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US-Israel Military Campaign Against Iran: Nuclear Deterrence Double Standards and the Risks to Global Order

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India-Afghanistan Diplomacy: Jaishankar-Muttaki Meeting and Taliban Engagement

भारत-अफ़ग़ानिस्तान कूटनीति: तालिबान के साथ व्यावहारिकता, मूल्य और सुरक्षा के बीच संतुलन

परिचय

अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान शासन की वापसी ने दक्षिण एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति को जटिल बना दिया है। भारत, जो लंबे समय से लोकतांत्रिक और विकास-आधारित साझेदारी के माध्यम से अफ़ग़ानिस्तान के साथ जुड़ा रहा है, अब एक ऐसे मोड़ पर है जहाँ व्यावहारिक कूटनीति और मूल्य आधारित नीति के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण हो गया है।
11 अक्टूबर 2025 को नई दिल्ली में विदेश मंत्री एस. जयशंकर और तालिबान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी की बैठक इस नए कूटनीतिक अध्याय का प्रतीक है। यह मुलाक़ात न केवल संवाद की पुनर्स्थापना है, बल्कि भारत की “Engagement without Endorsement” रणनीति का संकेत भी देती है।


ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: भारत की अफ़ग़ान नीति का विकास

भारत ने अफ़ग़ानिस्तान के पुनर्निर्माण में 2001 से 2021 तक लगभग 3 अरब डॉलर से अधिक का योगदान किया — सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों और संसदीय भवन जैसी परियोजनाएँ इसका उदाहरण हैं।
अशरफ गनी सरकार के पतन के बाद भारत ने अपनी राजनयिक उपस्थिति को सीमित किया, परंतु मानवीय सहायता और लोग-से-लोग संपर्क के मार्ग खुले रखे।
भारत ने 2022 में काबुल में "Technical Mission" स्थापित कर तालिबान शासन के साथ सीमित संवाद आरंभ किया। 2025 में मुत्तकी की दिल्ली यात्रा उसी निरंतरता का हिस्सा है — जो इंगित करती है कि भारत अपने भू-राजनीतिक हितों को ध्यान में रखकर नरम कूटनीति (soft diplomacy) का प्रयोग कर रहा है।


जयशंकर-मुत्तकी बैठक: संकेत और प्रतीकवाद

इस बैठक में किसी भी देश के झंडे को प्रदर्शित नहीं किया गया — जो इस तथ्य का संकेत है कि भारत अब भी तालिबान शासन को औपचारिक मान्यता देने से परहेज़ कर रहा है।
यह “Symbolic Neutrality” भारत की नीति का हिस्सा है — संवाद बनाए रखना, परंतु वैधता न देना।
बैठक के दौरान महिला पत्रकारों को प्रेस कॉन्फ्रेंस से वंचित करना और दूतावास में तालिबान झंडा बनाम अफ़ग़ान गणराज्य झंडा विवाद ने तालिबान शासन की नीतियों और अफ़ग़ान समाज के भीतर विभाजन को उजागर किया।

दिल्ली स्थित अफ़ग़ान दूतावास में तालिबान झंडा फहराने के प्रयास को कर्मचारियों द्वारा रोका जाना प्रतीकात्मक रूप से “अफ़ग़ान प्रतिरोध” का संकेत देता है। वहीं, दूतावास में मौजूद बामियान बुद्ध की पेंटिंग तालिबान की ऐतिहासिक हिंसा और आज की राजनीतिक स्थिति के बीच एक नैतिक विरोधाभास प्रस्तुत करती है।


भारत की कूटनीतिक दुविधा और रणनीतिक गणना

भारत के सामने तीन प्रमुख प्रश्न हैं:

  1. क्या तालिबान शासन को औपचारिक मान्यता दी जाए?
    भारत ने अब तक "व्यावहारिक संवाद" तक सीमित रहकर इस प्रश्न को टाल रखा है। मान्यता देने से क्षेत्रीय संवाद आसान हो सकता है, परंतु यह भारत के लोकतांत्रिक और मानवाधिकार मूल्यों से टकराता है।

  2. सुरक्षा और आतंकवाद का जोखिम
    तालिबान का पाकिस्तान स्थित आतंकी समूहों — जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा — के साथ ऐतिहासिक संबंध भारत के लिए चिंता का विषय हैं। मुत्तकी के दावे कि “अफ़ग़ान भूमि भारत विरोधी गतिविधियों के लिए उपयोग नहीं होगी” को भारत सतर्क विश्वास (Cautious Trust) के साथ देख रहा है।

