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Rising Attacks on Hindu Minorities in Bangladesh: Global Silence and Human Rights Concerns

The Silent Genocide: Persecution of Hindus in Bangladesh and the Moral Failure of the Global Community In an age where conflicts in Gaza, Ukraine, and other flashpoints command the world’s attention, a quieter yet deeply disturbing humanitarian crisis continues to unfold next door to India — in Bangladesh. Since the political upheaval and resignation of Prime Minister Sheikh Hasina in August 2024, reports of violence against the Hindu minority have escalated dramatically. Killings, arson attacks, vandalism of temples, forced displacement, economic boycotts, and intimidation have become frighteningly frequent. According to figures cited by Indian authorities, more than 2,200 incidents of violence against Hindus were recorded in 2024 alone , with similar patterns continuing through 2025 and into 2026. Independent reports corroborate these trends: homes torched, idols desecrated, businesses looted, and families compelled to flee ancestral lands. Yet, despite the mounting evidence, the w...

Revival of the Monroe Doctrine: Trump’s 2025 National Security Strategy and a Reordered Global Power Map

ट्रम्प प्रशासन की 2025 की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति: मॉनरो सिद्धांत का पुनर्जागरण और अमेरिकी वैशिक प्राथमिकताओं का पुनर्गठन

भूमिका: एक वैचारिक वक्र—19वीं सदी की वापसी, 21वीं सदी की चुनौतियाँ

दिसंबर 2025 में जारी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (National Security Strategy—NSS) अमेरिकी विदेश नीति में एक निर्णायक मोड़ का संकेत देती है। यह दस्तावेज़ केवल रणनीतिक प्राथमिकताओं का सूचक नहीं, बल्कि अमेरिकी विदेश नीति के दीर्घकालिक वैचारिक रूपांतरण का घोषणापत्र है। इस रणनीति में 1823 के मॉनरो सिद्धांत को औपचारिक रूप से पुनर्जीवित करने की घोषणा की गई है—एक ऐसा सिद्धांत जिसने लगभग दो शताब्दियों तक अमेरिकी महाद्वीप को वाशिंगटन के "विशेष प्रभाव क्षेत्र" के रूप में परिभाषित किया था।

नई NSS स्वयं को “लचीला यथार्थवाद (Flexible Realism)” की संज्ञा देती है और अमेरिका की वैश्विक प्राथमिकताओं के क्रम को तीन स्तरों में ढालती है—

  1. पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी वर्चस्व की पुनर्स्थापना,
  2. हिंद-प्रशांत में सैन्य उपस्थिति व गठबंधनों का विस्तार,
  3. यूरोप के साथ संबंधों का कठोर पुनर्मूल्यांकन।

यह पुनर्गठन न केवल शीत युद्धोत्तर वैश्विक व्यवस्था को चुनौती देता है, बल्कि अमेरिकी गठबंधन-संरचना की मूलभूत धुरी को भी पुनर्परिभाषित करता है।


मॉनरो सिद्धांत का 21वीं सदी संस्करण: लैटिन अमेरिका में चीन–रूस को कड़ी चुनौती

1823 का मूल मॉनरो सिद्धांत यूरोपीय साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं के विरुद्ध अमेरिका की भू-राजनीतिक ढाल के रूप में उभरा था। किंतु 2025 की NSS इसे एक नए संदर्भ में प्रस्तुत करती है—अब यह सिद्धांत यूरोप नहीं, बल्कि चीन और रूस को संबोधित है।

नए संस्करण के तीन प्रमुख आयाम

  1. लैटिन अमेरिकी देशों में चीन की आर्थिक-सामरिक घुसपैठ पर रोक

    • बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के माध्यम से बीजिंग की बढ़ती उपस्थिति—विशेषकर पनामा, ब्राज़ील, अर्जेंटीना और पेरू जैसे देशों में—अमेरिका के लिए चुनौती मानी गई है।
  2. रूस की सैन्य-सुरक्षा साझेदारियों पर सख्त निगरानी

    • वेनेजुएला व निकारागुआ में रूसी सैन्य सहायताओं और सूचना-युद्ध क्षमताओं को “अमेरिकी सुरक्षा के लिए प्राथमिक खतरा” करार दिया गया है।
  3. पश्चिमी गोलार्ध को ‘अमेरिकी विशेषाधिकार क्षेत्र’ घोषित करना

