Skip to main content

MENU👈

Show more

Rising Attacks on Hindu Minorities in Bangladesh: Global Silence and Human Rights Concerns

The Silent Genocide: Persecution of Hindus in Bangladesh and the Moral Failure of the Global Community In an age where conflicts in Gaza, Ukraine, and other flashpoints command the world’s attention, a quieter yet deeply disturbing humanitarian crisis continues to unfold next door to India — in Bangladesh. Since the political upheaval and resignation of Prime Minister Sheikh Hasina in August 2024, reports of violence against the Hindu minority have escalated dramatically. Killings, arson attacks, vandalism of temples, forced displacement, economic boycotts, and intimidation have become frighteningly frequent. According to figures cited by Indian authorities, more than 2,200 incidents of violence against Hindus were recorded in 2024 alone , with similar patterns continuing through 2025 and into 2026. Independent reports corroborate these trends: homes torched, idols desecrated, businesses looted, and families compelled to flee ancestral lands. Yet, despite the mounting evidence, the w...

Abujhmad and North Bastar Declared Naxal-Free: A Historic Milestone in India’s Internal Security Strategy

अबुझमाड़ और उत्तरी बस्तर नक्सल-मुक्त: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में एक उपलब्धि

भूमिका

भारत की आंतरिक सुरक्षा के इतिहास में यह घोषणा एक युगांतरकारी क्षण के रूप में दर्ज की जाएगी कि छत्तीसगढ़ के अबुझमाड़ और उत्तरी बस्तर क्षेत्र अब नक्सल प्रभाव से पूरी तरह मुक्त हो चुके हैं।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा की गई यह घोषणा केवल एक प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि उन आदिवासी अंचलों के लिए नई सुबह का प्रतीक है जो दशकों तक हिंसा, भय और अलगाव के घेरे में रहे।
साथ ही, हाल में 170 नक्सलियों के सामूहिक आत्मसमर्पण ने यह प्रमाणित कर दिया है कि सरकार की "समर्पण और पुनर्वास" नीति ने नक्सलवाद के जनाधार को कमजोर करने में निर्णायक भूमिका निभाई है।


नक्सलवाद: उत्पत्ति और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

भारत में नक्सलवाद की जड़ें स्वतंत्रता के बाद के ग्रामीण सामाजिक-आर्थिक असमानताओं में निहित हैं।
इस आंदोलन की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी गांव से हुई, जब भूमिहीन किसानों ने जमींदारों और दमनकारी भूमि नीति के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह किया।
इस आंदोलन के नेतृत्व में चारु मजूमदार और कानू सान्याल जैसे नेताओं ने माओ त्से-तुंग की "सशस्त्र क्रांति" की विचारधारा को भारतीय संदर्भ में लागू करने का प्रयास किया।

प्रारंभ में यह आंदोलन सीमित था, लेकिन 1970 और 1980 के दशकों में यह ओडिशा, झारखंड, बिहार, आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी बहुल राज्यों में फैल गया।
छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में नक्सलवाद की पैठ 1980 के दशक में हुई, जब आंध्र प्रदेश के सीमा क्षेत्रों से माओवादी कार्यकर्ता यहां आए और स्थानीय जनजातीय समुदायों में "भूमि अधिकार" और "शोषण विरोधी" नारों के माध्यम से समर्थन जुटाया।


अबुझमाड़: ‘मुक्त क्षेत्र’ से ‘मुख्यधारा’ तक

अबुझमाड़, नारायणपुर जिले में स्थित लगभग 4,000 वर्ग किलोमीटर का दुर्गम वन क्षेत्र, दशकों तक प्रशासन और विकास से अछूता रहा।
यहां सरकारी सर्वेक्षण तक नहीं हो पाए थे, और इसी भौगोलिक अलगाव का लाभ उठाकर माओवादी संगठन — विशेषकर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओइस्ट) — ने इसे अपना ‘मुक्त क्षेत्र’ (Liberated Zone) घोषित कर दिया।
यहां प्रशिक्षण शिविर, हथियार गोदाम और भूमिगत बैठकें आयोजित की जाती थीं।

