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Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

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US–Israel War on Iran: Geopolitical Challenges Facing the Trump Administration After One Week

यू.एस.–इज़राइल युद्ध का पहला सप्ताह: ट्रंप प्रशासन की ईरान नीति और बदलती वैश्विक भू-राजनीति

प्रस्तावना

28 फरवरी 2026 को शुरू हुआ संयुक्त अमेरिकी–इज़राइली सैन्य अभियान मध्य पूर्व की राजनीति में एक निर्णायक मोड़ के रूप में सामने आया है। इस अभियान, जिसे अनौपचारिक रूप से “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” कहा जा रहा है, ने न केवल ईरान के सैन्य और परमाणु ढांचे को निशाना बनाया, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को भी गहराई से प्रभावित किया है। अमेरिकी और इज़राइली वायुसेना द्वारा किए गए व्यापक हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई की हत्या की पुष्टि ने इस संघर्ष को और अधिक विस्फोटक बना दिया।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस अभियान को ईरान के परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करने और मध्य पूर्व में स्थिरता स्थापित करने की दिशा में एक निर्णायक कदम बताया है। उनके अनुसार यह कार्रवाई ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को नष्ट करने, क्षेत्रीय प्रॉक्सी नेटवर्क को कमजोर करने और “ईरानी आक्रामकता” को समाप्त करने के लिए आवश्यक थी।

हालांकि युद्ध के पहले सप्ताह के भीतर ही यह स्पष्ट हो गया है कि यह संघर्ष केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं रहेगा। यह एक व्यापक भू-राजनीतिक संकट में बदल चुका है, जिसका प्रभाव पूरे पश्चिम एशिया, वैश्विक ऊर्जा बाजार, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और अमेरिकी घरेलू राजनीति तक फैल गया है।

इस संपादकीय का उद्देश्य युद्ध के पहले सप्ताह के अनुभवों के आधार पर यह विश्लेषण करना है कि क्या शुरुआती सैन्य सफलता दीर्घकालिक रणनीतिक जीत में बदल सकती है, या यह संघर्ष अमेरिका को एक और लंबे और जटिल क्षेत्रीय युद्ध में उलझा सकता है।


ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: अमेरिका-ईरान संघर्ष की जड़ें

अमेरिका और ईरान के बीच वर्तमान टकराव को समझने के लिए उसके ऐतिहासिक संदर्भ को समझना आवश्यक है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से दोनों देशों के संबंध गहरे अविश्वास और राजनीतिक शत्रुता से भरे रहे हैं। उस वर्ष ईरान में शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी की पश्चिम समर्थक सरकार के पतन के बाद स्थापित इस्लामी गणराज्य ने स्वयं को अमेरिकी प्रभाव के विरुद्ध एक वैचारिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया।

इसके बाद अमेरिकी दूतावास बंधक संकट, आर्थिक प्रतिबंध, क्षेत्रीय प्रॉक्सी संघर्ष और परमाणु कार्यक्रम को लेकर लगातार तनाव बना रहा।

2015 में संयुक्त व्यापक कार्ययोजना (JCPOA) के माध्यम से कुछ समय के लिए इस तनाव को कम करने का प्रयास हुआ। इस समझौते के तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर सीमाएँ लगाने के बदले आर्थिक प्रतिबंधों में राहत प्राप्त की।

लेकिन 2018 में राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा इस समझौते से अमेरिका को अलग करने और “मैक्सिमम प्रेशर” नीति लागू करने के बाद संबंध फिर से तेजी से बिगड़ गए। आर्थिक प्रतिबंधों, तेल निर्यात पर प्रतिबंध और क्षेत्रीय सैन्य तनाव ने दोनों देशों के बीच टकराव को और बढ़ा दिया।

2026 का वर्तमान युद्ध इसी लंबे ऐतिहासिक संघर्ष की परिणति के रूप में देखा जा सकता है।


शुरुआती सैन्य अभियान: तेज़ लेकिन निर्णायक नहीं

युद्ध की शुरुआत में अमेरिकी और इज़राइली बलों ने अत्यधिक समन्वित और तकनीकी रूप से उन्नत सैन्य रणनीति का उपयोग किया। स्टील्थ बमवर्षकों, कैरियर स्ट्राइक ग्रुप्स, लंबी दूरी की क्रूज़ मिसाइलों और साइबर युद्ध तकनीकों का संयोजन करके ईरान की वायु रक्षा प्रणाली, नौसेना अड्डों, मिसाइल ठिकानों और संचार नेटवर्क पर बड़े पैमाने पर हमले किए गए।