    • 1990 के बाद पहली बार लैटिन अमेरिका को वैश्विक रणनीति के केंद्र में रखा गया है, जो संकेत देता है कि अमेरिका अब अपने “बैकयार्ड” को किसी बाहरी शक्ति के लिए खुला नहीं छोड़ेगा।

इस प्रकार 2025 की NSS एक स्पष्ट संदेश देती है—पश्चिमी गोलार्ध में शक्ति-संतुलन की निर्णायक पुनर्स्थापना अमेरिका का सर्वोच्च लक्ष्य होगा।


यूरोप पर तीखी टिप्पणी: “सभ्यतामूलक विलुप्ति” और नाटो की भविष्यगत अनिश्चितता

नई NSS में यूरोप के संदर्भ में उपयोग की गई भाषा शायद आधुनिक अमेरिकी नीति दस्तावेजों में सबसे कठोर मानी जा सकती है। पहली बार किसी NSS में यह कहा गया है कि यूरोप “सभ्यतामूलक विलुप्ति (civilizational erasure)” के खतरे का सामना कर रहा है।

अमेरिका की यूरोप संबंधी प्रमुख चिंताएँ

  • अत्यधिक प्रवास और सामाजिक-सांस्कृतिक तनाव,
  • जन्म-दर में गिरावट और जनसांख्यिकीय असंतुलन,
  • रक्षा व्यय में अनिच्छा—विशेषकर जर्मनी, स्पेन, इटली में,
  • रणनीतिक निर्भरता—अमेरिका की सुरक्षा छतरी पर पूर्ण भरोसा।

दस्तावेज़ सीधे संकेत देता है कि यदि यूरोपीय देश रक्षा खर्च जीडीपी के 3–4% तक नहीं बढ़ाते, तो उन्हें “विश्वसनीय सहयोगी” का दर्जा खोना पड़ेगा। यह टिप्पणी नाटो की सामूहिक सुरक्षा संरचना की स्थिरता पर गंभीर प्रश्न उठाती है।

संकेतित परिणाम

यूरोप के लिए संदेश स्पष्ट है—
“अमेरिका अब आपकी सुरक्षा के लिए अनंतकाल तक जिम्मेदार नहीं रह सकता।”

यह शीत युद्ध के बाद की अमेरिका–यूरोप साझेदारी के मूलभूत सिद्धांत को चुनौती देता है।


हिंद-प्रशांत पर बढ़ता जोर: चीन के विरुद्ध एक सुदृढ़ समुद्री दीवार

2025 की NSS में हिंद-प्रशांत को दूसरा उच्चतम प्राथमिकता क्षेत्र घोषित किया गया है। दस्तावेज़ में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि “चीन से उत्पन्न महान शक्ति चुनौती” का मुकाबला बहुपक्षीय सैन्य-सामरिक ढाँचों के माध्यम से किया जाएगा।

प्रमुख रणनीतिक दिशाएँ

  1. AUKUS की तकनीकी-सैन्य क्षमताओं का विस्तार

    • उन्नत पनडुब्बी निर्माण, AI-संचालित युद्ध प्रणालियाँ और लंबी दूरी की स्ट्राइक क्षमताओं पर फोकस।
  2. QUAD की सैन्य-सुरक्षा भूमिका को औपचारिक रूप देना

    • यह सॉफ्ट-बैलेंसिंग से हार्ड-बैलेंसिंग की ओर संकेत है।
  3. ताइवान को सुरक्षा सहायता में वृद्धि

    • यह बीजिंग को सीधे भू-सामरिक चुनौती देता है।
  4. भारत की भूमिका

    • अमेरिका स्पष्ट रूप से मानता है कि हिंद-प्रशांत में शक्ति-संतुलन भारत की सक्रिय भूमिका के बिना संभव नहीं।

अफ्रीका और मध्य पूर्व: प्राथमिकता के पायदान पर नीचे

थिंक-टैंक FDD के वरिष्ठ निदेशक ब्रैड बोमैन के शब्द दस्तावेज़ की भावना को संक्षेप में प्रस्तुत करते हैं—

“विजेता—पश्चिमी गोलार्ध और शायद हिंद-प्रशांत।
हारने वाले—यूरोप।
अनिश्चित—मध्य पूर्व।
अफ्रीका—शुभकामनाएँ…”

यह टिप्पणी कोई अतिशयोक्ति नहीं। NSS में मध्य पूर्व और अफ्रीका का उल्लेख संक्षिप्त और सीमित है।

