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Rising Attacks on Hindu Minorities in Bangladesh: Global Silence and Human Rights Concerns

The Silent Genocide: Persecution of Hindus in Bangladesh and the Moral Failure of the Global Community In an age where conflicts in Gaza, Ukraine, and other flashpoints command the world’s attention, a quieter yet deeply disturbing humanitarian crisis continues to unfold next door to India — in Bangladesh. Since the political upheaval and resignation of Prime Minister Sheikh Hasina in August 2024, reports of violence against the Hindu minority have escalated dramatically. Killings, arson attacks, vandalism of temples, forced displacement, economic boycotts, and intimidation have become frighteningly frequent. According to figures cited by Indian authorities, more than 2,200 incidents of violence against Hindus were recorded in 2024 alone , with similar patterns continuing through 2025 and into 2026. Independent reports corroborate these trends: homes torched, idols desecrated, businesses looted, and families compelled to flee ancestral lands. Yet, despite the mounting evidence, the w...

Sikkim’s Tongyadar Settlement Regularization and Centre’s Intervention: Balancing Social Justice and Environmental Governance

सिक्किम सरकार की तौंग्यदार बस्तियों के नियमितीकरण की पहल और केंद्र का हस्तक्षेप: एक नीतिगत विश्लेषण


प्रस्तावना

सिक्किम जैसे जैव-विविधता से परिपूर्ण पर्वतीय राज्य में, वन भूमि न केवल पर्यावरणीय संपदा है बल्कि स्थानीय समुदायों की आजीविका का आधार भी रही है। ऐसे में, सिक्किम सरकार द्वारा पारंपरिक वन श्रमिकों — तौंग्यदार्स — की बस्तियों को नियमित करने की पहल सामाजिक न्याय, पर्यावरणीय संतुलन और स्थानीय शासन के समन्वय का एक उदाहरण थी। किंतु हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा इस प्रक्रिया को स्थगित करते हुए भूमि उपयोग और लेआउट से संबंधित विस्तृत जानकारी मांगना, एक नई बहस को जन्म देता है — कि किस प्रकार विकास, पर्यावरण और स्थानीय अधिकारों के बीच संतुलन बनाया जाए।

यह लेख इसी बहस के नीति, संवैधानिक और प्रशासनिक आयामों का विश्लेषण करता है।


तौंग्यदार्स कौन हैं?

तौंग्यदार” सिक्किम के वे पारंपरिक वन श्रमिक समुदाय हैं जिन्हें ब्रिटिश काल से लेकर स्वतंत्रता के बाद तक वन प्रबंधन और खेती हेतु अस्थायी रूप से वन भूमि पर बसाया गया था।
इनका योगदान दोहरा रहा —

  1. वन संरक्षण में सहभागिता, क्योंकि उन्होंने स्थानीय पारिस्थितिकी के अनुरूप खेती की परंपराएँ विकसित कीं।
  2. स्थानीय अर्थव्यवस्था में योगदान, क्योंकि ये समुदाय सिक्किम की पारंपरिक कृषि प्रणाली का अभिन्न हिस्सा बन गए।

1980 के बाद वन (संरक्षण) अधिनियम लागू होने पर, इनकी बस्तियाँ कानूनी रूप से ‘वन भूमि पर कब्जा’ की श्रेणी में आने लगीं। सिक्किम सरकार का उद्देश्य इन्हें वैध दर्जा देकर उनकी भूमि अधिकारों को औपचारिक मान्यता देना था।


सिक्किम सरकार की पहल: सामाजिक न्याय और पर्यावरणीय नीति का संगम

सिक्किम सरकार ने इस पहल को केवल पुनर्वास का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का प्रश्न माना।

