जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज़ की भारत यात्रा और 'इंडो-यूरोप' की अवधारणा: एक रणनीतिक विश्लेषण
प्रस्तावना
वैश्विक भू-राजनीति में तेजी से बदलाव आ रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एकतरफा नीतियां और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की आक्रामक कूटनीति ने दुनिया को अस्थिरता की ओर धकेल दिया है। ऐसे समय में जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज़ की जनवरी 2026 में भारत की दो-दिवसीय आधिकारिक यात्रा केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह एक नई रणनीतिक भूगोल की शुरुआत का संकेत देती है। प्रसिद्ध स्तंभकार सी. राजा मोहन ने इसे "इंडो-यूरोप" की संज्ञा दी है। यह अवधारणा भारत और यूरोप (विशेषकर जर्मनी) के बीच गहन सहयोग के माध्यम से अमेरिका और चीन के प्रभुत्व को संतुलित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह यात्रा 25 वर्षों के भारत-जर्मनी रणनीतिक साझेदारी और 75 वर्षों के राजनयिक संबंधों के उपलक्ष्य में हुई, जिसमें दोनों पक्षों ने 19 समझौतों पर हस्ताक्षर किए।
यात्रा के प्रमुख परिणाम और समझौते
मेर्ज़ की यात्रा 12-13 जनवरी 2026 को हुई, जो उनकी चांसलर बनने के बाद पहली एशियाई यात्रा थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अहमदाबाद में हुई वार्ता में निम्नलिखित प्रमुख परिणाम सामने आए:
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रक्षा सहयोग: द्विपक्षीय रक्षा औद्योगिक सहयोग पर संयुक्त घोषणा पत्र (Joint Declaration of Intent) पर हस्ताक्षर। इसमें सह-विकास (co-development) और सह-उत्पादन (co-production) पर रोडमैप शामिल है। जर्मनी अब दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रक्षा खर्चकर्ता बन रहा है (जीडीपी का 3.5% तक), और भारत रूसी हथियारों पर निर्भरता कम करने तथा सिनो-पाक गठजोड़ का मुकाबला करने के लिए जर्मनी के साथ सहयोग बढ़ा रहा है।
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आर्थिक और व्यापारिक सहयोग: भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को जल्द पूरा करने का संकल्प। मेर्ज़ ने संकेत दिया कि जनवरी के अंत तक ईयू-भारत शिखर सम्मेलन में यह हस्ताक्षरित हो सकता है। दोनों देशों के बीच व्यापार पहले ही 50 अरब डॉलर से अधिक हो चुका है।
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अन्य क्षेत्र: सेमीकंडक्टर, क्रिटिकल मिनरल्स, ग्रीन हाइड्रोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्किल डेवलपमेंट और मोबिलिटी पर कई समझौते। जर्मनी ने भारतीय पासपोर्ट धारकों के लिए ट्रांजिट वीजा-मुक्त सुविधा की घोषणा की। ग्रीन एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट पार्टनरशिप के तहत 1.24 अरब यूरो का अतिरिक्त फंड जारी किया गया।
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रणनीतिक संवाद: इंडो-पैसिफिक पर द्विपक्षीय संवाद तंत्र और ट्रैक 1.5 विदेश नीति-सुरक्षा संवाद की स्थापना।
ये समझौते वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण, जलवायु परिवर्तन और आतंकवाद विरोधी सहयोग पर केंद्रित हैं।
'इंडो-यूरोप' की अवधारणा: सी. राजा मोहन का विश्लेषण
सी. राजा मोहन के अनुसार, इंडो-यूरोप कोई औपचारिक गठबंधन नहीं है, बल्कि एक "सप्लीमेंटरी ज्योमेट्री" है जो अमेरिका और चीन के बीच संतुलन बनाती है। यूरोप को रूसी ऊर्जा, चीनी आपूर्ति श्रृंखला और अमेरिकी सुरक्षा गारंटी पर लंबे समय से निर्भरता कम करनी होगी। वहीं भारत अमेरिकी टैरिफ, रूसी हथियारों की निर्भरता और चीन की सीमा चुनौतियों से जूझ रहा है।
इंडो-यूरोप भारत की जनसांख्यिकीय शक्ति और बाजार गहराई को यूरोप की औद्योगिक क्षमता तथा तकनीकी परिष्कार से जोड़ता है। यह उत्पादक विविधीकरण (productive diversification) पर आधारित रणनीतिक स्वायत्तता है, न कि equidistance या विरोध। प्रमुख पहलुओं में शामिल हैं:
- इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC)।
- क्रिटिकल मिनरल्स और ग्रीन हाइड्रोजन पर सहयोग।
- पश्चिमी हिंद महासागर में समुद्री जागरूकता बढ़ाना।
यह यूरोप की यूक्रेन युद्ध के बाद रिआर्मिंग (rearming) और भारत की इंडो-पैसिफिक रणनीति को जोड़ता है, जिससे यूरेशिया में चीन-रूस गठजोड़ के खिलाफ स्थिरता आए।
ऐतिहासिक संदर्भ
इंडो-जर्मन संबंधों की जड़ें प्रथम विश्व युद्ध तक जाती हैं, जब जर्मनी ने भारतीय राष्ट्रवादियों का समर्थन किया था (जैसे हिंदू-जर्मन षड्यंत्र और बर्लिन कमिटी)। आज का संदर्भ अलग है: यूरोप अमेरिकी सुरक्षा पर कम निर्भर हो रहा है, जबकि भारत बहुध्रुवीय दुनिया में यूरोप के साथ जुड़कर अपनी रणनीतिक जगह मजबूत कर रहा है।
निष्कर्ष
फ्रेडरिक मेर्ज़ की भारत यात्रा वैश्विक व्यवस्था में एक नया अध्याय खोलती है। इंडो-यूरोप की अवधारणा भारत और यूरोप को अधिक स्वतंत्र, लचीला और मजबूत बनाती है, जहां अमेरिका अपरिहार्य साझेदार रहता है, लेकिन दोनों महाद्वीप अपनी एजेंसी बनाए रखते हैं। भविष्य में फ्रांस, ब्रिटेन और पोलैंड जैसे देशों के साथ जुड़ाव से यह और मजबूत होगा। हालांकि, इन समझौतों को क्रियान्वित करना सबसे बड़ी चुनौती रहेगी। यह यात्रा न केवल द्विपक्षीय संबंधों का उत्सव है, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की बढ़ती भूमिका का प्रमाण भी है।
संदर्भ:
सी. राजा मोहन का लेख, इंडियन एक्सप्रेस, 13 जनवरी 2026; भारत-जर्मनी संयुक्त वक्तव्य; विभिन्न समाचार स्रोत।
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