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The “Bedbug Mentality” in Society: A Challenge of Exploitation and Mental Harassment

“समाज में पनपती खटमल प्रवृत्ति: शोषण और मानसिक उत्पीड़न का जाल” परिचय भारतीय समाज में समय-समय पर विभिन्न सामाजिक समस्याएँ उभरती रही हैं। हाल के वर्षों में एक नई प्रवृत्ति सामने आई है, जिसे हम रूपक में “खटमल प्रवृत्ति” कह सकते हैं। जैसे खटमल बिना श्रम किए दूसरों का रक्त चूसकर जीवित रहता है, वैसे ही कुछ लोग दूसरों की मेहनत, संसाधनों और मानसिक शांति का शोषण करके अपने स्वार्थ पूरे करते हैं। यह केवल आर्थिक परजीविता तक सीमित नहीं है, बल्कि अब इसका नया रूप मानसिक उत्पीड़न (psychological exploitation) के रूप में दिखाई देने लगा है। यह प्रवृत्ति न केवल व्यक्तिगत जीवन, बल्कि संस्थागत और सामाजिक ढाँचे पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है। आर्थिक परजीविता से मानसिक शोषण तक परंपरागत रूप से यह प्रवृत्ति भ्रष्टाचार, मुफ्तखोरी और कार्यस्थल पर दूसरों का श्रेय चुराने जैसे उदाहरणों में दिखाई देती रही है। परंतु अब इसका सूक्ष्म रूप मानसिक उत्पीड़न है — निरंतर आलोचना, अपमानजनक व्यवहार, सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग, और असहज तुलना। यह प्रवृत्ति व्यक्ति की mental well-being , समाज की trust capital और संस्थाओं ...

Why the Pancholi Case Matters for Judicial Appointments in India

न्यायपालिका की नियुक्ति और असहमति का स्वर: पंचोली प्रकरण से सबक

भारत की न्यायपालिका लोकतंत्र की रीढ़ मानी जाती है। संविधान के अनुच्छेद 124 से लेकर सुप्रीम कोर्ट की व्याख्यात्मक परंपरा तक, न्यायपालिका ने अपने को स्वतंत्र और निष्पक्ष संस्थान के रूप में स्थापित किया है। किंतु न्यायिक नियुक्तियों को लेकर उठने वाले विवाद यह प्रश्न खड़ा करते हैं कि क्या प्रक्रिया उतनी ही पारदर्शी और उत्तरदायी है, जितनी अपेक्षित होनी चाहिए। हाल ही में न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति और उस पर न्यायमूर्ति बी. वी. नगरात्ना की असहमति इसी विमर्श का जीवंत उदाहरण है।


नियुक्ति की पृष्ठभूमि

सुप्रीम कोर्ट कालेजियम ने 25 अगस्त 2025 को न्यायमूर्ति पंचोली का नाम सर्वोच्च न्यायालय के लिए अनुशंसित किया। केंद्र सरकार ने त्वरित रूप से 27 अगस्त को मंजूरी प्रदान कर दी और 29 अगस्त को उन्होंने शपथ ग्रहण की। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने 34 न्यायाधीशों की पूर्ण संख्या प्राप्त कर ली।

यद्यपि यह नियुक्ति नियमित प्रक्रिया का हिस्सा थी, किंतु इसमें सबसे बड़ा मोड़ आया न्यायमूर्ति नगरात्ना के dissent के रूप में। सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ जज और कालेजियम सदस्य के रूप में उन्होंने यह कहा कि इस नियुक्ति में वरिष्ठता, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और विविधता जैसे बुनियादी सिद्धांतों की अनदेखी की गई है।


नगरात्ना का असहमति स्वर: क्यों महत्त्वपूर्ण?