1990 के दशक तक बस्तर, दंतेवाड़ा और नारायणपुर माओवादी गतिविधियों के प्रमुख केंद्र बन चुके थे।
इसी काल में हिंसक घटनाओं की श्रृंखला ने प्रशासन को झकझोर दिया।
2005 में राज्य सरकार ने ‘सलवा जूडुम’ नामक जन-आंदोलन को बढ़ावा दिया, जिसका उद्देश्य नक्सलियों के खिलाफ स्थानीय प्रतिरोध खड़ा करना था।
परंतु यह प्रयोग मानवाधिकार हनन और विस्थापन के आरोपों में घिरा, और 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक घोषित किया।

बस्तर में हुई प्रमुख घटनाएं — जैसे

  • 2010 का दंतेवाड़ा हमला (76 सीआरपीएफ जवान शहीद),
  • और 2013 का दरभा घाटी नरसंहार (25 कांग्रेस नेता मारे गए) —
    नक्सल हिंसा की भयावहता के चरम उदाहरण बने।

सरकार की रणनीतिक दृष्टि में परिवर्तन

नक्सलवाद से निपटने की नीति वर्षों में परिष्कृत होती रही है।
यूपीए सरकार (2004–2014) ने “विकास और सुरक्षा का संतुलन” स्थापित करने के लिए एकीकृत कार्रवाई योजना (IAP) लागू की थी।
लेकिन 2014 के बाद, एनडीए सरकार के नेतृत्व में नीति का स्वरूप निर्णायक रूप से बदला — इसे “समर्पण या समाप्ति” (Surrender or Elimination) के दोहरे दृष्टिकोण के रूप में लागू किया गया।

गृह मंत्रालय ने ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’, ‘ऑपरेशन प्रहार’ जैसे अभियान चलाए, जिनमें आधुनिक तकनीक, ड्रोन निगरानी, संचार उपकरणों और हेलीकॉप्टर सहायता का उपयोग बढ़ाया गया।
अबुझमाड़ और उत्तरी बस्तर में सुरक्षाबलों ने न केवल सड़कें और पुलिस कैंप स्थापित किए, बल्कि स्थानीय जनजातीय समाज के साथ विश्वास बहाली के उपाय भी किए।

विकास योजनाओं — जैसे

  • प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना,
  • आदिवासी रोजगार मिशन,
  • आयुष्मान भारत स्वास्थ्य सेवा,
  • तथा ई-शिक्षा कार्यक्रमों — ने नक्सलियों की “राज्य-विरोधी” विचारधारा को कमजोर किया।

हालिया आत्मसमर्पण और नक्सल-मुक्ति

2025 में गृह मंत्री अमित शाह की यह घोषणा कि “अबुझमाड़ और उत्तरी बस्तर अब नक्सल प्रभाव से पूर्णतः मुक्त हैं,” न केवल प्रतीकात्मक बल्कि रणनीतिक उपलब्धि भी है।
इस घोषणा के साथ 170 नक्सलियों का सामूहिक आत्मसमर्पण, जिसमें वरिष्ठ कमांडर रूपेश और रानीता जैसे नाम शामिल हैं, एक ऐतिहासिक मोड़ है।
इससे पहले महाराष्ट्र के गढ़चिरोली जिले में 61 नक्सलियों के आत्मसमर्पण की खबर आई थी, जो इस प्रवृत्ति के व्यापक प्रसार को दर्शाती है।

सरकार की पुनर्वास नीति, जिसमें समर्पण करने वालों को आवास, आर्थिक सहायता और सुरक्षा दी जाती है, ने कई युवाओं को हिंसा का मार्ग छोड़ने के लिए प्रेरित किया है।
यह मॉडल "आतंक के खिलाफ विकास" की नीति का सफल उदाहरण बन चुका है।


