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Rising Attacks on Hindu Minorities in Bangladesh: Global Silence and Human Rights Concerns

The Silent Genocide: Persecution of Hindus in Bangladesh and the Moral Failure of the Global Community In an age where conflicts in Gaza, Ukraine, and other flashpoints command the world’s attention, a quieter yet deeply disturbing humanitarian crisis continues to unfold next door to India — in Bangladesh. Since the political upheaval and resignation of Prime Minister Sheikh Hasina in August 2024, reports of violence against the Hindu minority have escalated dramatically. Killings, arson attacks, vandalism of temples, forced displacement, economic boycotts, and intimidation have become frighteningly frequent. According to figures cited by Indian authorities, more than 2,200 incidents of violence against Hindus were recorded in 2024 alone , with similar patterns continuing through 2025 and into 2026. Independent reports corroborate these trends: homes torched, idols desecrated, businesses looted, and families compelled to flee ancestral lands. Yet, despite the mounting evidence, the w...

Russia-Ukraine War and India's Energy Diplomacy: Implications of Zelenskyy's Warning

रूस-यूक्रेन युद्ध, ज़ेलेंस्की की चेतावनी और भारत की ऊर्जा-कूटनीति: चुनौतियाँ व संभावनाएँ

भूमिका

रूस-यूक्रेन युद्ध, जो फरवरी 2022 में शुरू हुआ, ने वैश्विक ऊर्जा बाज़ार, कूटनीति और रणनीतिक समीकरणों को गहराई से प्रभावित किया है। इस संघर्ष ने न केवल यूरोप, बल्कि एशिया और अन्य क्षेत्रों में ऊर्जा व्यापार, व्यापार नीतियों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को झकझोरा है। हाल ही में यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर ज़ेलेंस्की ने अमेरिका से अपील की कि वह रूस के खिलाफ त्वरित और सख्त कार्रवाई करे, विशेष रूप से उन देशों पर ध्यान दे जो रूस से तेल खरीदते हैं, जैसे भारत। 2024 में भारत ने रूस से 52.73 बिलियन डॉलर का क्रूड आयात किया, जो उसके कुल तेल आयात का 37% है। यह स्थिति भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा, कूटनीतिक संतुलन और वैश्विक छवि की दृष्टि से जटिल चुनौतियाँ प्रस्तुत करती है, खासकर जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 50% टैरिफ लगा दी है।

ज़ेलेंस्की के तर्क: क्यों देरी ख़तरनाक

ज़ेलेंस्की का कहना है कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन वैश्विक मंचों, जैसे हाल के ट्रंप-पुतिन अलाइवका शिखर सम्मेलन, में भाग लेकर अपने अंतरराष्ट्रीय अलगाव को तोड़ रहे हैं। उनका मानना है कि यदि अमेरिका और उसके सहयोगी प्रतिबंधों में ढील देते हैं या कार्रवाई में देरी करते हैं, तो रूस अपनी स्थिति को और मजबूत करेगा। ज़ेलेंस्की ने सितंबर 2025 में स्काई न्यूज को दिए साक्षात्कार में कहा कि रूस से तेल खरीदना कुछ देशों के लिए ‘समझने योग्य’ हो सकता है, लेकिन अमेरिका को ऐसे देशों पर टैरिफ लगाने और रूस के खिलाफ सख्त कदम उठाने में देर नहीं करनी चाहिए। उन्होंने ट्रंप के टैरिफ प्रस्ताव को “सही विचार” करार दिया, क्योंकि यह रूस के युद्ध प्रयासों को वित्तीय सहायता देने वाले देशों पर दबाव डालता है। X प्लेटफॉर्म पर इस मुद्दे पर तीखी बहस देखी गई है, जहां कुछ यूक्रेन समर्थक पोस्ट्स भारत को “मॉस्को के समर्थक” के रूप में चित्रित करते हैं, जिससे भारत की तटस्थ छवि पर सवाल उठ रहे हैं।

भारत के सामने चुनौतियाँ

1. ऊर्जा निर्भरता – भारत को रूस से सस्ता क्रूड ऑयल मिलता है, जिसने 2024-25 में घरेलू ईंधन कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद की। अक्टूबर 2025 के लिए अनुमानित आयात 1.4 मिलियन बैरल प्रति दिन है। हालांकि, अगर अमेरिकी टैरिफ बढ़ते हैं या प्रतिबंध सख्त होते हैं, तो यह लाभ कम हो सकता है, जिससे मुद्रास्फीति और ऊर्जा लागत बढ़ सकती है।

2. निर्यात जोखिम – अमेरिकी और यूरोपीय टैरिफ भारतीय रिफाइनरियों और पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात को प्रभावित कर सकते हैं। जनवरी-जुलाई 2025 में भारत ने 35.5 मिलियन मीट्रिक टन रिफाइंड ऑयल निर्यात किया, जिसमें से 10% यूएई को गया। रूसी तेल के उपयोग के कारण अमेरिका द्वारा प्रतिबंध लगाए जाने का खतरा बढ़ रहा है।

3. कूटनीतिक दबाव – रूस के साथ दशकों पुराने रक्षा और ऊर्जा संबंध भारत को पश्चिमी देशों के दबाव में ला रहे हैं। अमेरिकी दूतावास ने स्पष्ट किया है कि भारत का रूसी तेल आयात खत्म करना उनकी प्राथमिकता है, जो द्विपक्षीय व्यापार समझौतों को जटिल बना सकता है।

