भारत–पाकिस्तान संबंधों में विश्वास-निर्माण की निरंतरता: परमाणु स्थापनाओं और बंदियों की सूचियों का आदान-प्रदान
परिचय
भारत और पाकिस्तान दक्षिण एशिया की सुरक्षा संरचना के केंद्र में स्थित दो परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं। इतिहास गवाह है कि दोनों के संबंधों में युद्ध, संघर्ष, सीमा झड़पें और राजनीतिक अविश्वास की गहरी परतें रही हैं। 1947, 1965, 1971 और 1999 के युद्धों से लेकर समय-समय पर हुए सैन्य तनाव तक, द्विपक्षीय रिश्ते बार-बार टकराव के मोड़ पर पहुँचे हैं। इसके बावजूद कुछ ऐसे विश्वास-निर्माण उपाय (Confidence Building Measures – CBMs) हैं, जो राजनीतिक तनाव के चरम समय में भी जारी रहे हैं।
1 जनवरी 2026 को दोनों देशों द्वारा परमाणु स्थापनाओं तथा बंदियों की सूचियों के आदान-प्रदान का कदम इसी निरंतरता का प्रमाण है। यह आदान-प्रदान ऐसे समय हुआ है जब मई 2025 के चार दिवसीय सैन्य टकराव — जिसे भारत ने “ऑपरेशन सिंदूर” नाम दिया — ने संबंधों को अभूतपूर्व तलहटी तक पहुँचा दिया था। फिर भी, इस परिस्थिति में भी ऐसे तंत्रों का जारी रहना अपने-आप में महत्वपूर्ण संदेश देता है।
परमाणु स्थापनाओं पर हमले न करने का तंत्र: सुरक्षा-स्थिरता का आधार
31 दिसंबर 1988 को हस्ताक्षरित और 1991 से प्रभावी “परमाणु स्थापनाओं एवं सुविधाओं पर हमले के निषेध संबंधी समझौता” दोनों देशों के बीच अपनाए गए सबसे स्थायी CBMs में से एक है। इसके अंतर्गत प्रत्येक वर्ष 1 जनवरी को भारत और पाकिस्तान एक-दूसरे को अपनी उन परमाणु स्थापनाओं की सूची सौंपते हैं जिन पर युद्ध की स्थिति में भी हमला न करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की गई है। वर्ष 2026 में यह इस आदान-प्रदान की लगातार 35वीं कड़ी थी।
परमाणु युग में जहाँ मामूली गलत अनुमान भी विनाशकारी परिणाम दे सकता है, यह समझौता रणनीतिक स्थिरता और आकस्मिक परमाणु जोखिमों को कम करने का अहम उपकरण है। मई 2025 के संघर्ष के दौरान, मिसाइल और ड्रोन हमलों के बावजूद, दोनों देशों द्वारा परमाणु स्थापनाओं को लक्ष्य न बनाए जाना इस तंत्र की विश्वसनीयता और गंभीरता को पुष्ट करता है।
मानवीय आयाम: बंदियों और मछुआरों की सूचियों का आदान-प्रदान
इसी क्रम में 2008 के वाणिज्यिक पहुँच समझौते के तहत 1 जनवरी 2026 को दोनों देशों ने नागरिक बंदियों और मछुआरों की सूचियाँ भी साझा कीं। यह प्रक्रिया वर्ष में दो बार — 1 जनवरी और 1 जुलाई — नियमित रूप से होती है।
भारत ने पाकिस्तान के कारावास में बंद अपने नागरिकों एवं मछुआरों को तत्काल वाणिज्यिक पहुँच और शीघ्र रिहाई की मांग की, वहीं पाकिस्तान ने भी अपनी ओर से सूची साझा की।
यह पहल केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक मानवीय सेतु है। सीमापार मछली-पकड़ क्षेत्र, समुद्री सीमाओं के अस्पष्ट निर्धारण और त्रुटिवश सीमा पार कर जाने के मामलों में फँसे लोगों के लिए यह तंत्र आशा का माध्यम बनता है। परिवारों को अपने प्रियजनों के बारे में जानकारी मिलती है और कई मामलों में रिहाई और पुनर्मिलन का रास्ता खुलता है।
मई 2025 का संघर्ष: पृष्ठभूमि और सीख
अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले में 26 नागरिकों की मृत्यु के बाद उत्पन्न तनाव ने मई 2025 में चार दिवसीय सैन्य टकराव का रूप ले लिया। मिसाइलों, ड्रोन और हवाई हमलों ने हालात को संवेदनशील बना दिया। यद्यपि संघर्ष युद्धविराम पर समाप्त हुआ, लेकिन अविश्वास और राजनीतिक दूरी बनी रही।
ऐसे कठिन समय में भी 1 जनवरी 2026 को CBMs का निर्विघ्न पालन यह दर्शाता है कि दोनों देश कुछ बुनियादी सुरक्षा-रेखाओं और मानवीय मर्यादाओं को बनाए रखने के महत्व को समझते हैं।
समापन: संवाद, स्थिरता और भविष्य की संभावनाएँ
भारत-पाकिस्तान संबंध स्वभावतः जटिल हैं, परंतु परमाणु स्थापनाओं पर हमला न करने का समझौता और बंदियों की सूचियों का नियमित आदान-प्रदान ऐसे संस्थागत तंत्र हैं जो संकट की स्थितियों में भी संतुलन बनाए रखते हैं। 2026 का यह आदान-प्रदान, 2025 के संघर्ष के तुरंत बाद, न केवल परमाणु स्थिरता बल्कि मानवीय संवेदनशीलता के प्रति भी साझा प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है।
भविष्य में यदि दोनों देश इन उपायों को और मजबूत करते हुए संवाद-प्रक्रिया को पुनर्जीवित करें, तो दक्षिण एशिया में स्थायी शांति और सहयोग की संभावनाएँ सुदृढ़ हो सकती हैं। परमाणु युग का सबसे बड़ा सबक यही है — संवाद, संयम और न्यूनतम सहयोग ही वास्तविक सुरक्षा की नींव हैं।
With Hindustan Times Inputs
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