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End of Hereditary Peers in the House of Lords: A Historic Reform in British Parliamentary Democracy

हाउस ऑफ लॉर्ड्स में वंशानुगत पीयर्स की सदस्यता का अंत: ब्रिटिश लोकतंत्र के विकास का एक निर्णायक अध्याय ब्रिटेन की संसदीय परंपरा विश्व की सबसे पुरानी और स्थायी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में से एक मानी जाती है। किंतु इस गौरवपूर्ण परंपरा के भीतर कुछ ऐसे तत्व भी रहे हैं जो आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ लंबे समय से असंगत माने जाते रहे हैं। इनमें सबसे प्रमुख था हाउस ऑफ लॉर्ड्स में वंशानुगत पीयर्स (Hereditary Peers) की सदस्यता—एक ऐसी व्यवस्था जिसके अंतर्गत कुलीन परिवारों के सदस्य केवल अपने जन्म के आधार पर संसद के ऊपरी सदन में स्थान प्राप्त करते थे। मार्च 2026 में ब्रिटिश संसद द्वारा पारित Hereditary Peers Bill इस व्यवस्था को समाप्त करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। इसके साथ ही सदियों से चली आ रही वह परंपरा समाप्त हो जाएगी जिसके अंतर्गत राजनीतिक शक्ति का एक हिस्सा जन्माधिकार से निर्धारित होता था। यह सुधार न केवल एक संस्थागत परिवर्तन है, बल्कि ब्रिटिश लोकतंत्र के क्रमिक आधुनिकीकरण की उस दीर्घकालिक प्रक्रिया का हिस्सा है जिसमें सामंती विरासतों को धीरे-धीरे लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुरू...

Free Speech in Contemporary India: Evaluating Salman Rushdie’s Critique of Civil Liberties under Modi’s Administration

Free Speech in Contemporary India: Salman Rushdie की आलोचना और मोदी शासन के संदर्भ में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मूल्यांकन

(A fresh, original, flowing, exam-oriented essay)

भूमिका

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी भी लोकतंत्र का प्राणतत्व है—एक ऐसा संवैधानिक आश्वासन जो नागरिकों को सत्ता से सवाल पूछने, अन्याय पर आवाज़ उठाने और समाज में बौद्धिक विविधता को बनाए रखने की क्षमता देता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) यही लोकतांत्रिक आधार प्रदान करता है, हालांकि अनुच्छेद 19(2) के "उचित प्रतिबंध" इस अधिकार को सीमित भी करते हैं। उपनिवेशकालीन विरासत से उत्पन्न ये सीमाएँ समय-समय पर राजनीतिक परिस्थितियों से प्रभावित होती रही हैं।

इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में प्रसिद्ध लेखक सलमान रुश्दी ने दिसंबर 2025 के एक साक्षात्कार में भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के क्षरण को लेकर चिंता व्यक्त की। उन्होंने आरोप लगाया कि बढ़ते "हिंदू राष्ट्रवाद" और "इतिहास के पुनर्लेखन" की आधिकारिक परियोजनाओं ने लेखकों, पत्रकारों तथा शिक्षाविदों पर दबाव बढ़ाया है, जिससे सार्वजनिक विमर्श भय और संकोच से ग्रस्त हो रहा है। रुश्दी की यह टिप्पणी भारत में एक बार फिर उस बहस को तेज कर देती है—क्या वास्तव में "नए भारत" में स्वतंत्र अभिव्यक्ति का दायरा संकुचित हो रहा है, या यह आलोचना अतिशयोक्तिपूर्ण तथा आंशिक सत्य पर आधारित है?

