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Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

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End of Hereditary Peers in the House of Lords: A Historic Reform in British Parliamentary Democracy

हाउस ऑफ लॉर्ड्स में वंशानुगत पीयर्स की सदस्यता का अंत: ब्रिटिश लोकतंत्र के विकास का एक निर्णायक अध्याय

ब्रिटेन की संसदीय परंपरा विश्व की सबसे पुरानी और स्थायी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में से एक मानी जाती है। किंतु इस गौरवपूर्ण परंपरा के भीतर कुछ ऐसे तत्व भी रहे हैं जो आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ लंबे समय से असंगत माने जाते रहे हैं। इनमें सबसे प्रमुख था हाउस ऑफ लॉर्ड्स में वंशानुगत पीयर्स (Hereditary Peers) की सदस्यता—एक ऐसी व्यवस्था जिसके अंतर्गत कुलीन परिवारों के सदस्य केवल अपने जन्म के आधार पर संसद के ऊपरी सदन में स्थान प्राप्त करते थे।

मार्च 2026 में ब्रिटिश संसद द्वारा पारित Hereditary Peers Bill इस व्यवस्था को समाप्त करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। इसके साथ ही सदियों से चली आ रही वह परंपरा समाप्त हो जाएगी जिसके अंतर्गत राजनीतिक शक्ति का एक हिस्सा जन्माधिकार से निर्धारित होता था। यह सुधार न केवल एक संस्थागत परिवर्तन है, बल्कि ब्रिटिश लोकतंत्र के क्रमिक आधुनिकीकरण की उस दीर्घकालिक प्रक्रिया का हिस्सा है जिसमें सामंती विरासतों को धीरे-धीरे लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुरूप ढाला गया है।


मध्यकालीन विरासत से आधुनिक लोकतंत्र तक

हाउस ऑफ लॉर्ड्स की ऐतिहासिक जड़ें मध्यकालीन इंग्लैंड में स्थित हैं। उस समय राजा की परिषद में चर्च के वरिष्ठ पदाधिकारी और सामंती कुलीन वर्ग शामिल होते थे। यही परिषद समय के साथ संसद के ऊपरी सदन में विकसित हुई। प्रारंभिक काल में यह संस्था राजसत्ता और कुलीन वर्ग के बीच शक्ति संतुलन का माध्यम थी, जबकि सामान्य जनता का प्रतिनिधित्व मुख्यतः हाउस ऑफ कॉमन्स में विकसित हुआ।

मध्यकालीन सामाजिक व्यवस्था में भूमि, उपाधि और राजनीतिक अधिकार परस्पर जुड़े हुए थे। इस कारण कुलीन वर्ग को स्वाभाविक रूप से शासन में भूमिका प्राप्त थी। किंतु 19वीं और 20वीं शताब्दी में जब लोकतांत्रिक राजनीति का विस्तार हुआ, तब यह व्यवस्था धीरे-धीरे आलोचना का विषय बनने लगी। लोकतांत्रिक सिद्धांत इस विचार पर आधारित है कि राजनीतिक अधिकार नागरिकों की समानता और जनता की सहमति से उत्पन्न होते हैं, न कि जन्म से।

ब्रिटेन ने इस विसंगति को समाप्त करने के लिए कई चरणों में सुधार किए। 1911 और 1949 के Parliament Acts ने हाउस ऑफ लॉर्ड्स की विधायी शक्तियों को सीमित कर दिया और हाउस ऑफ कॉमन्स की सर्वोच्चता स्थापित की। इसके बाद 1958 के Life Peerages Act ने जीवनकाल के लिए पीयर नियुक्त ( प्रधानमंत्री की सलाह पर क्राउन द्वारा) करने की व्यवस्था शुरू की, जिससे विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और सार्वजनिक जीवन के अनुभवी व्यक्तियों को सदन में स्थान मिलने लगा।

फिर भी वंशानुगत सदस्यता का प्रश्न अनसुलझा बना रहा। 1999 में House of Lords Act के माध्यम से लेबर सरकार ने अधिकांश वंशानुगत पीयर्स को हटा दिया, किंतु राजनीतिक समझौते के कारण 92 सदस्यों को अस्थायी रूप से बनाए रखा गया। यह व्यवस्था अस्थायी होने के बावजूद दो दशकों से अधिक समय तक बनी रही और हाउस ऑफ लॉर्ड्स के लोकतांत्रिक स्वरूप पर लगातार प्रश्न उठते रहे।


2026 का विधेयक: अधूरे सुधार की पूर्णता

2026 में पारित Hereditary Peers Bill ने इस ऐतिहासिक प्रक्रिया को निर्णायक रूप दिया। इस विधेयक के लागू होने के बाद शेष वंशानुगत पीयर्स की स्वतः सदस्यता समाप्त हो जाएगी। यह परिवर्तन ब्रिटिश संसद के लिए केवल सांकेतिक नहीं है; यह उस मूलभूत सिद्धांत की पुष्टि करता है कि आधुनिक लोकतंत्र में जन्म के आधार पर राजनीतिक शक्ति स्वीकार्य नहीं हो सकती।

