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Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

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Yemen Crisis 2025: Saudi-UAE Rift Deepens with Mukalla Strike & UAE Withdrawal

यमन संकट का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: सऊदी–यूएई मतभेद और बदलता क्षेत्रीय शक्ति संतुलन

प्रस्तावना

यमन का संघर्ष केवल समकालीन सत्ता-संघर्ष की कहानी नहीं है; यह औपनिवेशिक विरासत, जनजातीय राजनीति, वैचारिक ध्रुवीकरण, क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता और भू-राजनीतिक हस्तक्षेपों से उपजा एक दीर्घकालिक ऐतिहासिक संकट है। दिसंबर 2025 में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच उत्पन्न हालिया तनाव—जिसमें सऊदी-नीत गठबंधन ने मुकल्ला बंदरगाह पर यूएई से जुड़े हथियारों की शिपमेंट को लक्ष्य बनाकर हवाई हमला किया, और उसके बाद यूएई ने अपनी सेना की वापसी की घोषणा की—इस जटिल इतिहास की अगली कड़ी है। इस घटना ने यमन और खाड़ी क्षेत्र की राजनीति को नए मोड़ पर खड़ा कर दिया है, जहां पूर्व सहयोगी अब प्रतिस्पर्धी बन चुके हैं।

इस निबंध का उद्देश्य है—यमन संकट की ऐतिहासिक जड़ों, आंतरिक सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना, क्षेत्रीय शक्तियों की भूमिका और हालिया घटनाओं के व्यापक निहितार्थों का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करना। हम ऐतिहासिक तथ्यों, हाल की घटनाओं और सांख्यिकीय आंकड़ों के आधार पर इस संकट को अधिक स्पष्ट रूप से समझेंगे, जिसमें क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन में बदलाव और मानवीय प्रभाव शामिल हैं।

1. औपनिवेशिक विरासत और उत्तर–दक्षिण विभाजन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

यमन का आधुनिक इतिहास दो समानांतर राजनीतिक प्रवृत्तियों से निर्मित है: एक ओर पारंपरिक जनजातीय–धार्मिक सत्ता संरचना, दूसरी ओर वामपंथी–राष्ट्रवादी राजनीतिक आंदोलन। उत्तर यमन लंबे समय तक ज़ैदी शिया इमामत के अधीन रहा, जहां सत्ता जनजातीय अभिजात्य वर्ग और धार्मिक नेतृत्व के आसपास केंद्रित थी। उदाहरणस्वरूप, 1918 से 1962 तक इमाम याह्या और उनके उत्तराधिकारियों ने उत्तर में एक केंद्रीकृत शासन चलाया, जो जनजातीय गठबंधनों पर निर्भर था।

दक्षिणी यमन पर ब्रिटिश औपनिवेशिक नियंत्रण (1839-1967) रहा, जो एडन को एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र बनाता था। ब्रिटिश प्रस्थान के बाद 1967 में दक्षिण में पीपुल्स डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ यमन (PDRY) की स्थापना हुई, जो समाजवादी नीतियों पर आधारित थी और सोवियत संघ के समर्थन से चली। इसने दक्षिण में आधुनिक शिक्षा, भूमि सुधार और महिलाओं के अधिकारों को बढ़ावा दिया, लेकिन उत्तर की तुलना में अधिक धर्मनिरपेक्ष था।

1990 में दोनों क्षेत्रों का एकीकरण हुआ, लेकिन यह केवल कागजी था। प्रशासनिक असमानताएँ बनी रहीं—उत्तर के जनजातीय प्रभाव केंद्रीय सरकार पर हावी रहे, जबकि दक्षिण में संसाधन-वितरण पर विवाद बढ़े। उदाहरण के लिए, दक्षिण के तेल संसाधनों का बड़ा हिस्सा उत्तर की विकास परियोजनाओं में खर्च होता रहा, जिससे असंतोष बढ़ा। दक्षिण की क्षेत्रीय पहचान—जिसमें ब्रिटिश विरासत और समाजवादी इतिहास शामिल है—कभी पूरी तरह समाहित नहीं हुई। यही ऐतिहासिक विभाजन आगे चलकर दक्षिणी ट्रांजिशनल काउंसिल (STC) और अलगाववादी राजनीति की पृष्ठभूमि बना, जो 2017 में स्थापित हुआ और दक्षिण यमन की स्वतंत्रता की मांग करता है।