अमेरिकी रक्षा विभाग के अनुसार पहले सप्ताह के भीतर लगभग तीन हजार सैन्य और रणनीतिक लक्ष्यों पर हमले किए गए। कई प्रमुख वायु रक्षा प्रतिष्ठान नष्ट हो गए और ईरानी नौसेना के अनेक जहाज क्षतिग्रस्त या नष्ट हो गए।

सबसे नाटकीय घटना ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनेई की हत्या थी, जिसने ईरानी राजनीतिक व्यवस्था में तत्काल नेतृत्व संकट पैदा कर दिया। ईरान के संविधान के अनुसार अंतरिम नेतृत्व परिषद की स्थापना की गई है, जो नए सुप्रीम लीडर के चयन तक शासन का संचालन कर रही है।

इन घटनाओं ने प्रारंभिक चरण में अमेरिकी और इज़राइली सैन्य प्रभुत्व को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया। लेकिन युद्ध के पहले सप्ताह के भीतर ही यह भी स्पष्ट हो गया कि सैन्य सफलता स्वतः राजनीतिक स्थिरता या रणनीतिक विजय की गारंटी नहीं देती।


ईरान की जवाबी रणनीति: असममित युद्ध

ईरान ने पारंपरिक सैन्य शक्ति के बजाय असममित रणनीति अपनाई है। यह रणनीति पिछले कई दशकों से उसकी रक्षा नीति का केंद्र रही है।

ईरान ने बैलिस्टिक मिसाइलों, ड्रोन हमलों और क्षेत्रीय सहयोगी संगठनों के माध्यम से जवाबी कार्रवाई शुरू की है। इज़राइल के विभिन्न सैन्य ठिकानों और अमेरिकी अड्डों को निशाना बनाया गया है।

कुवैत, बहरीन और कतर में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले हुए हैं, जिनमें कुछ अमेरिकी सैनिकों की मौत की पुष्टि हुई है।

इसके अलावा लेबनान में हिज़्बुल्लाह ने उत्तरी इज़राइल पर हमलों की तीव्रता बढ़ा दी है। सीरिया और इराक में सक्रिय शिया मिलिशिया समूह भी अमेरिकी हितों को निशाना बना रहे हैं।

यमन में हौथी विद्रोहियों द्वारा लाल सागर में जहाजों पर हमले और ड्रोन हमलों ने समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा को भी चुनौती दी है।

इस प्रकार युद्ध अब केवल अमेरिका और ईरान के बीच सीमित संघर्ष नहीं रहा, बल्कि एक बहुस्तरीय क्षेत्रीय टकराव में बदल गया है।


होर्मुज़ जलडमरूमध्य और वैश्विक ऊर्जा संकट

इस संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण वैश्विक प्रभाव ऊर्जा बाजार पर पड़ा है। ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य में समुद्री यातायात को बाधित करने की धमकी दी है।

यह जलमार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग एक-तिहाई हिस्सा वहन करता है। टैंकरों पर हमलों और नौसैनिक गतिविधियों के कारण वैश्विक तेल कीमतों में तेजी आई है।

पहले सप्ताह के भीतर ही अंतरराष्ट्रीय बाजारों में तेल की कीमतों में लगभग दस प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

यदि यह संकट लंबा खिंचता है तो वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था में महंगाई और अस्थिरता बढ़ सकती है।


अमेरिकी घरेलू राजनीति पर प्रभाव

इस युद्ध का प्रभाव केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर तक सीमित नहीं है; यह अमेरिकी घरेलू राजनीति में भी महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है।

राष्ट्रपति ट्रंप ने 2024 के चुनाव में “अमेरिका फर्स्ट” नीति के तहत विदेशी युद्धों से दूरी बनाने का वादा किया था। उन्होंने अफगानिस्तान और इराक जैसे लंबे सैन्य अभियानों को “महंगे और अनावश्यक” बताया था।

लेकिन ईरान के विरुद्ध यह सैन्य अभियान कई विश्लेषकों के अनुसार एक “चुना हुआ युद्ध” है।

अमेरिकी जनमत सर्वेक्षणों से संकेत मिलता है कि बड़ी संख्या में नागरिक इस युद्ध को लेकर संदेह और चिंता व्यक्त कर रहे हैं। बढ़ते सैन्य खर्च और संभावित सैनिक हताहतों ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है।

डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ-साथ रिपब्लिकन पार्टी के कुछ सदस्य भी प्रशासन की रणनीति पर सवाल उठा रहे हैं।


अंतरराष्ट्रीय कानून और नैतिक प्रश्न

खामेनेई की हत्या ने अंतरराष्ट्रीय कानून और नैतिकता से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं।

किसी संप्रभु राष्ट्र के सर्वोच्च नेता की लक्षित हत्या को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में व्यापक बहस हो रही है।

कुछ विशेषज्ञ इसे “लक्षित सैन्य कार्रवाई” के रूप में देखते हैं, जबकि अन्य इसे अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर की भावना के विरुद्ध मानते हैं।

यदि इस प्रकार की कार्रवाइयों को स्वीकार्य मान लिया जाता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में खतरनाक मिसाल स्थापित कर सकता है।


वैश्विक शक्तियों की प्रतिक्रिया

इस संघर्ष पर वैश्विक शक्तियों की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण है।

रूस और चीन ने अमेरिकी कार्रवाई की कड़ी आलोचना की है और इसे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा बताया है।

यूरोपीय देशों में भी इस मुद्दे पर मतभेद दिखाई दे रहे हैं। कुछ देश अमेरिकी सुरक्षा चिंताओं को समझते हैं, जबकि अन्य इस सैन्य कार्रवाई को जल्दबाजी में लिया गया निर्णय मानते हैं।

नाटो सहयोगियों के बीच भी इस मुद्दे पर एकरूपता नहीं है, जिससे पश्चिमी गठबंधन की एकता पर प्रश्नचिह्न लग सकता है।


परमाणु प्रसार का जोखिम

इस युद्ध का एक गंभीर परिणाम वैश्विक परमाणु प्रसार की संभावना भी हो सकता है।

यदि ईरान यह निष्कर्ष निकालता है कि केवल परमाणु हथियार ही उसके शासन की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं, तो वह परमाणु हथियार बनाने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ सकता है।

यह स्थिति उत्तर कोरिया मॉडल की पुनरावृत्ति जैसी हो सकती है, जहां परमाणु हथियार शासन की सुरक्षा का साधन बन गए हैं।

ऐसी स्थिति में मध्य पूर्व में परमाणु हथियारों की दौड़ शुरू होने का खतरा भी बढ़ सकता है।


भारत के लिए निहितार्थ

इस संघर्ष का भारत पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है।

भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आयात करता है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य में अस्थिरता भारत की ऊर्जा सुरक्षा को सीधे प्रभावित कर सकती है।

इसके अलावा क्षेत्र में बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी रहते हैं, जिनकी सुरक्षा भी महत्वपूर्ण मुद्दा है।

भारत ने परंपरागत रूप से इस क्षेत्र में संतुलित कूटनीति अपनाई है और सभी पक्षों के साथ संवाद बनाए रखने का प्रयास किया है।

वर्तमान संकट भारत के लिए एक जटिल कूटनीतिक चुनौती प्रस्तुत करता है।


निष्कर्ष: सैन्य जीत बनाम रणनीतिक स्थिरता

युद्ध के पहले सप्ताह के अनुभव यह संकेत देते हैं कि अमेरिका और इज़राइल ने प्रारंभिक सैन्य चरण में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की है।

लेकिन इतिहास यह बताता है कि सैन्य जीत अक्सर राजनीतिक स्थिरता या दीर्घकालिक रणनीतिक सफलता में परिवर्तित नहीं होती।

2003 के इराक युद्ध का अनुभव इस बात का उदाहरण है कि प्रारंभिक सैन्य विजय के बाद भी लंबे समय तक अस्थिरता बनी रह सकती है।

ट्रंप प्रशासन के सामने अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या वह इस संघर्ष को सीमित रखते हुए कूटनीतिक समाधान की दिशा में आगे बढ़ेगा, या फिर “पूर्ण विजय” और शासन परिवर्तन की खोज में इसे एक दीर्घकालिक युद्ध में बदल देगा।

मध्य पूर्व की जटिल राजनीति, क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता और वैश्विक शक्ति संतुलन को देखते हुए यह स्पष्ट है कि इस युद्ध के परिणाम केवल सैन्य मैदान में तय नहीं होंगे।

आने वाले सप्ताह और महीने यह निर्धारित करेंगे कि यह संघर्ष क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में एक निर्णायक मोड़ बनेगा या वैश्विक अस्थिरता के एक नए युग की शुरुआत करेगा।

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