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Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

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India Backs UN Resolution Against Iran: Strategic Shift in West Asia Diplomacy and Global Security

भारत का संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ईरान विरोधी प्रस्ताव: एक कूटनीतिक संतुलन और उसके दूरगामी प्रभाव

प्रस्तावना

पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक राजनीति के केंद्र में है। क्षेत्र में बढ़ते सैन्य तनाव, ऊर्जा मार्गों की असुरक्षा और महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को अस्थिर बना दिया है। ऐसे समय में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में पारित वह प्रस्ताव, जिसमें ईरान द्वारा खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) देशों और जॉर्डन पर किए गए मिसाइल एवं ड्रोन हमलों की निंदा की गई, वैश्विक कूटनीति में एक महत्वपूर्ण क्षण के रूप में सामने आया।

इस प्रस्ताव को बड़ी संख्या में देशों द्वारा सह-प्रायोजित किया गया और भारत का इसमें शामिल होना विशेष रूप से उल्लेखनीय है। भारत, जो लंबे समय से पश्चिम एशिया में संतुलित और बहुआयामी विदेश नीति का अनुसरण करता रहा है, इस निर्णय के माध्यम से अपने रणनीतिक हितों, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय नियम-आधारित व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता को स्पष्ट करता है।

यह निर्णय केवल एक कूटनीतिक समर्थन नहीं है, बल्कि भारत की विदेश नीति के विकासशील चरित्र का संकेत भी है।


पश्चिम एशिया का बदलता भू-राजनीतिक परिदृश्य

पश्चिम एशिया लंबे समय से शक्ति संतुलन, धार्मिक राजनीति और संसाधनों की प्रतिस्पर्धा का केंद्र रहा है। ईरान, सऊदी अरब, इज़रायल और अमेरिका जैसे प्रमुख खिलाड़ी इस क्षेत्रीय समीकरण को प्रभावित करते रहे हैं।

हाल के महीनों में स्थिति तब और जटिल हो गई जब क्षेत्र में सैन्य कार्रवाई और प्रतिशोधात्मक हमलों की श्रृंखला शुरू हुई। इसके परिणामस्वरूप क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचा कमजोर हुआ और समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर भी प्रश्नचिह्न लग गया।

विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा का प्रश्न वैश्विक चिंता का विषय बन गया है। यह जलमार्ग विश्व ऊर्जा व्यापार का एक प्रमुख केंद्र है, जहां से विश्व के कुल तेल आपूर्ति का लगभग पाँचवाँ हिस्सा गुजरता है। यदि इस मार्ग में बाधा आती है तो इसका प्रभाव केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

इसी संदर्भ में सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव केवल एक राजनीतिक वक्तव्य नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा और वैश्विक ऊर्जा स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।


भारत की विदेश नीति: संतुलन की कला

भारत की पश्चिम एशिया नीति ऐतिहासिक रूप से संतुलन पर आधारित रही है। भारत ने एक ओर अरब देशों के साथ घनिष्ठ आर्थिक और रणनीतिक संबंध बनाए रखे हैं, वहीं दूसरी ओर ईरान के साथ भी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भू-राजनीतिक संबंधों को बनाए रखा है।

खाड़ी सहयोग परिषद के देशों के साथ भारत के संबंध बहुआयामी हैं।

  • भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है।
  • लाखों भारतीय प्रवासी इन देशों में कार्यरत हैं और भारत की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण विदेशी मुद्रा भेजते हैं।
  • रक्षा सहयोग, निवेश और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में भी तेजी से विस्तार हुआ है।

दूसरी ओर ईरान भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार रहा है।

  • चाबहार बंदरगाह परियोजना भारत की मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुंच की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
  • ऊर्जा क्षेत्र में भी ईरान संभावित साझेदार रहा है।

ऐसे में भारत का इस प्रस्ताव का समर्थन करना यह दर्शाता है कि उसकी विदेश नीति केवल ऐतिहासिक संबंधों पर आधारित नहीं बल्कि वर्तमान भू-राजनीतिक और आर्थिक हितों के आधार पर भी विकसित हो रही है।


वैश्विक प्रतिक्रिया और महाशक्ति राजनीति

इस प्रस्ताव पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया भी वैश्विक शक्ति संरचना की वास्तविकताओं को उजागर करती है।

अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने इसे क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में आवश्यक कदम बताया, जबकि रूस और चीन ने मतदान से दूरी बनाकर अपनी रणनीतिक स्थिति को स्पष्ट किया।