यह सुधार विशेष रूप से उस समय महत्वपूर्ण है जब लोकतांत्रिक संस्थाओं की वैधता और जवाबदेही पर विश्वभर में चर्चा हो रही है। ब्रिटेन की संसद ने इस कदम के माध्यम से यह संकेत दिया है कि ऐतिहासिक परंपराएँ भी तब बदलनी चाहिए जब वे आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों से टकराती हों।

यह भी उल्लेखनीय है कि यह परिवर्तन ब्रिटेन की असंहिताबद्ध संविधान प्रणाली के भीतर संभव हुआ है। ब्रिटेन में कोई एकल लिखित संविधान नहीं है; इसके बजाय संवैधानिक सिद्धांत कानूनों, परंपराओं और न्यायिक निर्णयों के संयोजन से विकसित होते हैं। इस व्यवस्था की एक विशेषता यह है कि बड़े संवैधानिक परिवर्तन भी क्रमिक और राजनीतिक सहमति के माध्यम से किए जा सकते हैं। हाउस ऑफ लॉर्ड्स का यह सुधार उसी परंपरा का उदाहरण है।


लोकतांत्रिक वैधता का प्रश्न

वंशानुगत सदस्यता के विरुद्ध सबसे बड़ा तर्क लोकतांत्रिक वैधता का रहा है। लोकतंत्र में यह अपेक्षा की जाती है कि विधायी संस्थाओं के सदस्य या तो जनता द्वारा चुने जाएँ या किसी पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से नियुक्त हों। जब किसी व्यक्ति को केवल अपने जन्म के आधार पर संसद में स्थान प्राप्त हो, तो यह सिद्धांत चुनौती के घेरे में आ जाता है।

राजनीतिक सिद्धांतकार रॉबर्ट डाहल के अनुसार लोकतांत्रिक शासन का आधार नागरिकों की समान भागीदारी और राजनीतिक समानता है। इसी प्रकार जॉन रॉल्स ने अपने न्याय सिद्धांत में यह तर्क दिया कि सामाजिक संस्थाएँ तभी न्यायपूर्ण मानी जा सकती हैं जब वे अवसरों की समानता को सुनिश्चित करें। वंशानुगत सीटें इन दोनों सिद्धांतों के विपरीत थीं क्योंकि वे राजनीतिक अवसरों को जन्म से निर्धारित करती थीं।

2026 का सुधार इस असमानता को समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इससे हाउस ऑफ लॉर्ड्स की संरचना अधिक योग्यता-आधारित और आधुनिक बनने की संभावना है।


हाउस ऑफ लॉर्ड्स की भूमिका: पुनरीक्षण सदन के रूप में

हाउस ऑफ लॉर्ड्स का कार्य ब्रिटिश संसद में एक पुनरीक्षण सदन (revising chamber) के रूप में कार्य करना है। यह हाउस ऑफ कॉमन्स द्वारा पारित विधेयकों की समीक्षा करता है, संशोधन सुझाता है और विशेषज्ञता प्रदान करता है।

हालाँकि लॉर्ड्स के पास अंतिम निर्णय का अधिकार नहीं है—क्योंकि कॉमन्स अंततः विधेयकों को पारित कर सकता है—फिर भी लॉर्ड्स की भूमिका विधायी प्रक्रिया की गुणवत्ता बढ़ाने में महत्वपूर्ण मानी जाती है।

वंशानुगत सदस्यता के हटने से यह अपेक्षा की जा रही है कि सदन की संरचना अधिक विशेषज्ञता, अनुभव और सार्वजनिक सेवा पर आधारित होगी। जीवनकाल पीयर्स में अक्सर न्यायविद, शिक्षाविद, वैज्ञानिक, सैन्य अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल होते हैं, जिनकी विशेषज्ञता विधायी चर्चा को समृद्ध करती है।


तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य: वैश्विक लोकतंत्रों से तुलना

यदि विश्व के अन्य लोकतांत्रिक देशों के ऊपरी सदनों को देखा जाए, तो अधिकांश देशों ने वंशानुगत सदस्यता जैसी व्यवस्थाओं को बहुत पहले समाप्त कर दिया है।

उदाहरण के लिए:

  • संयुक्त राज्य अमेरिका में सीनेट के सदस्य सीधे जनता द्वारा चुने जाते हैं।
  • भारत में राज्यसभा के सदस्य राज्यों की विधानसभाओं द्वारा चुने जाते हैं और कुछ सदस्यों को राष्ट्रपति नामित करते हैं।
  • कनाडा में सीनेट के सदस्य प्रधानमंत्री की सलाह पर नियुक्त किए जाते हैं।

इन उदाहरणों की तुलना में ब्रिटेन की वंशानुगत व्यवस्था एक ऐतिहासिक अपवाद थी। 2026 का सुधार इस अपवाद को समाप्त करता है और ब्रिटेन की संसदीय संरचना को अन्य लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के अधिक निकट लाता है।


