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Rising Attacks on Hindu Minorities in Bangladesh: Global Silence and Human Rights Concerns

The Silent Genocide: Persecution of Hindus in Bangladesh and the Moral Failure of the Global Community In an age where conflicts in Gaza, Ukraine, and other flashpoints command the world’s attention, a quieter yet deeply disturbing humanitarian crisis continues to unfold next door to India — in Bangladesh. Since the political upheaval and resignation of Prime Minister Sheikh Hasina in August 2024, reports of violence against the Hindu minority have escalated dramatically. Killings, arson attacks, vandalism of temples, forced displacement, economic boycotts, and intimidation have become frighteningly frequent. According to figures cited by Indian authorities, more than 2,200 incidents of violence against Hindus were recorded in 2024 alone , with similar patterns continuing through 2025 and into 2026. Independent reports corroborate these trends: homes torched, idols desecrated, businesses looted, and families compelled to flee ancestral lands. Yet, despite the mounting evidence, the w...

UN Reforms 2025: Why the United Nations Must Evolve Beyond the 1945 Framework

संयुक्त राष्ट्र में सुधार की आवश्यकता: 1945 से 2025 की ओर

(An Academic Analysis of the Need for UN Reforms in the 21st Century)


परिचय

संयुक्त राष्ट्र (United Nations – UN) की स्थापना 24 अक्टूबर 1945 को द्वितीय विश्व युद्ध की भयावहता के बाद एक ऐसे वैश्विक मंच के रूप में की गई थी, जो अंतरराष्ट्रीय शांति, सुरक्षा, विकास और मानवाधिकारों के संरक्षण को सुनिश्चित करे। उस समय यह संस्था एक नई आशा का प्रतीक थी—एक ऐसे विश्व की, जो संवाद और सहयोग से विवादों का समाधान खोजेगा।

किन्तु 80 वर्षों के उपरांत, 2025 के वैश्विक परिदृश्य में यह प्रश्न बार-बार उठ रहा है कि क्या संयुक्त राष्ट्र अब भी अपनी मूल भावना और उद्देश्य के अनुरूप कार्य कर पा रहा है? क्या इसकी संरचना, निर्णय-प्रक्रिया और शक्ति-संतुलन 21वीं सदी की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करते हैं?

भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने 16 अक्टूबर 2025 को इस प्रश्न को मुखर करते हुए कहा कि “संयुक्त राष्ट्र की संरचना 1945 की है, जबकि विश्व अब 2025 की जटिलताओं में जी रहा है।” उनका यह कथन केवल भारत का दृष्टिकोण नहीं, बल्कि उस सामूहिक वैश्विक असंतोष का प्रतिबिंब है जो वर्तमान संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था के असंतुलन से उत्पन्न हुआ है।


संयुक्त राष्ट्र की संरचना: इतिहास से वर्तमान तक

संयुक्त राष्ट्र का सबसे शक्तिशाली अंग सुरक्षा परिषद (UN Security Council) है, जिसमें पाँच स्थायी सदस्य – अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस – को वीटो (Veto) शक्ति प्राप्त है। शेष 10 सदस्य अस्थायी हैं, जिनका चयन दो वर्षों के लिए किया जाता है।

यह संरचना 1945 की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं का प्रतिनिधित्व करती थी, जब द्वितीय विश्व युद्ध के विजेता देश विश्व व्यवस्था के निर्णायक थे। परंतु 21वीं सदी में यह संरचना असंतुलित और अप्रासंगिक प्रतीत होती है।

आज वैश्विक शक्ति का केंद्र केवल पश्चिम में सीमित नहीं है। भारत, ब्राजील, जापान, जर्मनी, और अफ्रीका के उभरते राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा में निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं। बावजूद इसके, इन्हें सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता प्राप्त नहीं है। इस असमान प्रतिनिधित्व के कारण संयुक्त राष्ट्र की वैधता (Legitimacy) और प्रभावशीलता (Effectiveness) पर प्रश्नचिह्न लगते हैं।


वर्तमान संरचना की प्रमुख सीमाएँ

  1. वीटो शक्ति का असंतुलन:
    पाँच स्थायी सदस्य अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा हेतु वीटो का दुरुपयोग करते हैं। इसके कारण सीरिया, यूक्रेन, गाजा या म्यांमार जैसे मुद्दों पर वैश्विक सहमति बन नहीं पाती।

  2. क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का अभाव:
    अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया जैसे क्षेत्रों को स्थायी प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। परिणामस्वरूप, इन क्षेत्रों की समस्याएँ – गरीबी, जलवायु संकट, उपनिवेशी विरासत – वैश्विक नीति में उपेक्षित रह जाती हैं।

  3. संस्थागत जड़ता और नौकरशाही:
    संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियाँ (जैसे WHO, UNDP, FAO) निर्णय लेने में अत्यधिक समय लेती हैं, जिससे वैश्विक संकटों (जैसे कोविड-19 महामारी) के दौरान प्रभावी प्रतिक्रिया नहीं मिल पाती।

  4. लोकतांत्रिक घाटा (Democratic Deficit):
    संयुक्त राष्ट्र में निर्णय शक्ति कुछ गिने-चुने देशों तक सीमित है, जिससे यह संस्था ‘समानता’ के मूल सिद्धांत से दूर होती जा रही है।


संयुक्त राष्ट्र सुधार की आवश्यकता

संयुक्त राष्ट्र का उद्देश्य केवल शांति और सुरक्षा तक सीमित नहीं है; यह एक ऐसा मंच भी है जहाँ वैश्विक शासन (Global Governance) की रूपरेखा तय होती है। इसलिए, इसे 21वीं सदी की चुनौतियों के अनुरूप पुनर्संरचित करना अनिवार्य है।

