मोदी–मैक्रों की मजबूत जोड़ी और भारत–फ्रांस रिश्तों का गहराता रणनीतिक अर्थ
वैश्विक कूटनीति के तेजी से बदलते परिदृश्य में भारत अब महज एक प्रतिक्रियावादी शक्ति नहीं रह गया है। वह सक्रिय रूप से एजेंडा तय करने वाली शक्ति (agenda-setter) के रूप में उभर रहा है। 21वीं सदी के तीसरे दशक में भारत की विदेश नीति का मूल मंत्र स्पष्ट है—बहु-संरेखण (Multi-Alignment) के साथ रणनीतिक स्वायत्तता।
अमेरिका, रूस, जापान, यूरोपीय संघ और खाड़ी देशों के साथ संतुलित संबंधों के बीच फ्रांस एक ऐसे साझेदार के रूप में सामने आया है, जो न तो भारत पर दबाव डालता है और न ही उसे किसी रणनीतिक निर्भरता में बाँधता है। यह साझेदारी पारंपरिक सैन्य गठबंधनों से अलग, व्यावहारिक, विश्वास-आधारित और भविष्योन्मुखी है।
फरवरी 2026 में फ्रांस के राष्ट्रपति की भारत यात्रा ने इस रिश्ते को नई ऊँचाइयों पर पहुँचा दिया। मुंबई में प्रधानमंत्री और मैक्रों के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ता के दौरान भारत–फ्रांस संबंधों को औपचारिक रूप से “विशेष वैश्विक रणनीतिक साझेदारी (Special Global Strategic Partnership)” में अपग्रेड किया गया।
इसी क्रम में 2026 को “भारत–फ्रांस नवाचार वर्ष” घोषित किया गया, जो रक्षा, तकनीक, AI और इनोवेशन के क्षेत्रों में दीर्घकालिक सहयोग का प्रतीक है। ऐसे में प्रश्न स्वाभाविक है—क्या फ्रांस भारत के लिए ‘नया रूस’ बन सकता है? या यह रिश्ता किसी बिल्कुल नए रणनीतिक मॉडल की ओर संकेत करता है?
मोदी–मैक्रों की केमिस्ट्री: व्यक्तिगत विश्वास से रणनीतिक तालमेल तक
प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति मैक्रों के बीच संबंध अब औपचारिक कूटनीति की सीमाओं से आगे निकल चुका है। यह रिश्ता व्यक्तिगत विश्वास और राजनीतिक समन्वय पर आधारित है—जो आज की वैश्विक राजनीति में दुर्लभ होता जा रहा है।
मैक्रों की यह चौथी भारत यात्रा थी और मुंबई में उनका आगमन इस केमिस्ट्री का प्रतीक बन गया। मरीन ड्राइव पर बिना भारी सुरक्षा के उनका जॉगिंग करना केवल एक व्यक्तिगत शैली नहीं थी, बल्कि भारत की आंतरिक स्थिरता, सुरक्षा-विश्वास और वैश्विक आत्मविश्वास का प्रतीकात्मक संदेश था।
दोनों नेताओं की एक ही कार में यात्रा—जिसे ‘कार डिप्लोमेसी’ कहा गया—इस बात को रेखांकित करती है कि भारत-फ्रांस संबंध अब केवल फाइलों और समझौतों तक सीमित नहीं, बल्कि मानवीय और भरोसेमंद स्तर तक पहुँच चुके हैं।
आज जब वैश्विक व्यवस्था अस्थिर है, ऐसे समय में नेतृत्व-स्तरीय विश्वास कई बार संस्थागत ढाँचों से अधिक निर्णायक साबित होता है। यही कारण है कि फ्रांस भारत को एक स्वतंत्र और जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में स्वीकार करता है।
रक्षा साझेदारी: रूस-केंद्रित अतीत से फ्रांस-केंद्रित विविधीकरण
शीत युद्ध के दौर से लेकर 2000 के दशक तक रूस भारत का सबसे विश्वसनीय रक्षा साझेदार रहा। मिग विमान, सुखोई फाइटर जेट, टी-90 टैंक और S-400 मिसाइल प्रणाली ने इस रिश्ते को तकनीकी सहयोग और रणनीतिक विश्वास की मजबूत नींव दी।
लेकिन 2020 के बाद वैश्विक परिस्थितियाँ बदल गईं—
- यूक्रेन युद्ध
- वैश्विक सप्लाई-चेन बाधाएँ
- द्वितीयक प्रतिबंधों (Secondary Sanctions) का जोखिम