  • मध्य पूर्व में अमेरिकी उपस्थिति मुख्य रूप से ईरान-रोधी गठबंधनों और ऊर्जा सुरक्षा तक सीमित।
  • अफ्रीका को “कम प्राथमिकता” क्षेत्र बताया गया है, जिससे अनुमान है कि यहां चीन और रूस को अधिक अवसर मिलेंगे।

संभावित वैश्विक परिणाम और जोखिम

1. लैटिन अमेरिका में भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तेज होगी

चीन के BRI प्रोजेक्ट्स, 5G अवसंरचना, बंदरगाह निर्माण और खनन परियोजनाओं पर अमेरिकी दबाव बढ़ेगा। रूस को भी सैन्य-सूचना तंत्र के विस्तार में कठिनाई होगी।

2. हिंद-प्रशांत में शक्ति-संतुलन और अधिक ध्रुवीकृत होगा

AUKUS और QUAD का विस्तार चीन के साथ तनाव को बढ़ा सकता है। ताइवान जलडमरूमध्य में सैन्य गतिरोध की संभावना भी बढ़ेगी।

3. यूरोप में सामरिक स्वावलंबन (Strategic Autonomy) की मांग बढ़ेगी

यूरोपीय संघ के भीतर “अमेरिका-निर्भरता” से दूरी बनाने का दबाव बढ़ सकता है—विशेषकर फ्रांस और जर्मनी में।

4. वैश्विक दक्षिण में अमेरिका की मौजूदगी घटेगी

अफ्रीका और मध्य पूर्व में चीन-रूस की पकड़ और मजबूत हो सकती है।

5. वैश्विक गठबंधन प्रणाली की स्थिरता पर प्रश्नचिह्न

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद निर्मित अमेरिकी-नेतृत्व वाली सुरक्षा संरचना (NATO, नियम-आधारित व्यवस्था) का भविष्य अनिश्चित होगा।


निष्कर्ष: एक निर्णायक लेकिन जोखिमपूर्ण मोड़

2025 की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति अमेरिका को 20वीं सदी के उदारवादी अंतरराष्ट्रीयतावाद से दूर ले जाकर 19वीं सदी के क्षेत्रीय वर्चस्ववाद (hemispheric hegemonism) और यथार्थवादी शक्ति-संतुलन मॉडल की ओर मोड़ती है। यह “अमेरिका फर्स्ट” के वैचारिक ढांचे का अब तक का सबसे संरचित और आक्रामक रूप है।

दस्तावेज़ महत्वाकांक्षी है, परन्तु जोखिमपूर्ण भी—
यदि इसे पूरी तरह लागू किया गया, तो यह न केवल वैश्विक शक्ति-संतुलन बदल देगा, बल्कि अमेरिका के दशकों पुराने गठबंधन तंत्र को भी पुनर्परिभाषित कर सकता है।

दूसरे शब्दों में—
2025 की NSS केवल एक रणनीति नहीं, बल्कि अमेरिकी भू-राजनीतिक दृष्टिकोण में संरचनात्मक क्रांति का घोषणापत्र है।


भाग-2


ट्रंप प्रशासन की नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (2025): रूस के साथ संबंधों में ऐतिहासिक मोड़ और उभरती वैश्विक शक्ति-राजनीति

परिचय

7 दिसंबर 2025 को जारी संयुक्त राज्य अमेरिका की नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (National Security Strategy – NSS 2025) वैश्विक भू-राजनीतिक विमर्श में एक निर्णायक हस्तक्षेप की तरह सामने आई है। यह दस्तावेज़ केवल नीति-परिवर्तन का बयान भर नहीं है, बल्कि 2017 के बाद पहली बार अमेरिकी विदेश नीति की बुनियादी धारणाओं में हुए मौलिक बदलाव को दर्ज करता है। सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह है कि रूस को “तत्काल सैन्य खतरा” (direct threat) के रूप में चित्रित करना छोड़ दिया गया है—एक ऐसी स्थिति जो क्रीमिया के 2014 के संकट के बाद से अमेरिकी रणनीतिक दस्तावेज़ों में ऊँचे दर्जे की प्राथमिकता रही थी।

