Skip to main content

MENU👈

Show more

Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

  राजनीति शास्त्र (Polity & Political Science) की तैयारी को बनाएं आसान और सटीक! क्या आप UPSC, State PCS, UGC NET, PGT या अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं? सही मार्गदर्शन और बेहतरीन स्टडी मटेरियल के लिए विजिट करें: 🌐 www.politypoint.com Polity Point ही क्यों चुनें? विस्तृत एवं सरल नोट्स: भारतीय संविधान, राजव्यवस्था और राजनीतिक सिद्धांत की आसान भाषा में समझ। परीक्षा-उन्मुख सामग्री: पिछले वर्षों के प्रश्नों (PYQs) का विश्लेषण और ट्रेंड के अनुसार स्टडी मटेरियल। क्विज़ और टेस्ट सीरीज़: अपनी तैयारी का सही आकलन करने के लिए नियमित अभ्यास प्रश्न। करंट अफेयर्स से जुड़ाव: राजव्यवस्था से जुड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों का सटीक कवरेज। 🎯 आज ही अपनी सफलता की नींव रखें! अभ्यास शुरू करने और अपनी तैयारी को अगली स्तर पर ले जाने के लिए अभी वेबसाइट पर जाएँ: 👉 www.politypoint.com (स्मार्ट स्टडी करें, सफलता हासिल करें!)

Greenland Crisis 2026: US Pressure, Denmark’s Response and Global Geopolitics

ग्रीनलैंड संकट 2026: अमेरिकी दबाव, डेनमार्क की संप्रभुता और आर्कटिक भू-राजनीति का ऐतिहासिक विश्लेषण

आर्कटिक के शांत और बर्फ़ीले भूभाग में चल रहा तनाव केवल वर्तमान घटनाओं का परिणाम नहीं है — इसकी जड़ें इतिहास, साम्राज्यवादी दावों और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा में गहराई तक जमी हुई हैं। जनवरी 2026 में ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक नील्सन का कठोर बयान इसी लंबे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में उभरकर सामने आता है, जब उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा बार-बार दिए जा रहे “ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने” के सुझावों और दबाव पर दो-टूक प्रतिक्रिया दी:

“अब काफी है। संवाद तभी संभव है, जब वह सम्मान, वैधता और अंतरराष्ट्रीय कानून की सीमाओं के भीतर हो।”

यह वक्तव्य उस समय आया, जब अमेरिका ने हाल ही में वेनेज़ुएला में सैन्य अभियान चलाकर राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार किया — और इसी के साथ यह आशंका बढ़ी कि वाशिंगटन अब रणनीतिक क्षेत्रों पर प्रत्यक्ष नियंत्रण की ओर कदम बढ़ा सकता है।


ऐतिहासिक संदर्भ: ग्रीनलैंड पर दावों का लंबा सिलसिला

ग्रीनलैंड का प्रश्न नया नहीं है — यह औपनिवेशिक इतिहास, शीत युद्ध और आधुनिक भू-राजनीति का संगम है।

  • मध्यकाल में यह द्वीप नॉर्डिक बसाहटों का हिस्सा रहा
  • 18वीं सदी में डेनमार्क-नॉर्वे के नियंत्रण में आया
  • द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने यहाँ सैन्य उपस्थिति स्थापित की
  • 1946 में अमेरिका ने ग्रीनलैंड को खरीदने का औपचारिक प्रस्ताव दिया, जिसे डेनमार्क ने अस्वीकार कर दिया
  • शीत युद्ध के दौरान अमेरिका का थूल एयर बेस आर्कटिक सुरक्षा का मुख्य केंद्र बना
  • 2009 में Self-Government Act के बाद ग्रीनलैंड को व्यापक स्वायत्तता और संसाधन-प्रबंधन का अधिकार मिला

यह इतिहास बताता है कि ग्रीनलैंड हमेशा से केवल एक द्वीप नहीं, बल्कि रणनीतिक संपत्ति और शक्तियों के द्वंद्व का क्षेत्र रहा है।


