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Rising Attacks on Hindu Minorities in Bangladesh: Global Silence and Human Rights Concerns

The Silent Genocide: Persecution of Hindus in Bangladesh and the Moral Failure of the Global Community In an age where conflicts in Gaza, Ukraine, and other flashpoints command the world’s attention, a quieter yet deeply disturbing humanitarian crisis continues to unfold next door to India — in Bangladesh. Since the political upheaval and resignation of Prime Minister Sheikh Hasina in August 2024, reports of violence against the Hindu minority have escalated dramatically. Killings, arson attacks, vandalism of temples, forced displacement, economic boycotts, and intimidation have become frighteningly frequent. According to figures cited by Indian authorities, more than 2,200 incidents of violence against Hindus were recorded in 2024 alone , with similar patterns continuing through 2025 and into 2026. Independent reports corroborate these trends: homes torched, idols desecrated, businesses looted, and families compelled to flee ancestral lands. Yet, despite the mounting evidence, the w...

UPSC Current Affairs: 30 April 2025

 दैनिक समसामयिकी लेख संकलन व विश्लेषण: 30 अप्रैल 2025

1-यहाँ एक विश्लेषणात्मक लेख प्रस्तुत है, जो UNRWA के ताजा बयान पर आधारित है और UPSC GS पेपर 2 (अंतरराष्ट्रीय संबंध, मानवाधिकार) व GS पेपर 4 (नैतिकता) के दृष्टिकोण से उपयोगी है:


शीर्षक: ग़ाज़ा में UNRWA कर्मचारियों के साथ दुर्व्यवहार और ‘ह्यूमन शील्ड’ के रूप में उपयोग – अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून पर एक प्रश्नचिह्न

परिचय:

संयुक्त राष्ट्र की फिलिस्तीनी शरणार्थियों के लिए सहायता एजेंसी (UNRWA) ने हाल ही में एक गंभीर आरोप लगाया है कि उसके 50 से अधिक कर्मचारियों को इज़राइली सैन्य हिरासत में शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया और उन्हें 'मानव ढाल' के रूप में प्रयोग किया गया। यह घटना ग़ाज़ा पट्टी में जारी सैन्य संघर्ष के बीच मानवाधिकारों के व्यापक उल्लंघन की ओर संकेत करती है।


मुख्य तथ्य व घटनाक्रम:

  • UNRWA प्रमुख फिलिप लैजारिनी ने कहा कि कर्मचारियों को हिरासत में लिया गया, कई को जबरन नग्न किया गया और कुछ को बंदी बनाकर सैन्य अभियानों में 'ह्यूमन शील्ड' के रूप में इस्तेमाल किया गया।
  • इज़राइली सेना ने इन आरोपों को खारिज किया है लेकिन स्वतंत्र जांच की मांगें उठ रही हैं।
  • यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब ग़ाज़ा में मानवीय संकट पहले ही चरम पर है और UNRWA की भूमिका विवादों के घेरे में है।

मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन:

  • ‘ह्यूमन शील्ड’ का प्रयोग 1949 के जिनेवा कन्वेंशन के तहत एक युद्ध अपराध है।
  • युद्ध के नियमों (Law of Armed Conflict) के अनुसार, किसी नागरिक या गैर-लड़ाकू व्यक्ति का जबरन सैन्य कार्य में उपयोग अवैध है।
  • कर्मचारियों के साथ दुर्व्यवहार, जबरन नग्न करना, और अपमानजनक व्यवहार मानव गरिमा के खिलाफ है और यह संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार घोषणा-पत्र (UDHR) का भी उल्लंघन है।

नैतिक और मानवीय दृष्टिकोण:

  • यह कृत्य मानवीय मर्यादा और नैतिकता का उल्लंघन है।
  • यदि संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारियों को सुरक्षा नहीं मिलती, तो संघर्ष क्षेत्रों में मानवीय हस्तक्षेप का भविष्य संकट में पड़ सकता है।
  • यह सवाल उठता है कि क्या सैन्य कार्रवाई के नाम पर किसी देश को अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की निष्पक्षता और कर्मचारियों की सुरक्षा को कुचलने का अधिकार है?

राजनयिक और वैश्विक प्रतिक्रिया:

  • UN और कई मानवाधिकार संगठनों ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है और स्वतंत्र जांच की मांग की है।
  • इज़राइल और संयुक्त राष्ट्र के संबंधों में यह एक और विवादित बिंदु बन गया है, विशेषकर जब कुछ देशों ने UNRWA की फंडिंग रोक दी है।
  • इस घटना से इज़राइल की वैश्विक छवि को नुकसान पहुंच सकता है और न्यायिक जवाबदेही की मांगें तेज हो सकती हैं।

निष्कर्ष:

UNRWA के कर्मचारियों के साथ ऐसा व्यवहार न केवल मानवीय मूल्यों का हनन है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है। यदि स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच नहीं की गई, तो यह मामला भविष्य में और अधिक जटिलताओं को जन्म देगा और अंतरराष्ट्रीय कानून की प्रासंगिकता को कमजोर करेगा।


UPSC मुख्य परीक्षा से संबंधित संभावित प्रश्न:

  1. हाल ही में ग़ाज़ा संघर्ष में UNRWA कर्मचारियों के साथ हुए व्यवहार को लेकर उत्पन्न अंतरराष्ट्रीय विवाद को मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय कानून के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित कीजिए।
  2. युद्ध में नैतिक सीमाओं और सैन्य रणनीतियों के संतुलन पर चर्चा कीजिए।

स्रोत:

  • United Nations Relief and Works Agency for Palestine Refugees in the Near East (UNRWA) द्वारा 29 अप्रैल 2025 को जारी आधिकारिक बयान।
  • रिपोर्ट कवरेज: Al Jazeera और The Guardian की 29-30 अप्रैल 2025 की समाचार रिपोर्टें।
  • अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून: 1949 का जिनेवा कन्वेंशन, विशेषकर सामान्य अनुच्छेद 3 और अतिरिक्त प्रोटोकॉल-I।
  • मानवाधिकार का वैश्विक सन्दर्भ: Universal Declaration of Human Rights (UDHR), 1948