इसके साथ ही NSS 2025 यूरोपीय शक्तियों को “दीर्घकालिक क्षरण” (long-term decline) की अवस्था में देखता है और 19वीं सदी के प्रसिद्ध मुनरो सिद्धांत के आधुनिक संस्करण—“Monroe Doctrine 2.0”—को पुनः अमेरिकी विदेश नीति की केंद्रीय धुरी बनाने का सुझाव देता है। इस दस्तावेज़ को क्रेमलिन ने भी असामान्य रूप से सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हुए अमेरिकी विश्लेषण से “काफी हद तक साम्यता” रखने वाला बताया है।


दस्तावेज़ के प्रमुख प्रावधान: अमेरिकी विदेश नीति का नया मानचित्र

1. रूस: ‘खतरे’ से ‘प्रतिस्पर्धी शक्ति’ तक

दस्तावेज़ में रूस को “revisionist power” की श्रेणी में रखा गया है, परंतु उसे अब “direct military threat” कहना बंद कर दिया गया है। यह बदलाव संकेत करता है कि वॉशिंगटन अब रूस को प्राथमिक शत्रु नहीं, बल्कि वास्तविकता-आधारित प्रतिस्पर्धी के रूप में देखना चाहता है।

2. चीन: एकमात्र ‘श्रेष्ठ रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी’ (pacing competitor)

NSS 2025 का सबसे स्पष्ट संदेश यह है कि अमेरिका के सामने सबसे गंभीर, दीर्घकालिक और व्यापक चुनौती चीन है।
यह दस्तावेज़ चीन को तकनीकी, सैन्य, व्यापारिक और विचारधारात्मक—चारों मोर्चों पर प्राथमिक प्रतिस्पर्धी घोषित करता है।

3. यूरोप: सामरिक स्वायत्तता का भ्रम

दस्तावेज़ यूरोप को आर्थिक रूप से निर्भर, सैन्य रूप से कमजोर और जनसांख्यिकीय रूप से सिकुड़ता हुआ क्षेत्र मानता है। अमेरिकी आकलन के अनुसार, यूरोप की तथाकथित “strategic autonomy” व्यवहार्यता खो चुकी है और निकट भविष्य में अमेरिका पर ही सुरक्षा निर्भरता बढ़ेगी।

4. मुनरो सिद्धांत का पुनर्जागरण – “Flexible Realism” के अंतर्गत

पश्चिमी गोलार्ध को फिर से अमेरिका का “विशेष प्रभाव-क्षेत्र” घोषित करते हुए मुनरो सिद्धांत को एक नए रूप में पुनर्जीवित किया गया है, जिसका उद्देश्य है:

  • लैटिन अमेरिका में चीन और रूस के प्रभाव को सीमित करना
  • पनामा नहर, कैरिबियाई समुद्री मार्ग तथा आर्कटिक के उभरते रूटों पर अमेरिकी प्रभुत्व को पुनर्स्थापित करना
  • “Hemisphere First” दृष्टिकोण के तहत सैन्य-राजनीतिक उपस्थिति का विस्तार

5. नई नीति-दृष्टि: ‘Peace through Selective Engagement’

ट्रंप प्रशासन ने पारंपरिक “peace through strength” की जगह नई अवधारणा पेश की है—
शक्ति-संतुलन के आधार पर चुनिंदा क्षेत्रों में जुड़ाव (selective engagement) और अन्य क्षेत्रों में सीमित भागीदारी।


सैद्धांतिक ढांचा: ट्रंपकालीन ‘Flexible Realism’

NSS 2025 स्वयं को “Flexible Realism” का प्रतिनिधि बताता है। यह दृष्टिकोण पारंपरिक यथार्थवाद (Morgenthau), संशोधित यथार्थवाद (Mearsheimer), और ‘ऑफशोर बैलेंसिंग’ के सिद्धांतों का मिश्रित संदर्भ है।
इसके तीन प्रमुख स्तंभ हैं:

  1. राष्ट्रीय हित सर्वोपरि — America First, without apology
  2. चुनिंदा गठबंधन—जो उपयोगिता-आधारित हों, न कि मूल्य-आधारित
  3. 19वीं सदी के सिद्धांतों (Monroe Doctrine) का 21वीं सदी के संदर्भ में रणनीतिक पुनरुपयोग

यह फ्रेमवर्क मूलतः शक्ति-राजनीति और भूगोल पर आधारित विश्वदृष्टि है, जिसे जॉन मेयरशाइमर और स्टीफन वॉल्ट जैसे विद्वान वर्षों से बढ़ावा देते रहे हैं।


रूस के लिए इसका क्या अर्थ है?