निम्नलिखित विश्लेषण रुश्दी के दावों की जांच ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, डेटा, संस्थागत रुझानों और वैकल्पिक दृष्टिकोणों के आधार पर करता है। निष्कर्ष यह कि संकट मौजूद है, पर इसका रूप एकतरफा राजनीतिक नहीं, बल्कि बहुआयामी संरचनागत है।


I. अभिव्यक्ति पर बढ़ते दबाव: रुश्दी की आलोचना के समर्थन में प्रमाण

रुश्दी की चिंताएँ कोई निजी निष्कर्ष नहीं, बल्कि पिछले दशक में विभिन्न स्वतंत्र आकलनों द्वारा संकेतित गिरावट से मेल खाती हैं।

1. वैश्विक सूचकांक और प्रेस स्वतंत्रता में गिरावट

  • रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) के प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में 2014 में भारत की रैंक 140 थी, जो 2025 तक गिरकर 151 हो गई।
  • आकलन के अनुसार पत्रकारों पर मुकदमे, डराने-धमकाने की प्रवृत्ति, और मीडिया पर राजनीतिक तथा आर्थिक प्रभाव बढ़ा है।
  • UAPA, IT Act और अन्य कठोर कानूनों का व्यापक उपयोग रिपोर्टिंग को जोखिमपूर्ण बनाता है।

2. मीडिया संस्थानों और डिजिटल स्पेस पर नियंत्रण

  • कर-छापों, लाइसेंस जांच और कंटेंट ब्लॉकिंग जैसी कार्रवाइयों ने मीडिया संगठनों पर अप्रत्यक्ष दबाव बढ़ाया है।
  • 2021 के IT नियमों ने ऑनलाइन प्लेटफार्मों को सरकारी आदेशों के आधार पर बिना न्यायिक स्वीकृति तत्काल सामग्री हटाने के लिए बाध्य किया।
  • इंटरनेट शटडाउन की संख्या में भारत दुनिया में शीर्ष पर है—यह डिजिटल स्वतंत्रता पर एक बड़ा प्रहार है।

3. सामाजिक माहौल और सांस्कृतिक असहिष्णुता का उभार

  • सर्वेक्षणों से पता चलता है कि जनता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को समर्थन तो देती है, लेकिन सरकार की आलोचना को लेकर सहनशीलता कम है।
  • कई मामलों में भीड़ का दबाव, ट्रोलिंग, और "राष्ट्र-विरोधी" का लेबल आलोचकों पर लगाया गया है।
  • अकादमिक स्वतंत्रता और विश्वविद्यालयों में बहस का वातावरण भी ध्रुवीकृत हुआ है।

यह पूरा परिदृश्य उस "चिलिंग इफ़ेक्ट" की पुष्टि करता है, जिसकी ओर रुश्दी संकेत करते हैं—एक ऐसा वातावरण जिसमें लोग कानून से अधिक सामाजिक प्रतिकूलता के भय से खुद को सेंसर करने लगते हैं।


II. प्रतिवाद: क्या संकट उतना नया या एकतरफा है जितना कहा जा रहा है?

रुश्दी की आलोचना का एक सशक्त प्रतिवाद यह है कि भारतीय अभिव्यक्ति स्वतंत्रता का संकट कोई नवीन घटना नहीं है।

1. ऐतिहासिक निरंतरता

  • 1951 का प्रथम संवैधानिक संशोधन स्वयं "व्यापक प्रतिबंध" जोड़कर आया था।
  • 1988 में रुश्दी की ही द सैटेनिक वर्सेस को प्रतिबंधित किया गया था, और वह भी कांग्रेस सरकार द्वारा—अर्थात राजनीतिक दलों के बदलने से दृष्टिकोण हमेशा नहीं बदला।
  • 295A, 153A जैसे "भावनाएँ आहत" होने को अपराध बनाने वाले कानून दशकों से लागू हैं और आज भी राजनीतिक रूप से सुविधाजनक बने हुए हैं।

2. न्यायपालिका की भूमिका

  • न्यायालयों ने कई बार अभिव्यक्ति पर प्रतिबंधों की व्याख्या राज्य के पक्ष में विस्तृत रूप से की है।
  • हालांकि हाल के वर्षों में (जैसे देशद्रोह कानून पर रोक), कुछ सुधारवादी संकेत भी मिले हैं।

3. जीवंत मीडिया के उदाहरण

  • कई डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म, स्वतंत्र पोर्टल और पत्रकार कठोर आलोचनाएँ करते रहते हैं—जो दर्शाता है कि पूर्ण दमन की स्थिति नहीं है।
  • चुनावी वातावरण में सरकार-विरोधी रिपोर्टिंग भी सहज रूप से देखने को मिलती है।

इन प्रतिवादों का सार यह है कि समस्या केवल "मोदी युग" की परिणति नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक रूप से निर्मित ढाँचों का निरंतर विस्तार है।