2-भारत का अंतरिक्षीय गौरव: शुभांशु शुक्ला की 'Axiom-4' मिशन के साथ नई उड़ान
(UPSC GS-3: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी | अंतरराष्ट्रीय संबंध | अंतरिक्ष कूटनीति)


प्रस्तावना:

29 मई 2025 को भारत एक बार फिर अंतरिक्ष में अपनी उपस्थिति को मजबूत करने जा रहा है। इस बार नायक हैं शुभांशु शुक्ला, जो Axiom-4 मिशन के साथ अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) की ओर उड़ान भरने को तैयार हैं। यह न केवल भारत के लिए एक वैज्ञानिक उपलब्धि है, बल्कि अंतरिक्ष कूटनीति के क्षेत्र में भी एक संभावित मील का पत्थर हो सकता है।


Axiom-4 मिशन: परिचय

  • Axiom Space एक निजी अमेरिकी कंपनी है जो वाणिज्यिक अंतरिक्ष मिशनों का संचालन करती है।
  • Axiom-4 मिशन में अंतरिक्ष यात्री ISS पर पहुँचेंगे जहाँ वे विज्ञान, प्रौद्योगिकी और चिकित्सा से जुड़े प्रयोग करेंगे।
  • इस मिशन में शुभांशु शुक्ला का चयन भारत की वैश्विक अंतरिक्ष भूमिका को भी रेखांकित करता है।

शुभांशु शुक्ला की भूमिका:

  • मिशन में शुक्ला का प्रमुख योगदान होगा अंतरिक्ष स्वास्थ्य (Space Health), जीवविज्ञान प्रयोग, और उन्नत तकनीकी परीक्षण
  • उनकी पृष्ठभूमि रक्षा और अंतरिक्ष अनुसंधान दोनों से जुड़ी हुई है, जिससे वे मानव अंतरिक्ष उड़ानों के लिए उपयुक्त उम्मीदवार बनते हैं।

भारत के लिए इसका क्या अर्थ है?

  1. विज्ञान और प्रौद्योगिकी में प्रगति:
    इस मिशन से भारत को अंतरिक्ष जैविक अनुसंधान, माइक्रोग्रैविटी प्रभाव और मेडिकल टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में अनुभव मिलेगा।

  2. अंतरिक्ष कूटनीति (Space Diplomacy):
    भारत, अमेरिका जैसे देशों के साथ साझेदारी में अंतरिक्ष अभियानों में भागीदारी कर रहा है। यह वैश्विक मंच पर भारत की वैज्ञानिक साख को मजबूत करता है।

  3. निजी क्षेत्र को बढ़ावा:
    Axiom जैसी निजी कंपनियों के साथ सहयोग, भारत के अंतरिक्ष निजीकरण की दिशा में मार्ग प्रशस्त करता है – यह भारत की Gaganyaan योजना से भी जुड़ा हुआ कदम हो सकता है।

  4. युवा पीढ़ी को प्रेरणा:
    शुभांशु शुक्ला जैसे युवा अंतरिक्ष यात्री STEM शिक्षा और अनुसंधान को बढ़ावा देंगे, जो भविष्य की वैज्ञानिक पीढ़ियों को प्रोत्साहित करेगा।


चुनौतियाँ और रणनीतिक दृष्टिकोण:

  • भारत को चाहिए कि वह ऐसी भागीदारी को दीर्घकालिक सहयोग में बदले और अंतरिक्ष नियमों व नीति-निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाए।
  • इसके अलावा, ‘Global South’ की आवाज़ बनते हुए, भारत विकासशील देशों को भी अंतरिक्ष तकनीक सुलभ कराने की नीति अपना सकता है।

निष्कर्ष:

शुभांशु शुक्ला की Axiom-4 मिशन में भागीदारी महज़ एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, यह भारत की बढ़ती वैश्विक वैज्ञानिक उपस्थिति, अंतरिक्ष कूटनीतिक दृष्टिकोण, और STEM नेतृत्व की दिशा में अगला कदम है। यह मिशन हमें "धरती से सितारों तक" के उस स्वप्न की याद दिलाता है, जिसे भारत अब साकार कर रहा है।


UPSC उत्तरलेखन के लिए मुख्य बिंदु:

  • Axiom-4: अंतरिक्ष में निजी क्षेत्र की भूमिका
  • Space Diplomacy में भारत की रणनीति
  • अंतरिक्ष में विज्ञान, स्वास्थ्य और तकनीक की प्रासंगिकता
  • युवा नेतृत्व और STEM शिक्षा के लिए प्रेरणा स्रोत

यह लेख निम्नलिखित स्रोतों और प्रमाणिक सूचनाओं पर आधारित है:

प्रमुख स्रोत:

  1. Axiom Space की आधिकारिक वेबसाइट

    • Axiom-4 मिशन, चालक दल की संरचना और अनुसंधान उद्देश्यों की जानकारी।
  2. NASA की प्रेस रिलीज और ISS मिशन डिटेल्स

    • अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर नियोजित प्रयोगों और साझेदार देशों के योगदान की जानकारी।
  3. भारत सरकार / ISRO से जुड़े समाचार स्रोत:

    • Press Information Bureau (PIB): (https://pib.gov.in)
    • ISRO की भागीदारी और भारत की अंतरिक्ष नीति संबंधी घोषणाएँ।
  4. प्रमुख समाचार मीडिया पोर्टल्स:

    • The Hindu, Times of India, Indian Express (अप्रैल 2025 की रिपोर्टिंग)
    • शुभांशु शुक्ला की चयन प्रक्रिया, मिशन की तारीख (29 मई 2025), और भारत के दृष्टिकोण की जानकारी।
  5. Space.com और SpaceNews जैसी अंतरराष्ट्रीय विज्ञान रिपोर्टिंग साइट्स