रूस के संदर्भ में NSS 2025 ऐतिहासिक बदलाव का संकेतक है:

1. रूस अब प्राथमिक शत्रु नहीं

क्रीमिया संकट (2014) और यूक्रेन युद्ध के वर्षों के बाद पहली बार मॉस्को को अमेरिकी रणनीति में प्राथमिक खतरे के रूप में सूचीबद्ध नहीं किया गया।

2. यूक्रेन युद्ध को ‘क्षेत्रीय यूरोपीय संघर्ष’ के रूप में पेश किया गया

अमेरिका अब इसे वैश्विक नहीं, बल्कि सीमित क्षेत्रीय अस्थिरता के रूप में देख रहा है, जो अमेरिकी सुरक्षा हितों को प्रत्यक्ष चुनौती नहीं देता।

3. रूस–चीन अक्ष को तोड़ने की निक्सन-शैली रणनीति

दस्तावेज़ स्पष्ट रूप से रूस को चीन से अलग करने की 1972-प्रेरित ‘त्रिकोणीय कूटनीति’ की वापसी का संकेत देता है।
यह रणनीति शीत युद्ध में सोवियत संघ को अलग-थलग करने में अत्यंत प्रभावी रही थी।


यूरोपीय संघ और नाटो: विश्वसनीयता का संकट

NSS 2025 यूरोप को शक्ति-राजनीति के एक कमजोर और विभाजित केंद्र के रूप में चित्रित करता है। इसके प्रभाव निम्न प्रकार हो सकते हैं:

1. यूरोपीय ‘Strategic Autonomy’ के लिए बड़ा झटका

फ्रांस और जर्मनी द्वारा संचालित यह परियोजना अब अमेरिकी दृष्टिकोण में “भ्रामक महत्वाकांक्षा” है।

2. NATO की एकता पर प्रश्नचिह्न

यदि अमेरिका यूरोपीय सुरक्षा से दूरी बनाता है, तो Article 5—“सामूहिक सुरक्षा”—की विश्वसनीयता कमजोर हो सकती है।

3. पूर्वी यूरोप में असुरक्षा की भावना

बाल्टिक देश, पोलैंड और रोमानिया जैसे राष्ट्र अमेरिकी सुरक्षा गारंटी को लेकर चिंता में पड़ सकते हैं।


मुनरो सिद्धांत 2.0: 21वीं सदी का भू-राजनीतिक संस्करण

मुनरो सिद्धांत (1823) का मूल संदेश था—
यूरोपीय शक्तियाँ पश्चिमी गोलार्ध से दूर रहें।

NSS 2025 इसे नए आयामों में ढालता है:

  • चीन के निवेश, तकनीकी और सुरक्षा पैठ को लैटिन अमेरिका में रोकना
  • वेनेजुएला के तेल संसाधनों और पनामा नहर पर अमेरिकी रणनीतिक दावेदारी बढ़ाना
  • आर्कटिक के नये व्यापारिक मार्गों पर सैन्य-सामरिक उपस्थिति बढ़ाना
  • “Western Hemisphere First” नीति को अमेरिकी वैश्विक रणनीति के केंद्र में रखना

यह अमेरिका की ‘बैकयार्ड भू-राजनीति’ की स्पष्ट वापसी है।


निष्कर्ष: वैश्विक व्यवस्था का पुनर्गठन

NSS 2025 शीत युद्ध के बाद की उदारवादी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था (Liberal International Order) से निर्णायक दूरी बनाता है और शक्ति-संतुलन आधारित यथार्थवादी विश्वदृष्टि की ओर अमेरिकी वापसी का संकेत देता है। यदि यह रणनीति पूर्ण रूप से लागू होती है, तो आने वाले वर्षों में निम्न परिवर्तन संभव हैं:

  1. अमेरिका–रूस संबंधों में नया détente संभव
  2. चीन को अलग-थलग करने के लिए रणनीतिक त्रिकोणीय संतुलन
  3. यूरोपीय संघ अपनी सुरक्षा और आर्थिक निर्भरता के सबसे बड़े संकट में प्रवेश कर सकता है
  4. लैटिन अमेरिका में अमेरिका–चीन प्रतिद्वंद्विता नए ‘शीत युद्ध 2.0’ का केंद्र बन सकती है