राजनीतिक समझौता और व्यावहारिकता

ब्रिटेन की राजनीति में सुधार अक्सर व्यापक राजनीतिक सहमति के माध्यम से किए जाते हैं। हाउस ऑफ लॉर्ड्स सुधार के मामले में भी यही प्रक्रिया अपनाई गई।

कुछ वंशानुगत पीयर्स को जीवनकाल पीयर के रूप में नियुक्त करने की संभावना खुली रखी गई है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि जिन सदस्यों ने सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, उनकी विशेषज्ञता पूरी तरह समाप्त न हो।

इस प्रकार यह सुधार केवल सिद्धांत पर आधारित नहीं है, बल्कि व्यावहारिक राजनीतिक संतुलन को भी ध्यान में रखता है।


फिर भी अधूरा सुधार

यद्यपि यह परिवर्तन महत्वपूर्ण है, फिर भी हाउस ऑफ लॉर्ड्स से जुड़े कई प्रश्न अभी भी अनसुलझे हैं।

सबसे बड़ी समस्या सदन का अत्यधिक आकार है। लगभग 800 सदस्यों के साथ यह दुनिया के सबसे बड़े विधायी सदनों में से एक है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि इतने बड़े सदन में प्रभावी कार्य करना कठिन होता है।

इसके अलावा अधिकांश सदस्य अभी भी नियुक्त होते हैं, न कि चुने हुए। इस कारण कुछ आलोचक यह तर्क देते हैं कि लॉर्ड्स की लोकतांत्रिक वैधता अभी भी सीमित है।

इसी संदर्भ में Burns Committee ने सुझाव दिया था कि सदन की सदस्य संख्या को लगभग 600 तक सीमित किया जाना चाहिए और नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाया जाना चाहिए।


भविष्य के सुधारों की आवश्यकता

यदि हाउस ऑफ लॉर्ड्स को 21वीं सदी के लोकतांत्रिक मानकों के अनुरूप बनाना है, तो आगे कुछ और सुधारों की आवश्यकता होगी।

पहला, सदन की सदस्य संख्या को सीमित करना आवश्यक है ताकि यह अधिक प्रभावी और संगठित ढंग से कार्य कर सके।

दूसरा, सदस्यों के लिए कार्यकाल सीमा या सेवानिवृत्ति आयु निर्धारित करने पर विचार किया जा सकता है।

तीसरा, कुछ विशेषज्ञों ने यह सुझाव दिया है कि लॉर्ड्स के एक हिस्से को चुनाव के माध्यम से चुना जा सकता है, जिससे इसकी लोकतांत्रिक वैधता बढ़ेगी।

चौथा, नियुक्ति प्रक्रिया को एक स्वतंत्र आयोग के अधीन लाया जा सकता है ताकि राजनीतिक पक्षपात की आशंका कम हो।


व्यापक अर्थ: लोकतंत्र का सतत विकास

हाउस ऑफ लॉर्ड्स में वंशानुगत सदस्यता का अंत केवल एक संस्थागत सुधार नहीं है; यह उस व्यापक ऐतिहासिक प्रक्रिया का हिस्सा है जिसके माध्यम से ब्रिटिश लोकतंत्र धीरे-धीरे सामंती विरासतों से मुक्त होकर आधुनिक नागरिक समानता की ओर बढ़ा है।

ब्रिटेन की राजनीतिक व्यवस्था की एक विशिष्ट विशेषता यह रही है कि यहाँ क्रांतिकारी बदलावों के बजाय क्रमिक सुधार के माध्यम से संस्थाएँ विकसित हुई हैं। यही कारण है कि ब्रिटेन की संसद आज भी विश्व की सबसे स्थायी लोकतांत्रिक संस्थाओं में से एक मानी जाती है।

2026 का यह सुधार उसी परंपरा का नवीनतम अध्याय है। यह दर्शाता है कि लोकतंत्र केवल चुनावों की व्यवस्था नहीं है; यह एक सतत प्रक्रिया है जिसमें संस्थाएँ समय-समय पर स्वयं को बदलती रहती हैं।


निष्कर्ष

हाउस ऑफ लॉर्ड्स में वंशानुगत पीयर्स की सदस्यता समाप्त करना ब्रिटिश लोकतंत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। यह परिवर्तन उस सिद्धांत की पुष्टि करता है कि आधुनिक लोकतंत्र में राजनीतिक शक्ति जन्म से नहीं, बल्कि योग्यता, सेवा और सार्वजनिक विश्वास से उत्पन्न होनी चाहिए।

यद्यपि यह सुधार अंतिम समाधान नहीं है और हाउस ऑफ लॉर्ड्स के व्यापक पुनर्गठन की आवश्यकता बनी हुई है, फिर भी यह कदम ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली को अधिक न्यायसंगत और आधुनिक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।

अंततः, यह घटना हमें यह भी याद दिलाती है कि लोकतंत्र की शक्ति उसकी संस्थाओं की अनुकूलन क्षमता में निहित होती है। जब परंपराएँ आधुनिक मूल्यों से टकराती हैं, तो लोकतंत्र उन्हें बदलने का साहस करता है—और यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है।


With Washington post Inputs

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