    • मिशन उद्देश्यों, तकनीकी परीक्षण और वैश्विक भागीदारी की विश्लेषणात्मक रिपोर्टें।

3-शीर्षक: STEM शिक्षा: भारत के नवोन्मेषी भविष्य का स्वप्न और संकल्प

“जो राष्ट्र विज्ञान, तकनीक और नवाचार की भाषा बोलता है, वही 21वीं सदी का नेतृत्व करता है।” यह विचार आज के भारत के लिए एक मंत्र है, जो न केवल हमारी शैक्षिक प्रणाली को प्रेरित करता है, बल्कि हमारे युवाओं को वैश्विक मंच पर अग्रणी बनाने का मार्ग प्रशस्त करता है। STEM (Science, Technology, Engineering, Mathematics) शिक्षा केवल किताबों का बोझ या कक्षाओं का पाठ्यक्रम नहीं है; यह एक ऐसी चिंगारी है जो जिज्ञासा को प्रज्वलित करती है, समस्याओं का समाधान सिखाती है और नवाचार का साहस देती है।

भारत का युवा, भारत का सपना

भारत एक युवा राष्ट्र है, जहाँ 65% से अधिक जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की है। यह जनसांख्यिकीय लाभांश हमारी सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन इसे साकार करने के लिए हमें अपने युवाओं को सही औज़ार देने होंगे। STEM शिक्षा वह सेतु है, जो हमारे युवाओं को पारंपरिक नौकरियों से हटाकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, अंतरिक्ष अनुसंधान, ब्लॉकचेन, जैवप्रौद्योगिकी और ग्रीन टेक्नोलॉजी जैसे भविष्य के क्षेत्रों तक ले जाएगा।  

वर्तमान परिदृश्य: प्रगति और चुनौतियाँ

भारत सरकार ने STEM शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने प्रारंभिक स्तर पर ही अनुभव-आधारित और अनुसंधान-प्रधान शिक्षा पर जोर दिया है। अटल इनोवेशन मिशन और INSPIRE कार्यक्रम ने स्कूलों में टिंकरिंग लैब्स और विज्ञान प्रदर्शनियों को प्रोत्साहित किया है। निजी क्षेत्र भी कोडिंग बूटकैंप्स, रोबोटिक्स वर्कशॉप्स और स्टार्टअप इनक्यूबेटर्स के माध्यम से योगदान दे रहा है।  

लेकिन, तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। ग्रामीण भारत में अधिकांश स्कूलों में प्रयोगशालाएँ, इंटरनेट या प्रशिक्षित शिक्षक तक नहीं हैं। UNESCO की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में STEM क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी मात्र 28% है, जो सामाजिक रूढ़ियों और अवसरों की कमी को दर्शाता है। इसके अलावा, शहरी-ग्रामीण डिजिटल खाई और क्षेत्रीय असमानताएँ भी STEM शिक्षा के प्रसार में बाधा हैं।  

STEM क्यों है भारत का भविष्य?

आज भारत की अर्थव्यवस्था का भविष्य तकनीक पर टिका है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा साइंस जैसे क्षेत्र न केवल रोजगार सृजन कर रहे हैं, बल्कि स्वास्थ्य, कृषि और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में क्रांति ला रहे हैं। इसरो की मंगलयान और चंद्रयान जैसी उपलब्धियाँ STEM की शक्ति का प्रतीक हैं। जलवायु परिवर्तन, साइबर सुरक्षा और डिजिटल आत्मनिर्भरता जैसे वैश्विक मुद्दों का समाधान भी STEM-दक्ष नागरिकों के बिना संभव नहीं।  

एक रोचक उदाहरण लें: कोविड-19 महामारी के दौरान भारत ने स्वदेशी वैक्सीन विकसित कीं और डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे CoWIN के माध्यम से टीकाकरण अभियान चलाया। यह STEM की ताकत थी, जिसने विज्ञान, तकनीक और इंजीनियरिंग को एकजुट कर एक राष्ट्रीय संकट का सामना किया।  

चुनौतियों का समाधान: एक रोडमैप

STEM शिक्षा को भारत के कोने-कोने तक ले जाने के लिए हमें ठोस और रचनात्मक कदम उठाने होंगे:  

शिक्षकों का सशक्तिकरण: शिक्षकों को आधुनिक शिक्षण विधियों, डिजिटल टूल्स और प्रायोगिक शिक्षण का प्रशिक्षण देना होगा। उदाहरण के लिए, शिक्षक बच्चों को सौर ऊर्जा मॉडल बनाना सिखाएँ या स्थानीय समस्याओं के लिए तकनीकी समाधान खोजने को प्रेरित करें।  

प्रयोगशालाएँ और नवाचार केंद्र: हर स्कूल में अटल टिंकरिंग लैब्स जैसी सुविधाएँ होनी चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में मोबाइल साइंस वैन और डिजिटल क्लासरूम इस कमी को पूरा कर सकते हैं।  

लैंगिक समावेशन: लड़कियों को STEM में प्रोत्साहित करने के लिए छात्रवृत्तियाँ, मेंटरशिप प्रोग्राम और प्रेरक कहानियाँ जरूरी हैं। कल्पना चावला, टेस्सी थॉमस जैसी महिला वैज्ञानिकों की कहानियाँ स्कूल पाठ्यक्रम का हिस्सा बनें।  

उद्योग-शिक्षा साझेदारी: टेक कंपनियाँ और स्टार्टअप्स को स्कूलों के साथ मिलकर इंटर्नशिप, प्रोजेक्ट-आधारित लर्निंग और स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम शुरू करने चाहिए।  

स्थानीय भाषाओं में सामग्री: STEM शिक्षा को हिंदी, तमिल, बंगाली जैसी भाषाओं में उपलब्ध कराना होगा, ताकि भाषा कोई बाधा न बने।

