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Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

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Strait of Hormuz Crisis 2026: Global Reactions, Energy Security Risks and Geopolitical Impact Explained

होर्मुज़ जलडमरूमध्य संकट: अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएँ और इसके मौलिक वैश्विक प्रभाव

प्रस्तावना

मार्च 2026 में पश्चिम एशिया का यह संकट वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हो रहा है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य, विश्व के ऊर्जा परिवहन का प्रमुख जीवन-रेखा, आज सैन्य टकराव, भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और आर्थिक अस्थिरता का केंद्र बन गया है। अमेरिका-इज़राइल के फरवरी 2026 के सैन्य अभियानों के बाद ईरान ने 4 मार्च से इस जलमार्ग को “बंद” घोषित कर दिया और जहाजों पर ड्रोन-मिसाइल हमले शुरू कर दिए। इससे प्रतिदिन 20-25% वैश्विक कच्चे तेल और LNG का परिवहन बाधित हो गया है। यह संकट न केवल क्षेत्रीय संतुलन को चुनौती दे रहा है, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की सीमाओं को भी उजागर कर रहा है।

1. संकट की प्रकृति: एक रणनीतिक ‘चोकपॉइंट’ का सैन्यीकरण

होर्मुज़ जलडमरूमध्य विश्व का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री चोकपॉइंट है। ईरान की असममित युद्ध रणनीति—ड्रोन, मिसाइल और नौसैनिक बाधाओं के माध्यम से—समुद्री मार्गों को बाधित कर रही है। यह कदम अमेरिका और इज़राइल को स्पष्ट संदेश देता है कि युद्ध सीमित क्षेत्र तक नहीं रहेगा। ऊर्जा पर विश्व की निर्भरता को रणनीतिक हथियार के रूप में उपयोग किया जा रहा है, जिससे वैश्विक व्यापार प्रभावित हो रहा है।

2. अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएँ: विभाजित विश्व व्यवस्था

(क) अमेरिका का सैन्य गठबंधन दृष्टिकोण

डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने इसे “वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा” का मुद्दा बताया और सहयोगियों से सैन्य समर्थन मांगा। बहुराष्ट्रीय नौसैनिक गठबंधन का प्रस्ताव रखा गया, जिसमें नाटो सहयोगियों और चीन जैसे प्रतिद्वंद्वियों को शामिल करने की अपील की गई। ट्रंप ने कहा कि प्रभावित देश (जैसे चीन, जापान, दक्षिण कोरिया) युद्धपोत भेजें। लेकिन यह प्रयास अपेक्षित समर्थन जुटाने में विफल रहा।

(ख) सहयोगियों की सतर्कता और रणनीतिक स्वायत्तता

जापान और ऑस्ट्रेलिया ने सैन्य भागीदारी से इनकार कर दिया। जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन ने भी सतर्क रुख अपनाया। यूरोपीय देशों ने सैन्य भागीदारी से मना कर दिया और कूटनीति पर जोर दिया। यह “रणनीतिक स्वायत्तता” की बढ़ती प्रवृत्ति को दर्शाता है, जहाँ देश अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हैं।

(ग) यूरोपीय संघ का कूटनीतिक विकल्प

ईयू की विदेश नीति प्रमुख काजा कलास ने संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से सुरक्षित समुद्री कॉरिडोर का प्रस्ताव रखा। उन्होंने ब्लैक सी ग्रेन इनिशिएटिव की तर्ज पर समझौते की बात कही और यूएन महासचिव एंतोनियो गुतेरेश से चर्चा की। यह “सुरक्षा के लिए कूटनीति” की अवधारणा को मजबूत करता है।

3. मौलिक वैश्विक प्रभाव: बहुआयामी संकट

यह संकट केवल ऊर्जा आपूर्ति तक सीमित नहीं है। यह वैश्विक अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और शासन व्यवस्था को बहुआयामी रूप से प्रभावित कर रहा है।

(1) ऊर्जा सुरक्षा पर प्रभाव

तेल की कीमतें तेजी से बढ़ीं—ब्रेंट क्रूड $100 प्रति बैरल के पार चला गया। एशियाई देशों (भारत, चीन, दक्षिण कोरिया) पर सबसे अधिक दबाव है, क्योंकि ये क्षेत्र की ऊर्जा पर अत्यधिक निर्भर हैं। वैकल्पिक मार्ग जैसे केप ऑफ गुड होप अपनाने से परिवहन लागत और समय दोनों बढ़ गए। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने 400 मिलियन बैरल तेल रिजर्व जारी करने का ऐतिहासिक फैसला लिया। अब ऊर्जा बाजार “भू-राजनीतिक जोखिम प्रीमियम” से संचालित हो रहे हैं।

