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Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

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India’s Diplomatic Balancing Act in the Iran–Israel–US Conflict: Strategic Challenges in West Asia

Iran–Israel War and India’s Foreign Policy: How New Delhi Is Balancing Energy, Security and Diplomacy

पश्चिम एशिया में ईरान, इजरायल और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच भारत की कूटनीतिक संतुलन की चुनौतियाँ

परिचय 

पश्चिम एशिया की भू-राजनीति हमेशा ज्वालामुखी रही है, लेकिन मार्च 2026 तक यह विस्फोटक रूप ले चुकी है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या हो गई। उसके बाद शुरू हुए संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है। ईरान के जवाबी हमले, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकेबंदी और तेल की कीमतों में उछाल ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को झकझोर दिया है। इस संकट में भारत की स्थिति अत्यंत संवेदनशील है। नई दिल्ली को इजरायल के साथ रक्षा साझेदारी, अमेरिका के साथ रणनीतिक गठबंधन और ईरान के साथ ऊर्जा-व्यापार संबंधों के बीच सावधानीपूर्वक संतुलन बनाना पड़ रहा है। विशेषज्ञ माइकल कुगेलमैन ने हाल ही में कहा है कि भारत के लिए दोनों पक्षों के साथ संबंध बनाए रखना “अत्यंत कठिन” है, क्योंकि यह उसके रणनीतिक हितों को सीधे प्रभावित करता है। यह लेख भारत की ऐतिहासिक स्थिति, वर्तमान चुनौतियों, संभावित प्रभावों और भविष्य की रणनीतियों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

 पश्चिम एशिया में तनाव का पृष्ठभूमि

 तनाव की जड़ें ईरान के परमाणु कार्यक्रम, इजरायल की सुरक्षा चिंताओं और अमेरिका की क्षेत्रीय महत्त्वाकांक्षा में छिपी हैं। फरवरी 2026 के अंत में अमेरिका-इजरायल ने “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” शुरू किया, जिसमें खामेनेई समेत कई उच्च अधिकारी मारे गए। ईरान ने जवाबी हमले किए, लेकिन सऊदी अरब और UAE जैसे देशों की प्रतिक्रिया मिश्रित रही। सबसे बड़ा खतरा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकेबंदी है, जो विश्व के 20% तेल व्यापार का मार्ग है। मार्च 2026 तक तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं। भारत के लिए यह संकट घातक है क्योंकि वह मध्य पूर्व से 55% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। GCC देश (सऊदी अरब, UAE) मुख्य स्रोत हैं। हाल के दिनों में भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ी हैं और एलपीजी की उपलब्धता प्रभावित हुई है, जो आम आदमी की जेब पर बोझ बन रहा है। 

भारत के संबंध:

 इजरायल, ईरान और अमेरिका के साथ भारत की विदेश नीति गुटनिरपेक्षता की परंपरा पर टिकी रही है, लेकिन पिछले दशक में इसमें रणनीतिक बदलाव आया है। इजरायल के साथ संबंध अब रक्षा और प्रौद्योगिकी के मजबूत स्तंभ बन चुके हैं। फरवरी 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा ने इस साझेदारी को नई ऊंचाई दी। इजरायली एयर डिफेंस सिस्टम ने भारत को पाकिस्तानी ड्रोन हमलों से सुरक्षा दी है। अमेरिका के साथ भी रक्षा प्रौद्योगिकी और निवेश का गहरा संबंध है। QUAD और I2U2 जैसे मंचों ने इसे और मजबूत किया है। दूसरी ओर, ईरान के साथ संबंध ऊर्जा और चाबहार बंदरगाह पर आधारित हैं। चाबहार मध्य एशिया तक भारत का प्रवेश द्वार है, हालांकि अमेरिकी प्रतिबंधों ने इसमें बाधा डाली। खामेनी की मृत्यु पर भारत ने शोक व्यक्त किया और ईरानी तेल आयात को सावधानी से संभाला। फिर भी संबंध दोस्ताना बने हुए हैं। 

 कूटनीतिक संतुलन की चुनौतियाँ 

माइकल कुगेलमैन जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के सामने चार बड़ी चुनौतियाँ हैं: 

 1. ऊर्जा सुरक्षा: होर्मुज की नाकेबंदी से आयात प्रभावित हो सकता है। GCC पर निर्भरता बढ़ी है, लेकिन कीमतों में उछाल और आपूर्ति की अनिश्चितता भारत की अर्थव्यवस्था पर दबाव डाल रही है।

 2. प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा: पश्चिम एशिया में करीब 90 लाख भारतीय काम कर रहे हैं। विदेश मंत्रालय ने ईरान और पड़ोसी देशों के लिए यात्रा सलाह जारी की है। किसी भी बड़े संघर्ष में उनके जीवन का खतरा है। 

 3. रणनीतिक स्वायत्तता का संकट: कुछ विश्लेषक मानते हैं कि मोदी सरकार की नीति अमेरिका-इजरायल की ओर झुकाव दिखाती है, जो पारंपरिक गुटनिरपेक्षता से विचलन है। फिर भी भारत BRICS और SCO में चीन-रूस के साथ भी जुड़ा हुआ है। 

 4. वैश्विक प्रभाव: चीन और रूस इस संकट में ईरान का साथ दे रहे हैं। इससे भारत की बहुपक्षीय साझेदारियाँ प्रभावित हो सकती हैं।

 भारत की संभावित रणनीति 

भारत अब मध्यस्थता की भूमिका निभा सकता है। कतर, ओमान और सऊदी अरब के साथ सक्रिय संवाद बढ़ाना चाहिए। विदेश मंत्री एस. जयशंकर पहले ही ईरान के समकक्ष से बात कर चुके हैं। बहुपक्षीय मंचों (UN, G20) पर संवाद और शांति की अपील करनी चाहिए। कुगेलमैन की सलाह सही है—रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए सावधानी से कदम बढ़ाना। भारत को चाबहार परियोजना को मजबूत करना चाहिए और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत (रूस, अमेरिका) विकसित करने चाहिए। 

निष्कर्ष 

पश्चिम एशिया का यह संकट भारत की कूटनीतिक परीक्षा है। इजरायल और ईरान के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं, लेकिन भारत की “बहु-संरेखण” (multi-alignment) नीति इसे संभव बना सकती है। ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासियों की रक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता देकर भारत इस संकट को अवसर में बदल सकता है। संवाद ही एकमात्र रास्ता है। भारत अगर क्षेत्रीय शक्तियों के बीच विश्वसनीय मध्यस्थ बनेगा, तो उसकी वैश्विक छवि और मजबूत होगी। मार्च 2026 का यह संकट साबित कर रहा है कि भारत अब “मध्य शक्ति” से आगे बढ़कर “विश्व शक्ति” की राह पर है—बशर्ते वह संतुलन की कला में निपुण रहे। भारत की कूटनीति का यह परीक्षण समय है। संतुलन बनाए रखना ही सच्ची विजय होगी।

स्रोत:

Kugelman, Michael. Analysis on South Asian and global geopolitics.

Carnegie Endowment for International Peace / Wilson Center publications.

Reuters, The Hindu, The Indian Express (March 2026 reports on West Asia crisis).

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