एक प्रेरक कहानी

केरल के एक छोटे से गाँव की प्रिया की कहानी प्रेरणादायक है। एक सरकारी स्कूल की छात्रा, प्रिया ने अटल टिंकरिंग लैब में सौर ऊर्जा से चलने वाला एक सस्ता वाटर प्यूरीफायर बनाया, जो उसके गाँव की पीने के पानी की समस्या का समाधान बन गया। प्रिया जैसी लाखों प्रतिभाएँ भारत में हैं, बस उन्हें सही मंच और संसाधन चाहिए।  

निष्कर्ष: नवाचार का संकल्प

STEM शिक्षा भारत के लिए एक विकल्प नहीं, बल्कि एक संकल्प है। यह केवल डिग्रियाँ या नौकरियाँ देने का माध्यम नहीं, बल्कि एक ऐसी सोच है जो तर्क, रचनात्मकता और साहस को पंख देती है। अगर भारत को 2047 तक ‘विकसित राष्ट्र’ बनना है, तो STEM को हर बच्चे के सपनों का हिस्सा बनाना होगा। आइए, हम एक ऐसे भारत का निर्माण करें, जहाँ हर बच्चा वैज्ञानिक बनने का सपना देखे, हर गाँव नवाचार का केंद्र बने, और हर युवा वैश्विक मंच पर भारत का परचम लहराए।

 उक्त संपादकीय लेख "STEM शिक्षा: भारत के नवोन्मेषी भविष्य का स्वप्न और संकल्प" के आधार पर संभावित UPSC प्रश्न दिए जा रहे हैं, जो प्रारंभिक परीक्षा (MCQs) और मुख्य परीक्षा (लघु/विस्तृत उत्तर) दोनों के लिए प्रासंगिक हो सकते हैं। ये प्रश्न लेख के मुख्य विचारों, STEM शिक्षा की चुनौतियों, नीतियों और भारत के भविष्य से संबंधित हैं।

प्रारंभिक परीक्षा (MCQs)

प्रश्न:1 निम्नलिखित में से कौन-सा कार्यक्रम भारत में STEM शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए शुरू किया गया है?
a) राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020
b) अटल इनोवेशन मिशन
c) INSPIRE कार्यक्रम
d) उपरोक्त सभी  उत्तर: d) उपरोक्त सभी  

प्रश्न:2 UNESCO की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में STEM क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी कितनी है?
a) 15%
b) 28%
c) 40%
d) 50%  उत्तर: b) 28%  

प्रश्न:3 भारत में STEM शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए ‘अटल टिंकरिंग लैब्स’ किस मिशन के तहत स्थापित की गई हैं?
a) डिजिटल इंडिया
b) स्किल इंडिया
c) अटल इनोवेशन मिशन
d) मेक इन इंडिया  उत्तर: c) अटल इनोवेशन मिशन  

प्रश्न:4 निम्नलिखित में से कौन-सा क्षेत्र STEM शिक्षा पर निर्भर नहीं है?
a) आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस
b) अंतरिक्ष अनुसंधान
c) पारंपरिक हस्तशिल्प
d) जैवप्रौद्योगिकी  उत्तर: c) पारंपरिक हस्तशिल्प

मुख्य परीक्षा (लघु/विस्तृत उत्तर)

1: भारत में STEM शिक्षा की वर्तमान स्थिति और चुनौतियों का विश्लेषण करें। इसे ग्रामीण और लैंगिक समावेशन के दृष्टिकोण से कैसे मजबूत किया जा सकता है? (150 शब्द)  

2: राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने STEM शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए क्या प्रावधान किए हैं? भारत के नवोन्मेषी भविष्य के संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता पर चर्चा करें। (250 शब्द)  

3: STEM शिक्षा भारत की आर्थिक प्रगति और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए क्यों महत्वपूर्ण है? उदाहरणों के साथ इसकी भूमिका का मूल्यांकन करें। (250 शब्द)  

4: भारत में STEM शिक्षा को स्कूल स्तर पर रुचिकर और व्यावहारिक बनाने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं? शिक्षक प्रशिक्षण और उद्योग-शिक्षा समन्वय की भूमिका पर प्रकाश डालें। (150 शब्द)  

5: लैंगिक असमानता STEM शिक्षा में एक प्रमुख चुनौती है। इस असमानता को कम करने के लिए भारत सरकार और समाज द्वारा उठाए जा सकने वाले कदमों पर चर्चा करें। (250 शब्द)  

6: "STEM शिक्षा केवल तकनीकी कौशल नहीं, बल्कि तार्किक और रचनात्मक सोच का आधार है।" इस कथन के संदर्भ में भारत के युवाओं के लिए STEM शिक्षा की आवश्यकता पर प्रकाश डालें। (200 शब्द)  

7: भारत के डिजिटल आत्मनिर्भरता और जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक मुद्दों से निपटने में STEM शिक्षा की भूमिका का मूल्यांकन करें। इसे प्रभावी बनाने के लिए सुझाव दें। (250 शब्द)

निबंध प्रश्न

1: "STEM शिक्षा: भारत के विकसित राष्ट्र बनने का आधार"  
2: "युवा भारत, नवोन्मेषी भारत: STEM शिक्षा की भूमिका"  
3: "लैंगिक समावेशन और STEM: भारत के भविष्य की नींव"

साक्षात्कार (UPSC Personality Test) के लिए संभावित प्रश्न

1: भारत में STEM शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए आप क्या नवाचार सुझाएंगे, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों के लिए?  

2: STEM क्षेत्रों में महिलाओं की कम भागीदारी के सामाजिक और आर्थिक कारण क्या हैं? इसे कैसे बदला जा सकता है?  

3: क्या आपको लगता है कि भारत की शिक्षा प्रणाली नवाचार को पर्याप्त प्रोत्साहन दे रही है? STEM के संदर्भ में अपने विचार साझा करें।  

4:यदि आप एक नीति निर्माता हों, तो STEM शिक्षा को स्कूल स्तर पर लागू करने के लिए आपकी प्राथमिकताएँ क्या होंगी?