वृहद निहितार्थ और आगे की दिशा

यह उपलब्धि केवल सुरक्षा दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक रूपांतरण के दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
अबुझमाड़ जैसे क्षेत्र, जो दशकों तक प्रशासन से कटे रहे, अब

  • शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि सुधार और पर्यटन के नए अवसरों के लिए खुल रहे हैं।
    हालांकि, विकास की गति तेज होने के साथ पर्यावरणीय संतुलन और आदिवासी अधिकारों की रक्षा को सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है।

गृह मंत्रालय का लक्ष्य 31 मार्च 2026 तक पूरे देश से नक्सलवाद का पूर्ण उन्मूलन है।
परंतु यह तभी स्थायी सफलता मानी जाएगी जब स्थानीय समाज को
सामाजिक न्याय, भूमि सुधार और सांस्कृतिक सम्मान के माध्यम से सशक्त बनाया जाएगा।


निष्कर्ष

अबुझमाड़ और उत्तरी बस्तर का नक्सल-मुक्त होना भारत के आंतरिक सुरक्षा इतिहास में एक निर्णायक अध्याय है।
यह सिद्ध करता है कि जब सुरक्षा नीति, विकास रणनीति और जनसहभागिता एक साथ चलें, तो सबसे कठिन संघर्षों को भी सुलझाया जा सकता है।
नक्सलवाद की वैचारिक और सामाजिक जड़ें भले ही पुरानी हों, पर इस ऐतिहासिक उपलब्धि ने यह संकेत दिया है कि भारत अब अपने सबसे दुर्गम हिस्सों में भी शांति और विकास की रोशनी पहुँचाने में सक्षम है।


📚 स्रोत-संदर्भ (References)

  1. भारत सरकार, गृह मंत्रालय — वार्षिक रिपोर्ट 2024–25, “Left Wing Extremism Division”.
  2. प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB), “Statement by Home Minister Amit Shah on Naxal-Free Bastar Region”, अक्टूबर 2025.
  3. The Hindu, “Abujhmad, Once India’s Most Inaccessible Region, Declared Free of Maoist Influence”, 15 अक्टूबर 2025.
  4. Indian Express, “170 Maoists Surrender in Bastar; Shah Calls it a Milestone in Ending Red Terror”, 14 अक्टूबर 2025.
  5. BBC Hindi, “सलवा जूडुम से लेकर अबुझमाड़ तक: छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद की बदलती तस्वीर”, 2024.
  6. Down To Earth Magazine, “From Jungle Stronghold to Peace Zone: The Transformation of Abujhmad”, जुलाई 2025.
  7. सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया, Nandini Sundar & Others vs. State of Chhattisgarh, Judgment, 2011.


🧭 UPSC Mains (GS Paper-3 / Essay) संभावित प्रश्न

1. विश्लेषणात्मक प्रश्न

प्रश्न:
अबुझमाड़ और उत्तरी बस्तर के नक्सल-मुक्त होने की घोषणा भारत की आंतरिक सुरक्षा नीति में किस प्रकार का परिवर्तन दर्शाती है? इसकी स्थायित्व के लिए किन नीतिगत सुधारों की आवश्यकता है?
(250 words)

संकेत:

  • “समर्पण या समाप्ति” नीति
  • विकास और सुरक्षा का संतुलन
  • स्थानीय जनसहभागिता
  • पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों का संतुलन

2. निबंध विषय के रूप में

विषय:
"भारत में नक्सलवाद का अंत: सुरक्षा, विकास और जनसहभागिता की संयुक्त विजय"

या
"अबुझमाड़ से मुख्यधारा तक: भारत की आंतरिक सुरक्षा यात्रा का निर्णायक मोड़"


3. GS Paper-2 (Governance & Policy)

प्रश्न:
नक्सलवाद उन्मूलन में "विकास ही सर्वश्रेष्ठ प्रतिरोध" की अवधारणा को अबुझमाड़ के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।
(150 words)