न्यायमूर्ति नगरात्ना का विरोध केवल व्यक्तिगत असहमति नहीं, बल्कि संस्थागत आत्मचेतना का प्रतीक है। उनके अनुसार:

  1. वरिष्ठता की अनदेखी: कई वरिष्ठ जजों को दरकिनार कर दिया गया।
  2. क्षेत्रीय संतुलन: गुजरात से पहले ही पर्याप्त प्रतिनिधित्व था, जबकि उत्तर-पूर्व और अन्य क्षेत्रों से कमी बनी हुई है।
  3. विविधता: नियुक्ति में लैंगिक, सामाजिक और क्षेत्रीय विविधता की कसौटी पर अपेक्षित संवेदनशीलता नहीं दिखी।
  4. विश्वसनीयता पर आघात: ऐसी नियुक्तियां जनता के विश्वास और न्यायपालिका की पारदर्शिता को कमजोर करती हैं।

नियुक्ति प्रक्रिया बनाम पारदर्शिता

कालेजियम प्रणाली का उद्भव इस उद्देश्य से हुआ कि न्यायपालिका राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रह सके। परंतु समय के साथ इसकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हैं:

  • गोपनीयता का बोझ: चयन के मानदंड सार्वजनिक नहीं होते।
  • लचीलापन बनाम अस्पष्टता: कभी वरिष्ठता को महत्व दिया जाता है, तो कभी ‘merit’ को, जिससे असंगति पैदा होती है।
  • अल्पमत की अनदेखी: कालेजियम में dissent दर्ज होने पर भी अंतिम निर्णय बहुमत के अनुसार ही होता है।

नगरात्ना का dissent इस प्रणाली की खामियों को उजागर करता है और सुधार की आवश्यकता पर बल देता है।


UPSC दृष्टिकोण से निहितार्थ

GS Paper-2: Polity and Governance

  • न्यायपालिका की नियुक्ति प्रक्रिया पर प्रश्न संसद और समाज दोनों के स्तर पर उठ रहे हैं।
  • यह मामला बताता है कि संवैधानिक संस्थानों की पारदर्शिता लोकतंत्र की मजबूती से सीधे जुड़ी है।
  • अनुच्छेद 124 की व्याख्या और NJAC (2015) मामले का संदर्भ यहाँ महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

GS Paper-4: Ethics and Integrity

  • नैतिक साहस (Moral courage): नगरात्ना ने संस्थागत दबाव के बावजूद अपना dissent सार्वजनिक किया।
  • सार्वजनिक विश्वास (Public trust): न्यायपालिका का अधिकार जनता के विश्वास से आता है, और यह तभी संभव है जब प्रक्रिया निष्पक्ष दिखे।

Essay Perspective

यह मुद्दा लोकतंत्र, संस्थागत संतुलन और असहमति की भूमिका जैसे व्यापक विषयों से जुड़ता है। UPSC निबंध में इसे “Institutions and Transparency” या “Democracy and Dissent” जैसे टॉपिक्स से जोड़ा जा सकता है।


भविष्य के निहितार्थ

  1. CJI की कतार: जस्टिस पंचोली 2031 में CJI बनने की संभावना रखते हैं, अतः यह नियुक्ति केवल वर्तमान नहीं बल्कि भविष्य की न्यायिक संरचना को भी प्रभावित करती है।
  2. पहली महिला CJI: स्वयं नगरात्ना 2027 में देश की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बनने वाली हैं। उनका dissent ऐतिहासिक रूप से और भी महत्त्वपूर्ण बन जाता है।
  3. सुधार की मांग: यह विवाद नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और विविधता को समाहित करने की मांग को तेज करेगा।

निष्कर्ष: असहमति की गूंज

लोकतंत्र में असहमति केवल मतभेद नहीं, बल्कि संस्थागत जीवंतता का संकेत है। न्यायमूर्ति नगरात्ना का dissent न्यायपालिका के भीतर आत्ममंथन की आवश्यकता को रेखांकित करता है। यदि सुप्रीम कोर्ट अपनी नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता, विविधता और संतुलन सुनिश्चित कर पाए, तो यह न केवल जनता के विश्वास को मजबूत करेगा बल्कि न्यायपालिका की नैतिक ऊँचाई को भी स्थायी बनाएगा।


👉 मुख्य संदेश (UPSC हेतु उद्धरण योग्य पंक्ति):
“Judicial independence draws legitimacy not merely from freedom from politics, but from transparency, diversity and accountability to the people it serves.”




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