वंतारा परियोजना विवाद: वन्यजीव संरक्षण, कॉर्पोरेट भूमिका और भारतीय संघवाद
भूमिका
भारतीय लोकतंत्र में नीतिगत निर्णय केवल प्रशासनिक या आर्थिक विकल्प नहीं होते, बल्कि वे राजनीतिक नैतिकता, संघीय संतुलन और सार्वजनिक हित की कसौटी पर भी परखे जाते हैं। पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में जब निजी और कॉर्पोरेट भागीदारी सामने आती है, तो यह बहस और अधिक जटिल हो जाती है। हाल के वर्षों में रिलायंस फाउंडेशन की वंतारा (Vantara) परियोजना इसी विमर्श के केंद्र में रही है। विशेष रूप से तेलंगाना सरकार द्वारा वंतारा के साथ समझौता‑पत्र (MoU) पर हस्ताक्षर और उससे पूर्व दिल्ली चिड़ियाघर से जुड़े विवाद ने संरक्षण बनाम निजीकरण, राजनीतिक नैतिकता, और केंद्र‑राज्य संबंधों पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। यह निबंध इन सभी आयामों का UPSC GS‑II, GS‑III और निबंध के दृष्टिकोण से समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
वंतारा परियोजना: संरक्षण का नया कॉर्पोरेट मॉडल
वंतारा गुजरात के जामनगर क्षेत्र में विकसित एक विशाल वन्यजीव बचाव, उपचार और पुनर्वास केंद्र है। इसका उद्देश्य उन वन्यजीवों की देखभाल करना है जो मानव‑वन्यजीव संघर्ष, अवैध तस्करी, सर्कस या निजी कैद, तथा प्राकृतिक आपदाओं के कारण संकट में आ जाते हैं। आधुनिक पशु चिकित्सा सुविधाएं, वैज्ञानिक पुनर्वास पद्धतियां, अनुसंधान एवं संरक्षण‑उन्मुख प्रजनन कार्यक्रम इसकी प्रमुख विशेषताएं हैं।
नीतिगत दृष्टि से वंतारा कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) और पर्यावरणीय शासन (Environmental Governance) के उस उभरते मॉडल का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें निजी पूंजी, तकनीक और विशेषज्ञता को सार्वजनिक संरक्षण लक्ष्यों से जोड़ा गया है। यह मॉडल दर्शाता है कि राज्य के सीमित संसाधनों के बीच निजी क्षेत्र संरक्षण प्रयासों को कैसे पूरक भूमिका निभा सकता है।
तेलंगाना MoU: संरक्षण, विकास और शहरी यथार्थ
दिसंबर 2025 में आयोजित तेलंगाना राइजिंग ग्लोबल समिट के दौरान कांग्रेस शासित तेलंगाना सरकार ने वंतारा के साथ MoU पर हस्ताक्षर किए। प्रस्तावित योजना के अंतर्गत हैदराबाद के समीप ‘भारत फ्यूचर सिटी’ क्षेत्र में वन्यजीव संरक्षण केंद्र और नाइट सफारी की स्थापना का प्रस्ताव है। सरकार के अनुसार वंतारा की भूमिका मुख्यतः तकनीकी एवं परामर्शात्मक होगी—जैसे पशु‑कल्याण मानक, पुनर्वास मॉडल और इको‑फ्रेंडली डिज़ाइन।
राज्य सरकार ने इस पहल को जैव विविधता संरक्षण, इको‑टूरिज़्म के माध्यम से रोजगार सृजन और शहरीकरण के दबाव के बीच हरित विकास के मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया है। मुख्यमंत्री द्वारा इसे “संरक्षण‑आधारित और गैर‑व्यावसायिक पर्यटन” बताना यह संकेत देता है कि निजी भागीदारी को राज्य एक सहायक साधन के रूप में देख रहा है, न कि नीति‑निर्धारक के रूप में।
दिल्ली ज़ू विवाद: संरक्षण से अधिक राजनीति?