समग्र रूप से यह दस्तावेज़ प्रमाणित करता है कि अमेरिकी विदेश नीति अब मूल्यों से अधिक भू-राजनीतिक यथार्थ और शक्ति-संतुलन पर आधारित हो रही है—एक ऐसी दिशा जिसकी चेतावनी और भविष्यवाणी अग्रणी यथार्थवादी विद्वान दशकों से देते आए हैं।


With Reuters Inputs 

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ओमान में ईरान–अमेरिका परमाणु वार्ता: कूटनीति की सतर्क शुरुआत मध्य पूर्व की भू-राजनीति में स्थिरता एक दुर्लभ अतिथि रही है, किंतु ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दे जब सामने आते हैं, तो क्षेत्रीय अस्थिरता वैश्विक स्तर पर चिंता का विषय बन जाती है। 6 फरवरी 2026 को ओमान की राजधानी मस्कट में ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच अप्रत्यक्ष उच्च-स्तरीय वार्ता का आयोजन इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। यह वार्ता महज द्विपक्षीय संवाद नहीं थी, अपितु यह परीक्षा थी कि क्या गहन अविश्वास और हाल के सैन्य टकरावों के बावजूद कूटनीति अभी भी प्रभावी विकल्प बनी हुई है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने वार्ता को “एक अच्छी शुरुआत” और “सकारात्मक” करार दिया, जबकि दोनों पक्षों ने आगे बातचीत जारी रखने पर सहमति जताई। यह पहली ऐसी गंभीर कूटनीतिक पहल थी, जो 2025 में इजरायल-ईरान के बीच हुए 12-दिवसीय संघर्ष और अमेरिकी हमलों के बाद हुई। उस संघर्ष ने परमाणु स्थलों पर हमलों को जन्म दिया और क्षेत्र को युद्ध की कगार पर ला खड़ा किया था। ऐसे में मस्कट वार्ता ने संवाद की प्रक्रिया को पुनर्जीवित करने का संकेत दिया, यद्यप...

Trump’s Claim on India Oil Deal: Energy Geopolitics, Russia Sanctions and India’s Strategic Autonomy

ट्रंप का भारत के साथ व्यापार समझौते का दावा: ऊर्जा भू-राजनीति, दबाव कूटनीति और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता (भारत सरकार की पुष्टि के पूर्व लिखा गया यह लेख) प्रस्तावना फरवरी 2026 की शुरुआत में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह दावा कि भारत ने एक व्यापार समझौते के तहत रूसी तेल की खरीद बंद करने और इसके स्थान पर अमेरिका तथा संभावित रूप से वेनेजुएला से अधिक तेल आयात करने पर सहमति जताई है, केवल एक द्विपक्षीय बयान भर नहीं है। यह दावा वैश्विक ऊर्जा राजनीति, प्रतिबंध-आधारित कूटनीति और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता से जुड़े कई जटिल प्रश्नों को एक साथ सामने लाता है। विशेष रूप से तब, जब इस कथित समझौते की न तो भारत के विदेश मंत्रालय ने पुष्टि की है और न ही पेट्रोलियम मंत्रालय ने। यह स्थिति एक बार फिर उस अंतर को उजागर करती है, जो अमेरिकी राजनीतिक वक्तव्यों और संस्थागत वास्तविकताओं के बीच अक्सर देखा जाता है। साथ ही, यह प्रश्न भी खड़ा होता है कि क्या ऊर्जा व्यापार अब विशुद्ध आर्थिक निर्णय नहीं रह गया है, बल्कि एक शक्तिशाली भू-राजनीतिक हथियार बन चुका है। एकतरफा दावा और कूटनीतिक चुप्पी ट्रंप ने पत...

India Energy Week 2026 Goa: Trump’s Absence, Energy Diplomacy and the Rise of a New Multipolar World Order

