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Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

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India’s Nuclear Submarine Triad: INS Arihant, Arighat & Aridhaman Strengthen Sea-Based Deterrence and Second-Strike Capability

समुद्र की निस्तब्ध गहराइयों में भारत का रणनीतिक संतुलन

परमाणु पनडुब्बी त्रयी और विश्वसनीय प्रतिरोध की राजनीति

हिंद महासागर की शांत सतह के नीचे एक ऐसी शक्ति सक्रिय है, जो दिखाई नहीं देती, परंतु जिसकी उपस्थिति ही रणनीतिक संतुलन को परिभाषित करती है। भारत की परमाणु पनडुब्बी क्षमता—विशेषकर INS Arihant, INS Arighat और शीघ्र शामिल होने वाली INS Aridhaman—आज राष्ट्रीय सुरक्षा संरचना का वह स्तंभ है, जो प्रत्यक्ष आक्रामकता नहीं, बल्कि मौन निरोध (Silent Deterrence) का प्रतीक है।

भारत की परमाणु त्रयी का समुद्री आयाम, रणनीतिक स्थिरता के उस सिद्धांत पर आधारित है जिसमें शक्ति का उद्देश्य युद्ध करना नहीं, बल्कि युद्ध को रोकना होता है।


परमाणु त्रयी का अर्थ: सिद्धांत से व्यवहार तक

भारत की परमाणु नीति दो मूलभूत सिद्धांतों पर आधारित है—

  1. नो फर्स्ट यूज (No First Use)
  2. न्यूनतम विश्वसनीय निरोध (Credible Minimum Deterrence)

इन सिद्धांतों की विश्वसनीयता तभी संभव है जब “दूसरे प्रहार की क्षमता” (Second Strike Capability) सुनिश्चित हो। यदि शत्रु प्रथम आक्रमण में भूमि आधारित मिसाइल अड्डों या वायु ठिकानों को निशाना बना दे, तब भी समुद्र की गहराइयों में छिपी पनडुब्बियाँ जवाब देने में सक्षम रहें—यही परमाणु संतुलन का वास्तविक आधार है।

इस दृष्टि से समुद्री स्तंभ, त्रयी का सबसे सुरक्षित और लचीला आयाम माना जाता है।


स्वदेशी विकास और संस्थागत संरचना

भारत की परमाणु पनडुब्बी परियोजना ‘एडवांस्ड टेक्नोलॉजी वेसल’ (ATV) कार्यक्रम के तहत विकसित हुई। यह कार्यक्रम दशकों की वैज्ञानिक धैर्य, नौसैनिक कौशल और रणनीतिक गोपनीयता का परिणाम है।

इन पनडुब्बियों का संचालन Strategic Forces Command के अधीन होता है, जो परमाणु आयुधों के एकीकृत नियंत्रण और राजनीतिक-नागरिक पर्यवेक्षण को सुनिश्चित करता है।

इनका सामरिक आधार Project Varsha है—आंध्र प्रदेश में निर्मित एक अत्यधिक सुरक्षित भूमिगत नौसैनिक अड्डा, जिसे संभावित हमलों से संरक्षित रखने के लिए डिजाइन किया गया है।

यह संरचना इस बात का संकेत है कि भारत परमाणु शक्ति को केवल सैन्य क्षमता नहीं, बल्कि संस्थागत जिम्मेदारी के साथ जोड़कर देखता है।


अरिहंत से अरिधमन तक: क्षमता का क्रमिक विस्तार

INS अरिहंत: शुरुआत का मील का पत्थर

2016 में कमीशन हुई INS अरिहंत ने 2018 में अपनी पहली डिटरेंस गश्त पूरी की। यह वह क्षण था जब भारत ने औपचारिक रूप से अपनी परमाणु त्रयी को पूर्ण घोषित किया।