नोट: ये प्रश्न UPSC की प्रकृति को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं, जो तथ्यात्मक जानकारी, विश्लेषणात्मक सोच, और समाधान-उन्मुख दृष्टिकोण की मांग करते हैं। 

4-शीर्षक: जातिगत जनगणना पर केंद्र सरकार का निर्णय: सामाजिक न्याय की ओर एक महत्वपूर्ण कदम

प्रस्तावना:

हाल ही में केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने मीडिया को संबोधित करते हुए घोषणा की कि केंद्र सरकार ने अगली जनगणना में जातिगत गणना को शामिल करने का निर्णय लिया है। यह निर्णय सामाजिक न्याय, नीति निर्माण और समावेशी विकास की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल के रूप में देखा जा रहा है।

पृष्ठभूमि:

भारत में आखिरी बार पूर्ण जातिगत जनगणना 1931 में हुई थी। उसके बाद से केवल अनुसूचित जातियों और जनजातियों की गणना होती रही है। हालांकि 2011 में सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (SECC) की गई थी, परंतु उसके आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए।

फैसले का महत्व:

  1. नीति निर्माण में सहायता:
    जातिगत आंकड़े उपलब्ध होने से सरकार को शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को लक्षित वर्गों तक प्रभावी रूप से पहुँचाने में मदद मिलेगी।

  2. सामाजिक न्याय की स्थापना:
    यह कदम वंचित और पिछड़े वर्गों की वास्तविक स्थिति को उजागर करेगा, जिससे उनके अधिकारों और संसाधनों में हिस्सेदारी सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस नीति बनाई जा सकेगी।

  3. राजनीतिक प्रतिनिधित्व का पुनः मूल्यांकन:
    आंकड़ों के आधार पर राजनीतिक आरक्षण और प्रतिनिधित्व को अधिक न्यायसंगत बनाया जा सकता है।

संभावित चुनौतियाँ:

  • राजनीतिक विरोध और संदेह:
    कुछ वर्ग इसे सामाजिक विभाजन या तुष्टिकरण की राजनीति के रूप में देख सकते हैं।

  • तकनीकी और प्रशासनिक जटिलताएँ:
    जातियों की व्यापकता और उनकी उप-श्रेणियों को वर्गीकृत करना प्रशासनिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

  • डेटा की गोपनीयता और उपयोग:
    संवेदनशील जातिगत आंकड़ों का दुरुपयोग और लीक होने की आशंका भी चिंताजनक है।

विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण (UPSC GS पेपर 2):

यह निर्णय भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) में निहित सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को बल देता है। यह केंद्र और राज्य सरकारों को साक्ष्य आधारित निर्णय प्रक्रिया अपनाने की दिशा में प्रेरित करेगा। साथ ही यह बहुलतावादी लोकतंत्र को मजबूत करने और सबका साथ, सबका विकास के सिद्धांत को व्यवहारिक स्वरूप देने में सहायक सिद्ध हो सकता है।

निष्कर्ष:

केंद्र सरकार का जातिगत जनगणना से जुड़ा यह निर्णय सामाजिक समावेशन और न्याय आधारित शासन की ओर एक महत्वपूर्ण पहल है। यह न केवल आंकड़ों की पारदर्शिता बढ़ाएगा बल्कि वंचित वर्गों की आकांक्षाओं को नीति निर्माण की मुख्यधारा में लाने का अवसर प्रदान करेगा। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस प्रक्रिया को गोपनीयता, निष्पक्षता और उद्देश्यपरकता के साथ कैसे लागू करती है।

5-शीर्षक: छह माह के अंतरिक्ष मिशन के बाद चीन के तीन अंतरिक्ष यात्री सफलतापूर्वक पृथ्वी लौटे – वैश्विक अंतरिक्ष दौड़ में चीन की मजबूत उपस्थिति

प्रस्तावना:

30 अप्रैल 2025 को चीन के तीन अंतरिक्ष यात्री (Taikonauts) अपने छह माह लंबे अंतरिक्ष मिशन के बाद सफलतापूर्वक पृथ्वी लौट आए। यह मिशन चीन के "तियांगोंग अंतरिक्ष स्टेशन" (Tiangong Space Station) से जुड़ा हुआ था, जो चीन की महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष परियोजना का केंद्रबिंदु है। यह घटना न केवल चीन की तकनीकी क्षमता का परिचायक है, बल्कि यह उसके 'महाशक्ति बनने की अंतरिक्ष नीति' की दिशा में एक ठोस कदम भी है।

मुख्य बिंदु:

  1. तियांगोंग अंतरिक्ष स्टेशन:

    • यह स्टेशन चीन की एकमात्र मानवयुक्त अंतरिक्ष प्रयोगशाला है।
    • इसे 2022 में पूर्ण रूप से चालू किया गया था और यह अब अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) के बाद एकमात्र मानवयुक्त दीर्घकालिक स्टेशन है।
  2. मिशन का विवरण:

    • इस मिशन के तहत अंतरिक्ष यात्री Tang Hongbo, Tang Shengjie और Jiang Xinlin शामिल थे।
    • उन्होंने विभिन्न वैज्ञानिक प्रयोग, बाह्य मरम्मत कार्य, और चिकित्सा परीक्षणों को अंजाम दिया।
  3. रणनीतिक महत्व:

    • यह मिशन चीन के दीर्घकालिक मानव अंतरिक्ष अभियान का हिस्सा है।
    • चीन ने 2045 तक एक प्रमुख 'अंतरिक्ष महाशक्ति' बनने का लक्ष्य रखा है।
  4. वैश्विक प्रभाव:

    • चीन, अमेरिका और रूस के बाद तीसरा ऐसा देश बन गया है, जिसके पास दीर्घकालिक मानवयुक्त स्टेशन है।
    • वह अन्य विकासशील देशों को भी 'स्पेस डिप्लोमेसी' के तहत सहयोग प्रदान कर रहा है।
  5. भारत के लिए संकेत:

