शिक्षक दिवस को एक दर्पण की आवश्यकता क्यों है: आधुनिक शिक्षा का असुविधाजनक सच
प्रस्तावना: उत्सव के पीछे की खामोशी
आज शिक्षक दिवस है, फिर भी एक सजग शिक्षक के भीतर कहीं गहरे स्वयं को इस उत्सव से दूर रखने की तीव्र इच्छा जन्म लेती है। शिक्षक की "व्यथित आवाज़" केवल थकान की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि अंतरात्मा के प्रतिरोध का स्वर है। जब सार्वजनिक मंचों पर मालाएँ, सम्मान और प्रशंसा के भव्य आयोजन हो रहे होते हैं, तब अनेक शिक्षक उनमें शामिल होने का मन नहीं बना पाते।
यह मात्र निराशावाद नहीं, बल्कि शिक्षक-व्यवसाय के अस्तित्व का संकट है। हम एक भयावह विरोधाभास के साक्षी हैं। एक ओर मंचों पर "गुरु-वंदना" का सार्वजनिक प्रदर्शन है, दूसरी ओर उन शिक्षकों का निजी मोहभंग है जो जानते हैं कि मंच पर प्रस्तुत आदर्श छवि वास्तव में एक मुखौटा है, जिसके पीछे अनेक अनकही समस्याएँ छिपी हुई हैं।
मंच का मृगतृष्णा: धारणा बनाम वास्तविकता
शिक्षक दिवस के समारोह सम्मान के जीवंत उत्सव से अधिक एक औपचारिक अनुष्ठान बनते जा रहे हैं। मंच एक ऐसे फिल्टर का काम करता है जो शिक्षक जीवन की वास्तविकताओं को छिपाकर केवल एक चमकदार तस्वीर दिखाता है। यह वही असुविधाजनक सत्य है जिसका सामना हमें करना होगा: जो सम्मान दिया जा रहा है, वह अक्सर उस प्रतिष्ठा का शोकगीत बन चुका है जो अब वास्तविक जीवन में बहुत हद तक विलुप्त हो चुकी है।
"जो मंच पर दिखाई देता है, वह वास्तविकता में दिखाई नहीं देता।"
सम्मान का यह सार्वजनिक प्रदर्शन एक मृगतृष्णा है। जब शिक्षक मंच से उतरकर ऐसे वातावरण में लौटता है जहाँ मार्गदर्शन और शिक्षा का पवित्र दायित्व नौकरशाही, गुटबाज़ी या व्यक्तिगत संघर्षों के नीचे दब चुका हो, तब उत्सव उपहास जैसा प्रतीत होने लगता है।
पद का उत्सव मनाना और व्यवहार की गिरावट को अनदेखा करना, शिक्षा की उसी आत्मा के साथ विश्वासघात है जिसका हम सम्मान करने का दावा करते हैं।
संकीर्ण पहचानों का विष
आधुनिक शिक्षा व्यवस्था अब सार्वभौमिक मूल्यों का सुरक्षित आश्रय नहीं रह गई है। यह समाज की उन संकीर्ण पहचानों से प्रभावित हो चुकी है जो बाहर की दुनिया को विभाजित करती हैं। शिक्षक की नैतिक विश्वसनीयता भीतर से ही क्षीण होती जा रही है।
गुटबाज़ी और राजनीति
अनेक स्थानों पर स्टाफ रूम शिक्षा और विचार-विमर्श का केंद्र न रहकर शक्ति-संघर्ष और गुटीय राजनीति का अखाड़ा बन गया है। शिक्षण पीछे छूट जाता है और सत्ता की खींचतान आगे आ जाती है।
जातिवाद और धार्मिक पक्षपात
जो शिक्षक एक न्यायपूर्ण और समतामूलक समाज के निर्माता होने चाहिए, वे स्वयं कभी-कभी जाति, धर्म और पहचान की सीमाओं में सिमटते दिखाई देते हैं।
व्यक्तिगत हित
जब शिक्षक का अहंकार, उसका समूहगत लगाव या निजी स्वार्थ उसके व्यावसायिक दायित्वों से बड़ा हो जाता है, तब वह सार्वभौमिक मार्गदर्शक की भूमिका खो देता है।
जब कोई शिक्षक किसी जाति, धर्म या राजनीतिक विचारधारा को सत्य से ऊपर रखता है, तो वह शिक्षक होने के मूल अर्थ से दूर चला जाता है। निष्पक्षता केवल एक गुण नहीं; यह शिक्षक के अस्तित्व की मूल शर्त है। जो शिक्षक संकीर्ण दृष्टि से दुनिया को देखता है, वह सबका मार्गदर्शक नहीं रह जाता, बल्कि विद्वता के वस्त्र पहने एक और राजनीतिक पात्र बन जाता है।
सामाजिक प्रतिष्ठा क्यों क्षीण हो रही है?