आधुनिक संदर्भ: ट्रंप-काल में फिर उभरा “ग्रीनलैंड प्रश्न”

2019 में पहली बार डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को “खरीदने” का विचार सार्वजनिक रूप से रखा था।
उस समय डेनमार्क की प्रधानमंत्री ने इसे “बेतुका” कहा — लेकिन 2025-26 में इस विचार की आक्रामक पुनरावृत्ति ने बहस को फिर जिंदा कर दिया।

वेनेज़ुएला अभियान के बाद जब ट्रंप ने ग्रीनलैंड को “अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक संपत्ति” बताया, तो यह केवल बयान नहीं, बल्कि संभावित भू-रणनीतिक इशारा माना गया।


ग्रीनलैंड की रणनीतिक अहमियत — इतिहास से वर्तमान तक

आज ग्रीनलैंड तीन स्तरों पर वैश्विक शक्ति-प्रतिस्पर्धा का केंद्र है:

  1. संसाधन और खनिज
    रेयर अर्थ एलिमेंट्स, यूरेनियम, जिंक और सोना — जो आधुनिक तकनीक और रक्षा उद्योग के लिए महत्वपूर्ण हैं।

  2. आर्कटिक समुद्री मार्ग
    जलवायु परिवर्तन के साथ उभरते नॉर्थ-अटलांटिक रूट्स भविष्य के वैश्विक व्यापार का नया आधार बन सकते हैं।

  3. सैन्य व मिसाइल-रक्षा महत्व
    थूल एयर बेस शीत युद्ध से लेकर वर्तमान तक अमेरिकी सुरक्षा वास्तुकला का मुख्य स्तंभ है।

इतिहास से लेकर आज तक, ग्रीनलैंड पर नियंत्रण का अर्थ है —
आर्कटिक संतुलन पर नियंत्रण।


संप्रभुता, कानून और लोकतांत्रिक अधिकार

यहीं पर आधुनिक अंतरराष्ट्रीय कानून ऐतिहासिक राजनीति से टकराता है।

  • ग्रीनलैंड डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है
  • भविष्य का कोई भी निर्णय ग्रीनलैंड की जनता के जनमत-संग्रह से ही संभव
  • संयुक्त राष्ट्र चार्टर बल-प्रयोग या उसकी धमकी पर रोक लगाता है

इस पृष्ठभूमि में नील्सन का “That’s enough now” केवल प्रतिक्रिया नहीं —
संप्रभुता का ऐतिहासिक-कानूनी दावा है।


वैश्विक प्रतिक्रिया: आर्कटिक शीत-युद्ध की वापसी?

  • डेनमार्क ने स्पष्ट कहा — “ग्रीनलैंड न अमेरिका का था, न होगा।”
  • नॉर्डिक देशों ने लोकतांत्रिक अधिकारों का समर्थन किया
  • रूस और चीन ने इसे “साम्राज्यवादी दबाव” कहा और आर्कटिक उपस्थिति बढ़ाने का संकेत दिया

इस प्रकार यह विवाद द्विपक्षीय नहीं, बल्कि
उभरते बहुध्रुवीय शक्ति-संघर्ष का हिस्सा बन गया है।


क्या ट्रंप-युग 2.0 नई भू-रणनीतिक नीति का संकेत है?

2026 का ग्रीनलैंड संकट बताता है कि अमेरिकी विदेश नीति में
संसाधन-केंद्रित आक्रामक यथार्थवाद मजबूत होता दिख रहा है।

वेनेज़ुएला, आर्कटिक और यूरोपीय सहयोगी —
तीनों ही उदाहरण दर्शाते हैं कि स्थिर गठबंधन के स्थान पर
सीधे शक्ति-प्रयोग और रणनीतिक नियंत्रण को तरजीह दी जा रही है।