  3. आर्थिक एवं भू-रणनीतिक अवसर
    तालिबान सरकार ने भारत को चाबहार बंदरगाह और वाघा बॉर्डर मार्ग से व्यापार बढ़ाने का प्रस्ताव दिया।
    यदि भारत इसे व्यावहारिक स्तर पर आगे बढ़ाता है, तो यह “सेंट्रल एशिया तक भारत की पहुँच” को पुनर्स्थापित कर सकता है — जो चीन के बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव (BRI) का एक रणनीतिक संतुलन बन सकता है।


क्षेत्रीय और वैश्विक परिप्रेक्ष्य

भारत का अफ़ग़ानिस्तान के साथ संवाद केवल द्विपक्षीय नहीं है, बल्कि इसका क्षेत्रीय प्रभाव गहरा है।

  • चीन और पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान में अपना प्रभाव बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।
  • भारत, ईरान और मध्य एशिया के साथ Connectivity Diplomacy के माध्यम से एक वैकल्पिक ब्लॉक बनाना चाहता है।
  • रूस और ईरान जैसे देश भी तालिबान के साथ सीमित संवाद बनाए हुए हैं, जिससे भारत को "Regional Realignment" में अपना स्थान पुनः परिभाषित करना होगा।

वैश्विक स्तर पर, भारत को संयुक्त राष्ट्र और पश्चिमी देशों के साथ समन्वय करते हुए तालिबान शासन पर महिला अधिकारों और अल्पसंख्यक सुरक्षा के मुद्दे पर नैतिक दबाव बनाए रखना होगा।


नैतिक और प्रशासनिक दृष्टिकोण (GS Paper 4 से संबंध)

तालिबान के साथ संवाद भारत के लिए केवल भू-राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक निर्णय का प्रश्न भी है।
भारत को अपने “नैतिक कूटनीति (Ethical Diplomacy)” सिद्धांत के तहत यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी संवाद से मानवाधिकार और महिला अधिकारों के उल्लंघन को वैधता न मिले।
यह स्थिति “Ends vs Means” की क्लासिक नीति-दुविधा को उजागर करती है — क्या राष्ट्रीय सुरक्षा और भू-राजनीतिक स्थिरता के लिए मूल्य-आधारित नीति को लचीला बनाया जा सकता है?


UPSC के दृष्टिकोण से संभावित प्रश्न

GS Paper 2 (International Relations):

  • भारत की "Engagement without Recognition" नीति के संदर्भ में अफ़ग़ानिस्तान के साथ उसके संबंधों का विश्लेषण करें।
  • तालिबान शासन के प्रति भारत की नीति में नैतिकता और यथार्थवाद (Realism) के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जा सकता है?

GS Paper 3 (Internal Security):

  • अफ़ग़ानिस्तान में बदलते सुरक्षा परिदृश्य का भारत की आंतरिक सुरक्षा पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?
  • आतंकवादी नेटवर्कों के पुनर्संगठन की स्थिति में भारत को कौन-से प्रतिरोधात्मक उपाय अपनाने चाहिए?

Essay Paper:

  • “कूटनीति का मूल्यांकन केवल राष्ट्रीय हितों से नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों से भी किया जाना चाहिए।” — अफ़ग़ान संकट के संदर्भ में चर्चा करें।

निष्कर्ष

जयशंकर-मुत्तकी बैठक भारत की विदेश नीति के नए अध्याय का संकेत है — जहाँ वास्तविकता और मूल्य, संवाद और संयम का मिश्रण दिखाई देता है।
भारत का उद्देश्य है – अफ़ग़ानिस्तान में स्थिरता, आतंकवाद पर नियंत्रण, और क्षेत्रीय संपर्क को प्रोत्साहित करना, बिना अपनी लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता को कमजोर किए।

भविष्य में भारत की नीति का परीक्षण इस बात पर होगा कि वह तालिबान के साथ संवाद को किस सीमा तक व्यावहारिक रखता है, और किस प्रकार अपने नैतिक एवं रणनीतिक हितों के बीच संतुलन बनाए रखता है।
अंततः, यही संतुलन भारत को दक्षिण एशिया की स्थिरता और वैश्विक कूटनीति में एक विश्वसनीय शक्ति के रूप में स्थापित करेगा


With Indian Express Inputs 

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