    • भारत को अपने गगनयान मिशन की गति को तेज करना होगा ताकि वह मानव अंतरिक्ष उड़ान की क्षमता में चीन के समकक्ष बन सके।
    • वैश्विक भू-राजनीति में अंतरिक्ष अब एक रणनीतिक और कूटनीतिक हथियार बनता जा रहा है।

निष्कर्ष:

चीन के अंतरिक्ष यात्रियों की सफल वापसी न केवल वैज्ञानिक सफलता है बल्कि यह उसके वैश्विक प्रभाव और रणनीतिक क्षमता का प्रतीक भी है। यह घटना भारत सहित अन्य उभरते देशों के लिए प्रेरणा भी है और चुनौती भी, कि वे इस 'नई अंतरिक्ष दौड़' में अपनी उपस्थिति दर्ज कराएं।


श्रोत:

  • Xinhua News Agency, 30 अप्रैल 2025: "Three Chinese astronauts return to Earth after six-month Tiangong mission"
  • CGTN (China Global Television Network), 30 अप्रैल 2025
  • Space.com, April 2025 Report on Tiangong Mission Return


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“इस्लामिक नाटो” की परिकल्पना: तुर्की के हथियार, सऊदी धन और पाकिस्तान की परमाणु क्षमता — एक उभरते रक्षा गठजोड़ का विश्लेषण प्रस्तावना अंतरराष्ट्रीय राजनीति में गठबंधन स्थिर नहीं होते; वे समय, खतरे और हितों के अनुसार बदलते रहते हैं। हाल के वर्षों में मध्य एशिया, पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक परिवेश में तेज़ी से परिवर्तन हुआ है। इसी संदर्भ में तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच संभावित रक्षा-सहयोग को कुछ विश्लेषक “इस्लामिक नाटो” जैसी संज्ञा देने लगे हैं। यद्यपि यह कोई औपचारिक सैन्य संगठन नहीं है, फिर भी तीनों देशों के पूरक सामर्थ्य — तुर्की की रक्षा-तकनीक, सऊदी अरब की आर्थिक शक्ति और पाकिस्तान की परमाणु क्षमता — एक नए रणनीतिक त्रिकोण की संभावना को जन्म देते हैं। यह लेख इस संभावित रक्षा गठजोड़ की पृष्ठभूमि, इसके कारक, संभावित स्वरूप और वैश्विक राजनीति पर इसके प्रभावों का अकादमिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। 1. भू-राजनीतिक पृष्ठभूमि शीत युद्ध के बाद की दुनिया में शक्ति संतुलन पश्चिमी देशों से धीरे-धीरे बहुध्रुवीय संरचना की ओर बढ़ा है। अमेरिका और यूरोप की प्रभुत्ववादी भूम...

Trump’s Greenland Ambition and Europe Tariff Crisis: A New Geopolitical Flashpoint in 2026

ट्रंप की ग्रीनलैंड नीति और यूरोप पर टैरिफ का संकट: 21वीं सदी की नई भू-राजनीतिक परीक्षा 18 जनवरी 2026 को एक बार फिर वैश्विक राजनीति उस मोड़ पर खड़ी दिखाई दी, जहाँ शक्ति, संप्रभुता और आर्थिक दबाव आमने-सामने आ गए। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को खरीदने या किसी रूप में अमेरिकी नियंत्रण में लाने की अपनी पुरानी इच्छा को आक्रामक ढंग से दोहराया। 2019 में यह विचार दुनिया को अजीब लगा था, लेकिन 2025 में सत्ता में वापसी के बाद ट्रंप ने इसे रणनीतिक एजेंडे में बदल दिया। अब यह केवल एक असामान्य प्रस्ताव नहीं, बल्कि एक गंभीर अंतरराष्ट्रीय संकट का रूप ले चुका है। ग्रीनलैंड, जो डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है, भौगोलिक रूप से आर्कटिक क्षेत्र के केंद्र में स्थित है। बर्फ से ढकी यह भूमि देखने में शांत लगती है, लेकिन इसके नीचे खनिज संसाधनों, दुर्लभ पृथ्वी तत्वों और भविष्य के समुद्री मार्गों की अपार संभावनाएँ छिपी हैं। इसके साथ ही, यह अमेरिका, रूस और यूरोप के बीच रणनीतिक संतुलन का एक महत्वपूर्ण बिंदु बन चुका है। ट्रंप का तर्क है कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अनिवार्य है, ...

Trump’s Gaza “Board of Peace”: Power, Peacebuilding and the Future of Post-War Reconstruction

ट्रंप द्वारा गाजा के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की घोषणा: शक्ति, शांति और पुनर्निर्माण के बीच एक जटिल प्रयोग प्रस्तावना 17 जनवरी 2026 को व्हाइट हाउस से की गई एक घोषणा ने मध्य पूर्व की राजनीति में नई बहस छेड़ दी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा संघर्ष समाप्ति योजना के दूसरे चरण के अंतर्गत एक नई संस्था— ‘बोर्ड ऑफ पीस’ —के संस्थापक कार्यकारी सदस्यों की घोषणा की। इस बोर्ड का घोषित उद्देश्य गाजा में युद्ध के बाद के पुनर्निर्माण, स्थिरीकरण, प्रशासनिक क्षमता निर्माण और दीर्घकालिक विकास की निगरानी करना है। स्वयं ट्रंप इस बोर्ड के अध्यक्ष हैं। यह पहल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2803 (2025) से जुड़ी बताई गई है, जिसने ट्रंप की 20-सूत्रीय शांति योजना को सैद्धांतिक समर्थन दिया था। यह घोषणा केवल एक प्रशासनिक कदम नहीं है, बल्कि यह अमेरिका की मध्य पूर्व नीति, वैश्विक शासन संरचना और “शांति-निर्माण” की अवधारणा को लेकर कई बुनियादी प्रश्न खड़े करती है। पृष्ठभूमि: युद्ध से युद्धविराम तक अक्टूबर 2025 में हुए नाजुक युद्धविराम से पहले गाजा लगभग दो वर्षों तक भीषण युद्ध की चपेट में रहा। इस दौरा...