लेकिन इतिहास यह भी दर्शाता है —
लोकतांत्रिक समाजों की राजनीतिक आकांक्षा को दबाव से नहीं मोड़ा जा सकता।


समापन

ग्रीनलैंड का यह संकट हमें याद दिलाता है कि
भू-राजनीति केवल वर्तमान की नहीं, इतिहास की निरंतरता भी है।

यह संघर्ष केवल बर्फ़ीली भूमि का नहीं,
बल्कि संप्रभुता, आत्मनिर्णय और शक्ति-राजनीति के टकराव का प्रतीक है।

आने वाले समय में दुनिया देखेगी —
क्या यह विवाद संवाद और सहयोग की ओर मुड़ेगा,
या आर्कटिक में नए शीत-युद्ध की भूमिका-पटकथा लिखी जा रही है।


With Reuters and The Guardian Inputs 

Comments

Advertisement

POPULAR POSTS

Extradition of Tahawwur Rana – A Step Forward in India’s Fight Against Terrorism

 तहव्वुर हुसैन राणा का भारत प्रत्यर्पण: 26/11 मुंबई हमलों के लिए न्याय की दिशा में एक कदम 10 अप्रैल, 2025 को, 26/11 मुंबई आतंकी हमलों के साजिशकर्ताओं में से एक, पाकिस्तानी मूल के कनाडाई-अमेरिकी नागरिक तहव्वुर हुसैन राणा को संयुक्त राज्य अमेरिका से भारत प्रत्यर्पित कर दिया गया। यह घटना 2008 में हुए उन भयावह आतंकी हमलों के 17 साल बाद हुई है, जिसमें 166 से अधिक लोगों की जान गई थी और सैकड़ों घायल हुए थे। राणा का भारत आगमन एक लंबी कानूनी लड़ाई और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का परिणाम है, जो मुंबई हमले के पीड़ितों के लिए न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। राणा की पृष्ठभूमि और भूमिका तहव्वुर हुसैन राणा एक पूर्व पाकिस्तानी सैन्य चिकित्सक था, जो बाद में कनाडा और अमेरिका में व्यवसायी बन गया। उसका नाम तब सुर्खियों में आया जब यह पता चला कि वह डेविड कोलमैन हेडली का करीबी सहयोगी था। हेडली, जो मूल रूप से अमेरिकी-पाकिस्तानी नागरिक था, ने मुंबई हमलों की योजना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इन हमलों को पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) ने अंजाम दिया था। राणा पर आरोप है कि उ...

The Abbottabad Mystery: Osama's Killing and Pakistan's National Humiliation

अबॉटाबाद का रहस्य: एक राष्ट्रीय अपमान की कहानी सन् 2011 की एक काली रात थी। आसमान में बादल छाए थे, और पाकिस्तान के अबॉटाबाद शहर में सन्नाटा पसरा था। यह छोटा-सा शहर, जो हरे-भरे पहाड़ों और सैन्य अकादमी की शान के लिए जाना जाता था, उस रात दुनिया की नजरों में आ गया। एक हवेली, जो बाहर से साधारण-सी दिखती थी, लेकिन अंदर छिपा था दुनिया का सबसे खूंखार आतंकवादी—ओसामा बिन लादेन। और उस रात, अमेरिकी स्पेशल फोर्सेस के हेलीकॉप्टरों ने चुपके से पाकिस्तान की सीमा में प्रवेश किया, बिना किसी को खबर दिए। कुछ ही घंटों में, बिन लादेन मारा गया, और उसका शव समुद्र की गहराइयों में दफन हो गया। लेकिन इस घटना ने पाकिस्तान को एक ऐसे तूफान में धकेल दिया, जिसे फरहतुल्लाह बाबर अपनी किताब ‘द ज़रदारी प्रेसीडेंसी: नाउ इट मस्ट बी टोल्ड’ में "राष्ट्रीय अपमान" कहते हैं। एक हवेली, एक रहस्य अबॉटाबाद कोई जंगल या गुफा नहीं था। यह एक शांत शहर था, जहां सैन्य अकादमी के जवान परेड करते थे और बच्चे स्कूल जाते थे। लेकिन उस हवेली में, जो सैन्य अकादमी से बस कुछ कदम दूर थी, बिन लादेन सालों से छिपा था। ऊंची दीवारें, कांटेदार तार, ...

