भारत-अमेरिका व्यापार समझौता: व्यक्तिगत अहंकार, नीतिगत टकराव और वैश्विक कूटनीति की जटिलताएं
भूमिका
भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका—दोनों ही आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था के प्रमुख स्तंभ हैं। एक ओर भारत उभरती हुई आर्थिक शक्ति है, तो दूसरी ओर अमेरिका स्थापित महाशक्ति। ऐसे में इनके बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौता (Bilateral Trade Agreement – BTA) केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि रणनीतिक महत्व भी रखता था।
2025 में शुरू हुई बातचीत, जो फरवरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बैठक से गति पकड़ती दिखी थी, अगस्त 2025 में अमेरिका द्वारा भारतीय निर्यात पर 50% तक टैरिफ लगाने के साथ टूट गई। इसमें रूस से तेल आयात पर 25% अतिरिक्त शुल्क भी शामिल था, जिसने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को सीधे चुनौती दी।
जनवरी 2026 में ‘All-In Podcast’ में अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक के बयान—कि समझौता केवल इसलिए विफल हुआ क्योंकि मोदी ने ट्रंप को व्यक्तिगत फोन नहीं किया—ने इस विफलता को एक नाटकीय मोड़ दे दिया। सवाल यह है कि क्या सचमुच एक फोन कॉल की कमी ने इतना बड़ा समझौता तोड़ दिया, या इसके पीछे कहीं अधिक गहरे नीतिगत और रणनीतिक कारण थे?
लुटनिक का दावा और ट्रंप की “डील-मेकर” शैली
लुटनिक के अनुसार ट्रंप प्रशासन व्यापार समझौतों को “सीढ़ी मॉडल” (staircase model) की तरह देखता था—जो देश पहले समझौता करता है, उसे बेहतर शर्तें मिलती हैं। भारत को जून-जुलाई 2025 में “तीन शुक्रवार” का समय दिया गया था, जब समझौता लगभग तैयार था।
लेकिन अंतिम “क्लोजर” के लिए ट्रंप को प्रधानमंत्री मोदी का व्यक्तिगत फोन कॉल चाहिए था। लुटनिक के शब्दों में—“यह ट्रंप की डील थी, और वे खुद क्लोजर होते हैं।” भारतीय पक्ष इस व्यक्तिगत औपचारिकता से असहज था, इसलिए कॉल नहीं हुआ और मौका निकल गया। इसके बाद अमेरिका ने इंडोनेशिया, फिलीपींस और वियतनाम से समझौते कर लिए।
यह बयान ट्रंप की कूटनीतिक शैली को उजागर करता है—जहाँ औपचारिक संस्थागत प्रक्रिया से अधिक महत्व नेता-से-नेता संबंध और व्यक्तिगत स्वीकृति को दिया जाता है। लेकिन आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो यह शैली परिपक्व वैश्विक कूटनीति से अधिक “व्यक्तिकेंद्रित राजनीति” जैसी लगती है।
क्या एक महाशक्ति का नेतृत्व इतना व्यक्तिगत हो सकता है कि एक औपचारिक फोन कॉल के अभाव में वर्षों की बातचीत समाप्त कर दे? यह दावा ट्रंप की “अहंकार-केंद्रित” (ego-driven) राजनीति की ओर इशारा करता है, जहाँ राष्ट्रीय नीति और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है।
भारत की प्रतिक्रिया: नीतियों पर जोर, व्यक्तित्व से दूरी
भारतीय विदेश मंत्रालय ने लुटनिक के दावे को “सटीक नहीं” बताते हुए खारिज कर दिया। प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने कहा कि 2025 में मोदी और ट्रंप के बीच आठ बार बातचीत हुई, जिनमें व्यापार, सुरक्षा और रणनीतिक साझेदारी जैसे मुद्दे शामिल थे।
भारत का तर्क था कि बातचीत का असली अड़चन व्यक्तिगत नहीं, बल्कि नीतिगत थी—
- अमेरिका भारतीय कृषि और डेयरी बाजार को अधिक खोलना चाहता था,
- भारत किसानों के हितों के कारण इसमें हिचक रहा था,
- रूस से सस्ते तेल आयात पर अमेरिका नाराज था, जबकि भारत इसे ऊर्जा सुरक्षा के लिए जरूरी मानता था,
- टैरिफ और बाजार पहुँच पर दोनों देशों के हित टकरा रहे थे।
भारत की यह प्रतिक्रिया उसकी संस्थागत और नीति-आधारित कूटनीति को दिखाती है। भारत व्यक्तियों से अधिक नीतियों और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है। हालांकि आलोचनात्मक रूप से यह भी कहा जा सकता है कि भारत ट्रंप की अप्रत्याशित और व्यक्तिगत शैली को पूरी तरह साध नहीं पाया।
जहाँ भारत संरचित, धीमी और सहमति-आधारित प्रक्रिया में विश्वास करता है, वहीं ट्रंप त्वरित, दबाव-आधारित और व्यक्तिकेंद्रित निर्णयों में। यही सांस्कृतिक और कूटनीतिक अंतर टकराव का बड़ा कारण बना।
असली कारण: फोन कॉल या नीतिगत टकराव?
