ताइवान के राष्ट्रपति लाइ चिंग-ते और चीन की सैन्य मंशा: 2026 की दहलीज पर शक्ति-संतुलन का नया परीक्षण
प्रस्तावना
नए वर्ष 2026 की शुरुआत ताइवान जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव और सामरिक अनिश्चितता के बीच हुई। ताइवान के राष्ट्रपति लाइ चिंग-ते ने अपने नववर्षीय संबोधन में जिस दृढ़ स्वर में राष्ट्रीय सार्वभौमिकता की रक्षा और रक्षा क्षमताओं के आधुनिकीकरण की प्रतिबद्धता दोहराई, वह केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि बदलती एशियाई भू-राजनीति का संकेतक भी है। यह वक्तव्य ऐसे समय आया है जब चीन ने ताइवान के चारों ओर व्यापक सैन्य अभ्यास कर अपनी सैन्य शक्ति-प्रदर्शन रणनीति को एक बार फिर रेखांकित किया है।
चीन का सैन्य अभ्यास: शक्ति-संदेश या दबाव-रणनीति?
दिसंबर 2025 के अंत में आयोजित “जस्टिस मिशन 2025” केवल एक नियमित सैन्य अभ्यास नहीं था।
यह अभ्यास—
- नौसेना, वायुसेना, रॉकेट फोर्स और कोस्ट गार्ड
- तटरेखा के अत्यंत निकट लाइव-फायर ड्रिल
- बहु-डोमेन समन्वित ऑपरेशन
—जैसे तत्वों के कारण विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा।
चीन ने इसे “ताइवान स्वतंत्रता समर्थक ताकतों और बाहरी हस्तक्षेप को चेतावनी” करार दिया, वहीं ताइवान के लिए यह गतिविधि क्षेत्रीय शांति और नागरिक सुरक्षा के लिए गंभीर जोखिम बनकर सामने आई। अभ्यास के दौरान उड़ानों का रद्द होना और सेना का हाई-अलर्ट पर जाना इस तनाव की प्रत्यक्ष झलक थी।
राष्ट्रपति लाइ का संदेश: दृढ़ता और तैयारी का संतुलन
राष्ट्रपति लाइ चिंग-ते ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि ताइवान—
- विवाद नहीं चाहता
- तनाव नहीं बढ़ाना चाहता
- लेकिन धमकियों के आगे झुकने वाला भी नहीं है
उन्होंने कहा कि 2026 ताइवान के लिए एक निर्णायक वर्ष हो सकता है—
“सबसे खराब स्थिति के लिए तैयार रहना होगा, लेकिन सर्वोत्तम परिणाम की उम्मीद भी बनाए रखनी है।”
राष्ट्रपति का यह दृष्टिकोण रक्षा-सुदृढ़ीकरण और कूटनीतिक संयम—दोनों के संयुक्त मॉडल को दर्शाता है।
बदलता शक्ति-परिदृश्य: बीजिंग का रुख और रणनीतिक पृष्ठभूमि
चीन ताइवान को अब भी अपने “अविभाज्य भूभाग” के रूप में प्रस्तुत करता है और पुनर्संघटन को ऐतिहासिक अनिवार्यता बताता है।
राष्ट्रपति शी जिनपिंग द्वारा “राष्ट्रीय एकीकरण” को अपरिवर्तनीय प्रक्रिया बताना इस दीर्घकालिक राजनीतिक-सैन्य दृष्टिकोण की पुष्टि करता है।
बीते वर्षों में, विशेषकर लाइ चिंग-ते के सत्ता ग्रहण के बाद—
- सैन्य अभ्यासों की आवृत्ति बढ़ी
- समुद्री एवं वायु घुसपैठ के प्रयास तेज हुए
- मनोवैज्ञानिक एवं दबाव-आधारित रणनीति अपनाई गई
ये कदम न केवल ताइवान, बल्कि व्यापक इंडो-पैसिफिक शक्ति-संतुलन के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण हैं।
ताइवान की रणनीति: रक्षा-आधुनिकीकरण और लोकतांत्रिक स्वाभिमान
ताइवान ने अपनी रक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से विशेष रक्षा बजट योजना प्रस्तावित की है, जो 2026-2033 के बीच लागू होगी।
इसका लक्ष्य—
- रक्षा व्यय को जीडीपी के उच्च अनुपात तक ले जाना
- उन्नत हथियार-प्रणालियों का अधिग्रहण
- स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देना
राष्ट्रपति लाइ का जोर स्पष्ट है—
- संवाद तभी संभव है जब रिपब्लिक ऑफ चाइना (ताइवान का आधिकारिक नाम) के अस्तित्व का सम्मान हो
- ताइवान की लोकतांत्रिक जीवन-शैली को स्वीकार किया जाए
इस प्रकार ताइवान, कूटनीति और आत्म-रक्षा के बीच संतुलित रुख अपनाने का प्रयास कर रहा है।
अंतरराष्ट्रीय आयाम: वैश्विक शक्तियाँ और क्षेत्रीय स्थिरता
अमेरिका, जापान और यूरोपीय देशों के लिए ताइवान केवल एक भू-राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि—
- सप्लाई-चेन
- सेमीकंडक्टर सुरक्षा
- सामरिक समुद्री मार्गों
—से भी सीधे जुड़ा प्रश्न है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय तनाव-वृद्धि को लेकर चिंतित है, क्योंकि किसी भी गलत आकलन या सैन्य दुर्घटना से व्यापक क्षेत्रीय संकट उत्पन्न हो सकता है।
निष्कर्ष: संवाद की आवश्यकता, लेकिन यथार्थ की स्वीकृति भी
ताइवान और चीन के बीच वर्तमान स्थिति एक ऐसे दौर की ओर संकेत करती है जहाँ—
- एक ओर सैन्य दबाव और राजनीतिक दृढ़ता टकरा रहे हैं
- दूसरी ओर शांति और संवाद की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है
2026 इस संघर्ष-समीकरण के लिए निर्णायक वर्ष साबित हो सकता है—
या तो तनाव-नियंत्रण का अवसर बनेगा,
या प्रतिस्पर्धा के नए दौर की शुरुआत।
अभी के लिए इतना स्पष्ट है कि ताइवान जलडमरूमध्य केवल दो तटों के बीच का समुद्री मार्ग नहीं, बल्कि पूर्वी एशिया की सुरक्षा का सबसे संवेदनशील भू-राजनीतिक मंच बन चुका है।
With Reuters Inputs
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