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India Joins Trump’s Gaza Peace Board as Observer: Strategic Balance in Middle East Diplomacy 2026

भारत की गाजा शांति योजना में भागीदारी: ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में पर्यवेक्षक के रूप में भारत की कूटनीतिक उपस्थिति परिचय वर्ष 2026 में गाजा पट्टी का प्रश्न केवल इजराइल–फिलिस्तीन संघर्ष तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह वैश्विक शक्ति-संतुलन, मानवीय हस्तक्षेप और बहुपक्षीय कूटनीति की परीक्षा बन गया है। ऐसे समय में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प  द्वारा प्रारंभ किया गया ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (Board of Peace) एक नई पहल के रूप में सामने आया है, जिसका घोषित उद्देश्य गाजा में युद्धविराम की निगरानी, पुनर्निर्माण, हमास के निरस्त्रीकरण तथा एक अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण व्यवस्था की स्थापना है। फरवरी 2026 में वाशिंगटन डीसी में आयोजित इस बोर्ड की पहली बैठक में भारत ने पूर्ण सदस्य के बजाय पर्यवेक्षक (Observer) के रूप में भाग लिया। यह निर्णय साधारण कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि भारत की संतुलित और बहुस्तरीय विदेश नीति का प्रतीक है। ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की पृष्ठभूमि: संयुक्त राष्ट्र से परे एक वैकल्पिक मंच? ट्रंप प्रशासन ने जनवरी 2026 में विश्व आर्थिक मंच (दावोस) के दौरान इस पहल की घोषणा की थी। इसे एक ऐसे मंच के रूप में...

End of the New START Treaty: Global Nuclear Arms Control, Strategic Instability, and Emerging Security Challenges

न्यू START संधि का अंत: वैश्विक परमाणु व्यवस्था, रणनीतिक अनिश्चितता और भारत के विकल्प (UPSC दृष्टिकोण)

भूमिका

परमाणु हथियार नियंत्रण की वैश्विक संरचना आज अपने सबसे नाज़ुक चरण में प्रवेश कर चुकी है। शीत युद्ध के दौरान स्थापित arms control architecture ने दशकों तक अमेरिका और सोवियत संघ/रूस के बीच रणनीतिक संतुलन बनाए रखा। इसी परंपरा की अंतिम कड़ी न्यू स्ट्रैटेजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रीटी (New START) थी, जो 2010 में अमेरिका और रूस के बीच हस्ताक्षरित हुई। इसका 5 फरवरी 2026 को समाप्त होना न केवल द्विपक्षीय संबंधों का मुद्दा है, बल्कि यह समूची वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था के लिए एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हो सकता है। UPSC के दृष्टिकोण से यह विषय GS Paper II (अंतरराष्ट्रीय संबंध), GS Paper III (आंतरिक एवं बाह्य सुरक्षा) तथा निबंध के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।


न्यू START संधि: पृष्ठभूमि और प्रमुख प्रावधान

New START संधि शीत युद्ध के बाद की arms control प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण परिणाम थी। इस संधि के अंतर्गत:

  • दोनों देशों के तैनात रणनीतिक परमाणु वारहेड्स की सीमा 1,550 निर्धारित की गई।
  • 700 तैनात डिलीवरी सिस्टम (ICBM, SLBM और Heavy Bombers) की अधिकतम सीमा तय की गई।
  • ऑन-साइट निरीक्षण, डेटा एक्सचेंज, और लॉन्च नोटिफिकेशन जैसी सत्यापन व्यवस्थाएँ शामिल की गईं।

यह संधि 5 फरवरी 2011 से प्रभावी हुई और 2021 में पाँच वर्षों के लिए विस्तारित की गई, जिससे इसकी वैधता 5 फरवरी 2026 तक सुनिश्चित हुई। यह अमेरिका–रूस के बीच अंतिम प्रमुख कानूनी हथियार नियंत्रण ढांचा है।


वर्तमान स्थिति: समाप्ति के कगार पर संधि

जनवरी 2026 की स्थिति में New START के भविष्य को लेकर गंभीर अनिश्चितता बनी हुई है।

  • 2023 में रूस ने निरीक्षण और सत्यापन तंत्र को निलंबित कर दिया, हालांकि उसने केंद्रीय सीमाओं का पालन जारी रखने की घोषणा की।
  • अमेरिका ने इसे संधि की भावना के विपरीत बताया और रूस पर अनुपालन न करने का आरोप लगाया।
  • यूक्रेन युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच राजनयिक संवाद लगभग ठप हो गया, जिससे उत्तराधिकारी संधि पर कोई ठोस बातचीत नहीं हो सकी।

सितंबर 2025 में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक एक-वर्षीय स्वैच्छिक विस्तार का प्रस्ताव रखा, ताकि दोनों देश केंद्रीय सीमाओं का पालन जारी रखें। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे सकारात्मक संकेत बताया, किंतु अब तक कोई औपचारिक समझौता नहीं हुआ।

विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रस्ताव समय खरीद सकता है, परंतु:

  • नए रूसी हथियार (जैसे Burevestnik और Poseidon) इसके दायरे से बाहर रहेंगे,
  • और निरीक्षण तंत्र के अभाव में पारस्परिक विश्वास की कमी बनी रहेगी।

वैश्विक सुरक्षा पर प्रभाव: एक नया परमाणु असंतुलन?