यदि गहराई से देखा जाए, तो यह विवाद व्यक्तिगत से अधिक नीतिगत है।
भारत अपने कृषि क्षेत्र को खोलने से इसलिए बच रहा था क्योंकि यह करोड़ों किसानों की आजीविका से जुड़ा है। रूस से तेल आयात भारत को सस्ती ऊर्जा देता है, जिससे महँगाई और चालू खाते का घाटा नियंत्रित रहता है।
अमेरिका इन दोनों बातों से असहमत था और दबाव बनाना चाहता था। 50% टैरिफ और अतिरिक्त शुल्क उसी दबाव की रणनीति थे।
लुटनिक का “फोन कॉल” वाला तर्क इस जटिल नीतिगत असहमति को एक सरल, नाटकीय कहानी में बदल देता है। यह अमेरिकी पक्ष को यह कहने का मौका देता है कि “हम तैयार थे, भारत ने देर की।”
वास्तव में यह दोनों देशों के हितों का टकराव था—व्यक्तित्व ने केवल उसे और तीखा बना दिया।
वैश्विक संदर्भ: शक्ति संतुलन और “अमेरिका फर्स्ट”
यह विवाद केवल भारत-अमेरिका तक सीमित नहीं है, बल्कि ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” नीति का वैश्विक प्रतिबिंब है। इस नीति में अमेरिका साझेदारों से बराबरी नहीं, बल्कि अधीनता की अपेक्षा करता है—“पहले आओ, बेहतर पाओ; देर की, तो नुकसान उठाओ।”
भारत, जो अब ब्रिक्स जैसे मंचों में सक्रिय भूमिका निभा रहा है और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का समर्थक है, इस तरह की अधीनता स्वीकार करने को तैयार नहीं।
लेकिन इसका जोखिम भी है—अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है। ऊँचे टैरिफ से भारतीय उद्योग, रोजगार और निवेश प्रभावित होते हैं। दूसरी ओर, अमेरिका भी भारत जैसे बड़े बाजार और रणनीतिक साझेदार को खोने का जोखिम उठाता है।
निष्कर्ष: सबक और आगे की राह
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की विफलता यह दिखाती है कि आज की कूटनीति केवल दस्तावेजों और वार्ताओं से नहीं चलती, बल्कि नेतृत्व की शैली, समयबद्ध निर्णय और आपसी सम्मान से भी तय होती है।
लुटनिक का दावा पूरी सच्चाई नहीं है—समस्या एक फोन कॉल से कहीं गहरी थी। यह नीतियों, हितों और दृष्टिकोणों का टकराव था, जिसे ट्रंप की व्यक्तिकेंद्रित शैली ने और उग्र बना दिया।
सबक दोनों के लिए हैं—
- अमेरिका को समझना होगा कि दबाव और अहंकार से दीर्घकालिक साझेदारी नहीं बनती।
- भारत को यह सीखना होगा कि अलग-अलग नेताओं की शैली के अनुसार लचीलापन भी कूटनीति का हिस्सा है।
भविष्य में यदि दोनों देश कृषि, ऊर्जा और बाजार पहुँच जैसे मुद्दों पर संतुलित समझौता खोजें, तो यह रिश्ता फिर पटरी पर आ सकता है।
अंततः, यह प्रकरण बताता है कि वैश्विक कूटनीति में असफलता अक्सर किसी एक व्यक्ति या एक कॉल की वजह से नहीं होती—वह नीतियों, हितों और अहंकार के जटिल संगम का परिणाम होती है।
With Washington post Inputs
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