ईरान में अशांति 2025–26: आंतरिक संकट से वैश्विक चिंता तक
प्रस्तावना
दिसंबर 2025 से ईरान जिस उथल-पुथल से गुजर रहा है, वह केवल एक आंतरिक राजनीतिक संकट नहीं रह गया है, बल्कि धीरे-धीरे एक अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय बनता जा रहा है। शुरुआत में यह आंदोलन महंगाई, बेरोज़गारी, मुद्रा के पतन और रोज़मर्रा की ज़रूरतों की कमी के खिलाफ था, लेकिन कुछ ही हफ्तों में यह विरोध धार्मिक-राजनीतिक शासन व्यवस्था के विरुद्ध खुली चुनौती में बदल गया। अब सड़कों पर उतरने वाले लोग केवल रोटी और रोज़गार नहीं, बल्कि आज़ादी, न्याय और सत्ता परिवर्तन की मांग कर रहे हैं।
आंदोलन की पृष्ठभूमि
तेहरान के ग्रैंड बाज़ार से शुरू हुआ असंतोष धीरे-धीरे मशहद, इस्फहान, शिराज़, तबरीज़ और कुर्द बहुल इलाकों तक फैल गया। लंबे समय से चले आ रहे आर्थिक प्रतिबंधों, आंतरिक भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अक्षमता ने आम जनता का भरोसा तोड़ दिया है।
युवा वर्ग, महिलाएं और श्रमिक इस आंदोलन की रीढ़ बन गए हैं। नारे अब केवल महंगाई के खिलाफ नहीं, बल्कि धार्मिक नेतृत्व और सत्ता संरचना को चुनौती देने वाले बन चुके हैं। इससे स्पष्ट है कि यह आंदोलन केवल आर्थिक नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन की मांग कर रहा है।
दमन और मानवाधिकार संकट
सरकार ने इन प्रदर्शनों का जवाब कठोर दमन से दिया। इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गईं, सोशल मीडिया पर रोक लगाई गई और हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया। कई शहरों में सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़पें हुईं।
मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि हजारों लोग मारे गए या गंभीर रूप से घायल हुए हैं, जबकि सरकार इन आंकड़ों को कम बताती है। तेज़ ट्रायल, कड़ी सज़ा और फांसी की चेतावनियों ने डर का माहौल पैदा कर दिया है। यह स्थिति ईरान को एक गहरे मानवाधिकार संकट की ओर धकेल रही है।
अमेरिका की भूमिका और रणनीतिक विकल्प
इस संकट में अमेरिका खुलकर प्रदर्शनकारियों के समर्थन में सामने आया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरानी जनता को समर्थन का संदेश देते हुए चेतावनी दी कि अगर दमन जारी रहा तो “कड़ी कार्रवाई” की जाएगी।
अमेरिका के सामने तीन प्रमुख विकल्प हैं—
- कूटनीति: ईरान से बातचीत के जरिए संकट को शांत करना। इतिहास बताता है कि तनाव के दौर में भी दोनों देश कभी-कभी बातचीत का रास्ता निकालते रहे हैं।
- सीमित सैन्य कार्रवाई: ईरानी सैन्य ढांचे या रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स के ठिकानों पर सीमित हमले, ताकि दबाव बनाया जा सके।
- पूर्ण सैन्य हस्तक्षेप: यह सबसे खतरनाक विकल्प है, जो पूरे पश्चिम एशिया को युद्ध में झोंक सकता है और भारी जान-माल की हानि का कारण बन सकता है।
ईरानी बुद्धिजीवियों और प्रवासी विचारकों का एक वर्ग मानता है कि बाहरी हस्तक्षेप के बिना मौजूदा सत्ता व्यवस्था को बदलना बेहद कठिन है, जबकि दूसरा वर्ग इसे राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए खतरनाक मानता है।
भारत पर प्रभाव
ईरान में हज़ारों भारतीय नागरिक रहते हैं—छात्र, व्यापारी, तीर्थयात्री और कामगार। भारतीय दूतावास ने उन्हें सतर्क रहने, प्रदर्शन स्थलों से दूर रहने और ज़रूरत पड़ने पर देश छोड़ने की सलाह दी है।
भारत के लिए यह संकट केवल नागरिकों की सुरक्षा का सवाल नहीं है। पश्चिम एशिया से भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों का बड़ा हिस्सा पूरा करता है। अगर ईरान-अमेरिका तनाव बढ़ता है, तो तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे भारत में महंगाई और आर्थिक दबाव बढ़ेगा।
वैश्विक असर
ईरान में अशांति का असर सिर्फ उसके भीतर सीमित नहीं रहेगा। यह संकट पहले से अस्थिर पश्चिम एशिया को और अस्थिर कर सकता है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल आपूर्ति करता है; किसी भी सैन्य टकराव से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ेगा।
इसके अलावा, यह संकट यह भी तय करेगा कि आने वाले वर्षों में धार्मिक-राजनीतिक शासन मॉडल कितना टिकाऊ साबित होता है और जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को कैसे संभाला जाता है।
निष्कर्ष
ईरान में मौजूदा आंदोलन 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद सबसे बड़ी आंतरिक चुनौती बनकर उभरा है। यह केवल आर्थिक असंतोष नहीं, बल्कि सत्ता और समाज के रिश्ते पर उठता एक बड़ा सवाल है।
अगर यह संकट शांतिपूर्ण संवाद से हल नहीं हुआ, तो दमन और बाहरी हस्तक्षेप की आशंका बढ़ेगी, जिसके परिणाम केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेंगे। ईरानी जनता आज जिस संघर्ष से गुजर रही है, वह आज़ादी, गरिमा और न्याय की लड़ाई है—और यह लड़ाई पूरे विश्व को यह सोचने पर मजबूर करती है कि स्थिरता और मानवाधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
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