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Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

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Doha Peace Talks: Pakistan-Afghanistan Border Tensions and the Search for Lasting Stability

दोहा में शांति वार्ता: पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा तनाव के बाद समझौते की राह

सारांश

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच हालिया सीमा संघर्ष, जो अक्टूबर 2025 में दोहा में आयोजित शांति वार्ता और नाजुक युद्धविराम में परिणत हुआ, दक्षिण एशियाई भू-राजनीति के लिए एक निर्णायक क्षण है। एक सप्ताह तक चली हिंसक झड़पों — जिनमें दर्जनों लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हुए — ने दोनों देशों के संबंधों में दशकों से चली आ रही अविश्वास और वैचारिक टकराव को फिर से उजागर कर दिया। कतर और तुर्की की मध्यस्थता में आरंभ हुई इस वार्ता ने क्षेत्रीय स्थिरता, सीमा प्रबंधन और आतंकवाद-निरोधी सहयोग जैसे विषयों को पुनः केंद्र में ला दिया है। यह लेख ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, तात्कालिक कारणों, वार्ता की प्रक्रिया और संभावित परिणामों का विश्लेषण करता है। लेख का तर्क है कि दोहा का यह कूटनीतिक प्रयास केवल अस्थायी राहत नहीं, बल्कि स्थायी शांति के लिए एक संभावित प्रारंभिक ढांचा बन सकता है — बशर्ते दोनों देश अपने ऐतिहासिक अविश्वास को व्यावहारिक सहयोग में बदलें।


परिचय

दुर्रंड रेखा — 1893 में ब्रिटिश भारत द्वारा खींची गई 2,640 किलोमीटर लंबी सीमा — आज भी पाकिस्तान-अफगानिस्तान के बीच तनाव का सबसे बड़ा स्रोत बनी हुई है। यह रेखा न केवल दो राज्यों को, बल्कि पश्तून समाज और संस्कृति को भी विभाजित करती है। स्वतंत्रता के बाद से ही काबुल ने इस रेखा को वैध नहीं माना, और “पश्तूनिस्तान” की अवधारणा ने सीमा विवाद को राजनीतिक पहचान के प्रश्न से जोड़ दिया।

अगस्त 2021 में जब तालिबान ने काबुल पर कब्ज़ा किया, तो पाकिस्तान ने इसे अपने “रणनीतिक गहराई सिद्धांत” की सफलता के रूप में देखा था। किंतु इसके तुरंत बाद तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के हमलों में तेजी और तालिबान द्वारा इन उग्रवादियों के ठिकानों के खिलाफ कार्रवाई से इनकार ने संबंधों को बिगाड़ दिया। अक्टूबर 2025 की घटनाएँ इसी तनाव की चरम परिणति थीं — जब खैबर पख्तूनख्वा और स्पिन बोल्डक में हुए हमलों ने दोनों देशों को युद्ध की कगार पर ला खड़ा किया। अंततः कतर और तुर्की की मध्यस्थता में युद्धविराम की घोषणा हुई और दोहा में शांति वार्ता की शुरुआत।


ऐतिहासिक संदर्भ: औपनिवेशिक सीमा और परस्पर अविश्वास की विरासत

पाकिस्तान-अफगानिस्तान संबंध दक्षिण एशियाई इतिहास में औपनिवेशिक सीमांकन की जटिलताओं का प्रतीक हैं। ब्रिटिश राज द्वारा खींची गई दुर्रंड रेखा ने एक ऐसा भौगोलिक और मनोवैज्ञानिक विभाजन स्थापित किया, जो 1947 की विभाजन रेखा से भी अधिक विवादास्पद रहा। 1950 के दशक में अफगानिस्तान द्वारा पश्तून अलगाववादियों को समर्थन और 1980 के दशक में पाकिस्तान द्वारा सोवियत विरोधी मुजाहिदीन को हथियार व प्रशिक्षण देने की नीति ने अविश्वास को और गहरा किया।