इन कारकों ने भारत को रक्षा क्षेत्र में विविधीकरण (Diversification) की ओर मजबूर किया। यहीं से फ्रांस की भूमिका निर्णायक बनती है।
राफेल लड़ाकू विमान, स्कॉर्पीन पनडुब्बियाँ, और अब 114 अतिरिक्त राफेल विमानों की प्रस्तावित मेगा डील—जिसमें निर्माण का बड़ा हिस्सा भारत में होगा—फ्रांस को भारत के शीर्ष रक्षा साझेदारों में स्थापित कर रही है।
H-125 हेलीकॉप्टर: आत्मनिर्भर भारत का प्रतीक
कर्नाटक के वेमगल में टाटा–एयरबस साझेदारी के तहत H-125 हेलीकॉप्टर की फाइनल असेंबली लाइन केवल एक औद्योगिक परियोजना नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक आत्मनिर्भरता का प्रतीक है।
इस परियोजना का महत्व तीन स्तरों पर है:
- उच्च-ऊँचाई सैन्य संचालन (हिमालयी सीमाएँ)
- आपदा राहत और बचाव अभियान
- भारत को वैश्विक रक्षा-निर्यात केंद्र बनाने की दिशा
फ्रांस की विशेषता यह है कि वह भारत को केवल उपकरण नहीं देता, बल्कि वास्तविक तकनीकी हस्तांतरण के लिए तैयार रहता है—जो रूस-केंद्रित पुराने मॉडल से एक बड़ा बदलाव है।
AI, इनोवेशन और भविष्य की भू-राजनीति
मैक्रों की यात्रा रक्षा तक सीमित नहीं रही। AI इम्पैक्ट समिट 2026 में उनकी भागीदारी यह दर्शाती है कि भारत-फ्रांस साझेदारी अब भविष्य की तकनीकों पर केंद्रित है।
AI, हेल्थटेक, क्रिटिकल मिनरल्स, नवीकरणीय ऊर्जा और कौशल विकास जैसे क्षेत्रों में घोषित सहयोग भारत को केवल तकनीक-उपभोक्ता नहीं, बल्कि नियम-निर्माता (Norm-Setter) बनने की दिशा में ले जाता है।
फ्रांस, जो यूरोप में AI गवर्नेंस का अग्रणी समर्थक है, भारत के साथ मिलकर नैतिक, समावेशी और मानव-केंद्रित AI के वैश्विक मानक गढ़ना चाहता है। यह सहयोग भारत को चीन-अमेरिका तकनीकी प्रतिस्पर्धा से अलग एक तीसरा मार्ग प्रदान करता है।
तो क्या फ्रांस ‘नया रूस’ बन सकता है?
इस प्रश्न का उत्तर सीधे ‘हाँ’ या ‘नहीं’ में नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति के रूपांतरण में छिपा है।
- रूस भारत के लिए शीत युद्ध का भावनात्मक और ऐतिहासिक मित्र था।
- फ्रांस भारत के लिए पोस्ट-वेस्टर्न विश्व व्यवस्था में रणनीतिक सह-निर्माता बन रहा है।
रूस ने भारत को भरोसा दिया,
फ्रांस भारत को रणनीतिक विकल्प और भविष्य की तकनीक दे रहा है।
फ्रांस भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का सम्मान करता है—
- इंडो-पैसिफिक में स्वतंत्र भूमिका
- यूरोप में भारत की मजबूत आवाज
- बिना राजनीतिक शर्तों के तकनीकी सहयोग
निष्कर्ष: ‘नया रूस’ नहीं, बल्कि एक नई श्रेणी का साझेदार
मोदी–मैक्रों की जोड़ी यह स्पष्ट संकेत देती है कि भारत अब ब्लॉकों में नहीं, संतुलन में विश्वास करता है। फ्रांस भारत के लिए ‘नया रूस’ नहीं, बल्कि—
एक आधुनिक, संतुलित और रणनीतिक रूप से परिपक्व साझेदार
यह रिश्ता दर्शाता है कि भारत अब केवल साझेदार नहीं चुनता,
बल्कि साझेदारियों की परिभाषा बदल रहा है।
21वीं सदी की वैश्विक राजनीति में यही भारत की सबसे बड़ी शक्ति है—
स्वायत्तता के साथ सहयोग, और सहयोग के साथ वैश्विक नेतृत्व।
संदर्भ: आजतक समाचार- क्या फ्रांस भारत के लिए ‘नया रूस’ बन सकता है?
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