ईरान में जारी संकट: आर्थिक अस्थिरता से राजनीतिक उथल-पुथल तक
ईरान में 28 दिसंबर 2025 से शुरू हुई व्यापक विरोध प्रदर्शन अब तीन सप्ताह से अधिक समय तक जारी हैं। यह आंदोलन, जो प्रारंभ में मुद्रा रियाल की अभूतपूर्व गिरावट और आर्थिक संकट के विरुद्ध बाजारों में व्यापारियों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के रूप में उभरा था, अब पूरे देश में राजनीतिक मांगों के साथ एक गहन चुनौती में बदल चुका है। विभिन्न मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, प्रदर्शनकारियों पर सुरक्षा बलों की कार्रवाई में सैकड़ों से लेकर हजारों तक मौतें हुई हैं, जबकि हजारों लोग गिरफ्तार किए गए हैं। राष्ट्रव्यापी इंटरनेट ब्लैकआउट ने सूचना के प्रवाह को गंभीर रूप से प्रभावित किया है, जिससे स्वतंत्र सत्यापन कठिन हो गया है।
आर्थिक संकट की जड़ें और प्रदर्शन का प्रसार
ईरान की अर्थव्यवस्था लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों, आंतरिक प्रबंधकीय कमियों और क्षेत्रीय संघर्षों के दबाव में रही है। 2025 में रियाल का मूल्य 80-90 प्रतिशत तक गिरा, जिससे मुद्रास्फीति की दर 40 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गई। खाद्यान्न और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में भारी वृद्धि ने आम नागरिकों को विशेष रूप से प्रभावित किया। तेहरान के ग्रैंड बाजार से शुरू हुए व्यापारियों के विरोध ने जल्द ही मशहद, इस्फहान, शिराज, तबरीज और कुर्द-बहुल तथा बलूच-बहुल क्षेत्रों तक फैलाव लिया।
यह आंदोलन 2022-23 के महिला, जीवन, स्वतंत्रता (महसा अमीनी) आंदोलन की याद दिलाता है, किंतु इसकी व्यापकता और विविधता उल्लेखनीय है। युवा, महिलाएं, छात्र, श्रमिक, व्यापारी और विभिन्न जातीय समूह इसमें सक्रिय हैं। कुछ प्रदर्शनों में सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई के विरुद्ध नारे और निर्वासित क्राउन प्रिंस रेजा पहलवी के समर्थन में आवाजें सुनाई दी हैं।
दमन की तीव्रता और मानवाधिकार चिंताएं
ईरानी सुरक्षा बलों—इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) और बसिज मिलिशिया—ने प्रदर्शनों को कुचलने के लिए जीवित गोलीबारी, अस्पतालों पर छापेमारी और सामूहिक गिरफ्तारियां जैसी कठोर कार्रवाइयां अपनाई हैं। मानवाधिकार संगठनों जैसे एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वॉच और एचआरएएनए के अनुसार, दिसंबर अंत से जनवरी मध्य तक सैकड़ों मौतें दर्ज की गई हैं, जिनमें बच्चे और महिलाएं भी शामिल हैं। कुछ अनुमानों में यह संख्या हजारों तक पहुंचती है, हालांकि सरकारी स्रोत इन आंकड़ों को अतिरंजित बताते हैं।
8 जनवरी से लागू इंटरनेट और संचार ब्लैकआउट ने स्थिति को और जटिल बनाया है। यह उपाय प्रदर्शनकारियों के समन्वय को रोकने का प्रयास प्रतीत होता है, किंतु इससे आर्थिक गतिविधियां भी बुरी तरह प्रभावित हुई हैं।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं और भू-राजनीतिक प्रभाव
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रदर्शनकारियों का खुला समर्थन किया है और दमन जारी रहने पर सैन्य हस्तक्षेप की चेतावनी दी है। हाल के दिनों में ट्रंप ने कहा है कि ईरान ने उन्हें आश्वासन दिया है कि प्रदर्शनकारियों की हत्याएं रुकी हैं और कोई फांसी की योजना नहीं है, हालांकि वह स्थिति पर नजर रख रहे हैं। इजराइल ने भी सतर्कता बरती है और संभावित हमलों की तैयारी दिखाई है।
रूस ने ईरान को सैन्य सहायता प्रदान करने की रिपोर्टें आई हैं, जबकि यूरोपीय संघ और जी-7 देशों ने नए प्रतिबंधों की चर्चा की है। ईरान इन विरोधों को अमेरिका-इजराइल समर्थित षड्यंत्र करार दे रहा है।
भारत पर प्रभाव
ईरान में रहने वाले हजारों भारतीय नागरिकों—छात्रों, व्यापारियों और श्रमिकों—की सुरक्षा चिंता का विषय बनी हुई है। भारत ने उन्हें सतर्क रहने की सलाह दी है। ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से, ईरान से होने वाला तेल आयात (भारत के कुल आयात का लगभग 10 प्रतिशत) प्रभावित हो सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ने से वैश्विक तेल कीमतों में उछाल आ सकता है, जिसका भारत की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। चाबहार बंदरगाह परियोजना भी अस्थिरता के कारण जोखिम में है।
भारत ने तटस्थ रुख अपनाते हुए मानवीय सहायता की पेशकश की है, किंतु किसी सैन्य हस्तक्षेप का विरोध किया है।
आगे की राह
ईरान का यह संकट मात्र आर्थिक शिकायतों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह शासन की वैधता पर गंभीर सवाल उठा रहा है। यदि सरकार संवाद और सुधारों का रास्ता नहीं अपनाती, तो स्थिति और जटिल हो सकती है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए मानवाधिकारों की रक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होगा।
यह घटनाक्रम वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और मध्य पूर्व की राजनीति पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है। स्थिति की निगरानी आवश्यक है, क्योंकि इसका समाधान केवल आंतरिक सुधारों और संयमपूर्ण दृष्टिकोण से ही संभव प्रतीत होता है।
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