III. समग्र मूल्यांकन: समस्या का वास्तविक स्वरूप—संरचनागत, बहुस्तरीय और राजनीतिक-सांस्कृतिक

रुश्दी की आलोचना में सच्चाई है, पर उसका सही अर्थ समझने के लिए भारत के व्यापक लोकतांत्रिक पर्यावरण को देखना जरूरी है।

1. संरचनागत पक्ष

  • अभिव्यक्ति को सीमित करने वाले कानून—UAPA, 124A, 295A—स्वयं राज्य को विशाल विवेकाधिकार देते हैं।
  • प्रशासनिक आदेशों (जैसे कंटेंट ब्लॉकिंग या छापे) पर न्यायिक निगरानी न होने से सत्ता को तत्काल निर्णय लेने की सुविधा मिलती है।

2. राजनीतिक-आर्थिक कारक

  • बड़े मीडिया संस्थानों का कॉर्पोरेट और सरकार-संबद्ध समूहों द्वारा अधिग्रहण संपादकीय स्वतंत्रता को प्रभावित करता है।
  • सरकारी विज्ञापन पर निर्भरता ने "ग़ोदी मीडिया" जैसी आलोचनाएँ जन्म दी हैं।

3. सांस्कृतिक और सामाजिक तनाव

  • धार्मिक ध्रुवीकरण के कारण संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा करना मुश्किल होता जा रहा है।
  • भीड़-आधारित प्रतिरोध, ऑनलाइन धमकियाँ और ट्रोल आर्मी बौद्धिक माहौल को और संकुचित करते हैं।

इसलिए खतरा केवल "बड़ी सत्ता" से नहीं, बल्कि "समाज और संस्थानों" दोनों की दिशा से आता है। भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दो-तरफ़ा दबाव में है—ऊपर से राज्य और नीचे से समाज।


IV. आगे का मार्ग: लोकतंत्र की साँस बचाने के लिए आवश्यक सुधार

1. कानूनी सुधार

  • देशद्रोह कानून (124A) को पूर्ण रूप से समाप्त करना।
  • UAPA के दुरुपयोग पर कठोर न्यायिक निगरानी।
  • अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध लगाने से पहले न्यायिक पूर्व-स्वीकृति अनिवार्य करना।

2. मीडिया स्वायत्तता

  • मीडिया स्वामित्व पर एंटी-ट्रस्ट कानूनों को सख्ती से लागू करना।
  • सरकारी विज्ञापन वितरण को पारदर्शी बनाना।
  • सार्वजनिक प्रसारक संस्थाओं को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करना।

3. सांस्कृतिक सुधार

  • विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में विचार-विमर्श को प्रोत्साहित करना।
  • "भावनाएँ आहत" की संस्कृति से अधिक "संवाद" की संस्कृति विकसित करना।

ये उपाय भारत की लोकतांत्रिक आत्मा को मजबूती दे सकते हैं और उसे "जहाँ मन भय से मुक्त हो" वाली स्थिति की ओर ले जा सकते हैं, जैसा टैगोर ने कल्पना की थी।


निष्कर्ष

सलमान रुश्दी की आलोचना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं; वर्तमान भारतीय परिप्रेक्ष्य में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अनेक प्रकार के दबाव साफ़ दिखाई देते हैं। परंतु यह भी उतना ही सच है कि भारत की यह समस्या किसी एक शासन या एक दशक की देन नहीं है—यह लंबे समय में विकसित हुई संरचनागत कमज़ोरियों, कानूनों, सामाजिक असहिष्णुता और राजनीतिक हितों का परिणाम है।

आज भारत उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ लोकतांत्रिक संरचना तो मज़बूत है, पर उसकी आत्मा—अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता—संकोचग्रस्त और संदिग्ध होती जा रही है।
इसलिए आवश्यक है कि सुधारों को "वर्तमान सरकार की आलोचना" के बजाय "भारतीय लोकतंत्र के पुनर्निर्माण" के रूप में देखा जाए। तभी भारत सचमुच उस दिशा में आगे बढ़ सकेगा जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान की पंक्तियों से निकलकर नागरिक जीवन का वास्तविक अनुभव बन सके।


With India Today Inputs 

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