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End of Hereditary Peers in the House of Lords: A Historic Reform in British Parliamentary Democracy

हाउस ऑफ लॉर्ड्स में वंशानुगत पीयर्स की सदस्यता का अंत: ब्रिटिश लोकतंत्र के विकास का एक निर्णायक अध्याय ब्रिटेन की संसदीय परंपरा विश्व की सबसे पुरानी और स्थायी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में से एक मानी जाती है। किंतु इस गौरवपूर्ण परंपरा के भीतर कुछ ऐसे तत्व भी रहे हैं जो आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ लंबे समय से असंगत माने जाते रहे हैं। इनमें सबसे प्रमुख था हाउस ऑफ लॉर्ड्स में वंशानुगत पीयर्स (Hereditary Peers) की सदस्यता—एक ऐसी व्यवस्था जिसके अंतर्गत कुलीन परिवारों के सदस्य केवल अपने जन्म के आधार पर संसद के ऊपरी सदन में स्थान प्राप्त करते थे। मार्च 2026 में ब्रिटिश संसद द्वारा पारित Hereditary Peers Bill इस व्यवस्था को समाप्त करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। इसके साथ ही सदियों से चली आ रही वह परंपरा समाप्त हो जाएगी जिसके अंतर्गत राजनीतिक शक्ति का एक हिस्सा जन्माधिकार से निर्धारित होता था। यह सुधार न केवल एक संस्थागत परिवर्तन है, बल्कि ब्रिटिश लोकतंत्र के क्रमिक आधुनिकीकरण की उस दीर्घकालिक प्रक्रिया का हिस्सा है जिसमें सामंती विरासतों को धीरे-धीरे लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुरू...

India’s Semiconductor Manufacturing Boost: Subsidy Schemes Driving Self-Reliance and Tech Sovereignty

भारत की सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा: सब्सिडी योजनाओं के माध्यम से आत्मनिर्भरता की ओर एक कदम

परिचय

21 अक्टूबर 2025 को रॉयटर्स की एक रिपोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि भारत सरकार ने सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग को गति देने के लिए नई सब्सिडी योजनाओं की शुरुआत की है। इस पहल का उद्देश्य न केवल घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना है, बल्कि वैश्विक चिप आपूर्ति श्रृंखला में भारत की हिस्सेदारी को भी सशक्त बनाना है।
आत्मनिर्भर भारत’ के मूल मंत्र पर आधारित यह नीति भारत को तकनीकी दृष्टि से आत्मनिर्भर और रणनीतिक रूप से सक्षम बनाने की दिशा में एक निर्णायक कदम है। वर्तमान में जब चीन, ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे देश सेमीकंडक्टर उद्योग पर वर्चस्व बनाए हुए हैं, भारत ने 2030 तक लगभग $103 बिलियन के बाजार आकार के साथ वैश्विक मांग का 10% हिस्सा प्राप्त करने का लक्ष्य रखा है।


सरकारी सब्सिडी योजनाओं का विस्तृत अवलोकन

भारत की सेमीकंडक्टर नीति का मुख्य आधार 2021 में शुरू किया गया “इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM)” है। ₹76,000 करोड़ (लगभग $9.2 बिलियन) के इस कोष के अंतर्गत केंद्र सरकार ने उत्पादन, अनुसंधान और डिजाइन — तीनों स्तरों पर प्रोत्साहन योजनाएँ तैयार की हैं।

1. फैब्रिकेशन-लिंक्ड इंसेंटिव (FLI) स्कीम

इस योजना का उद्देश्य देश में वेफर फैब्रिकेशन (Fab) इकाइयों की स्थापना को प्रोत्साहित करना है।

  • यह योजना ग्रीनफील्ड व ब्राउनफील्ड दोनों प्रकार की परियोजनाओं पर लागू होती है।
  • सरकार परियोजना लागत का 50% तक सब्सिडी प्रदान कर रही है, जिससे निवेशक जोखिम घटे और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़े।
  • अगस्त 2025 तक 10 परियोजनाओं को मंजूरी मिल चुकी है, जिनमें कुल निवेश प्रतिबद्धता ₹1.60 लाख करोड़ (लगभग $18.23 बिलियन) तक पहुँच चुकी है।