Jimmy Lai Case: Hong Kong National Security Law, Press Freedom and Global Human Rights Debate

हांगकांग–चीन संबंध और जिमी लाई मामला राष्ट्रीय सुरक्षा, प्रेस स्वतंत्रता और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का समग्र अकादमिक विश्लेषण भूमिका हांगकांग आज केवल एक वैश्विक वित्तीय केंद्र नहीं, बल्कि इतिहास, राजनीति, कानून और मानवाधिकारों के जटिल संगम का प्रतीक बन चुका है। इसकी वर्तमान स्थिति को समझने के लिए उसके औपनिवेशिक अतीत, “एक देश–दो प्रणाली” की अवधारणा और हाल के वर्षों में लागू राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की भूमिका को समग्रता में देखना आवश्यक है। जिमी लाई का मामला इसी ऐतिहासिक और राजनीतिक परिवर्तन का जीवंत उदाहरण है, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, न्यायिक प्रक्रिया और प्रेस स्वतंत्रता आमने-सामने खड़ी दिखाई देती हैं। 1. हांगकांग–चीन संबंधों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (क) चीन का पारंपरिक हिस्सा हांगकांग प्राचीन काल से चीनी साम्राज्यों का हिस्सा रहा। यह मुख्यतः मछली पकड़ने और स्थानीय व्यापार पर आधारित क्षेत्र था। मिंग और चिंग राजवंशों के समय इसे दक्षिण चीन का सामान्य तटीय इलाका माना जाता था। (ख) अफीम युद्ध और ब्रिटिश उपनिवेश 19वीं सदी में अफीम युद्धों ने हांगकांग के भाग्य को बदल दिया। 1842 की नानजि...

Why India Needs a Shadow Cabinet: Strengthening the Role of Opposition in a Modern Democracy

वर्तमान में भारत में विपक्ष की आवाज़ को सशक्त बनाने हेतु छाया मंत्रिमंडल की आवश्यकता एक समग्र अकादमिक विश्लेषण परिचय लोकतंत्र की आत्मा सत्ता और विपक्ष के बीच संतुलन में निहित होती है। जहां सत्तारूढ़ दल शासन, नीति-निर्माण और प्रशासन का दायित्व निभाता है, वहीं विपक्ष का कार्य केवल विरोध करना नहीं, बल्कि सरकार की नीतियों की समीक्षा, आलोचना और वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना होता है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में विपक्ष ‘नकारात्मक शक्ति’ नहीं, बल्कि रचनात्मक नियंत्रक (Constructive Watchdog) की भूमिका निभाता है। भारत, जो स्वयं को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र घोषित करता है, आज एक ऐसे राजनीतिक चरण से गुजर रहा है जहाँ विपक्ष की भूमिका कमजोर, बिखरी हुई और प्रतिक्रियात्मक दिखाई देती है। संसद के भीतर विमर्श का स्तर गिरा है और नीति-आलोचना प्रायः नारेबाज़ी या वॉकआउट तक सीमित रह जाती है। ऐसे परिदृश्य में छाया मंत्रिमंडल (Shadow Cabinet) की अवधारणा भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष की आवाज़ को संस्थागत, संगठित और प्रभावी बनाने का एक महत्वपूर्ण साधन बन सकती है। यह लेख भारत में छाया मंत्रिमंडल की आवश्यकता, उसके संभा...

Gig Workers in India: Pain, Challenges and 10-Minute Delivery Crisis in Quick Commerce Sector

भारत में गिग वर्कर्स की पीड़ा: क्विक कॉमर्स और 10 मिनट डिलीवरी संकट का विश्लेषण डिजिटल क्रांति ने जिस सबसे बड़े सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन को जन्म दिया है, उसका एक प्रमुख रूप है—गिग इकोनॉमी। ऐप-आधारित प्लेटफॉर्म्स ने काम को “ऑन-डिमांड” बना दिया है, जहाँ नौकरी स्थायी नहीं, बल्कि अस्थायी कार्यों की शृंखला है। उबर, ब्लिंकिट, ज़ेप्टो, स्विगी इंस्टामार्ट और ज़ोमैटो जैसे प्लेटफॉर्म्स इस मॉडल के प्रतीक हैं। पहली नज़र में यह व्यवस्था युवाओं को लचीलापन, तुरंत कमाई और तकनीक से जुड़ने का अवसर देती है, लेकिन इसी चमकदार परत के नीचे गिग वर्कर्स की पीड़ा, असुरक्षा और संघर्ष की एक लंबी कहानी छिपी है। भारत में यह समस्या विशेष रूप से क्विक कॉमर्स सेक्टर में दिखाई देती है, जहाँ “10 मिनट में डिलीवरी” जैसे वादों ने उपभोक्ताओं को तो सुविधा दी, लेकिन डिलीवरी पार्टनर्स के जीवन को जोखिम में डाल दिया। यह केवल तेज डिलीवरी का सवाल नहीं है, बल्कि यह उस आर्थिक मॉडल का सवाल है जो मुनाफे को श्रमिकों की सुरक्षा से ऊपर रखता है। गिग इकोनॉमी: अवसर और विरोधाभास गिग इकोनॉमी का मूल आकर्षण है—लचीलापन। कोई भी व्यक्ति अपनी सु...

