India–Brazil Strategic Partnership 2026: Strengthening Global South, Trade Diversification and Critical Minerals Cooperation
भारत-ब्राजील साझेदारी: ग्लोबल साउथ में नई ऊर्जा का संचार
वैश्विक व्यवस्था एक निर्णायक संक्रमण के दौर से गुजर रही है। शीत युद्ध के बाद स्थापित एकध्रुवीय ढांचा अब बहुध्रुवीय शक्ति-संतुलन की ओर बढ़ रहा है, जहाँ उभरती अर्थव्यवस्थाएँ अपनी सामूहिक आवाज को संगठित कर रही हैं। इसी संदर्भ में 21 फरवरी 2026 को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री Narendra Modi और ब्राजील के राष्ट्रपति Luiz Inácio Lula da Silva के बीच हुई उच्च स्तरीय बैठक केवल द्विपक्षीय कूटनीति की घटना नहीं, बल्कि ग्लोबल साउथ की उभरती चेतना का प्रतीक है।
यह साझेदारी व्यापार, प्रौद्योगिकी, रक्षा, जलवायु और बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग के माध्यम से एक नई रणनीतिक दिशा निर्धारित कर रही है। दोनों देशों ने अगले पाँच वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार को 20 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक करने का लक्ष्य निर्धारित किया है—जो वर्तमान स्तर से एक उल्लेखनीय वृद्धि है।
ऐतिहासिक संदर्भ: दो लोकतंत्र, साझा दृष्टि
भारत और ब्राजील भौगोलिक रूप से भिन्न महाद्वीपों में स्थित होने के बावजूद कई समानताओं से जुड़े हैं—दोनों विशाल जनसंख्या वाले लोकतंत्र हैं, कृषि और संसाधन-समृद्ध अर्थव्यवस्थाएँ हैं, तथा उपनिवेशवाद के इतिहास से उभरकर वैश्विक राजनीति में स्वतंत्र भूमिका निभा रहे हैं।
दोनों देश लंबे समय से BRICS, G20 और WTO जैसे मंचों पर सहयोग करते रहे हैं। IBSA (India-Brazil-South Africa Dialogue Forum) के माध्यम से भी दक्षिण-दक्षिण सहयोग को संस्थागत रूप दिया गया।
आज यह संबंध केवल “साझा मंच” तक सीमित नहीं, बल्कि “साझा रणनीति” का रूप ले रहा है।
क्रिटिकल मिनरल्स: रणनीतिक स्वायत्तता की कुंजी
21वीं सदी की अर्थव्यवस्था का आधार तेल नहीं, बल्कि लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और रेयर अर्थ तत्व हैं। इलेक्ट्रिक वाहन, सेमीकंडक्टर, रक्षा प्रणालियाँ और नवीकरणीय ऊर्जा इन्हीं पर निर्भर हैं।
ब्राजील विश्व के प्रमुख लिथियम और नीओबियम उत्पादकों में से एक है। भारत, जो अभी तक इन खनिजों के लिए चीन पर काफी हद तक निर्भर रहा है, इस सहयोग के माध्यम से अपनी सप्लाई चेन का विविधीकरण कर सकता है।
यह केवल व्यापार नहीं, बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) का प्रश्न है। यदि भारत को हरित ऊर्जा संक्रमण में अग्रणी बनना है, तो उसे कच्चे माल की स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करनी होगी—और ब्राजील इस दिशा में एक विश्वसनीय साझेदार बन सकता है।
रक्षा और एयरोस्पेस सहयोग: नई संभावनाएँ
ब्राजील की एयरोस्पेस कंपनी Embraer विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त है। भारत के “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” अभियानों के संदर्भ में एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी, ड्रोन, और सैन्य परिवहन विमानों में सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकता है।
साइबर सुरक्षा और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में संयुक्त अनुसंधान परियोजनाएँ दोनों देशों की रक्षा क्षमताओं को मजबूत कर सकती हैं। भारत की ISRO की विशेषज्ञता और ब्राजील की उपग्रह निर्माण क्षमता मिलकर एक प्रभावी साझेदारी मॉडल बना सकती हैं।
डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर: तकनीकी कूटनीति
भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर—जैसे UPI, आधार और डिजिलॉकर—वैश्विक स्तर पर सराहा जा रहा है। यदि ब्राजील इन मॉडलों को अपनाता है, तो यह “टेक्नोलॉजी डिप्लोमेसी” का उदाहरण होगा।