4. GS Paper-3 (Internal Security)

प्रश्न:
भारत में वामपंथी उग्रवाद (Left Wing Extremism) से निपटने में आधुनिक तकनीक, स्थानीय समुदायों और पुनर्वास नीतियों की भूमिका का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
(250 words)


🧩 UPSC Prelims (Objective / MCQ) संभावित प्रश्न

1. तथ्य-आधारित प्रश्न

प्रश्न:
हाल ही में समाचारों में उल्लेखित “अबुझमाड़” क्षेत्र संबंधित है—
(a) नक्सल प्रभाव वाला घना वन क्षेत्र
(b) भारत-चीन सीमा विवादित क्षेत्र
(c) प्रमुख जैव विविधता आरक्षित क्षेत्र
(d) नर्मदा घाटी का भू-आकृतिक क्षेत्र

उत्तर: (a) नक्सल प्रभाव वाला घना वन क्षेत्र


2. नीति-संबंधी प्रश्न

प्रश्न:
भारत सरकार की “समर्पण या समाप्ति” (Surrender or Elimination) नीति का संबंध है —
(a) आतंकवाद निरोधक अभियानों से
(b) नक्सलवाद उन्मूलन रणनीति से
(c) अवैध खनन नियंत्रण से
(d) सीमा सुरक्षा नीति से

उत्तर: (b) नक्सलवाद उन्मूलन रणनीति से


3. संगठन-संबंधी प्रश्न

प्रश्न:
भारत में वामपंथी उग्रवाद से संबंधित प्रमुख संगठन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओइस्ट) का गठन किस दशक में हुआ था?
(a) 1960 का दशक
(b) 1970 का दशक
(c) 1980 का दशक
(d) 1990 का दशक

उत्तर: (d) 1990 का दशक


4. घटनाक्रम आधारित प्रश्न

प्रश्न:
निम्नलिखित घटनाओं को कालानुक्रम में सही क्रम में लगाइए —

  1. दरभा घाटी हमला
  2. सलवा जूडुम की शुरुआत
  3. दंतेवाड़ा हमला
  4. अबुझमाड़ नक्सल-मुक्त घोषणा

क्रम:
2 → 3 → 1 → 4

सही उत्तर: सलवा जूडुम (2005) → दंतेवाड़ा (2010) → दरभा घाटी (2013) → अबुझमाड़ नक्सल-मुक्त (2025)


5. वैचारिक प्रश्न

प्रश्न:
भारत में नक्सलवाद की वैचारिक प्रेरणा मुख्यतः किस विचारधारा से संबंधित है?
(a) लेनिनवाद
(b) मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद
(c) समाजवाद
(d) अराजकतावाद

उत्तर: (b) मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद




Comments

Advertisement

POPULAR POSTS

Islamic NATO in the Making? Turkey, Saudi Arabia and Pakistan’s Emerging Defense Axis

“इस्लामिक नाटो” की परिकल्पना: तुर्की के हथियार, सऊदी धन और पाकिस्तान की परमाणु क्षमता — एक उभरते रक्षा गठजोड़ का विश्लेषण प्रस्तावना अंतरराष्ट्रीय राजनीति में गठबंधन स्थिर नहीं होते; वे समय, खतरे और हितों के अनुसार बदलते रहते हैं। हाल के वर्षों में मध्य एशिया, पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक परिवेश में तेज़ी से परिवर्तन हुआ है। इसी संदर्भ में तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच संभावित रक्षा-सहयोग को कुछ विश्लेषक “इस्लामिक नाटो” जैसी संज्ञा देने लगे हैं। यद्यपि यह कोई औपचारिक सैन्य संगठन नहीं है, फिर भी तीनों देशों के पूरक सामर्थ्य — तुर्की की रक्षा-तकनीक, सऊदी अरब की आर्थिक शक्ति और पाकिस्तान की परमाणु क्षमता — एक नए रणनीतिक त्रिकोण की संभावना को जन्म देते हैं। यह लेख इस संभावित रक्षा गठजोड़ की पृष्ठभूमि, इसके कारक, संभावित स्वरूप और वैश्विक राजनीति पर इसके प्रभावों का अकादमिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। 1. भू-राजनीतिक पृष्ठभूमि शीत युद्ध के बाद की दुनिया में शक्ति संतुलन पश्चिमी देशों से धीरे-धीरे बहुध्रुवीय संरचना की ओर बढ़ा है। अमेरिका और यूरोप की प्रभुत्ववादी भूम...