Sanchar Saathi App Controversy: Security Shield or Privacy Threat?

संचार साधी ऐप: सुरक्षा कवच या गोपनीयता पर चोट? विवाद की गहराई से पड़ताल परिचय डिजिटल तकनीक के इस दौर में स्मार्टफोन केवल एक गैजेट नहीं, बल्कि हमारी व्यक्तिगत दुनिया का विस्तार बन चुके हैं—चाहे वह संचार हो, बैंकिंग, पहचान या रोज़मर्रा के कामकाज। इसी वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने नागरिक सुरक्षा बढ़ाने के उद्देश्य से ‘संचार साधी’ ऐप प्रस्तुत किया था। यह ऐप मोबाइल-संबंधित धोखाधड़ी, अवैध मोबाइल कनेक्शनों और चोरी हुए फोनों की पहचान जैसी समस्याओं से निपटने के लिए विकसित किया गया था। हालांकि, नवंबर 2025 में स्थिति बदल गई, जब दूरसंचार विभाग (DoT) ने सभी मोबाइल निर्माताओं को निर्देश दिया कि वे अपने नए फोनों में इस ऐप को प्री-इंस्टॉल करें। इसके बाद से विवादों की झड़ी लग गई—राजनीतिक दल, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ और गोपनीयता अधिकार कार्यकर्ता इसे नागरिक स्वतंत्रता पर संभावित हमला मान रहे हैं। वहीं सरकार इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और साइबर सुरक्षा के लिए अत्यावश्यक कदम बता रही है। यह लेख इसी बहस का संतुलित और व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। संचार साधी ऐप: उद्देश्य और कामकाज संचार...

New India-US Nuclear Agreement and Nuclear Energy

भारत-अमेरिका परमाणु समझौता और परमाणु ऊर्जा: UPSC GS के संदर्भ में विश्लेषण परिचय भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में परमाणु रिएक्टर निर्माण को लेकर हुई प्रगति ने वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण चर्चा को जन्म दिया है। यह निर्णय भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते (2008) के दो दशकों बाद आया है और भारत की ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी प्रगति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के नए अवसर खोलता है। इस लेख में UPSC के सामान्य अध्ययन (GS) के विभिन्न पहलुओं से इस विषय का विश्लेषण किया जाएगा। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य भारत में परमाणु ऊर्जा का विकास स्वतंत्रता के बाद से ही शुरू हुआ। 1950 के दशक में होमी भाभा के नेतृत्व में भारत ने अपने परमाणु कार्यक्रम की नींव रखी। हालांकि, 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षणों के बाद भारत पर कई प्रतिबंध लगाए गए। 2005 में भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक साझेदारी बनी, जिसके फलस्वरूप 2008 में ऐतिहासिक असैन्य परमाणु समझौता हुआ। यह समझौता भारत को अंतरराष्ट्रीय परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (NSG) के नियमों से छूट दिलाने में सफल रहा, जिससे भारत को परमाणु ईंधन और तकनीक तक पहुँच मिली। हालिया घटनाक...