2. 2011 की अरब स्प्रिंग और सत्ता रिक्ति का जन्म

अरब स्प्रिंग के दौरान राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह के 2012 में इस्तीफे ने यमन में सत्ता-संतुलन को पूरी तरह अस्थिर कर दिया। सालेह का 33 वर्षीय शासन जनजातीय गठबंधनों और भ्रष्टाचार पर टिका था, लेकिन प्रदर्शनों ने इसे उखाड़ फेंका। नई सरकार कमजोर साबित हुई: राज्य संस्थाएँ विभाजित हो गईं, आर्थिक संकट गहराया (जीडीपी में 12% की गिरावट), और सुरक्षा ढाँचा ढह गया, जिससे अल-कायदा जैसे समूह मजबूत हुए।

इस सत्ता-रिक्ति (power vacuum) में हूती आंदोलन एक संगठित शक्ति के रूप में उभरा। हूतियों का मूल उद्गम 1990 के दशक में ज़ैदी शिया समुदाय की सामाजिक हाशिये, क्षेत्रीय असमानता और राजनीतिक उपेक्षा से जुड़ा था। 2004-2010 के बीच सालेह सरकार के खिलाफ छह युद्धों ने उन्हें मजबूत बनाया। 2014 में हूतियों का सैन्य विस्तार—जिसमें उन्होंने साना पर कब्जा किया—केवल विद्रोह नहीं, बल्कि ऐतिहासिक क्षेत्रीय असंतुलन का विस्फोट था। ईरान के समर्थन ने उन्हें और मजबूत किया, हालांकि हूतियों ने इसे अस्वीकार किया है।

3. सऊदी–यूएई हस्तक्षेप: सहयोग से रणनीतिक विचलन तक

2015 में सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन का हस्तक्षेप हूती-ईरान समीकरण को संतुलित करने के उद्देश्य से शुरू हुआ। गठबंधन में यूएई, बहरीन और अन्य शामिल थे, और संयुक्त राष्ट्र ने इसे मान्यता दी। शुरुआत में सऊदी और यूएई के लक्ष्य समान दिखे: हूतियों को रोकना, अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार (अब्द रब्बू मंसूर हादी की) को बचाना, और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना। गठबंधन ने 2015-2018 के बीच हजारों हवाई हमले किए, लेकिन मानवीय लागत भारी पड़ी।

हालांकि, नीतिगत दृष्टि अलग रही। सऊदी अरब ने यमन की क्षेत्रीय एकता और अपनी सीमा-स्थिरता को प्राथमिकता दी, क्योंकि हूतियों के हमलों ने सऊदी शहरों को निशाना बनाया। यूएई ने दक्षिणी बंदरगाहों (जैसे एडन और मुकल्ला), व्यापार-मार्गों (बाब अल-मंदब जलडमरूमध्य) और रणनीतिक भू-क्षेत्रों में प्रभाव-संतुलन को महत्व दिया। समय के साथ यूएई का समर्थन दक्षिणी अलगाववादी गुटों (STC) के साथ गहराता गया, जो ऐतिहासिक दक्षिण पहचान से जुड़ा था। 2019 से यूएई ने अपनी सेना कम की, लेकिन STC को प्रशिक्षण और हथियार प्रदान जारी रखे। यहीं से दोनों (सऊदी और UAE) के बीच का रणनीतिक फासला धीरे-धीरे संघर्षात्मक रूप लेने लगा, जो 2025 में चरम पर पहुंचा।