2001 के बाद अमेरिकी हस्तक्षेप ने स्थिति को और जटिल बना दिया। इस्लामाबाद पर एक ओर अमेरिका का सहयोगी होने और दूसरी ओर तालिबान को शरण देने के दोहरे आरोप लगे। 2021 में तालिबान के पुनः सत्तारूढ़ होने के बाद भी, पाकिस्तान की अपेक्षाओं के विपरीत, काबुल ने टीटीपी के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई नहीं की। इसके परिणामस्वरूप पाकिस्तान ने 2024 में “ऑपरेशन अज़्म-ए-इस्तिहकाम” चलाया, जबकि अफगानिस्तान ने इसे संप्रभुता का उल्लंघन बताया।


हालिया तनाव: अक्टूबर 2025 की झड़पें

अक्टूबर 2025 की झड़पें सीमा-पार उकसावों, गलतफहमियों और राजनीतिक संदेशों का परिणाम थीं। 10 अक्टूबर को पाकिस्तानी बलों द्वारा स्पिन बोल्डक में टीटीपी शिविरों पर की गई तोपबारी के जवाब में तालिबान ने सीमा चौकियों पर हमले किए। इसके बाद 15 अक्टूबर को पाकिस्तान ने ड्रोन हमले किए, जिनमें काबुल के अनुसार कई नागरिक मारे गए। जवाबी कार्रवाई में अफगान तोपखाने ने पाकिस्तानी ठिकानों पर गोले दागे।

यह हिंसा 2021 के बाद की सबसे गंभीर घटना मानी गई, जिसमें 50 से अधिक लोग मारे गए और 200 से अधिक घायल हुए। 17 अक्टूबर को तालिबान ने युद्धविराम की घोषणा की, जिसे पाकिस्तान ने अनिच्छा से स्वीकार किया। दोहा में वार्ता के साथ इस युद्धविराम को अनिश्चितकाल तक बढ़ा दिया गया।


दोहा वार्ता: कूटनीतिक पहल और एजेंडा

कतर, जिसने पहले 2020 में अमेरिका-तालिबान वार्ता की मेजबानी की थी, एक बार फिर शांति मध्यस्थ के रूप में सामने आया। तुर्की ने भी लॉजिस्टिक और राजनयिक समर्थन प्रदान किया। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मुहम्मद आसिफ और अफगानिस्तान के रक्षा मंत्री मुल्ला मुहम्मद याकूब ने दोहा में प्रत्यक्ष वार्ता की।

वार्ता का एजेंडा तीन मुख्य विषयों पर केंद्रित था:

  1. सीमा-पार आतंकवाद की रोकथाम — संयुक्त गश्त और खुफिया-साझाकरण पर सहमति की संभावनाएं।
  2. संप्रभुता और नागरिक सुरक्षा — हवाई हमलों को रोकने और सीमित सैन्य गतिविधि के लिए प्रोटोकॉल तय करना।
  3. मानवीय और व्यापारिक सहयोग — सीमा व्यापार पुनर्स्थापन और विस्थापित नागरिकों की वापसी पर चर्चा।

कतर के विदेश मंत्रालय ने 19 अक्टूबर को घोषणा की कि दोनों पक्ष “युद्धविराम की निगरानी के लिए संयुक्त समिति” पर सिद्धांततः सहमत हुए हैं। हालांकि, तालिबान ने स्पष्ट किया कि “टीटीपी का प्रत्यर्पण या उन पर कार्रवाई” उनकी आंतरिक नीति का विषय है। यह रुख इस्लामाबाद के लिए बड़ी चुनौती है, जो टीटीपी हमलों को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है।


क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय आयाम

दोहा वार्ता केवल पाकिस्तान और अफगानिस्तान तक सीमित नहीं है; इसके प्रभाव व्यापक हैं।

  • चीन — जो चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) को अफगानिस्तान तक विस्तार देना चाहता है, स्थिरता को अपनी निवेश सुरक्षा से जोड़कर देखता है।
  • भारत — अफगानिस्तान में अपने ऐतिहासिक प्रभाव को पुनर्स्थापित करने की कोशिश में है, और पाकिस्तान को सीमा संघर्षों के माध्यम से दबाव में रखने का रणनीतिक अवसर भी देखता है।
  • अमेरिका और रूस — दोनों, अपनी-अपनी कूटनीतिक उपस्थिति बनाए रखने की कोशिश में, कतर जैसे मध्यस्थ देशों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हैं।

इस परिप्रेक्ष्य में, दोहा केवल एक शांति वार्ता नहीं बल्कि “दक्षिण एशिया के शक्ति-संतुलन” की प्रयोगशाला बन गया है।


संभावित परिणाम: "दुर्रंड 2.0" की दिशा में?