(2) वैश्विक अर्थव्यवस्था और मुद्रास्फीति

परिवहन लागत में वृद्धि से वस्तुओं की कीमतें बढ़ रही हैं। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बाधित हो गई है, जिससे विकासशील देशों में मुद्रास्फीति और चालू खाता घाटा बढ़ने की आशंका है। लंबे समय तक बंद रहने पर यह तेल शॉक से मुद्रास्फीति और विकास शॉक में बदल जाएगा। शिपिंग, बीमा और माल ढुलाई लागत में उछाल आया है, जो वैश्विक व्यापार को प्रभावित कर रहा है।

(3) खाद्य और उर्वरक संकट

होर्मुज़ से विश्व के एक-तिहाई समुद्री उर्वरक व्यापार गुजरता है। उर्वरक उत्पादन के कच्चे माल (LNG) की आपूर्ति प्रभावित होने से भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान और मिस्र के कारखाने बंद हो गए हैं। यूरिया की कीमतें 30% से अधिक बढ़ गई हैं। इससे कृषि उत्पादन में गिरावट आएगी, खाद्य कीमतों में वृद्धि होगी और “द्वितीयक संकट” पैदा होगा। अफ्रीका और एशिया के विकासशील देश सबसे अधिक प्रभावित होंगे।

(4) औषधि और स्वास्थ्य क्षेत्र पर प्रभाव

भारत जैसे देशों में जेनेरिक दवाओं का उत्पादन प्रभावित है। अमेरिका अपनी लगभग 47% जेनेरिक दवाएं भारत से आयात करता है। होर्मुज़ से तेल और पेट्रोकेमिकल कच्चे माल की आपूर्ति बाधित होने से सक्रिय फार्मास्यूटिकल इंग्रीडिएंट्स (APIs) की लागत 30% तक बढ़ गई है। ग्लिसरीन जैसे सॉल्वेंट्स की कीमत 60% उछल गई है। 4-6 सप्ताह में दवाओं की कमी और कीमतों में वृद्धि का खतरा है। वैश्विक स्वास्थ्य आपूर्ति श्रृंखला पर गंभीर असर पड़ रहा है।

(5) वैश्विक शासन और संस्थागत संकट

नाटो की प्रासंगिकता पर सवाल उठ रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की प्रभावशीलता सीमित साबित हो रही है। यह बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था (Multipolar World) के उदय को तेज कर रहा है, जहाँ महाशक्तियाँ सहयोग के बजाय प्रतिस्पर्धा पर अमल कर रही हैं।

4. भू-राजनीतिक पुनर्संतुलन

(क) चीन की भूमिका

चीन इस संकट में “मौन लाभार्थी” के रूप में उभर सकता है। वह ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण कर रहा है और कूटनीतिक मध्यस्थता की संभावना तलाश रहा है।

(ख) भारत की चुनौती और अवसर

भारत के लिए दोहरा प्रभाव है—ऊर्जा आयात बिल बढ़ा है और रणनीतिक भंडार (SPR) का उपयोग करना पड़ रहा है। लेकिन अवसर भी हैं: नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा, कूटनीतिक मल्टी-अलाइनमेंट और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा।

5. आगे की राह: समाधान की संभावनाएँ

(1) कूटनीतिक समाधान: युद्धविराम और संयुक्त राष्ट्र के तहत सुरक्षित कॉरिडोर।
(2) सैन्य संतुलन: सीमित एस्कॉर्ट मिशन।
(3) दीर्घकालिक रणनीति: ऊर्जा विविधीकरण, वैकल्पिक मार्ग और ऊर्जा संक्रमण।

निष्कर्ष

होर्मुज़ जलडमरूमध्य संकट केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था की परीक्षा है। यह स्पष्ट करता है कि 21वीं सदी में युद्ध ऊर्जा, अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य तक फैल जाते हैं। ट्रंप का सैन्य गठबंधन दृष्टिकोण और काजा कलास का कूटनीतिक समाधान दोनों इस निर्णायक मोड़ को दर्शाते हैं।

अंततः, प्रमुख प्रश्न यही है—क्या वैश्विक शक्तियाँ सहयोग से स्थिरता ला पाएंगी, या प्रतिस्पर्धा और अविश्वास विश्व को बड़े संकट की ओर धकेल देगा? इस संकट का समाधान न केवल होर्मुज़ की खुली नौवहन पर, बल्कि बहुपक्षीय विश्व व्यवस्था की मजबूती पर निर्भर करेगा।

With Reuters Inputs 

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