इसके विपरीत, जून 2025 में दिल्ली के नेशनल ज़ूलॉजिकल पार्क और वंतारा के बीच संभावित सहयोग को लेकर कांग्रेस ने तीखा विरोध दर्ज कराया था। आरोप लगाए गए कि प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है, सार्वजनिक संस्थानों के निजीकरण का मार्ग प्रशस्त किया जा रहा है, और केंद्र सरकार कॉर्पोरेट हितों को प्राथमिकता दे रही है।
यह विवाद केवल पर्यावरणीय या प्रशासनिक नहीं था, बल्कि इसमें राजनीतिक‑वैचारिक आयाम भी निहित थे। विपक्ष के रूप में कांग्रेस ने इसे लोकतांत्रिक निगरानी और सार्वजनिक संस्थानों की रक्षा के प्रश्न से जोड़ा, जबकि केंद्र सरकार ने इसे संरक्षण क्षमता बढ़ाने की पहल बताया।
दोहरी नीति या संघीय यथार्थ?
तेलंगाना और दिल्ली के उदाहरणों को साथ रखकर देखने पर ‘दोहरी नीति’ का आरोप स्वाभाविक रूप से उभरता है। किंतु UPSC दृष्टि से इसे केवल राजनीतिक विरोधाभास मानना सतही विश्लेषण होगा। इसके पीछे कुछ गहरे संरचनात्मक कारण हैं:
- संघीय ढांचा – भारत में पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण समवर्ती विषय हैं। राज्य सरकारें स्थानीय विकास, निवेश और रोजगार के प्रत्यक्ष दबावों का सामना करती हैं।
- सत्ता बनाम विपक्ष की भूमिका – विपक्ष में रहते हुए आलोचना और निगरानी लोकतांत्रिक दायित्व है, जबकि सत्ता में रहते हुए प्रशासनिक व्यावहारिकता और विकासात्मक दबाव हावी होते हैं।
- PPP मॉडल की अस्पष्टता – संरक्षण क्षेत्र में निजी भागीदारी के लिए स्पष्ट राष्ट्रीय दिशानिर्देशों का अभाव राजनीतिक भ्रम और विवाद को जन्म देता है।
संरक्षण में निजी क्षेत्र की भूमिका: अवसर और जोखिम
सकारात्मक पहलू:
- वित्तीय संसाधनों और उन्नत तकनीक की उपलब्धता,
- अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम संरक्षण प्रथाओं का समावेश,
- सरकारी तंत्र पर वित्तीय और प्रशासनिक दबाव में कमी।
चुनौतियां:
- जवाबदेही और सार्वजनिक निगरानी की कमी का जोखिम,
- लाभ‑प्रेरणा के संरक्षण उद्देश्यों पर हावी होने की आशंका,
- स्थानीय समुदायों और आदिवासी हितों की उपेक्षा।
इसलिए आवश्यक है कि संरक्षण में सभी PPP या CSR‑आधारित सहयोग:
- स्पष्ट कानूनी और नीतिगत ढांचे के अंतर्गत हों,
- संसद, विधानसभाओं और नागरिक समाज की निगरानी में संचालित हों,
- जैव विविधता संरक्षण को प्राथमिक उद्देश्य बनाए रखें।
निष्कर्ष: संरक्षण को राजनीति से ऊपर उठाने की आवश्यकता
वंतारा प्रकरण यह स्पष्ट करता है कि भारत में विकास, संरक्षण और राजनीति गहराई से एक‑दूसरे से जुड़े हुए हैं। मूल प्रश्न यह नहीं है कि निजी क्षेत्र को शामिल किया जाए या नहीं, बल्कि यह है कि किस शर्तों पर, किस स्तर तक और किस उद्देश्य से उसे शामिल किया जाए। यदि कॉर्पोरेट भागीदारी वैज्ञानिक संरक्षण, जैव विविधता की रक्षा और स्थानीय आजीविका को सशक्त बनाती है, तो उसे केवल राजनीतिक संदेह के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।
अंततः, वन्यजीव संरक्षण न तो किसी दल का एजेंडा है और न ही किसी कॉर्पोरेट की संपत्ति—यह एक राष्ट्रीय और अंतर‑पीढ़ीगत दायित्व है। UPSC दृष्टिकोण से यही संतुलित, नैतिक और व्यावहारिक समझ एक परिपक्व लोकतंत्र की पहचान है।
संभावित प्रश्न
वंतारा परियोजना से जुड़े UPSC Mains (GS-II, GS-III, निबंध) के लिए संभावित प्रश्न विषयवार प्रस्तुत हैं — पूरी तरह परीक्षा-उन्मुख और समसामयिक:
🔹 GS PAPER–II (राजव्यवस्था, शासन, संघवाद)
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“वन्यजीव संरक्षण में निजी क्षेत्र की भागीदारी संघीय ढांचे में नई चुनौतियाँ उत्पन्न करती है।”
वंतारा परियोजना के संदर्भ में चर्चा कीजिए। -
केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा एक ही कॉर्पोरेट परियोजना पर भिन्न दृष्टिकोण अपनाना लोकतांत्रिक नैतिकता को कैसे प्रभावित करता है?