हम अक्सर यह शिकायत सुनते हैं कि समाज अब शिक्षकों का पहले जैसा सम्मान नहीं करता। किंतु एक सामाजिक दृष्टिकोण से देखें तो यह घटती प्रतिष्ठा केवल दुर्भाग्य नहीं, बल्कि एक नैतिक निर्णय भी हो सकती है।
समाज का सम्मान कम होना उस आंतरिक नैतिक गिरावट का प्रतिबिंब हो सकता है जो कहीं-कहीं शिक्षा-जगत के भीतर दिखाई देती है। सम्मान किसी पद या उपाधि की संपत्ति नहीं है; यह आत्मा की कमाई हुई पूँजी है, जो चार आधारभूत स्तंभों पर खड़ी होती है:
1. आचरण
शिक्षक के जीवन में दिखाई देने वाली नैतिक सत्यनिष्ठा।
2. निष्पक्षता
विद्यार्थियों के मूल्यांकन और मार्गदर्शन में किसी भी प्रकार के पक्षपात को न आने देना।
3. विद्वता
ज्ञान की निरंतर साधना, जो स्वाभाविक रूप से सम्मान अर्जित करती है।
4. चरित्र
वह नैतिक दृढ़ता जो संकीर्ण हितों और दबावों के आगे झुकने से इंकार करती है।
यदि ये स्तंभ कमजोर पड़ जाएँ, तो कोई भी सार्वजनिक समारोह वास्तविक सम्मान पैदा नहीं कर सकता। यदि इन मूल्यों का दिवालियापन हो जाए, तो सामाजिक प्रतिष्ठा का क्षरण एक स्वाभाविक परिणाम बन जाता है।
आत्ममंथन का आह्वान
समाधान समाज से अधिक सम्मान माँगने में नहीं, बल्कि आत्ममंथन करने में है। हमें यह पूछना बंद करना होगा कि समाज क्यों बदल गया और यह पूछना शुरू करना होगा कि हम कहाँ चूक गए।
नैतिक पुनर्जागरण ही सामाजिक परिवर्तन की पहली शर्त है। प्रत्येक शिक्षक को स्वयं से पूछना चाहिए कि क्या वह उन आदर्शों का जीवंत प्रतीक है जिन्हें वह अपने विद्यार्थियों को सिखाता है, या केवल एक व्यवस्था का कर्मचारी बनकर रह गया है।
"जिस दिन शिक्षक ज्ञान, नैतिकता और निष्पक्षता का प्रतीक बन जाएगा, समाज का सम्मान स्वतः उसके चरणों में होगा।"
"स्वतः उसके चरणों में" यह स्मरण कराता है कि सम्मान कोई लक्ष्य नहीं, बल्कि सद्गुणों का स्वाभाविक परिणाम है। जब शिक्षक पुनः निष्पक्षता, विद्वता और नैतिकता का दीपस्तंभ बनेगा, तब समाज भी स्वाभाविक रूप से उसका अनुसरण करेगा।
निष्कर्ष: कक्षा के लिए एक प्रश्न
शिक्षा का भविष्य अधिक भव्य कार्यक्रमों, बड़े मंचों या ऊँची आवाज़ में सम्मान की माँग पर निर्भर नहीं करता। यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या आधुनिक शिक्षक अपने भीतर झाँकने और गुटबाज़ी, पक्षपात तथा नैतिक विचलन जैसी आंतरिक दरारों का सामना करने का साहस रखता है।
क्या हम "सम्मान" की शोरगुल वाली माँग को छोड़कर "आदर्शों" की शांत और कठोर साधना को अपनाने के लिए तैयार हैं?
केवल तभी, जब शिक्षक अपने द्वारा पढ़ाए गए सत्य को स्वयं जीने लगेगा, यह दर्पण ऐसी वास्तविकता दिखाएगा जो उत्सव मनाने योग्य होगी। तब तक, उत्सव के पीछे की यह खामोशी ही हमारी सबसे ईमानदार और सबसे महत्वपूर्ण सीख बनी रहेगी।
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