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Rising Attacks on Hindu Minorities in Bangladesh: Global Silence and Human Rights Concerns

The Silent Genocide: Persecution of Hindus in Bangladesh and the Moral Failure of the Global Community In an age where conflicts in Gaza, Ukraine, and other flashpoints command the world’s attention, a quieter yet deeply disturbing humanitarian crisis continues to unfold next door to India — in Bangladesh. Since the political upheaval and resignation of Prime Minister Sheikh Hasina in August 2024, reports of violence against the Hindu minority have escalated dramatically. Killings, arson attacks, vandalism of temples, forced displacement, economic boycotts, and intimidation have become frighteningly frequent. According to figures cited by Indian authorities, more than 2,200 incidents of violence against Hindus were recorded in 2024 alone , with similar patterns continuing through 2025 and into 2026. Independent reports corroborate these trends: homes torched, idols desecrated, businesses looted, and families compelled to flee ancestral lands. Yet, despite the mounting evidence, the w...

Trump’s Tariff War and Global Order: How Trade Policies Ended Up Strengthening China

ट्रंप की टैरिफ नीति और वैश्विक शक्ति संतुलन: “चीन को और महान बनाने” का अनचाहा परिणाम

वर्ष 2025 की शुरुआत में यूरोपीय महाद्वीप की नजरों में रूस सबसे बड़ा खतरा नजर आ रहा था। यूक्रेन में जारी युद्ध, ऊर्जा आपूर्ति की अनिश्चितता और सुरक्षा संबंधी अस्थिरता ने पूरे क्षेत्र को अपनी गिरफ्त में जकड़ रखा था। लेकिन जैसे-जैसे वर्ष आगे बढ़ा, खतरे की यह धारणा धीरे-धीरे बदलने लगी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक व्यापार नीतियां, खासकर अपने पारंपरिक सहयोगी देशों पर लगाए गए भारी-भरकम टैरिफ, यूरोप और वैश्विक व्यवस्था के लिए कहीं अधिक गंभीर चुनौती के रूप में उभरीं। इन नीतियों का घोषित उद्देश्य अमेरिकी उद्योगों की रक्षा करना, घरेलू रोजगार को बढ़ावा देना और व्यापार घाटे को कम करना था। लेकिन इनका एक अनचाहा और विडंबनापूर्ण परिणाम सामने आया: जिस चीन को अलग-थलग करने की कोशिश की जा रही थी, वह वैश्विक अर्थव्यवस्था में और अधिक गहराई से एकीकृत होता चला गया। इसे विश्लेषक “चीन को और महान बनाने” का अनपेक्षित नतीजा कहते हैं।

ट्रंप की टैरिफ नीति का मूल आधार उनकी “अमेरिका फर्स्ट” विचारधारा में निहित था, जिसे उन्होंने अपने पहले कार्यकाल में ही आर्थिक क्षेत्र में सख्ती से लागू किया था। दूसरे कार्यकाल में यह और भी तीव्र हो गई। उन्होंने न केवल चीन पर बल्कि यूरोपीय संघ, कनाडा, मैक्सिको और जापान जैसे सहयोगी देशों पर भी व्यापक टैरिफ थोप दिए। चीन के खिलाफ तो उन्होंने एक पूर्ण व्यापार युद्ध छेड़ दिया, जिसमें तकनीकी उत्पादों से लेकर कृषि वस्तुओं तक सब कुछ शामिल था। इसके अलावा, विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) जैसी बहुपक्षीय संस्थाओं को कमजोर करने की कोशिश की गई, क्योंकि ट्रंप का मानना था कि मुक्त व्यापार की व्यवस्था ने अमेरिका को नुकसान पहुंचाया है और अन्य देश उसके बाजार का अनुचित लाभ उठा रहे हैं। टैरिफ को उन्होंने एक राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया—दबाव बनाने, सौदेबाजी करने और अपनी शर्तें मनवाने के लिए। लेकिन इस रणनीति की जड़ें गहरी थीं: यह अमेरिकी अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने का दावा तो करती थी, लेकिन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं की जटिलता को नजरअंदाज कर रही थी।

यदि 2025 की शुरुआत में रूस यूरोप की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा था, तो ट्रंप की नीतियों ने जल्द ही इस स्थान को हथिया लिया। यूरोपीय देश, जो दशकों से अमेरिका को अपना सबसे विश्वसनीय साझेदार मानते आए थे, अब खुद को आर्थिक और रणनीतिक अनिश्चितता के भंवर में फंसा पा रहे थे। ट्रंप द्वारा यूरोपीय संघ पर लगाए गए टैरिफ ने स्टील, ऑटोमोबाइल और अन्य उद्योगों को प्रभावित किया, जिससे यूरोप में महंगाई बढ़ी और आर्थिक विकास की गति सुस्त पड़ी। इससे भी बढ़कर, नाटो और ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में दरारें पड़नी शुरू हो गईं। ट्रंप ने व्यापार को सहयोग का माध्यम नहीं, बल्कि टकराव का साधन बना दिया। परिणामस्वरूप, यूरोपीय देशों को नए साझेदारों और वैकल्पिक बाजारों की तलाश में जुटना पड़ा। जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों ने अपनी विदेश नीति में बदलाव लाना शुरू किया, जहां अमेरिका पर निर्भरता कम करने पर जोर दिया गया।