यदि दोहा वार्ता टिकाऊ ढांचे में रूपांतरित होती है, तो यह "दुर्रंड 2.0" जैसी व्यवस्था की दिशा में एक कदम हो सकता है — जहाँ सीमा को नियंत्रण रेखा के बजाय सहयोग के गलियारे के रूप में पुनर्परिभाषित किया जाए। इसमें तीन संभावनाएँ प्रमुख हैं:

  1. संयुक्त सीमा आयोग (Joint Border Commission) — जो सीमा पार गतिविधियों, गश्त और व्यापारिक मार्गों की निगरानी करे।
  2. सुरक्षा-सहयोग समझौता — जिसमें टीटीपी जैसे संगठनों के खिलाफ साझा खुफिया संचालन हो।
  3. आर्थिक प्रोत्साहन तंत्र — जैसे TAPI पाइपलाइन, सीमा व्यापार बाजार, और मानवीय गलियारों की पुनर्स्थापना।

हालांकि, निराशावादी परिदृश्य यह है कि यदि दोनों पक्षों ने अपने राजनीतिक और वैचारिक मतभेदों को दूर नहीं किया, तो यह युद्धविराम भी 2022 के मॉस्को फॉर्मेट की तरह समाप्त हो सकता है — जो कागजों पर सफल था, लेकिन ज़मीन पर असफल।


नीति निहितार्थ

  1. पाकिस्तान को अपने सैन्य समाधान-आधारित दृष्टिकोण से आगे बढ़कर राजनीतिक संवाद को प्राथमिकता देनी होगी।
  2. तालिबान शासन को यह समझना होगा कि अंतरराष्ट्रीय मान्यता तभी संभव है जब वह सीमा-पार आतंकवाद के खिलाफ ठोस कदम उठाए।
  3. क्षेत्रीय संस्थाएँ — जैसे एससीओ और सार्क — को इस तरह के मुद्दों के लिए मंच प्रदान करने की भूमिका निभानी चाहिए।
  4. मानवीय आयाम — दोनों देशों को संयुक्त रूप से विस्थापितों और सीमा के नागरिकों के पुनर्वास हेतु सहायता योजनाएँ बनानी होंगी।

निष्कर्ष

दोहा में आरंभ हुई यह शांति प्रक्रिया केवल युद्धविराम नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया में एक नए भू-राजनीतिक युग की संभावित शुरुआत है। किंतु स्थायी शांति के लिए केवल समझौतों पर हस्ताक्षर पर्याप्त नहीं — बल्कि उन पर क्रियान्वयन, विश्वास और पारदर्शिता की आवश्यकता है।

दुर्रंड रेखा यदि इतिहास की जख्म है, तो उसे मिटाने का उपाय सीमा की पुनःरेखांकन में नहीं, बल्कि साझा समृद्धि और सुरक्षा के ढांचे में है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के सामने अब यही अवसर है — या तो वे इतिहास को दोहराएँ, या एक नई शांति कथा लिखें।


संदर्भ

  • Reuters. (18 Oct 2025). Pakistan and Afghanistan hold peace talks in Doha after deadly clashes.
  • Reuters. (17 Oct 2025). Pakistan, Afghanistan extend ceasefire as Doha talks begin.
  • Modern Diplomacy. (18 Oct 2025). Doha Dialogue: Afghanistan and Pakistan seek calm after border violence.
  • Al Jazeera. (Oct 2025). Cross-border tension and the Taliban’s challenge.
  • India Today. (Oct 2025). Durand Line flare-up: Why Pakistan and Afghanistan can’t trust each other.
  • Arab News (@arabnews), PakTV Global (@PakTVGlobal) – X Posts, Oct 2025.


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