New START की समाप्ति के बाद दशकों में पहली बार अमेरिका और रूस के रणनीतिक परमाणु शस्त्रागार पर कोई कानूनी बाध्यता नहीं रहेगी। इसके संभावित परिणाम गहरे और बहुआयामी हैं:

  1. नई हथियारों की दौड़
    दोनों देश अपने परमाणु बलों का आधुनिकीकरण और विस्तार कर सकते हैं, जिससे शीत युद्ध जैसी प्रतिस्पर्धा पुनर्जीवित होने का खतरा है।

  2. पारदर्शिता और विश्वास का ह्रास
    निरीक्षण और डेटा एक्सचेंज की अनुपस्थिति से गलत आकलन (miscalculation) और आकस्मिक संघर्ष की आशंका बढ़ेगी।

  3. चीन का उभरता परमाणु कारक
    चीन के तेज़ी से बढ़ते परमाणु भंडार (2030 तक 1,000+ वारहेड्स का अनुमान) के कारण अमेरिका अपनी रणनीति पुनर्संतुलित कर सकता है, जिसका अप्रत्यक्ष प्रभाव रूस के साथ संबंधों पर पड़ेगा।

  4. NPT व्यवस्था पर दबाव
    2026 का NPT समीक्षा सम्मेलन ऐसे समय होगा जब प्रमुख परमाणु शक्तियाँ स्वयं हथियार नियंत्रण से पीछे हटती दिखेंगी। इससे वैश्विक निरस्त्रीकरण की नैतिक और राजनीतिक वैधता कमजोर होगी।

यह परिदृश्य शीत युद्ध के बाद की सबसे गंभीर परमाणु अनिश्चितता को जन्म दे सकता है।


भारत के लिए निहितार्थ: अवसर और चुनौतियाँ

भारत NPT का सदस्य नहीं है, फिर भी उसे एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति के रूप में वैश्विक मान्यता प्राप्त है। New START के अंत के संदर्भ में भारत के लिए कई निहितार्थ उभरते हैं:

  • भारत की No First Use (NFU) नीति और न्यूनतम विश्वसनीय प्रतिरोध की अवधारणा वैश्विक स्थिरता के लिए एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करती है।
  • BRICS, SCO और G20 जैसे मंचों पर भारत संवाद और जोखिम न्यूनीकरण की वकालत कर सकता है।
  • रूस के साथ रणनीतिक साझेदारी भारत को उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकी तक पहुँच के अवसर प्रदान कर सकती है, किंतु बढ़ती वैश्विक अस्थिरता से भारत की सुरक्षा चुनौतियाँ भी जटिल होंगी।
  • हथियार नियंत्रण में सक्रिय भूमिका भारत की NSG सदस्यता की दावेदारी को नैतिक बल दे सकती है।

आगे का रास्ता: जोखिम न्यूनीकरण और राजनीतिक इच्छाशक्ति

यदि पूर्ण arms control समझौता संभव न भी हो, तब भी कुछ व्यावहारिक उपाय आवश्यक हैं:

  • हॉटलाइन और संकट-संचार तंत्र का सुदृढ़ीकरण,
  • लॉन्च नोटिफिकेशन और सैन्य अभ्यासों की पारदर्शिता,
  • बहुपक्षीय संवाद में चीन और अन्य परमाणु शक्तियों की भागीदारी।

इन उपायों के बिना, दुनिया एक अनियंत्रित परमाणु युग की ओर बढ़ सकती है।


निष्कर्ष

New START संधि का समाप्त होना केवल एक संधि का अंत नहीं, बल्कि वैश्विक परमाणु शासन के क्षरण का संकेत है। यूक्रेन युद्ध, बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था ने हथियार नियंत्रण को और जटिल बना दिया है। ऐसे में सीमित विस्तार या वैकल्पिक जोखिम-न्यूनीकरण तंत्र ही तत्काल व्यावहारिक समाधान प्रतीत होते हैं।

UPSC के दृष्टिकोण से यह विषय यह दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सुरक्षा, शक्ति और नैतिकता कैसे परस्पर टकराती हैं। भारत जैसे देशों के लिए यह समय सक्रिय कूटनीति, संतुलित रणनीति और वैश्विक शांति के पक्ष में रचनात्मक भूमिका निभाने का है। अन्यथा, विश्व एक ऐसे दौर में प्रवेश कर सकता है जहाँ परमाणु स्थिरता एक अपवाद बन जाएगी, नियम नहीं।

With Reuters Inputs

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