Skip to main content

MENU👈

Show more

Rising Attacks on Hindu Minorities in Bangladesh: Global Silence and Human Rights Concerns

The Silent Genocide: Persecution of Hindus in Bangladesh and the Moral Failure of the Global Community In an age where conflicts in Gaza, Ukraine, and other flashpoints command the world’s attention, a quieter yet deeply disturbing humanitarian crisis continues to unfold next door to India — in Bangladesh. Since the political upheaval and resignation of Prime Minister Sheikh Hasina in August 2024, reports of violence against the Hindu minority have escalated dramatically. Killings, arson attacks, vandalism of temples, forced displacement, economic boycotts, and intimidation have become frighteningly frequent. According to figures cited by Indian authorities, more than 2,200 incidents of violence against Hindus were recorded in 2024 alone , with similar patterns continuing through 2025 and into 2026. Independent reports corroborate these trends: homes torched, idols desecrated, businesses looted, and families compelled to flee ancestral lands. Yet, despite the mounting evidence, the w...

Hybrid Threats and State Sovereignty: Lessons from the Lithuania–Belarus Balloon Crisis

Hybrid Threats and State Sovereignty: Lithuania–Belarus Balloon Crisis as a Case Study in Contemporary Geopolitics

(A UPSC Essay-Style Analytical Article)

भूमिका: आधुनिक विश्व व्यवस्था में संप्रभुता की नई परीक्षा

21वीं सदी की अंतरराष्ट्रीय राजनीति ऐसे चरण में प्रवेश कर चुकी है जहाँ युद्ध और शांति की पारंपरिक सीमाएँ धुंधली हो रही हैं। संघर्ष अब केवल गोलाबारी, सैनिक जुटान या सीमा पार आक्रमण तक सीमित नहीं रहा; बल्कि राज्य अपने प्रतिद्वंद्वी को अस्थिर करने के लिए ऐसी रणनीतियों का उपयोग कर रहे हैं जो दिखने में तो असैन्य और मामूली जान पड़ती हैं, परंतु उनके प्रभाव व्यापक, दीर्घकालिक और रणनीतिक होते हैं। इन्हें ही आधुनिक सुरक्षा साहित्य में हाइब्रिड थ्रेट्स कहा जाता है।

यूरोप के बाल्टिक क्षेत्र में 2025 में लिथुआनिया द्वारा घोषित राष्ट्रीय आपातकाल—बेलारूस से आने वाले स्मगलिंग गुब्बारों के कारण—इसी हाइब्रिड युद्ध की एक शिक्षाप्रद मिसाल है। यह प्रकरण दर्शाता है कि संप्रभुता पर आघात हमेशा बमों और मिसाइलों से नहीं होता; कई बार एक साधारण गुब्बारा भी राष्ट्र की सुरक्षा संरचना को चुनौती दे सकता है।


1. हाइब्रिड वारफेयर: सिद्धांत और व्यवहार का संगम

हाइब्रिड युद्ध की अवधारणा अमेरिकी विश्लेषक फ्रैंक हॉफमैन द्वारा दी गई थी, जिसके अनुसार आधुनिक संघर्ष में—
“सैन्य, असैन्य, साइबर, सूचना, आपराधिक और राजनीतिक उपकरणों का सम्मिलित प्रयोग किया जाता है।”
इस ढाँचे में राज्य सीधे संघर्ष से बचते हुए अपने प्रतिद्वंद्वी को उस सीमा तक परेशान करते हैं जहाँ प्रतिक्रिया देना कठिन हो जाए, परंतु परिणाम उनकी रणनीतिक ऊर्जा को क्षीण कर दें।

बेलारूस द्वारा तस्करी गुब्बारों का इस्तेमाल इसी सिद्धांत पर आधारित है—

  • कम लागत
  • कम जोखिम
  • अधिकतम डिसरप्शन
  • राजनयिक अस्पष्टता
  • जवाबी कार्रवाई की दुविधा

अर्थात्, रणनीतिक लाभ, मगर पारंपरिक युद्ध की कीमत के बिना।


2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: बाल्टिक क्षेत्र में तनाव की जड़ें