ट्रंप के बाद की दुनिया: गोवा में उभरी बहुध्रुवीय ऊर्जा राजनीति भारत एनर्जी वीक (IEW) 2026, जो गोवा के ONGC एडवांस्ड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में 27 से 30 जनवरी तक आयोजित हुआ, मात्र एक ऊर्जा सम्मेलन नहीं रहा। यह वैश्विक व्यवस्था में गहन बदलाव का जीवंत साक्ष्य बन गया, जहां अमेरिका-केंद्रित एकध्रुवीय ढांचे की जगह बहुध्रुवीय वास्तविकता ने मजबूती से पकड़ बनानी शुरू कर दी। इस मंच पर ऊर्जा केवल ईंधन या बिजली का स्रोत नहीं रही, बल्कि भू-राजनीतिक शक्ति-संतुलन का प्रमुख माध्यम बनी। सम्मेलन की शुरुआत से ही चर्चाएं ऊर्जा संक्रमण से आगे बढ़कर वैश्विक व्यवस्था के पुनर्गठन पर केंद्रित हो गईं। कनाडा के ऊर्जा मंत्री टिम हॉजसन ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आज की दुनिया में जो हो रहा है, वह "कोई धीमा आर्थिक संक्रमण नहीं, बल्कि एक बड़ा विद्रूप (rupture)" है। यह टिप्पणी डावोस में कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के उस बयान की गूंज थी, जिसमें उन्होंने postwar अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की "मृत्यु" की घोषणा की थी। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका की "अमेरिका फर्स्ट" नीतियां—टैरिफ को रण...

Pariksha Pe Charcha 2026: PM Modi’s Motivational Message for Students on Exams, Skills, Balance & Success

परीक्षा पे चर्चा 2026: परीक्षा से आगे जीवन की तैयारी का राष्ट्रीय संवाद परीक्षा का समय आते ही देश के करोड़ों छात्रों के मन में एक ही सवाल गूंजने लगता है— क्या मैं सफल हो पाऊँगा? इसी प्रश्न, इसी तनाव और इसी अनिश्चितता को संवाद और आत्मविश्वास में बदलने का मंच है ‘परीक्षा पे चर्चा’ । 6 फरवरी 2026 को आयोजित परीक्षा पे चर्चा के 9वें संस्करण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशभर के छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों से सीधी बातचीत की। सुबह 10 बजे शुरू हुए इस कार्यक्रम में दिल्ली, गुजरात के देवमोगरा, तमिलनाडु के कोयंबटूर, छत्तीसगढ़ के रायपुर और असम के गुवाहाटी से जुड़े छात्रों ने भाग लिया। कार्यक्रम का लाइव प्रसारण दूरदर्शन, पीएम मोदी के यूट्यूब चैनल और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर किया गया। इस बार 4.5 करोड़ से अधिक रजिस्ट्रेशन होना यह दर्शाता है कि आज का छात्र केवल परीक्षा टिप्स नहीं, बल्कि जीवन मार्गदर्शन चाहता है। 🌱 सपने देखें, लेकिन एक्शन के साथ प्रधानमंत्री मोदी का संदेश बेहद स्पष्ट और प्रेरक था— “सपने न देखना जुर्म है, लेकिन सिर्फ सपनों की गुनगुनाहट से काम नहीं चलता।” उन्हों...

Current Affairs in Hindi : 12 April 2025

 समसामयिकी लेख संकलन : 12 अप्रैल 2025 1-भारत में EVMs की सुरक्षा और विश्वसनीयता पर चुनाव आयोग का स्पष्टीकरण हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रीय खुफिया निदेशक तुलसी गैब्बार्ड द्वारा इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग सिस्टम्स की हैकिंग की संभावनाओं को लेकर उठाए गए सवालों के बाद भारत के चुनाव आयोग (Election Commission of India) ने स्पष्ट किया है कि भारत में प्रयुक्त Electronic Voting Machines (EVMs) पूरी तरह से सुरक्षित हैं और इनमें किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ संभव नहीं है। चुनाव आयोग के सूत्रों के अनुसार, कई देश ऐसे इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग सिस्टम्स का उपयोग करते हैं जिनमें इंटरनेट, प्राइवेट नेटवर्क, विभिन्न मशीनें और प्रक्रियाओं का मिश्रण होता है। ऐसे सिस्टम्स को बाहरी नेटवर्क से जोड़े जाने के कारण साइबर हमलों की संभावना बढ़ जाती है। इसके विपरीत, भारत में इस्तेमाल होने वाली EVMs एकदम सरल, सही और सटीक ‘कैलकुलेटर’ की तरह कार्य करती हैं। भारत की EVMs को न तो इंटरनेट, न वाई-फाई और न ही इंफ्रारेड से जोड़ा जा सकता है। ये पूरी तरह से stand-alone यानी स्वतंत्र रूप से काम करने वाली मशीनें हैं, जिनमें बाहरी हस्तक्षेप क...