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Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

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Trump-Xi Consensus on Strait of Hormuz Signals New Push for Global Energy Security

ऊर्जा सुरक्षा की साझा ज़मीन पर अमेरिका-चीन

दुनिया की राजनीति में ऐसे क्षण विरले ही आते हैं, जब प्रतिद्वंद्वी महाशक्तियाँ अपने मतभेदों से ऊपर उठकर किसी साझा वैश्विक हित पर एकमत दिखाई दें। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping के बीच ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ को खुला और सुरक्षित बनाए रखने पर बनी सहमति ऐसा ही एक संकेत है। यह केवल समुद्री मार्ग की सुरक्षा का प्रश्न नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की स्थिरता, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की दिशा से जुड़ा हुआ विषय है।

होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व ऊर्जा व्यापार की धुरी है। फारस की खाड़ी से निकलने वाला लगभग पाँचवाँ हिस्सा कच्चा तेल इसी संकरे समुद्री मार्ग से होकर अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुँचता है। सऊदी अरब, इराक, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देशों की अर्थव्यवस्था इस मार्ग पर निर्भर है। दूसरी ओर, चीन जैसा विशाल ऊर्जा आयातक देश तथा अमेरिका जैसी वैश्विक आर्थिक शक्ति भी इसकी स्थिरता से सीधे प्रभावित होते हैं। इसलिए इस मार्ग में किसी प्रकार की बाधा केवल क्षेत्रीय संकट नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक अस्थिरता का कारण बन सकती है।

हाल के वर्षों में पश्चिम एशिया लगातार तनाव का केंद्र बना रहा है। ईरान और पश्चिमी देशों के बीच टकराव, समुद्री जहाजों पर हमलों की घटनाएँ तथा क्षेत्रीय संघर्षों ने यह आशंका बार-बार उत्पन्न की है कि कहीं तेल आपूर्ति बाधित न हो जाए। ऐसी स्थिति में तेल की कीमतों में तेज उछाल आना लगभग निश्चित है, जिसका असर विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर सबसे अधिक पड़ता है। भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर राष्ट्रों के लिए यह स्थिति महँगाई, व्यापार घाटे और आर्थिक दबाव को बढ़ा सकती है।

इसी संदर्भ में अमेरिका और चीन का साझा बयान महत्वपूर्ण है। दोनों देशों के बीच व्यापार युद्ध, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक तनाव किसी से छिपे नहीं हैं। फिर भी ऊर्जा सुरक्षा पर उनका एक सुर में बोलना यह दर्शाता है कि कुछ मुद्दे ऐसे हैं जहाँ सहयोग प्रतिस्पर्धा से अधिक आवश्यक हो जाता है। यह वैश्विक राजनीति की व्यावहारिकता को भी रेखांकित करता है—जहाँ राष्ट्रीय हित अंततः वैचारिक मतभेदों पर भारी पड़ते हैं।

हालाँकि इस सहमति को अत्यधिक आशावाद के साथ देखने से बचना चाहिए। अमेरिका और चीन के बीच अविश्वास की खाई अभी भी गहरी है। समुद्री सुरक्षा के प्रश्न पर दोनों की रणनीतिक प्राथमिकताएँ अलग-अलग हैं। अमेरिका लंबे समय से पश्चिम एशिया में सैन्य उपस्थिति बनाए हुए है, जबकि चीन आर्थिक और कूटनीतिक प्रभाव बढ़ाने की नीति पर चलता रहा है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह सहमति केवल बयानबाज़ी तक सीमित रहती है या वास्तविक सहयोग का रूप लेती है।

भारत के लिए भी यह घटनाक्रम विशेष महत्व रखता है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आयात करता है। अतः होर्मुज जलडमरूमध्य में स्थिरता भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास दोनों के लिए आवश्यक है। नई दिल्ली को चाहिए कि वह क्षेत्रीय शांति और समुद्री सुरक्षा से जुड़े बहुपक्षीय प्रयासों में सक्रिय भूमिका निभाए तथा ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण की नीति को और तेज करे।

अंततः, यह सहमति इस व्यापक सत्य की याद दिलाती है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की परस्पर निर्भरता ने महाशक्तियों को भी सहयोग के लिए विवश किया है। प्रतिद्वंद्विता के इस युग में यदि अमेरिका और चीन ऊर्जा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर साझा जमीन तलाश सकते हैं, तो यह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिए सकारात्मक संकेत माना जाना चाहिए। दुनिया को आज प्रतिस्पर्धा से अधिक स्थिरता और संवाद की आवश्यकता है—और होर्मुज जलडमरूमध्य पर बनी यह सहमति उसी दिशा में एक छोटा किंतु महत्वपूर्ण कदम प्रतीत होती है।

With Reuters Inputs

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