लिथुआनिया, लातविया और एस्टोनिया जैसे बाल्टिक देश रूस और बेलारूस की निकटता के कारण लगातार हाइब्रिड दबाव में रहे हैं।

(क) 2021 का प्रवासन संकट

यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों के बाद बेलारूस ने हजारों प्रवासियों को लिथुआनिया की ओर धकेला—एक स्पष्ट दवाब की रणनीति।
इससे

  • संसाधनों पर बोझ बढ़ा
  • घरेलू राजनीतिक विवाद उत्पन्न हुए
  • सीमा सुरक्षा ढाँचा चरमरा गया

(ख) रूस–यूक्रेन युद्ध (2022) और बाल्टिक असुरक्षा

लिथुआनिया ने रूस पर कठोर रुख अपनाया तथा यूक्रेन को सैन्य सहयोग दिया, जिससे बेलारूस–रूस गठबंधन की ओर से उकसावे बढ़े।

(ग) 2025: गुब्बारा उल्लंघन और आपातकाल

2025 में हजारों गुब्बारे सुबह की हवा के साथ बेलारूस से लिथुआनिया में प्रवेश करने लगे।
इनमें प्रायः अवैध सिगरेट, छोटे गैजेट, व कभी-कभी संदिग्ध पेलोड होने की आशंका थी।
इसके परिणामस्वरूप—

  • विलनियुस अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट कई बार बंद करना पड़ा
  • वायु यातायात बाधित हुआ
  • सुरक्षा एजेंसियों की संसाधन-क्षमता पर भारी दबाव पड़ा

लिथुआनिया ने इसे मात्र तस्करी नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर हमला करार दिया।


3. यह केवल तस्करी क्यों नहीं—बल्कि संप्रभुता पर हमला है?

(1) वायु-क्षेत्र उल्लंघन

किसी भी देश का वायु-क्षेत्र उसकी संप्रभुता का अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है।
यदि गुब्बारे आसानी से प्रवेश कर सकते हैं, तो

  • ड्रोन
  • निगरानी उपकरण
  • खतरनाक पेलोड
    भी भेजे जा सकते हैं।
    यह जोखिम इसलिए बड़ा है क्योंकि गुब्बारे रडार सिस्टम पर कम दृश्यता रखते हैं।

(2) नागरिक उड्डयन की सुरक्षा

हवाई अड्डे का बंद होना न केवल आर्थिक बल्कि सामरिक नुकसान है।
कई हादसे ऐसे “अज्ञात वस्तुओं” के कारण संभावित रूप से हो सकते हैं।

(3) तस्करी व राजनैतिक संकेत

बेलारूस में अवैध सिगरेट उद्योग राजनीतिक संरक्षण में पनपा है।
राज्य की मौन सहमति इसे हाइब्रिड प्रायोजित अपराध का रूप देती है।

(4) NATO की प्रतिक्रिया-क्षमता की परीक्षा

बिना गोली चलाए, बेलारूस ने NATO सदस्य देश को कमजोर दिखाने का प्रयास किया।
यह “costless coercion” की रणनीति है।


4. लिथुआनिया की प्रतिक्रिया: आपातकाल और सैन्य-सहयोग का निर्णय

(क) आपातकाल की घोषणा

सरकार ने आपातकाल घोषित करते हुए कहा कि यह कदम

  • वायु सुरक्षा
  • नागरिक सुरक्षा
  • राज्य संस्थाओं की विश्वसनीयता

को बचाने के लिए आवश्यक है।

(ख) सैन्य को विशेष शक्तियाँ

संसद से मांगे गए अधिकारों में शामिल हैं—

  • प्रतिबंधित क्षेत्रों में नागरिक गतिशीलता सीमित करना
  • तलाशी व रोक-टोक
  • संदिग्धों को रोकना
  • आवश्यक बल का नियंत्रित उपयोग

इन अधिकारों की अवधि सीमित है तथा उन पर संसदीय निगरानी भी होगी, जिससे लोकतांत्रिक संतुलन बना रहता है।

(ग) अंतरराष्ट्रीय समर्थन

EU ने इसे “हाइब्रिड अटैक” कहा, जिससे यह मामला यूरोपीय सामूहिक सुरक्षा के दायरे में आ गया।
इससे