Trump’s Greenland Ambition and Europe Tariff Crisis: A New Geopolitical Flashpoint in 2026

ट्रंप की ग्रीनलैंड नीति और यूरोप पर टैरिफ का संकट: 21वीं सदी की नई भू-राजनीतिक परीक्षा 18 जनवरी 2026 को एक बार फिर वैश्विक राजनीति उस मोड़ पर खड़ी दिखाई दी, जहाँ शक्ति, संप्रभुता और आर्थिक दबाव आमने-सामने आ गए। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को खरीदने या किसी रूप में अमेरिकी नियंत्रण में लाने की अपनी पुरानी इच्छा को आक्रामक ढंग से दोहराया। 2019 में यह विचार दुनिया को अजीब लगा था, लेकिन 2025 में सत्ता में वापसी के बाद ट्रंप ने इसे रणनीतिक एजेंडे में बदल दिया। अब यह केवल एक असामान्य प्रस्ताव नहीं, बल्कि एक गंभीर अंतरराष्ट्रीय संकट का रूप ले चुका है। ग्रीनलैंड, जो डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है, भौगोलिक रूप से आर्कटिक क्षेत्र के केंद्र में स्थित है। बर्फ से ढकी यह भूमि देखने में शांत लगती है, लेकिन इसके नीचे खनिज संसाधनों, दुर्लभ पृथ्वी तत्वों और भविष्य के समुद्री मार्गों की अपार संभावनाएँ छिपी हैं। इसके साथ ही, यह अमेरिका, रूस और यूरोप के बीच रणनीतिक संतुलन का एक महत्वपूर्ण बिंदु बन चुका है। ट्रंप का तर्क है कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अनिवार्य है, ...

Trump’s Gaza “Board of Peace”: Power, Peacebuilding and the Future of Post-War Reconstruction

ट्रंप द्वारा गाजा के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की घोषणा: शक्ति, शांति और पुनर्निर्माण के बीच एक जटिल प्रयोग प्रस्तावना 17 जनवरी 2026 को व्हाइट हाउस से की गई एक घोषणा ने मध्य पूर्व की राजनीति में नई बहस छेड़ दी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा संघर्ष समाप्ति योजना के दूसरे चरण के अंतर्गत एक नई संस्था— ‘बोर्ड ऑफ पीस’ —के संस्थापक कार्यकारी सदस्यों की घोषणा की। इस बोर्ड का घोषित उद्देश्य गाजा में युद्ध के बाद के पुनर्निर्माण, स्थिरीकरण, प्रशासनिक क्षमता निर्माण और दीर्घकालिक विकास की निगरानी करना है। स्वयं ट्रंप इस बोर्ड के अध्यक्ष हैं। यह पहल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2803 (2025) से जुड़ी बताई गई है, जिसने ट्रंप की 20-सूत्रीय शांति योजना को सैद्धांतिक समर्थन दिया था। यह घोषणा केवल एक प्रशासनिक कदम नहीं है, बल्कि यह अमेरिका की मध्य पूर्व नीति, वैश्विक शासन संरचना और “शांति-निर्माण” की अवधारणा को लेकर कई बुनियादी प्रश्न खड़े करती है। पृष्ठभूमि: युद्ध से युद्धविराम तक अक्टूबर 2025 में हुए नाजुक युद्धविराम से पहले गाजा लगभग दो वर्षों तक भीषण युद्ध की चपेट में रहा। इस दौरा...