यह स्थिति संयुक्त राष्ट्र की उस जटिलता को भी उजागर करती है जहां वैश्विक सुरक्षा मुद्दे अक्सर महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा के कारण राजनीतिक रंग ले लेते हैं।

इसके बावजूद प्रस्ताव का पारित होना यह दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय क्षेत्रीय संघर्षों के विस्तार को रोकने के लिए अभी भी बहुपक्षीय संस्थाओं का सहारा लेना चाहता है।


मौलिक प्रभाव: क्षेत्रीय और वैश्विक राजनीति पर असर

1. पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन

इस प्रस्ताव का सबसे पहला प्रभाव क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर पड़ेगा।

ईरान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ने से उसके क्षेत्रीय प्रभाव को चुनौती मिल सकती है। वहीं खाड़ी देशों को यह संदेश जाएगा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय उनकी सुरक्षा चिंताओं को गंभीरता से ले रहा है।

हालांकि यह भी संभव है कि इससे ईरान और पश्चिमी समर्थित गठबंधन के बीच तनाव और बढ़ जाए।


2. ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक अर्थव्यवस्था

यदि क्षेत्रीय संघर्ष बढ़ता है तो इसका सीधा असर ऊर्जा बाजार पर पड़ेगा।

तेल की कीमतों में अस्थिरता वैश्विक मुद्रास्फीति और आर्थिक विकास को प्रभावित कर सकती है। भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों के लिए यह विशेष चिंता का विषय है।

इस प्रस्ताव के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने यह संकेत दिया है कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला की सुरक्षा एक सामूहिक जिम्मेदारी है।


3. भारत की कूटनीतिक स्थिति का सुदृढ़ीकरण

भारत के लिए यह निर्णय कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

यह कदम भारत को पश्चिम एशिया में एक जिम्मेदार और संतुलित शक्ति के रूप में स्थापित करता है। भारत ने यह संदेश दिया है कि वह केवल अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा ही नहीं बल्कि वैश्विक स्थिरता के लिए भी प्रतिबद्ध है।

यह दृष्टिकोण भारत की उस दीर्घकालिक आकांक्षा को भी मजबूत करता है जिसके तहत वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का दावा करता है।


4. बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का संकेत

इस घटना ने वैश्विक राजनीति के बदलते स्वरूप को भी उजागर किया है।

रूस और चीन का मतदान से परहेज यह दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर महाशक्तियों के बीच सहमति बनाना पहले की तुलना में अधिक कठिन हो गया है।

यह स्थिति एक उभरती हुई बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का संकेत देती है, जहां क्षेत्रीय शक्तियां और मध्यम शक्तियां—जैसे भारत—अधिक सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।


भारत के सामने कूटनीतिक चुनौती

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब संतुलन बनाए रखने की होगी।

ईरान के साथ संबंध पूरी तरह टूटना भारत के रणनीतिक हितों के लिए उचित नहीं होगा। चाबहार परियोजना और मध्य एशिया तक भारत की पहुंच में ईरान की भूमिका महत्वपूर्ण है।

इसलिए भारत को एक ऐसी कूटनीतिक रणनीति अपनानी होगी जिसमें वह GCC देशों के साथ साझेदारी को मजबूत करते हुए ईरान के साथ संवाद के चैनल भी खुले रख सके।

यह वही संतुलन है जिसने पिछले दो दशकों में भारत की पश्चिम एशिया नीति को सफल बनाया है।


निष्कर्ष

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ईरान विरोधी प्रस्ताव का समर्थन भारत की विदेश नीति में एक महत्वपूर्ण संकेतक है। यह निर्णय दर्शाता है कि भारत अब वैश्विक राजनीति में अधिक सक्रिय और जिम्मेदार भूमिका निभाने के लिए तैयार है।

हालांकि यह कदम तत्काल कूटनीतिक लाभ प्रदान कर सकता है, लेकिन इसके दीर्घकालिक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेंगे कि भारत क्षेत्रीय शक्तियों के बीच संतुलन बनाए रखने में कितना सफल रहता है।

पश्चिम एशिया की जटिल राजनीति में स्थायी समाधान केवल सैन्य या राजनीतिक दबाव से नहीं बल्कि संवाद, सहयोग और क्षेत्रीय विश्वास निर्माण से ही संभव है।

भारत, जिसकी विदेश नीति परंपरागत रूप से संतुलन और बहुपक्षीयता पर आधारित रही है, इस दिशा में एक महत्वपूर्ण सेतु की भूमिका निभा सकता है।


With the Hindu Inputs 

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