  • आर्थिक सहायता
  • निगरानी तकनीक
  • सुरक्षा सहयोग
    की संभावना बढ़ जाती है।

5. वैश्विक एवं क्षेत्रीय निहितार्थ

1. हाइब्रिड युद्ध का नया मोड: ‘Low-Cost, High-Impact’

गुब्बारे जैसे सस्ते प्लेटफॉर्म से भी

  • राज्य-व्यवस्था बाधित की जा सकती है
  • अंतरराष्ट्रीय उड़ानें प्रभावित हो सकती हैं
  • राजनीतिक विवाद गहराया जा सकता है

यह भविष्य के युद्धों की दिशा को पुनर्परिभाषित करता है।

2. यूरोपीय सुरक्षा ढांचे की कमजोरी उजागर

यह प्रकरण बताता है कि

  • सीमा सुरक्षा
  • वायु रक्षा
  • हाइब्रिड प्रतिक्रिया प्रणाली

अभी भी पूर्णतः तैयार नहीं हैं।

3. NATO को ‘Grey-Zone Strategy’ तैयार करनी होगी

सैन्य गठबंधन पारंपरिक युद्ध के लिए बना था।
अब उसे—

  • साइबर रक्षा
  • दुष्प्रचार-रोधी तंत्र
  • आर्थिक प्रतिबंध-समन्वय
  • गैर-परंपरागत खतरों पर जवाबी रणनीति

अपनानी होगी।

4. भारत के लिए भी सीख

भारत को भी पाकिस्तान व चीन के माध्यम से—

  • ड्रोन ड्रॉप
  • साइबर हमले
  • प्रवासन दबाव
  • सूचना युद्ध

जैसे अनेक हाइब्रिड खतरों का सामना करना पड़ता है।
लिथुआनिया का मॉडल,
“सिविल–मिलिट्री इंटीग्रेटेड हाइब्रिड रेस्पॉन्स”,
भारत के लिए उपयोगी संदर्भ बन सकता है।


6. आगे की राह: नीति- सुझाव

(1) तकनीकी आधुनिकीकरण

  • AI आधारित रडार
  • एंटी-बैलून लेज़र तकनीक
  • सीमा पर हाइब्रिड निगरानी केंद्र
  • ड्रोन–डोम जैसी संरचना

(2) क्षेत्रीय सहयोग

लातविया, पोलैंड व एस्टोनिया के साथ संयुक्त
“Baltic Hybrid Security Pact”
बनाया जा सकता है।

(3) हाइब्रिड खतरों की अंतरराष्ट्रीय परिभाषा

संयुक्त राष्ट्र स्तर पर ऐसे खतरों की श्रेणीकरण, दण्ड, और सामूहिक प्रतिक्रिया की रूपरेखा बनाई जानी चाहिए।

(4) पारदर्शिता और जनविश्वास

आपातकाल जैसे उपाय तभी सफल होते हैं जब नागरिकों का विश्वास कायम रहे।
नियमित

  • ब्रीफिंग
  • स्वतंत्र निगरानी
  • मानवाधिकार संतुलन

आवश्यक है।


निष्कर्ष: 21वीं सदी का युद्ध—जहाँ एक गुब्बारा भी रणनीतिक हथियार बन सकता है

लिथुआनिया–बेलारूस गुब्बारा संकट हमें यह सिखाता है कि आधुनिक संप्रभुता की परीक्षा केवल युद्धक्षेत्रों में नहीं होती।
हाइब्रिड युद्ध की प्रकृति यह है कि वह समाज के सबसे कमजोर बिंदुओं—सीमा, सूचना, राजनीति, अर्थव्यवस्था—का संयोजित शोषण करता है।

लिथुआनिया ने जिस दृढ़ता और संवैधानिक प्रक्रिया के साथ प्रतिक्रिया दी, वह यह दर्शाता है कि लोकतांत्रिक राष्ट्र हाइब्रिड खतरों के सामने असहाय नहीं हैं। बल्कि वे अनुकूलनशील, संगठित और सामूहिक जिम्मेदारी के साथ अपने हितों की रक्षा कर सकते हैं।