Jimmy Lai Case: Hong Kong National Security Law, Press Freedom and Global Human Rights Debate

हांगकांग–चीन संबंध और जिमी लाई मामला राष्ट्रीय सुरक्षा, प्रेस स्वतंत्रता और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का समग्र अकादमिक विश्लेषण भूमिका हांगकांग आज केवल एक वैश्विक वित्तीय केंद्र नहीं, बल्कि इतिहास, राजनीति, कानून और मानवाधिकारों के जटिल संगम का प्रतीक बन चुका है। इसकी वर्तमान स्थिति को समझने के लिए उसके औपनिवेशिक अतीत, “एक देश–दो प्रणाली” की अवधारणा और हाल के वर्षों में लागू राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की भूमिका को समग्रता में देखना आवश्यक है। जिमी लाई का मामला इसी ऐतिहासिक और राजनीतिक परिवर्तन का जीवंत उदाहरण है, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, न्यायिक प्रक्रिया और प्रेस स्वतंत्रता आमने-सामने खड़ी दिखाई देती हैं। 1. हांगकांग–चीन संबंधों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (क) चीन का पारंपरिक हिस्सा हांगकांग प्राचीन काल से चीनी साम्राज्यों का हिस्सा रहा। यह मुख्यतः मछली पकड़ने और स्थानीय व्यापार पर आधारित क्षेत्र था। मिंग और चिंग राजवंशों के समय इसे दक्षिण चीन का सामान्य तटीय इलाका माना जाता था। (ख) अफीम युद्ध और ब्रिटिश उपनिवेश 19वीं सदी में अफीम युद्धों ने हांगकांग के भाग्य को बदल दिया। 1842 की नानजि...

Why India Needs a Shadow Cabinet: Strengthening the Role of Opposition in a Modern Democracy

वर्तमान में भारत में विपक्ष की आवाज़ को सशक्त बनाने हेतु छाया मंत्रिमंडल की आवश्यकता एक समग्र अकादमिक विश्लेषण परिचय लोकतंत्र की आत्मा सत्ता और विपक्ष के बीच संतुलन में निहित होती है। जहां सत्तारूढ़ दल शासन, नीति-निर्माण और प्रशासन का दायित्व निभाता है, वहीं विपक्ष का कार्य केवल विरोध करना नहीं, बल्कि सरकार की नीतियों की समीक्षा, आलोचना और वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना होता है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में विपक्ष ‘नकारात्मक शक्ति’ नहीं, बल्कि रचनात्मक नियंत्रक (Constructive Watchdog) की भूमिका निभाता है। भारत, जो स्वयं को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र घोषित करता है, आज एक ऐसे राजनीतिक चरण से गुजर रहा है जहाँ विपक्ष की भूमिका कमजोर, बिखरी हुई और प्रतिक्रियात्मक दिखाई देती है। संसद के भीतर विमर्श का स्तर गिरा है और नीति-आलोचना प्रायः नारेबाज़ी या वॉकआउट तक सीमित रह जाती है। ऐसे परिदृश्य में छाया मंत्रिमंडल (Shadow Cabinet) की अवधारणा भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष की आवाज़ को संस्थागत, संगठित और प्रभावी बनाने का एक महत्वपूर्ण साधन बन सकती है। यह लेख भारत में छाया मंत्रिमंडल की आवश्यकता, उसके संभा...