  • उद्देश्य: 1980 से पहले स्थापित तौंग्यदार बस्तियों को नियमित कर, उन्हें भूमि स्वामित्व और मूलभूत सेवाएँ (सड़क, बिजली, जल, शिक्षा) उपलब्ध कराना।
  • तर्क:
    • ये समुदाय दशकों से वन भूमि पर आश्रित हैं, अतः इन्हें विस्थापित करना न तो न्यायसंगत है, न ही व्यावहारिक।
    • वन संरक्षण का अर्थ स्थानीय समुदायों को बाहर करना नहीं, बल्कि उन्हें सहभागी बनाना है।

यह पहल सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (SDG-1, SDG-15) — गरीबी उन्मूलन और भूमि पारिस्थितिकी के संरक्षण — के अनुरूप भी मानी जा सकती है।


केंद्र सरकार का हस्तक्षेप: पर्यावरणीय और कानूनी दृष्टि से

केंद्र सरकार ने इस प्रक्रिया को अस्थायी रूप से रोकते हुए सिक्किम सरकार से विस्तृत जानकारी मांगी है, विशेषकर:

  • भूमि उपयोग की श्रेणी,
  • लेआउट योजनाएँ,
  • पर्यावरणीय प्रभाव का मूल्यांकन (EIA)।

यह कदम वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 की धारा 2 के अनुरूप है, जो किसी भी वन भूमि के गैर-वन उपयोग पर केंद्रीय अनुमति अनिवार्य करता है।
केंद्र का यह हस्तक्षेप तीन प्रमुख आधारों पर समझा जा सकता है:

  1. पर्यावरणीय सतर्कता: सिक्किम की पारिस्थितिकी हिमालयी भू-क्षरण, जैव विविधता हानि और जल-स्रोतों पर अत्यधिक संवेदनशील है।
  2. कानूनी अनुपालन: किसी भी प्रकार के भूमि परिवर्तन हेतु केंद्रीय स्वीकृति आवश्यक है, ताकि पर्यावरणीय नुकसान रोका जा सके।
  3. संघीय समन्वय: केंद्र और राज्य के बीच नीतिगत समन्वय सुनिश्चित करने की संवैधानिक जिम्मेदारी।

संवैधानिक और नीतिगत आयाम

  1. संविधान का अनुच्छेद 48A — राज्य को पर्यावरण और वन संपदा की रक्षा का दायित्व सौंपता है।
  2. अनुच्छेद 51A(g) — नागरिकों को पर्यावरणीय संरक्षण का मौलिक कर्तव्य बताता है।
  3. अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 — स्थानीय समुदायों के वन अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करता है।

इन प्रावधानों के अंतर्गत यह विवाद दो संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन की खोज का प्रतीक है —

  • पर्यावरणीय संरक्षण और
  • सामाजिक न्याय।

प्रमुख निहितार्थ

1. सामाजिक प्रभाव

केंद्र के स्थगन निर्णय से तौंग्यदार समुदायों में अनिश्चितता और अविश्वास की भावना पैदा हो सकती है। भूमि स्वामित्व का अधिकार केवल आजीविका नहीं, बल्कि सामाजिक पहचान का भी प्रश्न है।

2. प्रशासनिक चुनौतियाँ

सिक्किम सरकार को अब भूमि सर्वेक्षण, पर्यावरणीय प्रभाव अध्ययन और विस्तृत नीतिगत दस्तावेज तैयार करने होंगे। इससे प्रक्रिया लंबी और संसाधन-गहन हो सकती है।

3. पर्यावरणीय संवेदनशीलता

नियमितीकरण से वन आवरण में कमी या पारिस्थितिकी तंत्र में हस्तक्षेप का जोखिम है, खासकर तब जब भूमि उपयोग नियमन सख्ती से लागू न हो।

4. संघवाद और नीति-निर्माण

यह प्रकरण सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) की व्यवहारिक परीक्षा भी है। राज्य के स्थानीय अनुभवों और केंद्र के पर्यावरणीय मानकों के बीच संतुलन बनाना नीतिगत समन्वय का उदाहरण बन सकता है।


🔹 UPSC GS पेपर – 2 और 3 के दृष्टिकोण से विश्लेषण

इस मुद्दे का विश्लेषण UPSC GS Paper-2 और GS Paper-3 दोनों के संदर्भ में किया जा सकता है।