यह घटना एक व्यापक संदेश देती है—
“भविष्य का संघर्ष उन साधनों से लड़ा जाएगा जिन्हें हम आज गैर-गंभीर या मामूली समझते हैं। संप्रभुता की रक्षा अब केवल सीमाओं पर नहीं बल्कि हर उस मोर्चे पर होगी जहाँ राज्य को कमजोर करने का अवसर उपलब्ध हो सकता है।”

आधुनिक भू-राजनीति का यही सत्य है, और इसी को समझकर 21वीं सदी की सुरक्षा रणनीतियाँ गढ़नी होंगी।


With Reuters Inputs 

Comments

Advertisement

POPULAR POSTS

16th Finance Commission 2026–31: Continuity, Reforms and the Future of India’s Federal Fiscal Framework

16वाँ वित्त आयोग: संघीय वित्तीय ढाँचे में निरंतरता और सुधार की नई दिशा भूमिका भारतीय संघीय व्यवस्था में वित्त आयोग एक केंद्रीय संवैधानिक संस्था है, जो केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों के न्यायसंगत वितरण को सुनिश्चित करती है। संविधान के अनुच्छेद 280 के अंतर्गत गठित 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट (2026–27 से 2030–31) ऐसे समय में प्रस्तुत की गई है, जब भारत महामारी के बाद की आर्थिक पुनर्बहाली, जलवायु परिवर्तन, तीव्र शहरीकरण और बढ़ते राजकोषीय दबावों जैसी बहुआयामी चुनौतियों का सामना कर रहा है। डॉ. अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता में गठित इस आयोग ने केवल वित्तीय हस्तांतरण तक स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि दक्षता, उत्तरदायित्व और सतत विकास को संघीय वित्त व्यवस्था के मूल स्तंभ के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है। यह रिपोर्ट पूर्ववर्ती आयोगों की निरंतरता बनाए रखते हुए कुछ नवीन तत्वों को शामिल करती है, जो भारतीय संघवाद को अधिक परिणामोन्मुख बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। कर हस्तांतरण में स्थिरता: ऊर्ध्वाधर वितरण 16वें वित्त आयोग ने केंद्रीय करों के विभाज्य पूल में राज्यो...

Why India Needs a Shadow Cabinet: Strengthening the Role of Opposition in a Modern Democracy

वर्तमान में भारत में विपक्ष की आवाज़ को सशक्त बनाने हेतु छाया मंत्रिमंडल की आवश्यकता एक समग्र अकादमिक विश्लेषण परिचय लोकतंत्र की आत्मा सत्ता और विपक्ष के बीच संतुलन में निहित होती है। जहां सत्तारूढ़ दल शासन, नीति-निर्माण और प्रशासन का दायित्व निभाता है, वहीं विपक्ष का कार्य केवल विरोध करना नहीं, बल्कि सरकार की नीतियों की समीक्षा, आलोचना और वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना होता है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में विपक्ष ‘नकारात्मक शक्ति’ नहीं, बल्कि रचनात्मक नियंत्रक (Constructive Watchdog) की भूमिका निभाता है। भारत, जो स्वयं को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र घोषित करता है, आज एक ऐसे राजनीतिक चरण से गुजर रहा है जहाँ विपक्ष की भूमिका कमजोर, बिखरी हुई और प्रतिक्रियात्मक दिखाई देती है। संसद के भीतर विमर्श का स्तर गिरा है और नीति-आलोचना प्रायः नारेबाज़ी या वॉकआउट तक सीमित रह जाती है। ऐसे परिदृश्य में छाया मंत्रिमंडल (Shadow Cabinet) की अवधारणा भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष की आवाज़ को संस्थागत, संगठित और प्रभावी बनाने का एक महत्वपूर्ण साधन बन सकती है। यह लेख भारत में छाया मंत्रिमंडल की आवश्यकता, उसके संभा...

