US–Iran Tensions Rise After Trump’s Warning to ‘Protect Iranian Protesters’: A Geopolitical Analysis
ट्रंप की ‘प्रदर्शनकारियों को बचाने’ की चेतावनी और ईरानी प्रतिक्रिया: वैश्विक शक्ति-राजनीति के बीच उभरता तनाव
जनवरी 2026 की शुरुआत में ही अमेरिका-ईरान संबंध नई तल्ख़ी में प्रवेश करते दिखाई दे रहे हैं। 2 जनवरी को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर ईरान में जारी विरोध प्रदर्शनों के संदर्भ में सख्त लहजे में बयान देते हुए कहा कि यदि ईरानी शासन “शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाता है”, तो संयुक्त राज्य अमेरिका उन्हें “बचाने आएगा” और “हम लॉक्ड एंड लोडेड हैं” — यानी सैन्य प्रतिक्रिया के लिए तैयार हैं। यह बयान ऐसे समय आया है जब ईरान गहरे आर्थिक संकट, मुद्रास्फीति, बेरोजगारी और मुद्रा-संकट से गुजर रहा है, जिसके कारण देश-भर में असंतोष की लहर फैल चुकी है।
आर्थिक संकट से उपजा असंतोष: विरोध प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि
दिसंबर 2025 के अंत से शुरू हुए ये प्रदर्शन शुरुआत में महँगाई और गिरती क्रय-शक्ति के खिलाफ आर्थिक आक्रोश के रूप में उभरे। ईरानी रियाल ऐतिहासिक रूप से कमजोर हुआ, डॉलर के मुकाबले इसकी कीमत 1.4–1.5 मिलियन रियाल प्रति डॉलर के स्तर तक पहुँच गई। इसके साथ-साथ 40–42% तक पहुँची मुद्रास्फीति ने दैनिक जीवन को गम्भीर रूप से प्रभावित किया — आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ीं, वेतन ठहर गए और मध्यम-वर्ग तथा मजदूर-वर्ग की स्थिति अस्थिर हो गई।
तेहरान की व्यावसायिक हड़तालों से शुरू हुआ संघर्ष जल्द ही छात्रों, पेंशनभोगियों और युवाओं तक फैल गया। नारेबाज़ी में आर्थिक शिकायतों से आगे बढ़कर राजनीतिक असंतोष भी प्रकट हुआ — “मुल्लाओं को जाना चाहिए” और “तानाशाही मुर्दाबाद” जैसे नारे शासन-विरोधी भावनाओं के तीखे संकेत देते हैं। महसा अमीनी आंदोलन (2022) के बाद यह सबसे बड़ा जन-उभार माना जा रहा है। सरकार ने आंशिक संवाद और सीमित आर्थिक राहत की घोषणा की, परंतु सुरक्षा बलों के साथ झड़पों में अब तक कई लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है।
ट्रंप की चेतावनी: विदेश-नीति या राजनीतिक संदेश?
ट्रंप का बयान केवल मानवीय सहानुभूति का संकेत नहीं, बल्कि उनकी ईरान-नीति की निरंतरता का हिस्सा भी माना जा रहा है। पूर्ववर्ती वर्षों की “अधिकतम दबाव” नीति, प्रतिबंध-कूटनीति और 2025 के सैन्य तनावों की पृष्ठभूमि इस घोषणा को और सशंकित बनाती है। “लॉक्ड एंड लोडेड” जैसी सैन्य अभिव्यक्ति संकेत देती है कि वाशिंगटन प्रदर्शनकारियों के समर्थन की आड़ में सैन्य-उपस्थिति या आक्रामक हस्तक्षेप की संभावना खुली छोड़ना चाहता है।
यह कदम अमेरिकी घरेलू राजनीति के लिए भी उपयोगी हो सकता है — जहां कठोर विदेश-नीति अक्सर राजनीतिक समर्थन जुटाने का साधन बनती है। साथ ही, यह संदेश ईरानी शासन पर अंतरराष्ट्रीय नैतिक दबाव बनाने का प्रयास भी प्रतीत होता है।
ईरानी नेतृत्व की तीखी प्रतिक्रिया: ‘रेड लाइन’ और संप्रभुता का प्रश्न
ट्रंप के बयान के तुरंत बाद ईरान ने इसे राष्ट्रीय संप्रभुता पर सीधा हस्तक्षेप करार देते हुए कड़ी प्रतिक्रिया दी। शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों ने स्पष्ट कहा कि ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा “रेड लाइन” है और किसी बाहरी शक्ति द्वारा सैन्य दखल का “कठोर जवाब” दिया जाएगा। अमेरिकी “बचाव-नीति” का उल्लेख करते हुए इराक, अफगानिस्तान और गाजा जैसे उदाहरणों पर तंज भी कसा गया — यह बताते हुए कि ऐसे हस्तक्षेपों ने स्थिरता के बजाय हिंसा और अराजकता को जन्म दिया।
सरकारी बयानबाज़ी में अमेरिका और उसके सहयोगियों पर प्रदर्शनों को “कृत्रिम रूप से भड़काने” का आरोप भी जोड़ा गया, हालांकि इसके पक्ष में ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं किए गए। ईरान की चेतावनी का सीधा संकेत क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैनिकों और ठिकानों तक जाता है — जो किसी भी संभावित टकराव की स्थिति में जोखिम-क्षेत्र बन सकते हैं।
भू-राजनीतिक निहितार्थ: समर्थन और हस्तक्षेप के बीच की महीन रेखा
यह घटनाक्रम मध्य-पूर्व की पहले से जटिल शक्ति-राजनीति को और संवेदनशील बना देता है। एक ओर बाहरी समर्थन से प्रदर्शनकारियों के मनोबल को बढ़ावा मिल सकता है, वहीं शासन इसे “विदेशी साजिश” बताकर और कठोर दमन को वैध ठहरा सकता है। इससे विरोध आंदोलन का स्वरूप लोकतांत्रिक अधिकारों के संघर्ष से हटकर भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के मैदान में बदल सकता है।
क्षेत्रीय स्तर पर यह तनाव इजरायल-ईरान प्रतिद्वंद्विता, खाड़ी देशों की सुरक्षा-चिंताओं और ऊर्जा-बाज़ार की अस्थिरता को भी प्रभावित कर सकता है। यदि टकराव बढ़ा, तो इसका असर केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगा — बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की सामरिक संरचना को झकझोर सकता है।
निष्कर्ष: आर्थिक संकट से राजनीतिक उथल-पुथल तक
ईरान में जारी विरोध प्रदर्शन यह दर्शाते हैं कि आर्थिक संकट लंबे समय तक राजनीतिक रूप से निष्क्रिय नहीं रह सकता। जैसे-जैसे दैनंदिन जीवन असहनीय होता है, शासन-विरोधी असंतोष सामाजिक आंदोलन का रूप ले लेता है। परंतु जब इस प्रक्रिया में वैश्विक शक्तियों की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा जुड़ जाती है, तो जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों और भू-राजनीतिक हस्तक्षेप के बीच की रेखा धुंधली पड़ जाती है।
वर्तमान परिस्थिति में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि स्थिति संवाद और सुधार की दिशा में बढ़े — न कि सैन्य टकराव और क्षेत्रीय अस्थिरता की ओर। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि यह आंदोलन ईरान के भीतर सुधार की दिशा में परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करता है, या फिर बाहरी-आंतरिक दबावों के टकराव में और अधिक जटिल हो जाता है।
With Reuters and The Times of India Inputs
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