4. 2025 का मोड़: सऊदी अल्टीमेटम और यूएई की वापसी

30 दिसंबर 2025 को मुकल्ला बंदरगाह पर सऊदी गठबंधन द्वारा की गई हवाई कार्रवाई—जिसमें यूएई से फुजैराह बंदरगाह से आई हथियारों की शिपमेंट को नष्ट किया गया—और उसके बाद यूएई के सैनिकों की पूर्ण वापसी की घोषणा, केवल तात्कालिक सुरक्षा-घटना नहीं, बल्कि लंबे समय से पनप रहे अविश्वास का सार्वजनिक विस्फोट थी। सऊदी ने इसे "अनधिकृत हथियार आपूर्ति" बताया, जबकि यूएई ने आरोपों से इनकार किया और "आश्चर्य" व्यक्त किया। यमन की सऊदी-समर्थित प्रेसिडेंशियल काउंसिल ने यूएई के साथ रक्षा समझौता रद्द कर दिया और 24 घंटे का अल्टीमेटम जारी किया।

यह घटना तीन प्रमुख संकेत देती है:

1. सऊदी अरब क्षेत्रीय नेतृत्व की निर्णायक पुनर्स्थापना चाहता है, खासकर अपनी सीमाओं के निकट।

2. यूएई सैन्य उपस्थिति के बदले रणनीतिक–आर्थिक प्रभाव को प्राथमिकता दे रहा है, जैसे बंदरगाह नियंत्रण और इजराइल के साथ साझेदारी।

3. यमन अब सहयोगी हस्तक्षेप से अधिक प्रतिस्पर्धी हस्तक्षेप का मैदान बन चुका है, जहां STC के हालिया लाभ (हदरामौत और अल-महरा में) ने तनाव बढ़ाया।

5. हूती आंदोलन के लिए ऐतिहासिक अवसर

गठबंधन में उत्पन्न दरार ने हूतियों पर पड़ रहे सैन्य दबाव को काफी हद तक कम कर दिया है। 2025 के दौरान हूतियों ने लाल सागर में वाणिज्यिक जहाज़ों पर हमलों की तीव्रता बढ़ा दी, जिसे ईरान-समर्थित क्षेत्रीय रणनीति का विस्तार माना जा सकता है। इस बदले हुए शक्ति-संतुलन ने उन्हें राजनीतिक वार्ता में भी लाभ पहुंचा सकता है — ठीक वैसे ही जैसे 2018 के स्टॉकहोम समझौते (समझौते का मुख्य पक्षकार) के समय हुआ था। इसके साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय विमर्श में भी उनकी वैधता बढ़ी है, जहाँ संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न रिपोर्टों में हूतियों को ‘यमन की वास्तविक शक्ति-संरचना’ के रूप में उल्लेखित किया जाने लगा है। यह परिस्थिति इतिहास की उन स्थितियों की पुनरावृत्ति प्रतीत होती है, जब बाहरी शक्तियों के आपसी विभाजन ने यमन के आंतरिक गुटों को मजबूत किया था — जैसे 1960 के दशक में मिस्र और सऊदी अरब के हस्तक्षेप के दौरान हुआ था।

6. दक्षिणी प्रश्न: इतिहास, पहचान और सत्ता-साझेदारी की दुविधा

दक्षिण यमन का प्रश्न केवल अलगाववादी महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि ऐतिहासिक स्मृति और क्षेत्रीय पहचान से जुड़ा है। दक्षिण को लंबे समय तक लगा कि शक्ति-संरचना उत्तर-प्रधान है—उदाहरणस्वरूप, 1994 के गृहयुद्ध में दक्षिण की हार ने असंतोष बोया। संसाधनों के विभाजन पर असंतोष गहरा रहा, जहां हदरामौत के 80% तेल भंडार दक्षिण में हैं लेकिन लाभ उत्तर को जाता रहा। प्रशासनिक प्रतिनिधित्व सीमित रहा, जैसे सैन्य पदों में दक्षिणियों की कमी।