India–US Trade Deal 2026: Strategic Shift, Tariff Cuts, Energy Realignment and Geopolitical Implications

भारत–अमेरिका व्यापार समझौता 2026: रणनीतिक मोड़, आर्थिक अवसर और भू-राजनीतिक निहितार्थ परिचय वैश्विक अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल के इस दौर में, जहां व्यापार युद्ध, ऊर्जा संकट और महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा प्रमुख मुद्दे बने हुए हैं, भारत और अमेरिका के बीच फरवरी 2026 में घोषित व्यापार समझौता एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुए उच्च-स्तरीय संवाद के परिणामस्वरूप यह समझौता न केवल द्विपक्षीय व्यापार संबंधों को मजबूत करता है, बल्कि वैश्विक रणनीतिक संतुलन को भी प्रभावित करता है। इस समझौते के केंद्र में भारतीय निर्यात पर लगे अमेरिकी टैरिफ में भारी कटौती और रूसी तेल आयात से जुड़ी शर्तें हैं, जो पिछले एक साल से चले आ रहे तनाव को समाप्त करती हैं। यह लेख समझौते की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, उसके प्रमुख प्रावधानों, आर्थिक लाभों व जोखिमों, तथा भू-राजनीतिक प्रभावों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह समझौता न केवल आर्थिक अवसरों का द्वार खोलता है, बल्कि भारत की बहुध्रुवीय कूटनीति को भी नई दिशा देता है। पृष्ठभूमि: तनाव से सम...

Western Alliance Cracks and the Rise of a Multipolar World Order

पश्चिमी गठबंधन में उभरती दरारें: बहुध्रुवीय विश्व की ओर संकेत ट्रांस-अटलांटिक गठबंधन, जो शीत युद्ध के बाद वैश्विक स्थिरता का प्रतीक रहा है, आज अपनी आंतरिक असंगतियों से जूझ रहा है। अमेरिका और यूरोप के बीच बढ़ते मतभेद न केवल रणनीतिक प्राथमिकताओं में फर्क दिखाते हैं, बल्कि एक नई बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के उभरने का स्पष्ट संकेत भी देते हैं। जहां अमेरिका अपनी "अमेरिका फर्स्ट" नीति के तहत इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की चुनौती पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, वहीं यूरोप अपनी रणनीतिक स्वायत्तता हासिल करने की कोशिश में लगा है। ये दरारें महज नीतिगत असहमतियां नहीं हैं, बल्कि गहरे भू-राजनीतिक परिवर्तनों की अभिव्यक्ति हैं, जो पश्चिमी एकता के पारंपरिक मिथक को तोड़ रही हैं। 2025-2026 में ट्रंप प्रशासन की नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (NSS) ने इन मतभेदों को और गहरा किया है, जिसमें यूरोप को "सभ्यता के विलोपन" का खतरा बताया गया है। अमेरिकी एकतरफावाद इस संकट का मूल कारण है। डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में "अमेरिका फर्स्ट 2.0" नीति ने यूरोप पर दबाव बढ़ा दिया है। NATO में बो...

Union Budget 2026-27: Fiscal Stability, Structural Reforms and Inclusive Growth Strategy

केंद्रीय बजट 2026-27: स्थिरता, सुधार और समावेशी विकास की दिशा में एक संतुलित कदम 1 फरवरी 2026 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा संसद में प्रस्तुत केंद्रीय बजट 2026–27 केवल एक वार्षिक वित्तीय दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह उस नीति-निरंतरता का प्रमाण है जिसके माध्यम से भारत वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में भी आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा है। यह बजट इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि यह उनका लगातार नौवाँ बजट है और ‘कर्तव्य भवन’ में तैयार किया गया पहला बजट भी—जो शासन की नई कार्य-संस्कृति और संस्थागत संक्रमण का प्रतीक है। बजट का केंद्रीय दर्शन तीन परस्पर जुड़े उद्देश्यों पर आधारित दिखाई देता है—आर्थिक विकास की गति को बनाए रखना, मानव क्षमता का सशक्तिकरण, और “सबका साथ, सबका विकास” के सिद्धांत के अनुरूप समावेशी अवसरों का विस्तार। यह दर्शन किसी तात्कालिक राजनीतिक लाभ से अधिक, दीर्घकालिक आर्थिक सोच को प्रतिबिंबित करता है। राजकोषीय अनुशासन: विश्वास और स्थिरता की नींव बजट 2026–27 का सबसे मजबूत पक्ष उसका राजकोषीय संतुलन है। सरकार ने राजकोषीय घाटे को GDP के 4.3 प्रतिशत तक सीमित रखने ...