Gujarat Becomes Second Indian State to Pass UCC: Key Highlights of the 2026 Act

गुजरात एक समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक, 2026: UPSC CSE हेतु संपूर्ण विश्लेषण पाठ्यक्रम संबंध (Syllabus Mapping): GS Paper-2 (शासन व्यवस्था, भारतीय संविधान, सामाजिक न्याय एवं तुलनात्मक राजनीति) 1. चर्चा में क्यों? (Context) हाल ही में गुजरात राज्य समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक, 2026 को भारत के राष्ट्रपति की स्वीकृति (अनुच्छेद 201) प्राप्त हो गई है। उत्तराखंड के पश्चात् गुजरात देश का ऐसा दूसरा प्रमुख राज्य बन गया है, जिसने अपने राज्य में समान नागरिक संहिता लागू की है।  यह कानून राज्य में विवाह, तलाक, संपत्ति का उत्तराधिकार, गोद लेने (Adoption) तथा लिव-इन संबंधों के लिए सभी धर्मों पर लागू होने वाला एक सर्वसमावेशी व एकीकृत कानूनी ढांचा प्रदान करता है। 2. संवैधानिक एवं कानूनी आधार (Constitutional & Legal Framework) समान नागरिक संहिता (UCC) का अर्थ है— नागरिकों की धार्मिक या व्यक्तिगत (Personal) मान्यताओं से परे होकर संपूर्ण भारत के राज्यक्षेत्र में विवाह, तलाक, संपत्ति व उत्तराधिकार संबंधी एक समान नागरिक कानून का होना। अनुच्छेद 44 (DPSP): संविधान के भाग IV में निहित राज्य के नी...

The Story of Palestine: Conflict, Division & Quest for Peace

🌍 फिलिस्तीन की कहानी: संघर्ष, विभाजन और शांति की तलाश 1- शुरुआत: एक पवित्र भूमि में बढ़ता तनाव (1917-1947) फिलिस्तीन वह जगह है जिसे यहूदी, ईसाई और मुसलमान तीनों पवित्र मानते हैं। लेकिन 20वीं सदी की शुरुआत में यह भूमि राजनीति और संघर्ष का मैदान बन गई। 1917 में ब्रिटेन ने बाल्फोर घोषणापत्र जारी किया। इसमें यहूदियों के लिए फिलिस्तीन में एक “राष्ट्रीय घर” बनाने का वादा किया गया। 1920 में लीग ऑफ नेशन्स ने ब्रिटेन को फिलिस्तीन का शासन (ब्रिटिश मण्डेट) सौंप दिया। ब्रिटिश शासन के दौरान यहूदी आप्रवासन तेज़ी से बढ़ा। अरब समुदाय को लगा कि उनकी ज़मीन और अधिकार छिन जाएंगे। 1947 में संयुक्त राष्ट्र ने फिलिस्तीन को दो हिस्सों में बाँटने का प्रस्ताव दिया: 55% यहूदी राज्य (इजराइल) के लिए 45% अरब राज्य(नए फिलिस्तीन) के लिए जेरूसलम – अंतरराष्ट्रीय प्रशासन के अधीन लेकिन अरब देशों और फिलिस्तीनियों ने इसे अपनी ज़मीन का बँटवारा मानकर ठुकरा दिया। 2- इजरायल का जन्म और नक्बा (1948-49) 14 मई 1948 को ब्रिटिश मण्डेट खत्म होते ही इजरायल ने स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। अरब देशों ने युद्ध छेड़ दि...

UN Security Council Backs US-Led Gaza Peace Plan: A Turning Point in Ending the 2025 Gaza War

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा अमेरिकी प्रस्ताव का पारित होना गाजा संघर्ष समाधान की दिशा में अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप का निर्णायक मोड़ प्रस्तावना मध्य-पूर्व के इतिहास में गाजा पट्टी हमेशा से भू-राजनीतिक अस्थिरता, मानवीय संकट और सत्ता-संघर्ष का प्रतीक रही है। 2024–25 के युद्ध ने इस संकट को और अधिक गहरा कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप लाखों लोगों का विस्थापन, बुनियादी ढांचे का पतन और क्षेत्रीय कूटनीति की जटिलता बढ़ी। ऐसे दौर में 17 नवंबर 2025 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा अमेरिका के प्रस्ताव को 15–0 के अभूतपूर्व मतों से पारित किया जाना न केवल एक कूटनीतिक उपलब्धि है, बल्कि संघर्ष समाधान की वैश्विक इच्छा का भी संकेत है। रूस और चीन जैसे स्थायी सदस्यों द्वारा विरोध न करना इस घटना को और विशेष बनाता है। यह प्रस्ताव अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की “गाजा युद्ध समाप्ति योजना”—जिसे अनौपचारिक रूप से Deal of the Century 2.0 का विस्तार माना जा रहा है—को औपचारिक अंतरराष्ट्रीय वैधता प्रदान करता है तथा गाजा में एक बहुराष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल (ISF) की तैनाती का मार्ग प्र...

