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लोकसभा में नया सामाजिक अनुबंध: प्रतिनिधित्व, संघवाद और राजनीति का पुनर्संतुलन नई दिल्ली के सत्ता-गलियारों में आज जो कुछ घटित हो रहा है, वह केवल तीन विधेयकों की औपचारिक प्रस्तुति भर नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के स्वरूप में एक संभावित संरचनात्मक परिवर्तन का संकेत है। लोकसभा में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण को प्रभावी बनाने और सीटों के पुनर्विन्यास हेतु प्रस्तुत प्रस्ताव, प्रतिनिधित्व के प्रश्न को एक नए आयाम में स्थापित करते हैं—जहाँ न्याय, जनसंख्या, और संघीय संतुलन एक-दूसरे से टकराते भी हैं और पूरक भी बनते हैं। प्रतिनिधित्व का विस्तार या शक्ति का पुनर्वितरण? सरकार द्वारा प्रस्तावित सीटों का विस्तार—543 से बढ़ाकर संभावित 850—पहली दृष्टि में लोकतांत्रिक समावेशन की दिशा में एक प्रगतिशील कदम प्रतीत होता है। तर्क स्पष्ट है: यदि महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण लागू करना है, तो मौजूदा सीटों में कटौती किए बिना समग्र संख्या बढ़ाना अधिक न्यायसंगत होगा। परंतु यह विस्तार केवल संख्यात्मक नहीं है; यह सत्ता-संतुलन के पुनर्निर्धारण का माध्यम भी बन सकता है। परिसीमन की प्रक्रिया, जो जनसंख्या के आधार ...