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Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

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Social Media Content Removal in 1 Hour: India’s New Digital Regulation, Free Speech Concerns and Policy Impact

सोशल मीडिया कंटेंट हटाने की 1 घंटे की समयसीमा: डिजिटल सुरक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नियामक चुनौतियां

प्रस्तावना

डिजिटल युग में सूचना का प्रवाह जितना तेज हुआ है, उससे कहीं अधिक तेज़ी से उसके दुष्प्रभाव भी सामने आए हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने जहां लोकतांत्रिक विमर्श को व्यापक बनाया है, वहीं फेक न्यूज, डीपफेक, घृणास्पद भाषण और गैर-सहमति आधारित निजी सामग्री के प्रसार ने गंभीर सामाजिक, नैतिक और सुरक्षा संबंधी चुनौतियाँ उत्पन्न की हैं। ऐसे समय में केंद्र सरकार द्वारा सोशल मीडिया पर “अवैध सामग्री” हटाने की समयसीमा को घटाकर एक घंटे करने का प्रस्ताव डिजिटल शासन के नए चरण का संकेत देता है—जहां नियंत्रण और स्वतंत्रता के बीच संतुलन की परीक्षा होगी।


तेजी से बदलता डिजिटल परिदृश्य

भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या अब एक अरब के पार पहुंच चुकी है। सूचना का यह लोकतंत्रीकरण एक ओर नागरिकों को सशक्त बनाता है, तो दूसरी ओर इसे दुरुपयोग के लिए भी खुला छोड़ देता है। एक वायरल पोस्ट कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकती है और यदि वह भ्रामक या हानिकारक हो, तो उसका प्रभाव दीर्घकालिक और अपूरणीय हो सकता है।

इसी संदर्भ में सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी नियमों में संशोधन कर पहले 24-36 घंटे की समयसीमा को घटाकर 2-3 घंटे किया और अब इसे और कम करके एक घंटे करने पर विचार कर रही है। यह प्रस्ताव डिजिटल स्पेस में “तत्काल उत्तरदायित्व” (instant accountability) स्थापित करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।


सरकार का दृष्टिकोण: सुरक्षा सर्वोपरि

सरकार का तर्क स्पष्ट है—डिजिटल प्लेटफॉर्म अब केवल “माध्यम” नहीं रहे, बल्कि वे सूचना के सक्रिय नियंत्रक बन चुके हैं। ऐसे में उन्हें अपने प्लेटफॉर्म पर प्रसारित सामग्री के लिए अधिक जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।

इस प्रस्ताव के पीछे मुख्य उद्देश्य हैं:

  • महिलाओं और बच्चों को ऑनलाइन शोषण से बचाना
  • डीपफेक और फेक न्यूज के माध्यम से जनमत के दुरुपयोग को रोकना
  • राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था की रक्षा करना
  • डिजिटल स्पेस में उत्तरदायित्व और अनुशासन स्थापित करना

विशेष रूप से गैर-सहमति आधारित निजी सामग्री (NCII) के मामलों में त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता निर्विवाद है, जहां हर मिनट पीड़ित की गरिमा पर आघात करता है।


व्यावहारिकता की कसौटी पर एक घंटा

हालांकि उद्देश्य सराहनीय है, लेकिन एक घंटे की समयसीमा कई व्यावहारिक प्रश्न खड़े करती है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिदिन लाखों शिकायतें दर्ज होती हैं। ऐसे में प्रत्येक शिकायत की सत्यता, कानूनी वैधता और संदर्भ का आकलन करना अत्यंत जटिल प्रक्रिया है।

यदि निर्णय जल्दबाजी में लिए जाएंगे, तो प्लेटफॉर्म “ओवर-कम्प्लायंस” की ओर झुक सकते हैं—अर्थात् विवादास्पद सामग्री को हटाने में सावधानी के बजाय अत्यधिक सतर्कता बरतेंगे, जिससे वैध अभिव्यक्ति भी प्रभावित हो सकती है।


अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रभाव

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। यद्यपि यह स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है और “युक्तिसंगत प्रतिबंधों” के अधीन है, लेकिन एक घंटे जैसी सख्त समयसीमा इस स्वतंत्रता के व्यावहारिक प्रयोग को सीमित कर सकती है।

विशेष चिंता “अश्लीलता” की व्यापक और अस्पष्ट परिभाषा को लेकर है। यदि इसमें सामाजिक आलोचना, व्यंग्य या राजनीतिक टिप्पणी भी शामिल हो जाती है, तो यह लोकतांत्रिक विमर्श को बाधित कर सकता है। इतिहास साक्षी है कि अस्पष्ट कानूनी प्रावधानों का उपयोग अक्सर असहमति को दबाने के लिए किया गया है।


नवाचार और डिजिटल अर्थव्यवस्था पर असर

भारत का डिजिटल इकोसिस्टम केवल बड़े प्लेटफॉर्म्स तक सीमित नहीं है। स्टार्टअप्स और छोटे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एक घंटे की समयसीमा का अनुपालन करने के लिए अत्याधुनिक तकनीकी अवसंरचना, एआई मॉडरेशन और कानूनी विशेषज्ञता की आवश्यकता होगी—जो छोटे प्लेटफॉर्म्स के लिए अत्यंत महंगी और जटिल हो सकती है।

इससे नवाचार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और डिजिटल क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा सीमित हो सकती है।


न्यायिक प्रक्रिया और पारदर्शिता का प्रश्न

किसी भी सामग्री को हटाने का निर्णय केवल तकनीकी नहीं, बल्कि कानूनी और नैतिक भी होता है। यदि यह प्रक्रिया पारदर्शी और न्यायसंगत नहीं होगी, तो इससे मनमाने निर्णयों की आशंका बढ़ेगी।

यह आवश्यक है कि:

  • सामग्री हटाने के आदेशों की स्पष्ट प्रक्रिया हो
  • उपयोगकर्ताओं को अपील का अधिकार मिले
  • निर्णयों की समीक्षा के लिए स्वतंत्र तंत्र स्थापित किया जाए

आगे का रास्ता: संतुलित नियमन की आवश्यकता
डिजिटल नियमन का उद्देश्य केवल नियंत्रण नहीं, बल्कि संतुलन स्थापित करना होना चाहिए। एक प्रभावी ढांचे के लिए निम्नलिखित कदम महत्वपूर्ण हैं:

  1. स्पष्ट परिभाषाएं: “अवैध” और “अश्लील” सामग्री की सुस्पष्ट और संकीर्ण परिभाषा
  2. हितधारक परामर्श: उद्योग, नागरिक समाज और कानूनी विशेषज्ञों के साथ व्यापक चर्चा
  3. प्रौद्योगिकी समाधान: एआई और स्वचालित मॉडरेशन के साथ मानव समीक्षा का संतुलन
  4. पारदर्शिता और जवाबदेही: सभी निर्णयों का रिकॉर्ड और सार्वजनिक रिपोर्टिंग
  5. न्यायिक निगरानी: मनमाने आदेशों पर अंकुश के लिए स्वतंत्र समीक्षा तंत्र

निष्कर्ष

एक घंटे में सामग्री हटाने का प्रस्ताव डिजिटल शासन में सख्ती और तत्परता का प्रतीक है, लेकिन यह लोकतांत्रिक मूल्यों की कसौटी भी है। सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखना किसी भी लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है।

यदि यह नीति संतुलित, पारदर्शी और संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप लागू की जाती है, तो यह डिजिटल स्पेस को सुरक्षित और जिम्मेदार बना सकती है। अन्यथा, यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अनावश्यक अंकुश का कारण बन सकती है।

डिजिटल भारत का भविष्य केवल तकनीकी प्रगmति पर नहीं, बल्कि इस बात पर निर्भर करेगा कि हम स्वतंत्रता और नियंत्रण के बीच सही संतुलन कैसे स्थापित करते हैं।

With Indian Express Inputs


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