Trump’s “Board of Peace”: From Gaza Plan to Global Conflict Resolution

ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’: गाजा से वैश्विक संघर्ष समाधान तक एक नया प्रयोग प्रस्तावना इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में वैश्विक राजनीति एक बार फिर संक्रमण के दौर से गुजर रही है। बहुपक्षीय संस्थाएं—विशेषकर संयुक्त राष्ट्र—लगातार यह आरोप झेल रही हैं कि वे तेज़ी से बदलते संघर्षों के समाधान में प्रभावी नहीं रह गई हैं। इसी पृष्ठभूमि में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2025 में गाजा संकट के समाधान के लिए एक 20-सूत्रीय योजना पेश की और उसके दूसरे चरण में एक नई संस्था— ‘बोर्ड ऑफ पीस’ —की स्थापना की। जो पहल गाजा तक सीमित मानी जा रही थी, वह जनवरी 2026 में अचानक वैश्विक संघर्ष समाधान के मंच में बदलने लगी। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, बहुपक्षीयता और अमेरिका की भूमिका पर नए प्रश्न खड़े हो गए हैं। गाजा संकट और ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की उत्पत्ति 2024–25 में इजरायल-हमास संघर्ष ने गाजा को मानवीय त्रासदी के केंद्र में ला खड़ा किया। लगातार युद्ध, विस्थापन, भुखमरी और बुनियादी ढांचे का विनाश अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए चुनौती बन गया। इसी संदर्भ में सितंबर 2025 में ट्रंप ने ‘कॉम्प्रिहेंसिव प्लान टू एंड द गाजा क...

Frederick Merz’s India Visit and the “Indo-Europe” Idea: A New Strategic Geography

जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज़ की भारत यात्रा और 'इंडो-यूरोप' की अवधारणा: एक रणनीतिक विश्लेषण प्रस्तावना वैश्विक भू-राजनीति में तेजी से बदलाव आ रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एकतरफा नीतियां और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की आक्रामक कूटनीति ने दुनिया को अस्थिरता की ओर धकेल दिया है। ऐसे समय में जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज़ की जनवरी 2026 में भारत की दो-दिवसीय आधिकारिक यात्रा केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह एक नई रणनीतिक भूगोल की शुरुआत का संकेत देती है। प्रसिद्ध स्तंभकार सी. राजा मोहन ने इसे "इंडो-यूरोप" की संज्ञा दी है। यह अवधारणा भारत और यूरोप (विशेषकर जर्मनी) के बीच गहन सहयोग के माध्यम से अमेरिका और चीन के प्रभुत्व को संतुलित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह यात्रा 25 वर्षों के भारत-जर्मनी रणनीतिक साझेदारी और 75 वर्षों के राजनयिक संबंधों के उपलक्ष्य में हुई, जिसमें दोनों पक्षों ने 19 समझौतों पर हस्ताक्षर किए। यात्रा के प्रमुख परिणाम और समझौते मेर्ज़ की यात्रा 12-13 जनवरी 2026 को हुई, जो उनकी चांसलर बनने के बाद प...

India's Israel-Palestine Policy: From Traditional Palestinian Support to Strategic Balance with Israel (2026 Update)

भारत की इज़राइल-फिलिस्तीन विदेश नीति: नेहरू से मोदी तक इज़राइल–फिलिस्तीन विवाद बीसवीं सदी के सबसे जटिल और दीर्घकालिक भू-राजनीतिक संघर्षों में से एक है, जो 1947-48 के विभाजन और इज़राइल की स्थापना से लेकर आज के गाजा संकट तक फैला हुआ है। यह मुद्दा न केवल मध्य पूर्व की राजनीति को आकार देता है, बल्कि वैश्विक दक्षिण-उत्तरी संबद्धताओं, धार्मिक पहचान राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विमर्श का केंद्र बिंदु भी रहा है। भारत का रुख इस संदर्भ में विशेष रूप से अध्ययन-योग्य है, क्योंकि यह पारंपरिक रूप से फिलिस्तीनी आत्मनिर्णय के समर्थक के रूप में जाना जाता है, जबकि हाल के दशकों में इज़राइल के साथ रणनीतिक साझेदारी भी गहराती जा रही है। यह द्वंद्व भारत की विदेश नीति की बहुआयामी प्रकृति को उजागर करता है, जिसमें ऐतिहासिक विरासत, वैचारिक आधार, भू-रणनीतिक हित, आर्थिक कारक और घरेलू राजनीतिक संवेदनशीलताएं शामिल हैं। इस विश्लेषण में हम इन आयामों का संतुलित परीक्षण करेंगे, विशेष रूप से 2023 के बाद की घटनाओं के प्रकाश में, जो दर्शाती हैं कि भारत किस प्रकार वैश्विक दबावों के बीच संतुलन साध रहा है। भारत की विदे...

Trump’s Gaza Peace Board and India’s Role: Strategic, Political and Ethical Analysis

ट्रंप की ‘गाजा शांति बोर्ड’ में भारत की संभावित भागीदारी: एक संतुलित विश्लेषण भूमिका इजरायल–हमास युद्ध के बाद गाजा पट्टी के भविष्य को लेकर वैश्विक स्तर पर कई योजनाएँ सामने आई हैं। इन्हीं में से एक है अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस फॉर गाजा’ । इसका उद्देश्य गाजा में युद्धोत्तर शासन, सुरक्षा व्यवस्था और पुनर्निर्माण को एक अंतरराष्ट्रीय ढाँचे के तहत संचालित करना है। इस बोर्ड में भारत को औपचारिक रूप से आमंत्रित किया गया है। यह निमंत्रण केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका की स्वीकृति भी है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या भारत को इस पहल का हिस्सा बनना चाहिए? और यदि हाँ, तो किस स्तर तक? यह लेख इसी प्रश्न का ऐतिहासिक, रणनीतिक और नैतिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करता है और अंत में एक संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत करता है। पृष्ठभूमि: गाजा और ट्रंप की शांति योजना गाजा लंबे समय से इजरायल–फिलिस्तीन संघर्ष का केंद्र रहा है। हमास के नियंत्रण, इजरायली सैन्य कार्रवाइयों और मानवीय संकट ने इस क्षेत्र को वैश्विक चिंता का विषय बना दिया है। ट्रंप ...