2. डिस्प्ले मैन्युफैक्चरिंग इंसेंटिव (DMI)

स्मार्टफोन, टेलीविज़न और ऑटोमोटिव उद्योगों में प्रयुक्त होने वाले उच्च-रेजोल्यूशन डिस्प्ले पैनलों के उत्पादन हेतु इस योजना के तहत अनुदान दिया जा रहा है। इससे भारत में डिस्प्ले वैल्यू चेन विकसित करने का मार्ग प्रशस्त होगा।

3. डिज़ाइन-लिंक्ड इंसेंटिव (DLI) स्कीम

यह योजना स्टार्टअप्स और MSMEs के लिए वरदान साबित हो रही है।

  • चिप डिजाइन कंपनियों को ₹15 करोड़ तक की वित्तीय सहायता और नेट सेल्स का 4-6% इंसेंटिव दिया जा रहा है।
  • आगामी “सेमीकॉन 2.0 योजना” (2025) के तहत बड़ी कंपनियों जैसे L&T, Qualcomm, और MediaTek को भी सहायता प्रदान की जाएगी, बशर्ते उनका बौद्धिक संपदा अधिकार (IP) भारत में पंजीकृत हो।

4. राज्य स्तरीय प्रोत्साहन

केंद्र के साथ-साथ कई राज्य सरकारें भी पूंजीगत व्यय पर 40% तक की अतिरिक्त सब्सिडी दे रही हैं। विशेष रूप से गुजरात, उत्तर प्रदेश, और आंध्र प्रदेश ने इस दिशा में अग्रणी भूमिका निभाई है।

वर्तमान में ISM के ₹65,000 करोड़ फंड का लगभग 97% (₹62,900 करोड़) पहले ही प्रतिबद्ध हो चुका है, जो नीति की तेज प्रगति का संकेत है।


प्रमुख परियोजनाएँ और निवेश प्रवाह

सरकारी योजनाओं के परिणामस्वरूप कई बहुराष्ट्रीय और घरेलू कंपनियाँ भारत में उत्पादन इकाइयाँ स्थापित कर रही हैं।

  • टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स:

    • धोलेरा (गुजरात) में ₹91,526 करोड़ की 28nm चिप फैब यूनिट
    • असम में ₹27,120 करोड़ की OSAT (Outsourced Semiconductor Assembly and Test) सुविधा।
  • माइक्रॉन टेक्नोलॉजी (अमेरिका):
    सानंद, गुजरात में $2.75 बिलियन (₹22,516 करोड़) का पैकेजिंग प्लांट, जिसमें लगभग 70% लागत सरकार वहन कर रही है।

  • एचसीएल-फॉक्सकॉन जॉइंट वेंचर:
    जेवर (उत्तर प्रदेश) में ₹3,700 करोड़ ($446 मिलियन) की फैब्रिकेशन यूनिट।

  • केन्स सेमीकॉन:
    सानंद में ₹3,307 करोड़ की सुविधा, जो प्रतिदिन लगभग 6.33 मिलियन चिप्स का उत्पादन करेगी।

इसके अतिरिक्त ओडिशा, आंध्र प्रदेश और पंजाब में नई पैकेजिंग और डिजाइन सुविधाएँ स्थापित की जा रही हैं। ये परियोजनाएँ न केवल रोज़गार सृजन को बढ़ावा देंगी, बल्कि ऑटोमोटिव, इंडस्ट्रियल और कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्रों में आयात निर्भरता को भी घटाएँगी।


आत्मनिर्भर भारत और तकनीकी स्वायत्तता की दिशा में प्रगति

भारत की सेमीकंडक्टर नीति केवल औद्योगिक विकास का विषय नहीं है — यह राष्ट्रीय सुरक्षा और तकनीकी संप्रभुता से भी जुड़ी है। कोविड-19 महामारी और ताइवान जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव ने विश्व को यह सिखाया कि चिप्स की आपूर्ति में कोई भी व्यवधान वैश्विक अर्थव्यवस्था को ठप कर सकता है।

भारत वर्तमान में अपनी 100% चिप आवश्यकता आयात के माध्यम से पूरी करता है। इस निर्भरता को घटाने के लिए सरकार ने 2025-26 तक

