तालिबान-शासित अफगानिस्तान में घरेलू हिंसा को लेकर नए नियम: एक अकादमिक विश्लेषण
परिचय
अगस्त 2021 में तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद अफगानिस्तान में कानूनी, सामाजिक और राजनीतिक ढांचे में गहन परिवर्तन देखने को मिले हैं। इन परिवर्तनों का सबसे अधिक प्रभाव महिलाओं और बच्चों पर पड़ा है, जहां शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाओं और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए हैं।
इसी संदर्भ में, जनवरी 2026 में तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा ने एक नई आपराधिक प्रक्रिया संहिता (Criminal Procedural Regulations for Courts) पर हस्ताक्षर किए, जो 10 अध्यायों और 119 अनुच्छेदों में विभाजित है। इसे अनौपचारिक रूप से “Penal Principles of Taliban Courts” कहा जा रहा है। यह संहिता केवल न्यायिक प्रक्रिया को परिभाषित नहीं करती, बल्कि तालिबान की वैचारिक और पितृसत्तात्मक दृष्टि को विधिक रूप प्रदान करती है।
मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, यह संहिता घरेलू हिंसा को “सीमित वैधता” प्रदान करती है और महिलाओं को अधीनस्थ सामाजिक इकाई के रूप में स्थापित करती है। यह लेख संहिता के प्रमुख प्रावधानों, उनके सामाजिक–न्यायिक प्रभावों तथा अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों से उनके टकराव का अकादमिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
नई संहिता के प्रमुख प्रावधान: घरेलू हिंसा का विधिककरण
तालिबान की यह संहिता पारंपरिक इस्लामी व्याख्याओं पर आधारित होने का दावा करती है, किंतु व्यवहार में यह दमनकारी प्रथाओं को कानूनी संरक्षण प्रदान करती है। घरेलू हिंसा से जुड़े प्रावधान विशेष रूप से विवादास्पद हैं:
1. शारीरिक दंड की सशर्त अनुमति
अनुच्छेद 32 के अनुसार, पति को पत्नी और बच्चों पर “अनुशासनात्मक” शारीरिक दंड देने की अनुमति है, बशर्ते उससे हड्डी टूटना, खुले घाव या स्पष्ट बाहरी निशान न हों। यदि गंभीर चोट भी हो जाए, तो अधिकतम सजा केवल 15 दिन की कैद है।
यह प्रावधान घरेलू हिंसा को अपराध के बजाय निजी अनुशासन का विषय बना देता है और महिलाओं की शारीरिक अखंडता को कानूनी रूप से कमजोर करता है।
2. प्रमाण का बोझ पीड़िता पर
सजा तभी संभव है जब पीड़िता अदालत में चोटों को सिद्ध कर सके। जबकि महिलाओं की आवाजाही, वकील तक पहुंच और स्वतंत्र न्यायिक प्रक्रिया में भागीदारी पर स्वयं तालिबान द्वारा प्रतिबंध लगाए गए हैं। परिणामस्वरूप, न्याय की यह शर्त व्यावहारिक रूप से असंभव हो जाती है और अपराधी दंडमुक्त रहते हैं।
3. मनोवैज्ञानिक और यौन हिंसा की अनदेखी
संहिता में मनोवैज्ञानिक उत्पीड़न, वैवाहिक बलात्कार या अन्य गैर-शारीरिक हिंसा के लिए कोई स्पष्ट अपराध-परिभाषा नहीं दी गई है। यह मौन इन हिंसक व्यवहारों को सामाजिक रूप से स्वीकार्य बना देता है, जिससे महिलाओं की मानसिक स्वास्थ्य और गरिमा पर गहरा आघात पड़ता है।
4. महिलाओं की गतिशीलता पर दंडात्मक नियंत्रण
अनुच्छेद 34 के तहत, यदि कोई विवाहित महिला पति की अनुमति के बिना बार-बार मायके या रिश्तेदारों के घर जाती है, तो उसे और उसके रिश्तेदारों को तीन महीने तक की कैद हो सकती है। यह प्रावधान महिलाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अपराध में बदल देता है और पारिवारिक संबंधों को भी आपराधिक निगरानी के अधीन कर देता है।
5. संरचनात्मक असमानताओं का संस्थानीकरण
संहिता में “स्वतंत्र” और “गुलाम” के आधार पर अलग-अलग दंड निर्धारित हैं, जो दासत्व की अवधारणा को विधिक मान्यता देते हैं। साथ ही, कुछ प्रावधानों में पशुओं के प्रति क्रूरता के लिए महिलाओं के विरुद्ध हिंसा की तुलना में अधिक कठोर दंड का उल्लेख है। यह कानून के समक्ष समानता के सार्वभौमिक सिद्धांत का स्पष्ट उल्लंघन है।
इन सभी प्रावधानों का सम्मिलित प्रभाव यह है कि 2009 का Elimination of Violence Against Women (EVAW) कानून व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी हो जाता है, जो लैंगिक हिंसा को स्पष्ट रूप से अपराध मानता था।
मानवाधिकार संगठनों और विशेषज्ञों की प्रतिक्रियाएं
संहिता के सार्वजनिक होने के बाद अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समुदाय ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। अफगान मानवाधिकार संगठन रावादारी ने इसे महिलाओं और बच्चों के साथ दुर्व्यवहार को वैध बनाने वाला दस्तावेज बताया।
Georgetown Institute for Women, Peace and Security के अनुसार, यह संहिता महिलाओं को संपत्ति के रूप में देखने वाली व्यवस्था को संस्थागत बनाती है। वहीं Feminist Majority Foundation ने इसे gender apartheid की औपचारिक स्थापना करार दिया।
तालिबान के न्याय मंत्रालय ने इन आलोचनाओं को “शरिया-विरोधी” बताते हुए अस्वीकार किया और आलोचना को अपराध की श्रेणी में रखने का संकेत दिया है, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी प्रश्नचिह्न लग जाता है।
व्यापक सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव
यह संहिता ऐसे समय लागू की गई है जब अफगान महिलाएं पहले ही शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक जीवन से लगभग पूर्णतः बाहर कर दी गई हैं। घरेलू हिंसा के मामलों में न्याय की अनुपस्थिति निजी जीवन को भी असुरक्षित बनाती है और राज्य, परिवार तथा धर्म की संयुक्त संरचना के माध्यम से महिलाओं की अधीनता को सुनिश्चित करती है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, यह संहिता संयुक्त राष्ट्र के CEDAW और Universal Declaration of Human Rights जैसे मानकों के प्रतिकूल है। इसके बावजूद, तालिबान पर प्रभावी अंतरराष्ट्रीय दबाव का अभाव बना हुआ है—मानवीय सहायता जारी है, परंतु उसे अधिकारों से जोड़ने की राजनीतिक इच्छाशक्ति कमजोर दिखाई देती है।
निष्कर्ष
तालिबान की नई आपराधिक प्रक्रिया संहिता घरेलू हिंसा को सीमित वैधता देकर उसे सामाजिक अनुशासन का अंग बना देती है। इससे न केवल लैंगिक समानता और न्याय की संभावनाएं क्षीण होती हैं, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर रूढ़िवादी और दमनकारी शासन की चुनौती को भी उजागर करता है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए यह केवल अफगानिस्तान का आंतरिक मामला नहीं है, बल्कि मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता की परीक्षा है। यदि ठोस कूटनीतिक, कानूनी और नैतिक हस्तक्षेप नहीं हुआ, तो अफगान महिलाएं और बच्चे इस संस्थागत हिंसा के चक्र में फंसे रहेंगे।
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