GS Paper 2 (Governance, Policy & Federalism):

यह विषय केंद्र-राज्य संबंधों, सहकारी संघवाद और विकेन्द्रीकृत नीति-निर्माण से जुड़ा है। सिक्किम सरकार द्वारा स्थानीय समुदायों के हित में की गई पहल राज्य के स्वायत्त निर्णय का उदाहरण है, जबकि केंद्र का हस्तक्षेप संघीय ढाँचे के भीतर संतुलन और पर्यावरणीय मानकों को सुनिश्चित करने का प्रयास दर्शाता है। अतः यह प्रकरण सहकारी संघवाद की व्यवहारिक परीक्षा प्रस्तुत करता है।

GS Paper 3 (Environment, Ecology & Sustainable Development):

यह पहल वन संरक्षण अधिनियम, 1980 और समुदाय आधारित संरक्षण (Community-Based Conservation) की अवधारणा से संबंधित है। यह प्रश्न उठाती है कि विकास और संरक्षण के बीच नीति-निर्माता किस प्रकार संतुलन स्थापित कर सकते हैं, विशेषकर ऐसे राज्यों में जहाँ पारिस्थितिकी अत्यंत संवेदनशील है।

निबंध / केस स्टडी परिप्रेक्ष्य:

यह विषय "पर्यावरणीय न्याय बनाम सामाजिक न्याय" के रूप में एक उत्कृष्ट निबंध विषय बन सकता है। नीति-निर्माण में यह आवश्यक है कि पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित करते हुए स्थानीय समुदायों के आजीविका अधिकारों की रक्षा की जाए। यही Inclusive and Sustainable Development का वास्तविक अर्थ है।

आगे की राह

  1. संवेदनशील दृष्टिकोण: सिक्किम सरकार को तौंग्यदार समुदायों की भागीदारी के साथ Participatory Mapping और Social Impact Assessment करना चाहिए।
  2. संघीय सहयोग: केंद्र और राज्य के बीच साझा समिति बनाकर पर्यावरणीय मंजूरी और सामाजिक पुनर्वास को समानांतर रूप से आगे बढ़ाया जाए।
  3. मॉडल नीति: यदि संतुलित समाधान निकाला जाता है, तो यह पहल देश के अन्य पहाड़ी राज्यों — जैसे उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड — के लिए मॉडल केस सिद्ध हो सकती है।

निष्कर्ष

सिक्किम सरकार की तौंग्यदार बस्तियों को नियमित करने की पहल केवल भूमि अधिकारों का प्रश्न नहीं, बल्कि समावेशी विकास की एक परिकल्पना है।

केंद्र सरकार का हस्तक्षेप इस प्रक्रिया में पारदर्शिता और पर्यावरणीय संतुलन सुनिश्चित करने की दिशा में एक आवश्यक कदम हो सकता है — बशर्ते कि यह संवेदनशीलता और सहमति के साथ लागू हो।

यह प्रकरण दर्शाता है कि भारत के नीति-निर्माण में आज भी सबसे बड़ी चुनौती वही है —

“विकास और संरक्षण के बीच संतुलन।”

यदि सिक्किम इस दिशा में संतुलित नीति प्रस्तुत करता है, तो यह न केवल स्थानीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा करेगा, बल्कि भारत की पर्यावरणीय शासन-व्यवस्था के लिए एक प्रेरक मिसाल बन सकता है।


👉 UPSC Answer Framework Suggestion:

    • परिचय: तौंग्यदार्स की पृष्ठभूमि
    • मुख्य भाग: सिक्किम की पहल, केंद्र का हस्तक्षेप, कानूनी प्रावधान, चुनौतियाँ
    • निष्कर्ष: संतुलित नीति निर्माण का महत्व
    • कीवर्ड्स: वन (संरक्षण) अधिनियम, सहकारी संघवाद, पर्यावरणीय न्याय, सामाजिक समावेशन

With The Hindu Inputs 

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