्चित ही दिलचस्प है। यह दिखाता है कि वैश्विक ताकतें भी भारत की बढ़ती ताकत और गुणवत्ता को स्वीकार करने लगी हैं। अब यह भारत पर है कि वह इस अवसर का कैसे उपयोग करता है—अपने निर्यात को बढ़ाकर, और घरेलू उद्योगों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाकर।

आपका क्या मानना है? क्या भारत को चीन के साथ व्यापारिक रिश्ते फिर से मज़बूत करने चाहिए? कमेंट में अपनी राय जरूर बताएं।



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