  • $300 बिलियन के इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन,
  • 25% स्थानीय मूल्य वर्धन, और
  • लाखों नई नौकरियों के सृजन का लक्ष्य रखा है।

इन पहलों से धोलेरा SIR जैसे औद्योगिक क्लस्टर्स का विकास, R&D निवेश में वृद्धि और वैश्विक साझेदारी (जैसे Bosch, ARM, TSMC) को बढ़ावा मिलेगा।


मुख्य चुनौतियाँ और नीति सुझाव

1. वित्तीय सीमाएँ

ISM का अधिकांश फंड पहले ही आवंटित हो चुका है, जिससे नई बड़ी परियोजनाओं के लिए संसाधनों की कमी दिखाई देती है।
👉 सुझाव: “सेमीकॉन 2.0” के तहत कम से कम $15 बिलियन का अतिरिक्त आउटले सुनिश्चित किया जाए।

2. आपूर्ति श्रृंखला और कुशल जनशक्ति की कमी

गैसों, सिलिकॉन वेफर्स और मशीनरी जैसी सामग्रियों के लिए अभी भी बाहरी स्रोतों पर निर्भरता बनी हुई है।
👉 सुझाव: इनपुट मटेरियल्स के लिए मेक-इन-इंडिया दृष्टिकोण अपनाया जाए और तकनीकी संस्थानों के साथ मिलकर प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाएँ।

3. वैश्विक प्रतिस्पर्धा

अमेरिका, यूरोप और दक्षिण-पूर्व एशिया भी अपनी घरेलू उद्योगों के लिए अरबों डॉलर के इंसेंटिव दे रहे हैं।
👉 सुझाव: भारत को स्थिर नीति ढाँचा, कर राहत, और दीर्घकालिक अनुबंधों के माध्यम से निवेश आकर्षित करना होगा।


UPSC दृष्टिकोण से प्रासंगिकता

यह विषय UPSC सिविल सेवा परीक्षा में विभिन्न दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है:

  • GS Paper 3 (विज्ञान, प्रौद्योगिकी और अर्थव्यवस्था)
    संभावित प्रश्न:
    “भारत की सेमीकंडक्टर नीति के प्रमुख घटकों और उसकी चुनौतियों की चर्चा करें।”

  • GS Paper 2 (अंतरराष्ट्रीय संबंध)
    भारत की तकनीकी साझेदारियाँ — विशेषकर ताइवान, अमेरिका और जर्मनी के साथ — इस विषय को कूटनीतिक परिप्रेक्ष्य से भी जोड़ती हैं।

  • Prelims Exam (तथ्यात्मक MCQs)
    जैसे प्रश्न:
    “इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन का कुल कोष कितना है?”
    (A) ₹50,000 करोड़
    (B) ₹76,000 करोड़ ✅
    (C) ₹1 लाख करोड़
    (D) ₹1.5 लाख करोड़


निष्कर्ष

भारत की नई सेमीकंडक्टर सब्सिडी योजनाएँ केवल औद्योगिक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में एक निर्णायक परिवर्तन हैं।
2025 तक 10 स्वीकृत परियोजनाएँ और $18 बिलियन से अधिक का निवेश यह दर्शाता है कि भारत अब “चिप उपभोक्ता” से “चिप उत्पादक” बनने की राह पर है।

भविष्य की सफलता के लिए आवश्यक है कि सरकार इकोसिस्टम विकास, फंडिंग विस्तार, और R&D सहयोग पर निरंतर ध्यान केंद्रित रखे। यदि यह रणनीति सतत रही, तो भारत न केवल आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि वैश्विक सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण “विश्वसनीय भागीदार” के रूप में उभरेगा।


संदर्भ

  • Reuters (21 अक्टूबर 2025). “India’s Push for Semiconductor Manufacturing.”
  • Times of India (22 अगस्त 2025). “Govt allocates 97% of semiconductor fund.”
  • India Briefing (13 अगस्त 2025). “India’s Semiconductor Sector Outlook 2025.”
  • Carnegie Endowment (2025). “India’s Semiconductor Mission: The Story So Far.”
  • Business Standard (16 सितंबर 2024). “Semicon 2.0 scheme to raise subsidies.”


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