इसलिए STC का उभार भू-राजनीति का परिणाम भर नहीं, बल्कि ऐतिहासिक भावनात्मक–राजनीतिक प्रतिक्रिया भी है। यूएई का समर्थन—जिसमें प्रशिक्षण, हथियार और आर्थिक सहायता शामिल है—इस भावना को नई संस्थागत संरचना देता रहा है। 2025 में STC ने हदरामौत के बड़े हिस्से पर कब्जा किया, जो यूएई की रणनीति का हिस्सा है।

7. मानवीय और सामाजिक आयाम — भू-राजनीति से परे

यमन संकट की सबसे बड़ी त्रासदी सामान्य नागरिकों, बच्चों और शरणार्थी समुदायों पर पड़ी है। 2025 में, 19.5 मिलियन लोग (जनसंख्या का आधा से अधिक) मानवीय सहायता की जरूरत में हैं, जिसमें 17.1 मिलियन भोजन असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। 4.8 मिलियन आंतरिक रूप से विस्थापित हैं, और स्वास्थ्य प्रणाली का पतन हुआ है—80% अस्पताल बंद या क्षतिग्रस्त। शिक्षा का विघटन: 2.5 मिलियन बच्चे स्कूल से बाहर। सामाजिक विखंडन: लिंग-आधारित हिंसा में 30% वृद्धि।

यमन का समाज उस बिंदु पर पहुंच चुका है जहां संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं, मानवीय अस्तित्व का प्रश्न बन गया है। इतिहास गवाही देता है कि जहां सत्ता-संघर्ष लंबा खिंचता है, वहां समाज पीढ़ियों तक पुनर्निर्माण के संघर्ष में फंसा रहता है, जैसे अफगानिस्तान या सोमालिया में।

8. क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन और भविष्य की दिशा

सऊदी–यूएई मतभेद यह संकेत देते हैं कि खाड़ी राजनीति अब केवल सहयोगी नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धी नेतृत्व संरचना की ओर बढ़ रही है। समुद्री व्यापार मार्गों पर नियंत्रण (बाब अल-मंदब, जहां 12% वैश्विक व्यापार गुजरता है), ऊर्जा सुरक्षा (तेल कीमतों में 2-4 डॉलर/बैरल की वृद्धि), और रणनीतिक प्रभाव-क्षेत्र—ये सब यमन को क्षेत्रीय भू–राजनीतिक शतरंज का केंद्रीय मोहरा बनाए रखेंगे। यूएई की इजराइल के साथ साझेदारी (2020 अब्राहम समझौते से) और सऊदी की पाकिस्तान जैसे सहयोगियों के साथ रक्षा समझौते इस बदलाव को तेज कर रहे हैं।

निष्कर्ष: इतिहास से सीख और शांति की चुनौती

यमन का वर्तमान संकट उसके इतिहास से अलग नहीं—बल्कि इसी इतिहास की निरंतरता है। उत्तर–दक्षिण विभाजन, औपनिवेशिक प्रभाव, जनजातीय नेटवर्क, और बाहरी हस्तक्षेप—इन सबने मिलकर यमन को स्थिर राष्ट्र-राज्य के बजाय संघर्षशील राजनीतिक इकाई बना दिया। 2025 की घटनाएँ बताती हैं कि सैन्य हस्तक्षेप अस्थायी समाधान दे सकता है, परंतु समाधान का मार्ग सत्ता-साझेदारी, सामाजिक न्याय और ऐतिहासिक पहचानों के सम्मान से ही निकलेगा। यदि इतिहास से सबक न लिया गया, तो यमन केवल युद्ध का भूगोल नहीं, अनंत अस्थिरता का इतिहास बनता चला जाएगा। शांति के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रयासों—जैसे यूएन-मध्यस्थ वार्ता—को मजबूत करना आवश्यक है, अन्यथा क्षेत्रीय अस्थिरता वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगी।

With Reuters and Al Jazeera Inputs 

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