रोमिला थापर की नई किताब: इतिहास, मिथक और व्हाट्सएप फॉरवर्ड्स के दौर में एक ज़रूरी हस्तक्षेप
भारतीय इतिहास-लेखन के क्षेत्र में रोमिला थापर का नाम गहन शोध, वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण और प्रमाण-आधारित तर्क के लिए जाना जाता है। प्राचीन भारत पर उनके अध्ययन ने न केवल इतिहास-चेतना को समृद्ध किया है, बल्कि यह भी दिखाया है कि इतिहास केवल बीते समय की कहानी नहीं, बल्कि वर्तमान को समझने का बौद्धिक उपकरण भी है। उनकी नई पुस्तक “Speaking of History: Conversations about India’s Past and Present” इसी परंपरा का विस्तार है, जिसमें वे लेखक-चिंतक नमित अरोड़ा के साथ संवाद के रूप में भारतीय इतिहास, उसकी व्याख्याओं और समकालीन चुनौतियों पर विचार-मंथन करती हैं।
यह पुस्तक इतिहास को राजाओं-रानियों या युद्धों के घटनाक्रम के रूप में नहीं, बल्कि इतिहास-लेखन की प्रक्रिया, उसकी पद्धति और समाज पर उसके प्रभाव** के रूप में प्रस्तुत करती है। यही दृष्टिकोण इसे पारंपरिक इतिहास-किताबों से अलग और अधिक विवेकपूर्ण बनाता है।
व्हाट्सएप इतिहास: गलतफहमियों का नया संकट
पुस्तक की सबसे महत्वपूर्ण बहस सोशल मीडिया पर फैलते उस तथाकथित “व्हाट्सएप इतिहास” को लेकर है, जो बिना प्रमाण और संदर्भ के मिथकों, अतिरंजनाओं और पूर्वाग्रहों को इतिहास के रूप में प्रस्तुत करता है। थापर स्पष्ट कहती हैं कि यह प्रवृत्ति समाजिक सामंजस्य को तोड़ती है और अतीत के बारे में झूठी धारणाएँ गढ़ती है।
उनके अनुसार इसके दो बड़े कारण हैं—
- शिक्षा-तंत्र की कमजोर गुणवत्ता
- इतिहास को वैज्ञानिक और आलोचनात्मक दृष्टि से पढ़ने-समझने की कमी
ऐसा इतिहास बौद्धिक जिज्ञासा नहीं, बल्कि पहचान-राजनीति और भावनात्मक उग्रता को बढ़ाता है, जो लोकतांत्रिक विमर्श के लिए खतरनाक है।
औपनिवेशिक ढांचे की विरासत और इतिहास की श्रेणियाँ
पुस्तक यह भी दिखाती है कि भारत के इतिहास को धार्मिक द्वैतों — जैसे “हिंदू काल” और “मुस्लिम काल” — में बाँटने की औपनिवेशिक प्रवृत्ति आज भी हमारे बौद्धिक ढांचे पर हावी है। जेम्स मिल जैसे औपनिवेशिक इतिहासकारों द्वारा निर्मित यह रचना-शैली आधुनिक राजनीतिक विमर्श में बार-बार पुनरुत्पादित होती है।
थापर इस पर ज़ोर देती हैं कि इतिहास को सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक और वैचारिक कारकों के संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए, न कि केवल सत्ता-परिवर्तन की रेखीय कथा के रूप में।
इतिहास का वैज्ञानिक दृष्टिकोण: प्रमाण, बहुस्वरीयता और संदर्भ
थापर के लिए इतिहास केवल घटनाओं का विवरण नहीं, बल्कि प्रमाण-आधारित व्याख्या है। वे इतिहास-लेखन में—
- अनेक दृष्टिकोणों,
- अंतःविषयक पद्धतियों
- और तर्कपूर्ण आलोचना
की आवश्यकता पर ज़ोर देती हैं। उनके अनुसार, इतिहास को प्रश्न पूछने की कला के रूप में देखा जाना चाहिए — जहाँ हर दावे की परीक्षा की जाती है और हर तथ्य का संदर्भ समझा जाता है।
वर्तमान राजनीति और इतिहास का दुरुपयोग
आज के सामाजिक-राजनीतिक माहौल में इतिहास को वैचारिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किए जाने की प्रवृत्ति भी पुस्तक का एक केंद्रीय विषय है। थापर मानती हैं कि जब अतीत को वर्तमान की राजनीतिक ज़रूरतों के अनुसार गढ़ा जाता है, तो न केवल इतिहास का निष्पक्ष स्वभाव नष्ट होता है, बल्कि समाज की बहुलतावादी परंपरा भी कमजोर पड़ती है।
उनका तर्क है कि इतिहास को समझना तभी सार्थक है जब वह हमें जिम्मेदार नागरिकता और समावेशी सोच की ओर ले जाए।
पुस्तक क्यों महत्वपूर्ण है?
इस पुस्तक की खासियत यह है कि यह विद्वतापूर्ण होते हुए भी संवादात्मक है। कठिन और बौद्धिक विषयों को यह सरल लेकिन गंभीर शैली में प्रस्तुत करती है। यह उन पाठकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो—
- इतिहास को तथ्यों की सूची नहीं, बल्कि सोचने-समझने की प्रक्रिया के रूप में देखना चाहते हैं,
- सोशल मीडिया पर फैल रही फर्जी ऐतिहासिक कथाओं के प्रति सजग होना चाहते हैं,
- और भारत के अतीत-वर्तमान के रिश्ते की जटिलताओं को समझना चाहते हैं।
समापन: इतिहास और नागरिक चेतना का रिश्ता
रोमिला थापर की यह पुस्तक हमें याद दिलाती है कि इतिहास केवल स्मृतियों का संग्रह नहीं, बल्कि सच की खोज का अनुशासन है। जब इतिहास को व्हाट्सएप फॉरवर्ड्स, राजनीतिक नारों या भावनात्मक रोमांस के माध्यम से समझा जाता है, तो वह अपने मूल उद्देश्य से भटक जाता है। इसके विपरीत, विवेकपूर्ण संवाद और प्रमाण-आधारित अध्ययन हमें उसी दिशा में ले जाते हैं, जहाँ इतिहास समाज को विभाजित नहीं, बल्कि परिपक्व बनाता है।
इस अर्थ में “Speaking of History” केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि हमारे समय के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी और विचार-आमंत्रण है — कि अतीत को समझना, दरअसल, वर्तमान को जिम्मेदारी से जीने की कला है।
With The Hindu Inputs
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