डिजिटल भुगतान प्रणाली, ई-गवर्नेंस और फिनटेक स्टार्टअप सहयोग से दोनों देशों के MSME सेक्टर को नई गति मिल सकती है। इससे वित्तीय समावेशन और रोजगार सृजन में वृद्धि होगी।
MERCOSUR और बाजार विस्तार
ब्राजील दक्षिण अमेरिकी व्यापार ब्लॉक MERCOSUR का प्रमुख सदस्य है। यह भारत को लगभग 500 मिलियन उपभोक्ताओं के बाजार तक पहुँच प्रदान कर सकता है।
भारत का वर्तमान निर्यात मुख्यतः फार्मास्यूटिकल्स, ऑटो पार्ट्स और पेट्रोलियम उत्पादों तक सीमित है। नई साझेदारी के माध्यम से IT सेवाओं, एग्री-टेक, बायोफ्यूल और हरित ऊर्जा में विस्तार संभव है।
यदि भारत-MERCOSUR के बीच व्यापक FTA होता है, तो यह लैटिन अमेरिका में भारत की आर्थिक उपस्थिति को कई गुना बढ़ा सकता है।
जलवायु और सस्टेनेबल डेवलपमेंट
भारत और ब्राजील दोनों जैव-विविधता से समृद्ध देश हैं। ब्राजील का अमेजन वर्षावन और भारत का पश्चिमी घाट वैश्विक पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण हैं।
जलवायु वित्त, कार्बन क्रेडिट और हरित प्रौद्योगिकी में सहयोग से दोनों देश संयुक्त राष्ट्र के मंचों पर एक सशक्त आवाज प्रस्तुत कर सकते हैं।
UN सुधार, विकासशील देशों के ऋण राहत, और वैश्विक दक्षिण के लिए जलवायु वित्त जैसे मुद्दों पर साझा रणनीति अंतरराष्ट्रीय विमर्श को प्रभावित कर सकती है।
चुनौतियाँ: यथार्थ का सामना
1. टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाएँ
दोनों देशों में उच्च आयात शुल्क और नियामक जटिलताएँ व्यापार वृद्धि में बाधा हैं।
2. भौगोलिक दूरी
लॉजिस्टिक्स लागत अधिक होने से व्यापार प्रतिस्पर्धी नहीं बन पाता।
3. नीति असमानताएँ
ब्राजील की अमेजन संरक्षण नीतियाँ और भारत की इंडो-पैसिफिक रणनीति कभी-कभी अलग प्राथमिकताओं को दर्शाती हैं।
4. क्रियान्वयन की समस्या
अक्सर समझौते घोषणाओं तक सीमित रह जाते हैं। इसके लिए निगरानी तंत्र और समयबद्ध लक्ष्य आवश्यक हैं।
समाधान की दिशा
- MERCOSUR के साथ व्यापक FTA वार्ता को गति देना
- संयुक्त R&D फंड स्थापित करना
- डिजिटल ट्रेड फ्रेमवर्क विकसित करना
- निवेश संरक्षण समझौते को मजबूत करना
- सांस्कृतिक आदान-प्रदान—बॉलीवुड और ब्राजीलियन सिनेमा सहयोग
सॉफ्ट पावर के माध्यम से संबंधों को जन-स्तर तक ले जाना दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करेगा।
बहुध्रुवीय विश्व में भारत की भूमिका
भारत आज केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि वैश्विक दक्षिण का नैतिक और रणनीतिक प्रतिनिधि बनता जा रहा है। ब्राजील के साथ साझेदारी इस दृष्टि का विस्तार है।
यह संबंध पश्चिमी देशों के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि संतुलन का प्रयास है। “स्ट्रैटेजिक डाइवर्सिफिकेशन” की नीति भारत को किसी एक ध्रुव पर निर्भर रहने से बचाती है।
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा कही गई यह बात—कि “हमारा व्यापार ट्रस्ट का प्रतिबिंब है”—दरअसल भविष्य की विश्व व्यवस्था की झलक है, जहाँ सहयोग, सम्मान और परस्पर लाभ केंद्रीय तत्व होंगे।
निष्कर्ष: ग्लोबल साउथ का नया अध्याय
भारत-ब्राजील साझेदारी केवल आर्थिक समझौता नहीं, बल्कि एक वैचारिक संदेश है—कि विकासशील देश अब केवल वैश्विक नियमों के अनुयायी नहीं, बल्कि निर्माता भी बनना चाहते हैं।
यदि यह साझेदारी सफल होती है, तो यह ग्लोबल साउथ के लिए एक मॉडल बन सकती है—जहाँ संसाधन-साझाकरण, तकनीकी सहयोग और बहुपक्षीय मंचों पर एकजुटता से एक अधिक न्यायसंगत और संतुलित विश्व व्यवस्था का निर्माण संभव होगा।
आने वाले वर्षों में यह संबंध न केवल व्यापारिक आँकड़ों में, बल्कि वैश्विक नीति-निर्माण में भी अपनी छाप छोड़ेगा।
भारत और ब्राजील की यह निकटता संकेत देती है कि बहुध्रुवीय विश्व अब केवल अवधारणा नहीं—वास्तविकता बन रहा है।
With Reuters, Hindustan Times, India today Inputs
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