Gig Workers in India: Pain, Challenges and 10-Minute Delivery Crisis in Quick Commerce Sector

भारत में गिग वर्कर्स की पीड़ा: क्विक कॉमर्स और 10 मिनट डिलीवरी संकट का विश्लेषण डिजिटल क्रांति ने जिस सबसे बड़े सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन को जन्म दिया है, उसका एक प्रमुख रूप है—गिग इकोनॉमी। ऐप-आधारित प्लेटफॉर्म्स ने काम को “ऑन-डिमांड” बना दिया है, जहाँ नौकरी स्थायी नहीं, बल्कि अस्थायी कार्यों की शृंखला है। उबर, ब्लिंकिट, ज़ेप्टो, स्विगी इंस्टामार्ट और ज़ोमैटो जैसे प्लेटफॉर्म्स इस मॉडल के प्रतीक हैं। पहली नज़र में यह व्यवस्था युवाओं को लचीलापन, तुरंत कमाई और तकनीक से जुड़ने का अवसर देती है, लेकिन इसी चमकदार परत के नीचे गिग वर्कर्स की पीड़ा, असुरक्षा और संघर्ष की एक लंबी कहानी छिपी है। भारत में यह समस्या विशेष रूप से क्विक कॉमर्स सेक्टर में दिखाई देती है, जहाँ “10 मिनट में डिलीवरी” जैसे वादों ने उपभोक्ताओं को तो सुविधा दी, लेकिन डिलीवरी पार्टनर्स के जीवन को जोखिम में डाल दिया। यह केवल तेज डिलीवरी का सवाल नहीं है, बल्कि यह उस आर्थिक मॉडल का सवाल है जो मुनाफे को श्रमिकों की सुरक्षा से ऊपर रखता है। गिग इकोनॉमी: अवसर और विरोधाभास गिग इकोनॉमी का मूल आकर्षण है—लचीलापन। कोई भी व्यक्ति अपनी सु...

Trump’s “Board of Peace”: From Gaza Plan to Global Conflict Resolution

ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’: गाजा से वैश्विक संघर्ष समाधान तक एक नया प्रयोग प्रस्तावना इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में वैश्विक राजनीति एक बार फिर संक्रमण के दौर से गुजर रही है। बहुपक्षीय संस्थाएं—विशेषकर संयुक्त राष्ट्र—लगातार यह आरोप झेल रही हैं कि वे तेज़ी से बदलते संघर्षों के समाधान में प्रभावी नहीं रह गई हैं। इसी पृष्ठभूमि में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2025 में गाजा संकट के समाधान के लिए एक 20-सूत्रीय योजना पेश की और उसके दूसरे चरण में एक नई संस्था— ‘बोर्ड ऑफ पीस’ —की स्थापना की। जो पहल गाजा तक सीमित मानी जा रही थी, वह जनवरी 2026 में अचानक वैश्विक संघर्ष समाधान के मंच में बदलने लगी। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, बहुपक्षीयता और अमेरिका की भूमिका पर नए प्रश्न खड़े हो गए हैं। गाजा संकट और ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की उत्पत्ति 2024–25 में इजरायल-हमास संघर्ष ने गाजा को मानवीय त्रासदी के केंद्र में ला खड़ा किया। लगातार युद्ध, विस्थापन, भुखमरी और बुनियादी ढांचे का विनाश अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए चुनौती बन गया। इसी संदर्भ में सितंबर 2025 में ट्रंप ने ‘कॉम्प्रिहेंसिव प्लान टू एंड द गाजा क...

Frederick Merz’s India Visit and the “Indo-Europe” Idea: A New Strategic Geography

जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज़ की भारत यात्रा और 'इंडो-यूरोप' की अवधारणा: एक रणनीतिक विश्लेषण प्रस्तावना वैश्विक भू-राजनीति में तेजी से बदलाव आ रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एकतरफा नीतियां और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की आक्रामक कूटनीति ने दुनिया को अस्थिरता की ओर धकेल दिया है। ऐसे समय में जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज़ की जनवरी 2026 में भारत की दो-दिवसीय आधिकारिक यात्रा केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह एक नई रणनीतिक भूगोल की शुरुआत का संकेत देती है। प्रसिद्ध स्तंभकार सी. राजा मोहन ने इसे "इंडो-यूरोप" की संज्ञा दी है। यह अवधारणा भारत और यूरोप (विशेषकर जर्मनी) के बीच गहन सहयोग के माध्यम से अमेरिका और चीन के प्रभुत्व को संतुलित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह यात्रा 25 वर्षों के भारत-जर्मनी रणनीतिक साझेदारी और 75 वर्षों के राजनयिक संबंधों के उपलक्ष्य में हुई, जिसमें दोनों पक्षों ने 19 समझौतों पर हस्ताक्षर किए। यात्रा के प्रमुख परिणाम और समझौते मेर्ज़ की यात्रा 12-13 जनवरी 2026 को हुई, जो उनकी चांसलर बनने के बाद प...