Putin–Trump Bering Strait Tunnel: A Geopolitical and Economic Analysis of a Transcontinental Dream

 प्रस्तावित पुतिन–ट्रम्प बेरिंग जलडमरूमध्य रेल सुरंग: एक भू-राजनीतिक और आर्थिक विश्लेषण सारांश रूस के RDIF संप्रभु धन कोष के प्रमुख एवं राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के निवेश दूत किरिल दिमित्रिएव द्वारा प्रस्तावित बेरिंग जलडमरूमध्य रेल और मालवाहक सुरंग ने वैश्विक भू-राजनीतिक चर्चाओं को नया आयाम दिया है। लगभग 70 मील लंबी और 8 बिलियन डॉलर की अनुमानित लागत वाली यह परियोजना रूस के चुकोत्का क्षेत्र को अमेरिका के अलास्का राज्य से जोड़ेगी। इसे प्रतीकात्मक रूप से “ पुतिन–ट्रम्प सुरंग ” कहा गया है, जो रूस–अमेरिका संबंधों में संभावित सहयोग और सामरिक मेलजोल का प्रतीक मानी जा रही है। यह लेख इस परियोजना की तकनीकी संभाव्यता , आर्थिक तर्क , और भू-राजनीतिक निहितार्थों का विश्लेषण करता है, इसे 19वीं सदी से अब तक चले आ रहे यूरेशिया–अमेरिका कनेक्टिविटी के ऐतिहासिक विचारों की निरंतरता के रूप में देखता है। 1. परिचय बेरिंग जलडमरूमध्य पृथ्वी के उन दुर्लभ भौगोलिक बिंदुओं में से है जो दो महाद्वीपों— यूरेशिया और उत्तर अमेरिका —को जोड़ते हुए, मात्र 82 किमी (51 मील) चौड़ी समुद्री सीमा से अलग ...

India-US Tariff Dispute : A Comprehensive Analysis

  भारत-अमेरिका टैरिफ विवाद : एक व्यापक विश्लेषण परिचय भारत-अमेरिका टैरिफ विवाद 2025 में एक प्रमुख मुद्दा बनकर उभरा, जिसने दोनों देशों के व्यापारिक और कूटनीतिक संबंधों को प्रभावित किया। इस लेख में टैरिफ विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, वर्तमान स्थिति, कारण, प्रभाव और संभावित समाधान का व्यापक विश्लेषण किया गया है। यह लेख UPSC, SSC, बैंकिंग और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उपयोगी है। 1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 2018: ट्रंप प्रशासन ने भारत से स्टील और एल्यूमीनियम पर अतिरिक्त शुल्क लगाया। 2019: भारत ने जवाबी कार्रवाई में अमेरिकी मोटरसाइकिल, बादाम और सेब जैसे उत्पादों पर टैरिफ बढ़ाया। GSP का हटना: 2019 में अमेरिका ने भारत को सामान्यीकृत प्राथमिकता प्रणाली (GSP) से हटा दिया, जिससे भारत को शुल्क-मुक्त निर्यात का लाभ मिलना बंद हो गया। 2. वर्तमान स्थिति (मार्च 2025) ट्रंप ने दावा किया कि भारत ने टैरिफ कम करने का वादा किया था, लेकिन भारतीय वाणिज्य मंत्रालय ने इसे खारिज कर दिया। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता की, लेकिन कोई ठोस समझौता नहीं हो सका। दोनों देश 2025 के अंत ...