ट्रंप की नीतियों का सबसे विडंबनापूर्ण पहलू चीन के संदर्भ में उभरा। उनका मुख्य लक्ष्य बीजिंग को वैश्विक अर्थव्यवस्था से अलग-थलग करना था, लेकिन हुआ इसका ठीक उलटा। जब अमेरिका ने अपने सहयोगियों पर टैरिफ लगाए, तो यूरोप और कई एशियाई देशों ने वैकल्पिक बाजारों की ओर रुख किया—और सबसे आकर्षक विकल्प चीन साबित हुआ। यूरोपीय कंपनियां, जैसे ऑटोमोबाइल दिग्गज, ने चीन में निवेश बढ़ाया और नए समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इसी तरह, एशियाई अर्थव्यवस्थाएं, जैसे दक्षिण कोरिया और वियतनाम, ने अमेरिकी दबाव से बचने के लिए चीन के साथ व्यापार संबंधों को मजबूत किया। ट्रंप की नीतियों ने चीन को प्रेरित किया कि वह अपनी वैश्विक पहुंच को विस्तार दे। बीजिंग ने एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में अपने व्यापार नेटवर्क को मजबूत किया, यूरोप के साथ आर्थिक साझेदारियां बढ़ाईं और क्षेत्रीय व्यापार समझौतों जैसे आरसीईपी (क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी) को आगे बढ़ाया। इससे चीन न केवल आत्मनिर्भर बना, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं का केंद्र बिंदु भी बन गया।

इसके विपरीत, अमेरिका को इन नीतियों से आत्म-क्षति पहुंची। कई स्वतंत्र अध्ययनों, जैसे अमेरिकी फेडरल रिजर्व और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के विश्लेषणों से स्पष्ट हुआ कि टैरिफ का बोझ अंततः अमेरिकी उपभोक्ताओं और कंपनियों पर ही पड़ा। आयातित वस्तुएं महंगी हुईं, महंगाई बढ़ी और उद्योगों की उत्पादन लागत में वृद्धि हुई। अमेरिकी किसान, जो चीन के बाजार पर निर्भर थे, बुरी तरह प्रभावित हुए। यानी जिस नीति से अमेरिका को मजबूत बनाना था, उसी ने उसकी अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डाला। इस प्रकार, ट्रंप की रणनीति ने चीन को कमजोर करने के बजाय उसे और अधिक रणनीतिक रूप से मजबूत बना दिया।

ट्रंप की टैरिफ नीति ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में गहरे बदलाव लाए। सबसे पहले, बहुपक्षवाद कमजोर हुआ। डब्ल्यूटीओ जैसी संस्थाओं की जगह द्विपक्षीय दबाव और सौदेबाजी ने ले ली, जिससे वैश्विक व्यापार नियमों की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे। दूसरे, अमेरिका के सहयोगियों में अविश्वास का भाव पनपा। वे अब वाशिंगटन को एक अनिश्चित और स्वार्थ-केंद्रित शक्ति के रूप में देखने लगे, जिसने उनके साथ संबंधों को आर्थिक हितों की भेंट चढ़ा दिया। तीसरे, चीन को रणनीतिक लाभ मिला। बीजिंग ने खुद को एक “स्थिर और भरोसेमंद” व्यापारिक भागीदार के रूप में प्रस्तुत किया, जिससे कई विकासशील और विकसित देशों ने उसे अमेरिका के विकल्प के रूप में अपनाना शुरू किया। इससे वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव आया, जहां बहुध्रुवीय दुनिया की रूपरेखा और स्पष्ट हो गई।

निष्कर्षतः, ट्रंप की टैरिफ नीति का उद्देश्य अमेरिका को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना और चीन को कमजोर करना था। लेकिन व्यवहार में इसने अमेरिका के सहयोगियों को उससे दूर किया, वैश्विक व्यापार व्यवस्था को अस्थिर बनाया और चीन को बाकी दुनिया के साथ और गहराई से जोड़ दिया। यही कारण है कि इसे “चीन को और महान बनाने” का अनचाहा परिणाम कहा जाता है। यह उदाहरण अंतरराष्ट्रीय राजनीति की उस सच्चाई को रेखांकित करता है कि आक्रामक और एकतरफा नीतियां अक्सर अपने घोषित लक्ष्यों के उलट परिणाम देती हैं। 21वीं सदी की वैश्विक व्यवस्था में शक्ति केवल टैरिफ और दबाव से नहीं, बल्कि सहयोग, विश्वास और संस्थागत ढांचे से निर्मित होती है। ट्रंप की नीति इस सच्चाई को नकारने की कोशिश थी—और उसी में उसकी सबसे बड़ी विफलता छिपी हुई है।

With The Indian Express Inputs 

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