India Belongs to Everyone: An Analysis of Inclusive Nationalism in the Context of the Racial Discrimination and Killing of a Tripura Youth in Uttarakhand
“भारत सबका है" — नस्लीय भेदभाव, क्षेत्रीय पूर्वाग्रह और संवैधानिक भारतीयता का प्रश्न
(त्रिपुरा के युवक की उत्तराखंड में हत्या की घटना के सन्दर्भ में)
भूमिका
हाल ही में उत्तराखंड में त्रिपुरा के एक युवक के साथ हुए नस्लीय भेदभाव और हिंसक हमले ने भारतीय समाज में मौजूद क्षेत्रीय-नस्लीय पूर्वाग्रहों की गहरी परतों को उजागर किया है। उत्तर-पूर्व से आने वाले लोगों के प्रति “अलग दिखने”, “भिन्न भाषा” या “सांस्कृतिक पहचान” के आधार पर बने पूर्वाग्रह, कई बार सामाजिक दूरी और हिंसा का रूप ले लेते हैं।
इसी संदर्भ में जब RSS प्रमुख मोहन भागवत यह कहते हैं कि —
“भारत सबका है, जाति–क्षेत्र–पहचान के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए” —
तो यह कथन केवल नैतिक अपील नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद, संवैधानिक नागरिकता और सामाजिक न्याय के प्रश्न को सीधे स्पर्श करता है।
संवैधानिक दृष्टिकोण — समानता का आदर्श और सामाजिक यथार्थ
भारतीय संविधान नागरिकों के बीच समानता, गरिमा और गैर-भेदभाव की गारंटी देता है—
- अनुच्छेद 14 — कानून के समक्ष समानता
- अनुच्छेद 15 — धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध
- अनुच्छेद 19 — देश में निर्बाध आवागमन व निवास का अधिकार
फिर भी, त्रिपुरा के युवक की हत्या यह दिखाती है कि
कानूनी समानता और सामाजिक व्यवहारिक समानता के बीच अब भी दूरी है।
यह घटना केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों और नस्लीय रूढ़ियों की ओर भी संकेत करती है।
उत्तर–पूर्व के नागरिक और “अन्यीकरण” (Othering) की समस्या
उत्तर-पूर्व के लोगों के प्रति
- चेहरे-मोहरे,
- खान-पान,
- उच्चारण,
- सांस्कृतिक पहचान
के आधार पर बनाए गए पूर्वाग्रह उन्हें “भारतीय समाज के भीतर भी पराया” बना देते हैं।
यह प्रक्रिया सामाजिक विज्ञान की भाषा में “अन्यीकरण” कहलाती है —
जहाँ किसी समूह को अलग, बाहरी और कमतर समझा जाता है।
ऐसे पूर्वाग्रह
- नस्लवादी टिप्पणियों,
- आवास भेदभाव,
- रोजमर्रा के अपमान,
- और अंततः हिंसा
तक पहुँच सकते हैं।
मोहन भागवत के कथन का सामाजिक-राजनीतिक अर्थ
भागवत का कथन इस संदर्भ में तीन स्तरों पर महत्वपूर्ण है —
-
समावेशी भारतीयता की पुनर्पुष्टि
उनकी बात नागरिक पहचान को क्षेत्रीय–भौगोलिक सीमाओं से ऊपर रखती है। -
सार्वजनिक और सामाजिक स्थलों तक समान पहुँच की मांग
यह विचार केवल मंदिर, मार्ग या संस्थानों तक पहुँच तक सीमित नहीं,
बल्कि सम्मानजनक सामाजिक व्यवहार की मांग भी है। -
नैतिक वक्तव्य बनाम संस्थागत प्रतिबद्धता
यदि संगठनात्मक, शैक्षिक और सामाजिक स्तर पर ठोस कदम न उठें,
तो यह संदेश केवल नैतिक घोषणापत्र बनकर रह जाएगा।
घटना से उत्पन्न व्यापक प्रश्न
त्रिपुरा के युवक की हत्या निम्न प्रश्नों को सामने लाती है—
- क्या भारत में अभी भी क्षेत्रीय-नस्लीय भेदभाव मौजूद है?
- क्या संवैधानिक नागरिकता का विचार समाज में समान रूप से आत्मसात हुआ है?
- क्या शिक्षा, मीडिया और सामाजिक संस्थाएँ पूर्वाग्रह तोड़ने में सक्षम हैं?
यह घटना स्पष्ट करती है कि समानता की समस्या केवल जाति तक सीमित नहीं,
बल्कि क्षेत्र, भाषा और नस्लीय पहचान तक भी फैली हुई है।
आगे का रास्ता — नैतिकता से सामाजिक परिवर्तन तक
सार्थक परिवर्तन के लिए आवश्यक है—
- विद्यालयों व विश्वविद्यालयों में बहुलतावादी संवेदनशीलता शिक्षा
- राज्यों के बीच सांस्कृतिक आदान–प्रदान और संवाद
- भेदभाव विरोधी कड़ी कानूनी क्रियान्वयन
- मीडिया और सामाजिक संगठनों की जिम्मेदार भूमिका
- संगठनों के भीतर समावेशी व्यवहारिक प्रशिक्षण
तभी “भारत सबका है” का विचार
वक्तव्य से अनुभव में बदल सकेगा।
निष्कर्ष
त्रिपुरा के युवक की हत्या केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं,
बल्कि भारतीय समाज के समक्ष खड़ा गंभीर नैतिक और सामाजिक प्रश्न है।
मोहन भागवत का संदेश इस संदर्भ में आत्ममंथन का अवसर देता है कि —
राष्ट्र तभी सबका हो सकता है, जब हर नागरिक स्वयं को सम्मानित, सुरक्षित और बराबरी का सहभागी महसूस करे।
समानता का वास्तविक अर्थ यही है कि
भारतीयता किसी क्षेत्र, नस्ल या पहचान से सीमित नहीं —
बल्कि साझा मानवीय गरिमा पर आधारित नागरिक समुदाय का भाव है।
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