India's Israel-Palestine Policy: From Traditional Palestinian Support to Strategic Balance with Israel (2026 Update)

भारत की इज़राइल-फिलिस्तीन विदेश नीति: नेहरू से मोदी तक इज़राइल–फिलिस्तीन विवाद बीसवीं सदी के सबसे जटिल और दीर्घकालिक भू-राजनीतिक संघर्षों में से एक है, जो 1947-48 के विभाजन और इज़राइल की स्थापना से लेकर आज के गाजा संकट तक फैला हुआ है। यह मुद्दा न केवल मध्य पूर्व की राजनीति को आकार देता है, बल्कि वैश्विक दक्षिण-उत्तरी संबद्धताओं, धार्मिक पहचान राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विमर्श का केंद्र बिंदु भी रहा है। भारत का रुख इस संदर्भ में विशेष रूप से अध्ययन-योग्य है, क्योंकि यह पारंपरिक रूप से फिलिस्तीनी आत्मनिर्णय के समर्थक के रूप में जाना जाता है, जबकि हाल के दशकों में इज़राइल के साथ रणनीतिक साझेदारी भी गहराती जा रही है। यह द्वंद्व भारत की विदेश नीति की बहुआयामी प्रकृति को उजागर करता है, जिसमें ऐतिहासिक विरासत, वैचारिक आधार, भू-रणनीतिक हित, आर्थिक कारक और घरेलू राजनीतिक संवेदनशीलताएं शामिल हैं। इस विश्लेषण में हम इन आयामों का संतुलित परीक्षण करेंगे, विशेष रूप से 2023 के बाद की घटनाओं के प्रकाश में, जो दर्शाती हैं कि भारत किस प्रकार वैश्विक दबावों के बीच संतुलन साध रहा है। भारत की विदे...

Trump’s Gaza Peace Board and India’s Role: Strategic, Political and Ethical Analysis

ट्रंप की ‘गाजा शांति बोर्ड’ में भारत की संभावित भागीदारी: एक संतुलित विश्लेषण भूमिका इजरायल–हमास युद्ध के बाद गाजा पट्टी के भविष्य को लेकर वैश्विक स्तर पर कई योजनाएँ सामने आई हैं। इन्हीं में से एक है अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस फॉर गाजा’ । इसका उद्देश्य गाजा में युद्धोत्तर शासन, सुरक्षा व्यवस्था और पुनर्निर्माण को एक अंतरराष्ट्रीय ढाँचे के तहत संचालित करना है। इस बोर्ड में भारत को औपचारिक रूप से आमंत्रित किया गया है। यह निमंत्रण केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका की स्वीकृति भी है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या भारत को इस पहल का हिस्सा बनना चाहिए? और यदि हाँ, तो किस स्तर तक? यह लेख इसी प्रश्न का ऐतिहासिक, रणनीतिक और नैतिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करता है और अंत में एक संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत करता है। पृष्ठभूमि: गाजा और ट्रंप की शांति योजना गाजा लंबे समय से इजरायल–फिलिस्तीन संघर्ष का केंद्र रहा है। हमास के नियंत्रण, इजरायली सैन्य कार्रवाइयों और मानवीय संकट ने इस क्षेत्र को वैश्विक चिंता का विषय बना दिया है। ट्रंप ...