Iran–US Nuclear Talks in Oman 2026: Diplomacy, Deadlock and the Risk of Middle East Conflict

ओमान में ईरान–अमेरिका परमाणु वार्ता: कूटनीति की सतर्क शुरुआत मध्य पूर्व की भू-राजनीति में स्थिरता एक दुर्लभ अतिथि रही है, किंतु ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दे जब सामने आते हैं, तो क्षेत्रीय अस्थिरता वैश्विक स्तर पर चिंता का विषय बन जाती है। 6 फरवरी 2026 को ओमान की राजधानी मस्कट में ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच अप्रत्यक्ष उच्च-स्तरीय वार्ता का आयोजन इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। यह वार्ता महज द्विपक्षीय संवाद नहीं थी, अपितु यह परीक्षा थी कि क्या गहन अविश्वास और हाल के सैन्य टकरावों के बावजूद कूटनीति अभी भी प्रभावी विकल्प बनी हुई है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने वार्ता को “एक अच्छी शुरुआत” और “सकारात्मक” करार दिया, जबकि दोनों पक्षों ने आगे बातचीत जारी रखने पर सहमति जताई। यह पहली ऐसी गंभीर कूटनीतिक पहल थी, जो 2025 में इजरायल-ईरान के बीच हुए 12-दिवसीय संघर्ष और अमेरिकी हमलों के बाद हुई। उस संघर्ष ने परमाणु स्थलों पर हमलों को जन्म दिया और क्षेत्र को युद्ध की कगार पर ला खड़ा किया था। ऐसे में मस्कट वार्ता ने संवाद की प्रक्रिया को पुनर्जीवित करने का संकेत दिया, यद्यप...

Trump’s Claim on India Oil Deal: Energy Geopolitics, Russia Sanctions and India’s Strategic Autonomy

ट्रंप का भारत के साथ व्यापार समझौते का दावा: ऊर्जा भू-राजनीति, दबाव कूटनीति और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता (भारत सरकार की पुष्टि के पूर्व लिखा गया यह लेख) प्रस्तावना फरवरी 2026 की शुरुआत में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह दावा कि भारत ने एक व्यापार समझौते के तहत रूसी तेल की खरीद बंद करने और इसके स्थान पर अमेरिका तथा संभावित रूप से वेनेजुएला से अधिक तेल आयात करने पर सहमति जताई है, केवल एक द्विपक्षीय बयान भर नहीं है। यह दावा वैश्विक ऊर्जा राजनीति, प्रतिबंध-आधारित कूटनीति और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता से जुड़े कई जटिल प्रश्नों को एक साथ सामने लाता है। विशेष रूप से तब, जब इस कथित समझौते की न तो भारत के विदेश मंत्रालय ने पुष्टि की है और न ही पेट्रोलियम मंत्रालय ने। यह स्थिति एक बार फिर उस अंतर को उजागर करती है, जो अमेरिकी राजनीतिक वक्तव्यों और संस्थागत वास्तविकताओं के बीच अक्सर देखा जाता है। साथ ही, यह प्रश्न भी खड़ा होता है कि क्या ऊर्जा व्यापार अब विशुद्ध आर्थिक निर्णय नहीं रह गया है, बल्कि एक शक्तिशाली भू-राजनीतिक हथियार बन चुका है। एकतरफा दावा और कूटनीतिक चुप्पी ट्रंप ने पत...

India Energy Week 2026 Goa: Trump’s Absence, Energy Diplomacy and the Rise of a New Multipolar World Order

