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The “Bedbug Mentality” in Society: A Challenge of Exploitation and Mental Harassment

“समाज में पनपती खटमल प्रवृत्ति: शोषण और मानसिक उत्पीड़न का जाल” परिचय भारतीय समाज में समय-समय पर विभिन्न सामाजिक समस्याएँ उभरती रही हैं। हाल के वर्षों में एक नई प्रवृत्ति सामने आई है, जिसे हम रूपक में “खटमल प्रवृत्ति” कह सकते हैं। जैसे खटमल बिना श्रम किए दूसरों का रक्त चूसकर जीवित रहता है, वैसे ही कुछ लोग दूसरों की मेहनत, संसाधनों और मानसिक शांति का शोषण करके अपने स्वार्थ पूरे करते हैं। यह केवल आर्थिक परजीविता तक सीमित नहीं है, बल्कि अब इसका नया रूप मानसिक उत्पीड़न (psychological exploitation) के रूप में दिखाई देने लगा है। यह प्रवृत्ति न केवल व्यक्तिगत जीवन, बल्कि संस्थागत और सामाजिक ढाँचे पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है। आर्थिक परजीविता से मानसिक शोषण तक परंपरागत रूप से यह प्रवृत्ति भ्रष्टाचार, मुफ्तखोरी और कार्यस्थल पर दूसरों का श्रेय चुराने जैसे उदाहरणों में दिखाई देती रही है। परंतु अब इसका सूक्ष्म रूप मानसिक उत्पीड़न है — निरंतर आलोचना, अपमानजनक व्यवहार, सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग, और असहज तुलना। यह प्रवृत्ति व्यक्ति की mental well-being , समाज की trust capital और संस्थाओं ...

The Disappearance of 65 Lakh Voters in Bihar: A Question Mark on Democracy

 

 बिहार में 65 लाख मतदाताओं का गायब होना: लोकतंत्र पर सवालों का साया


स्वर: जब 65 लाख आवाजें मतदाता सूची से गायब हो जाएँ, तो क्या लोकतंत्र की धड़कन कमजोर नहीं पड़ती?


भारत का लोकतंत्र अपनी चुनावी प्रक्रिया की मजबूती से चमकता है। यह वह नींव है, जिस पर संविधान निर्माताओं ने जनता की संप्रभुता का भव्य भवन खड़ा किया। लेकिन बिहार में हालिया Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया ने इस नींव को हिलाकर रख दिया है। ड्राफ्ट मतदाता सूची से 65 लाख नामों का विलोपन कोई साधारण प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि लोकतंत्र के विश्वास को चुनौती देने वाला संकट है। यह आंकड़ा सिर्फ कागजी नहीं, बल्कि उन लाखों नागरिकों की आवाज है, जो अब मतपेटी तक पहुँचने से वंचित हो सकते हैं।


आंकड़ों का अंधेरा

चुनाव आयोग (ECI) का दावा है कि:

  •  22 लाख नाम मृतकों के थे,
  • 36 लाख लोग प्रवास कर गए या अनुपलब्ध थे,
  • लाख नाम डुप्लिकेट पाए गए।


ये आंकड़े सुनने में व्यवस्थित लगते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या इतने बड़े पैमाने पर नाम हटाने से पहले हर मतदाता को नोटिस और सुनवाई का मौका दिया गया? 65 लाख नामों का मतलब है कई लोकसभा क्षेत्रों की पूरी मतदाता संख्या। यह कोई तकनीकी गड़बड़ी नहीं, बल्कि लोकतंत्र की साख पर गहरा सवाल है। क्या इतनी विशाल संख्या में नाम हटाना पारदर्शी और निष्पक्ष प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है?


न्यायपालिका की दस्तक

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लिया और चुनाव आयोग को स्पष्ट निर्देश दिए:

  •  नाम हटाने से पहले मतदाताओं को सूचित करना और उनकी आपत्तियाँ सुनना अनिवार्य है।
  • हटाए गए नामों की पूरी सूची, कारणों सहित, सार्वजनिक की जाए।


यह आदेश नागरिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक मील का पत्थर है। लेकिन ECI की यह दलील कि “सूची साझा करना कानूनी बाध्यता नहीं” लोकतांत्रिक पारदर्शिता के मूल सिद्धांत से टकराती है। अगर मतदाता सूची ही अपारदर्शी हो, तो जनता का विश्वास कैसे बरकरार रहेगा?


राजनीति की गूँज

यह मुद्दा अब राजनीतिक रंग ले चुका है। 

  •  राहुल गांधी ने इसे “वोट चुराने का संस्थागत तरीका” करार दिया।
  • तेजस्वी यादव ने दावा किया कि उनका नाम भी ड्राफ्ट सूची से गायब है, इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बताया।
  • CPI(ML) ने इसे संविधान पर सबसे बड़ा आघात कहा।
  • एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने कोर्ट में आरोप लगाया कि ECI ने हटाए गए नामों के कारणों को छिपाया।


आरोप-प्रत्यारोप अपनी जगह, लेकिन असली सवाल यह है कि आम मतदाता का भरोसा कैसे बचेगा? जब एक साधारण नागरिक अपनी आवाज खोने के डर से जूझे, तो लोकतंत्र का आधार कमजोर पड़ने लगता है।


लोकतंत्र का दर्पण

मतदाता सूची कोई साधारण रजिस्टर नहीं, बल्कि लोकतंत्र का दर्पण है। यह दिखाता है कि नागरिकों की पहचान और उनके अधिकार कितने सुरक्षित हैं। जब एक झटके में 65 लाख लोग “गैर-नागरिक” बना दिए जाएँ, तो यह सिर्फ प्रशासनिक भूल नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक असंवेदनशीलता का प्रतीक बन जाता है। यह घटना हमें चेताती है कि:

  • तकनीकी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता सर्वोपरि होनी चाहिए।
  • डेटा और मानवाधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
  • मताधिकार को अछूत अधिकार माना जाए, जिसे कोई प्राधिकरण हल्के में न ले।


आगे की राह

भारत का लोकतंत्र विश्वास की बुनियाद पर टिका है। अगर मतदाता सूची पर जनता का भरोसा डगमगाया, तो पूरी चुनावी प्रक्रिया की साख खतरे में पड़ सकती है। बिहार की यह घटना एक चेतावनी है कि डिजिटलाइजेशन और सुधारों की आड़ में नागरिकों के संवैधानिक अधिकार दबने नहीं चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप स्वागतयोग्य है, लेकिन असली जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है। उसे अपनी प्रक्रियाओं को निष्पक्ष, पारदर्शी और सहभागी बनाना होगा। क्योकि मताधिकार सिर्फ संविधान का प्रावधान नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है। जब तक हर नागरिक की आवाज मतपेटी तक नहीं पहुँचती, तब तक जनतंत्र का दावा अधूरा ही रहेगा।

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