4. वैश्विक छवि पर असर – भारत की तटस्थता और ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की नीति को केवल आर्थिक लाभ के रूप में देखा जा सकता है, जिससे उसकी वैश्विक मध्यस्थ की छवि धूमिल हो सकती है। 2025 में ट्रंप के साथ व्यापारिक तनाव ने इस चुनौती को और बढ़ा दिया है।

भारत की संभावनाएँ

1. वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता – भारत मध्य-पूर्व (जैसे सऊदी अरब, इराक), अफ्रीका (नाइजीरिया) और अमेरिका से तेल आयात बढ़ाकर रूस पर निर्भरता कम कर सकता है। इराक से आयात बढ़ाकर रूस के 37% शेयर को संतुलित किया जा सकता है।

2. ऊर्जा सुरक्षा – रणनीतिक तेल भंडार (SPR) को बढ़ाना और नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश करना दीर्घकालिक समाधान हो सकता है। भारत का 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा का लक्ष्य आयात निर्भरता को कम करने में मदद करेगा।

3. कूटनीतिक संतुलन – भारत रूस के साथ अपने मजबूत रक्षा और ऊर्जा संबंधों को बनाए रखते हुए पश्चिमी देशों को यह आश्वस्त कर सकता है कि वह युद्ध को बढ़ावा नहीं दे रहा। 2025 में भारत-रूस संबंधों में रणनीतिक सहमति पर जोर दिया गया है, जैसे SCO समिट में शांति वार्ता की वकालत।

4. निर्यात बाज़ार विविधीकरण – एशिया (जैसे सिंगापुर, मलेशिया) और अफ्रीका के नए बाज़ारों में रिफाइंड उत्पादों का निर्यात बढ़ाकर यूरोप पर निर्भरता कम की जा सकती है। फिर हाल संकटग्रस्त रूसी टैंकरों के बावजूद, मुंद्रा पोर्ट पर आयात-निर्यात जारी है, लेकिन विविधीकरण आवश्यक है।

5. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मध्यस्थता – भारत शांति वार्ता और कूटनीतिक पहल के जरिए अपनी सकारात्मक छवि बना सकता है। उदाहरण के लिए, 2025 SCO समिट में प्रधानमंत्री मोदी ने पुतिन के साथ मुलाकात में शांति पर जोर दिया, जिसे वैश्विक मंचों पर सराहा गया।

विश्लेषणात्मक दृष्टि

ज़ेलेंस्की की चेतावनी रूस-यूक्रेन युद्ध में समय और रणनीति की महत्ता को रेखांकित करती है। भारत के लिए यह स्थिति एक जटिल संतुलन की मांग करती है। एक ओर ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हित हैं – जैसे अगस्त 2025 में 3.1 बिलियन डॉलर का रूसी तेल आयात – तो दूसरी ओर वैश्विक छवि और कूटनीतिक रिश्तों का दबाव। भारत की रक्षा निर्भरता (60% सैन्य उपकरण रूस से) और ऊर्जा आयात इसे रणनीतिक जटिलता में डालते हैं। हालांकि, ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण, जैसे इराक और सऊदी अरब से आयात बढ़ाना, और नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश भारत को इस दबाव से उबार सकता है। इसके अलावा, भारत आर्कटिक जैसे नए क्षेत्रों में रूस के साथ सहयोग को पश्चिमी देशों के साथ संतुलित कर सकता है, जैसा कि हाल की नीतिगत चर्चाओं में सामने आया है। X पर चल रही बहस में कुछ उपयोगकर्ता भारत की तटस्थता को “opportunistic” करार दे रहे हैं, जो भारत को अपनी नीति को और स्पष्ट करने की आवश्यकता दर्शाता है।

निष्कर्ष

रूस-यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक परिदृश्य को जटिल बना दिया है, जहां सैन्य शक्ति के साथ-साथ कूटनीति, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक नीति निर्णायक भूमिका निभा रही हैं। ज़ेलेंस्की की चेतावनी भारत के लिए एक संकेत है कि वह अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए समयबद्ध और संतुलित फैसले ले। 2025 में यूरोपीय संघ और अमेरिका की नीतियों में विभाजन भारत के व्यापार पर असर डाल सकता है, लेकिन ऊर्जा विविधीकरण, निर्यात बाज़ारों का विस्तार और शांति मध्यस्थता के जरिए भारत इन चुनौतियों को अवसर में बदल सकता है। भारत की नीति यदि पारदर्शी और समावेशी रहती है, तो वह न केवल अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, बल्कि वैश्विक मंच पर एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में उभरेगा।

स्रोत

1. Energy Policy Columbia – Tensions with the US and EU  

2. Reuters – Indian refiners pause Russian oil purchases  

3. The Diplomat – India’s Russian Oil Dilemma  

4. Times of India – Zelenskyy urges US action against Russia  

5. Eurasia Review – India’s Strategic Autonomy in the Russia-Ukraine War  

6. X Post Analysis – Discussions on India’s role in Russian oil imports, September 2025  

7. Indian Ministry of Commerce – Trade Statistics, January-July 2025  

8. Oil and Gas Journal – India’s crude import trends, 2024-25  

9. Sky News Interview – Zelenskyy on tariffs and Russia, September 2025  

10. SCO Summit Reports – Modi-Putin discussions, 2025

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