ट्रंप के बाद की दुनिया: गोवा में उभरी बहुध्रुवीय ऊर्जा राजनीति भारत एनर्जी वीक (IEW) 2026, जो गोवा के ONGC एडवांस्ड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में 27 से 30 जनवरी तक आयोजित हुआ, मात्र एक ऊर्जा सम्मेलन नहीं रहा। यह वैश्विक व्यवस्था में गहन बदलाव का जीवंत साक्ष्य बन गया, जहां अमेरिका-केंद्रित एकध्रुवीय ढांचे की जगह बहुध्रुवीय वास्तविकता ने मजबूती से पकड़ बनानी शुरू कर दी। इस मंच पर ऊर्जा केवल ईंधन या बिजली का स्रोत नहीं रही, बल्कि भू-राजनीतिक शक्ति-संतुलन का प्रमुख माध्यम बनी। सम्मेलन की शुरुआत से ही चर्चाएं ऊर्जा संक्रमण से आगे बढ़कर वैश्विक व्यवस्था के पुनर्गठन पर केंद्रित हो गईं। कनाडा के ऊर्जा मंत्री टिम हॉजसन ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आज की दुनिया में जो हो रहा है, वह "कोई धीमा आर्थिक संक्रमण नहीं, बल्कि एक बड़ा विद्रूप (rupture)" है। यह टिप्पणी डावोस में कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के उस बयान की गूंज थी, जिसमें उन्होंने postwar अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की "मृत्यु" की घोषणा की थी। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका की "अमेरिका फर्स्ट" नीतियां—टैरिफ को रण...

Pariksha Pe Charcha 2026: PM Modi’s Motivational Message for Students on Exams, Skills, Balance & Success

परीक्षा पे चर्चा 2026: परीक्षा से आगे जीवन की तैयारी का राष्ट्रीय संवाद परीक्षा का समय आते ही देश के करोड़ों छात्रों के मन में एक ही सवाल गूंजने लगता है— क्या मैं सफल हो पाऊँगा? इसी प्रश्न, इसी तनाव और इसी अनिश्चितता को संवाद और आत्मविश्वास में बदलने का मंच है ‘परीक्षा पे चर्चा’ । 6 फरवरी 2026 को आयोजित परीक्षा पे चर्चा के 9वें संस्करण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशभर के छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों से सीधी बातचीत की। सुबह 10 बजे शुरू हुए इस कार्यक्रम में दिल्ली, गुजरात के देवमोगरा, तमिलनाडु के कोयंबटूर, छत्तीसगढ़ के रायपुर और असम के गुवाहाटी से जुड़े छात्रों ने भाग लिया। कार्यक्रम का लाइव प्रसारण दूरदर्शन, पीएम मोदी के यूट्यूब चैनल और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर किया गया। इस बार 4.5 करोड़ से अधिक रजिस्ट्रेशन होना यह दर्शाता है कि आज का छात्र केवल परीक्षा टिप्स नहीं, बल्कि जीवन मार्गदर्शन चाहता है। 🌱 सपने देखें, लेकिन एक्शन के साथ प्रधानमंत्री मोदी का संदेश बेहद स्पष्ट और प्रेरक था— “सपने न देखना जुर्म है, लेकिन सिर्फ सपनों की गुनगुनाहट से काम नहीं चलता।” उन्हों...

Current Affairs in Hindi : 12 April 2025

 समसामयिकी लेख संकलन : 12 अप्रैल 2025 1-भारत में EVMs की सुरक्षा और विश्वसनीयता पर चुनाव आयोग का स्पष्टीकरण हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रीय खुफिया निदेशक तुलसी गैब्बार्ड द्वारा इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग सिस्टम्स की हैकिंग की संभावनाओं को लेकर उठाए गए सवालों के बाद भारत के चुनाव आयोग (Election Commission of India) ने स्पष्ट किया है कि भारत में प्रयुक्त Electronic Voting Machines (EVMs) पूरी तरह से सुरक्षित हैं और इनमें किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ संभव नहीं है। चुनाव आयोग के सूत्रों के अनुसार, कई देश ऐसे इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग सिस्टम्स का उपयोग करते हैं जिनमें इंटरनेट, प्राइवेट नेटवर्क, विभिन्न मशीनें और प्रक्रियाओं का मिश्रण होता है। ऐसे सिस्टम्स को बाहरी नेटवर्क से जोड़े जाने के कारण साइबर हमलों की संभावना बढ़ जाती है। इसके विपरीत, भारत में इस्तेमाल होने वाली EVMs एकदम सरल, सही और सटीक ‘कैलकुलेटर’ की तरह कार्य करती हैं। भारत की EVMs को न तो इंटरनेट, न वाई-फाई और न ही इंफ्रारेड से जोड़ा जा सकता है। ये पूरी तरह से stand-alone यानी स्वतंत्र रूप से काम करने वाली मशीनें हैं, जिनमें बाहरी हस्तक्षेप क...