दिल्ली ज़ू विवाद और तेलंगाना MoU के उदाहरण सहित विश्लेषण करें। -
राजनीतिक दलों की सत्ता और विपक्ष की भूमिकाओं में नीति-संगति बनाए रखना क्यों कठिन होता है?
वंतारा प्रकरण के आलोक में स्पष्ट कीजिए। -
सार्वजनिक संस्थानों में निजी भागीदारी की सीमा क्या होनी चाहिए?
वन्यजीव संरक्षण के संदर्भ में उत्तर दीजिए।
🔹 GS PAPER–III (पर्यावरण, संरक्षण, विकास)
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वन्यजीव संरक्षण में PPP और CSR मॉडल अवसर भी हैं और जोखिम भी।
वंतारा परियोजना के उदाहरण से समालोचनात्मक विवेचना करें। -
भारत में संरक्षण-आधारित पर्यटन (Conservation-led Tourism) की संभावनाएँ और सीमाएँ क्या हैं?
नाइट सफारी मॉडल के संदर्भ में उत्तर दीजिए। -
क्या कॉर्पोरेट-प्रेरित संरक्षण मॉडल जैव विविधता संरक्षण को सुदृढ़ कर सकता है?
तर्क सहित उत्तर दीजिए। -
पर्यावरणीय शासन (Environmental Governance) में निजी क्षेत्र की बढ़ती भूमिका से जुड़े नियामक अंतरालों की पहचान कीजिए।
🔹 GS PAPER–IV (नैतिकता, ईमानदारी, योग्यता)
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“संरक्षण का उद्देश्य साधन को न्यायोचित नहीं बनाता।”
इस कथन की विवेचना वंतारा परियोजना के संदर्भ में कीजिए। -
यदि आप राज्य के वन्यजीव संरक्षण विभाग के सचिव हों और कॉर्पोरेट भागीदारी पर जन-विरोध हो, तो आप नैतिक संतुलन कैसे स्थापित करेंगे? (Case-study आधारित प्रश्न)
🔹 निबंध (Essay – 125/250 शब्द)
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“संरक्षण और विकास के बीच संघर्ष नहीं, बल्कि संतुलन की आवश्यकता है।”
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“प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण राज्य का दायित्व है, परंतु उसकी रक्षा में समाज और निजी क्षेत्र की भूमिका भी अपरिहार्य है।”
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“जब नीति राजनीति से प्रेरित हो जाए, तब संरक्षण भी विवाद बन जाता है।”
🔹 Prelims (Objective Orientation)
- वंतारा परियोजना से संबंधित निम्न कथनों पर विचार कीजिए:
- यह एक निजी-नेतृत्व वाली वन्यजीव पुनर्वास परियोजना है।
- इसका उद्देश्य केवल पर्यटन विकास है।
- यह CSR आधारित संरक्षण मॉडल का उदाहरण है।
🔑 परीक्षोपयोगी संकेत (Exam Tip)
वंतारा जैसे विषयों में UPSC सीधे परियोजना से अधिक
PPP, संघवाद, नैतिकता, पर्यावरणीय शासन पर प्रश्न पूछता है।
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