83 मेगावाट के कॉम्पैक्ट रिएक्टर, K-15 और K-4 जैसी पनडुब्बी-लॉन्च बैलिस्टिक मिसाइलों (SLBM) की क्षमता, तथा उन्नत सोनार प्रणाली ने इसे एक विश्वसनीय मंच बनाया।

INS अरिघात: परिष्कृत स्टील्थ

2024 में शामिल INS अरिघात, पहले संस्करण की तुलना में अधिक साइलेंट और उन्नत है। बेहतर ध्वनिक डिजाइन और सोनार तकनीक इसे दुश्मन की पनडुब्बी-रोधी प्रणालियों से बचने में सक्षम बनाती है।

यह केवल एक अतिरिक्त प्लेटफॉर्म नहीं, बल्कि निरंतर समुद्री गश्त (Continuous At-Sea Deterrence) की दिशा में कदम है।

INS अरिधमन (S4): विस्तारित प्रतिरोध

अरिधमन आकार और क्षमता दोनों में विस्तारित है। अधिक वर्टिकल लॉन्च ट्यूब, लंबी दूरी की संभावित K-5 मिसाइल क्षमता, और उन्नत साउंड-डैम्पनिंग तकनीक इसे भारत की समुद्री निरोध क्षमता का निर्णायक चरण बनाती है।


क्षेत्रीय परिप्रेक्ष्य: शक्ति संतुलन की अनिवार्यता

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती नौसैनिक उपस्थिति—विशेषकर उसकी जिन-क्लास SSBNs—और पाकिस्तान की उन्नत डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियाँ सामरिक समीकरण को जटिल बनाती हैं।

ऐसे परिदृश्य में भारत की SSBN क्षमता केवल सामरिक प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं, बल्कि संतुलन का साधन है।

परमाणु निरोध की प्रकृति प्रतिस्पर्धात्मक होती है; एक पक्ष की कमजोरी दूसरे को जोखिम लेने के लिए प्रेरित कर सकती है। अतः विश्वसनीय समुद्री निरोध, अस्थिरता को रोकने का माध्यम बन जाता है।


आलोचनात्मक विमर्श: लागत, पारदर्शिता और दायित्व

हालाँकि परमाणु पनडुब्बी कार्यक्रम राष्ट्रीय सुरक्षा का आधार है, परंतु इससे जुड़े प्रश्न भी प्रासंगिक हैं—

  • क्या इसकी दीर्घकालिक लागत रक्षा बजट पर असंतुलन पैदा करेगी?
  • क्या नागरिक-सैन्य पर्यवेक्षण पर्याप्त रूप से पारदर्शी है?
  • क्या क्षेत्रीय हथियार होड़ को इससे बढ़ावा मिलेगा?

इन प्रश्नों का उत्तर रणनीतिक परिपक्वता में निहित है। भारत की नीति आक्रामक विस्तारवाद की नहीं, बल्कि रक्षात्मक संतुलन की रही है।


निष्कर्ष: मौन शक्ति का दार्शनिक आयाम

परमाणु पनडुब्बियाँ शोर नहीं करतीं; वे मौन में संचालित होती हैं। किंतु उनका मौन ही उनकी सबसे बड़ी शक्ति है।

भारत की परमाणु पनडुब्बी त्रयी, केवल सैन्य तकनीक की उपलब्धि नहीं, बल्कि राजनीतिक संयम और रणनीतिक धैर्य का प्रतीक है।

हिंद महासागर की गहराइयों में गश्त करती ये पनडुब्बियाँ यह सुनिश्चित करती हैं कि भारत का “नो फर्स्ट यूज” केवल नैतिक घोषणा न रह जाए, बल्कि व्यवहारिक रूप से विश्वसनीय भी हो।

अंततः, यह शक्ति युद्ध को संभव बनाने के लिए नहीं, बल्कि उसे असंभव बनाने के लिए है—और यही परमाणु निरोध का वास्तविक उद्देश्य है।

With The Times of India Inputs 

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