1. सुरक्षा परिषद का विस्तार

  • स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों में सदस्यों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए।
  • G4 देशों (भारत, जर्मनी, जापान, ब्राजील) और अफ्रीकी प्रतिनिधि देशों को स्थायी सदस्यता मिलनी चाहिए।
  • इससे सुरक्षा परिषद अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण और संतुलित बनेगी।

2. वीटो शक्ति में सुधार

  • वीटो के दुरुपयोग को सीमित करने के लिए “Code of Conduct” लागू किया जा सकता है।
  • प्रस्तावों पर वीटो का प्रयोग तभी वैध माना जाए जब कम-से-कम दो स्थायी सदस्य समर्थन में हों।

3. पारदर्शिता और जवाबदेही

  • संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों की कार्यप्रणाली को पारदर्शी बनाया जाए।
  • फंडिंग और निर्णय प्रक्रिया में विकसित और विकासशील देशों के बीच संतुलन स्थापित किया जाए।

4. नए मुद्दों पर वैश्विक प्रतिक्रिया तंत्र

  • जलवायु परिवर्तन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), साइबर अपराध, और वैश्विक महामारी जैसी नई चुनौतियों पर विशेष संयुक्त राष्ट्र परिषदों का गठन आवश्यक है।

भारत की भूमिका और दृष्टिकोण

भारत संयुक्त राष्ट्र सुधार का एक संगठित, व्यवहारिक और नैतिक नेतृत्वकर्ता के रूप में उभरा है।

  1. सुरक्षा परिषद में दावेदारी:
    भारत विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, सबसे अधिक जनसंख्या वाला लोकतंत्र, और वैश्विक दक्षिण (Global South) की मुखर आवाज है। इसकी स्थायी सदस्यता न केवल नैतिक रूप से उचित है बल्कि व्यावहारिक रूप से भी आवश्यक।

  2. शांति और विकास में योगदान:
    भारत ने 50 से अधिक संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में 2 लाख से अधिक सैनिक भेजे हैं — जो किसी भी अन्य देश से अधिक है।

  3. वैश्विक दक्षिण की आवाज:
    G20 शिखर सम्मेलन (2023) के दौरान भारत ने अफ्रीकी संघ (African Union) को स्थायी सदस्यता दिलाकर यह साबित किया कि वह “वैश्विक दक्षिण की सामूहिक आकांक्षाओं” को नेतृत्व देने में सक्षम है।

  4. ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अवधारणा:
    भारत का दृष्टिकोण शक्ति-संतुलन के बजाय सह-अस्तित्व और साझी मानवता पर आधारित है। यही दर्शन संयुक्त राष्ट्र सुधार का नैतिक आधार भी प्रदान करता है।


सुधारों की वैश्विक चुनौतियाँ

संयुक्त राष्ट्र सुधार की आवश्यकता पर लगभग सभी सदस्य देश सहमत हैं, परंतु स्थायी सदस्यों की राजनीतिक इच्छाशक्ति (Political Will) की कमी सबसे बड़ी बाधा है।

  • अमेरिका और रूस जैसे देश अपने वीटो विशेषाधिकार को सीमित करने के पक्ष में नहीं हैं।
  • चीन भारत और जापान की स्थायी सदस्यता को लेकर शंकालु है।
  • पश्चिमी देशों के बीच भी इस पर मतभेद हैं कि कौन-से देश नए सदस्य बनें।

इस प्रकार, सुधार एक राजनीतिक सहमति का जटिल प्रश्न बन गया है।


निष्कर्ष

संयुक्त राष्ट्र की 80 वर्षों की यात्रा विश्व इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय रही है। इसने युद्ध रोके, शांति स्थापित की, और विकास को दिशा दी। परंतु आज की बहुध्रुवीय, डिजिटल और जलवायु-संकटग्रस्त दुनिया में इसकी प्रासंगिकता तभी बनी रह सकती है जब यह अपनी संरचना और सोच को समयानुकूल बनाए।

भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर का यह कथन सार्थक है कि —

“यदि संयुक्त राष्ट्र 21वीं सदी में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखना चाहता है, तो उसे 1945 की मानसिकता से मुक्त होकर वर्तमान विश्व की विविधता को अपनाना होगा।”

इसलिए, संयुक्त राष्ट्र सुधार न केवल संरचनात्मक परिवर्तन का प्रश्न है, बल्कि यह वैश्विक न्याय, समानता और प्रतिनिधित्व की पुनर्स्थापना का प्रयास भी है।
भारत, एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में, इस परिवर्तन का नेतृत्व करने की नैतिक और ऐतिहासिक दोनों दृष्टियों से पात्र है।

श्रोत (Sources):

1. संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक वेबसाइट – www.un.org

2. भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) – एस. जयशंकर के 16 अक्टूबर 2025 के बयान पर प्रेस विज्ञप्ति

3. द हिंदू और इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्टें (अक्टूबर 2025)

4. यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल रिफॉर्म डॉसियर (UNGA Documentation, 2024)

5. G4 देशों का संयुक्त वक्तव्य – "Reform of the UN Security Council" (2023)

6. संयुक्त राष्ट्र महासचिव की वार्षिक रिपोर्ट, 2024 – “Our Common Agenda”


संभावित UPSC प्रश्न

  1. मुख्य परीक्षा (GS Paper-II):
    संयुक्त राष्ट्र की संरचना 1945 की वास्तविकताओं पर आधारित है, जबकि आज का विश्व पूरी तरह भिन्न है। विश्लेषण कीजिए कि 21वीं सदी के संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र में कौन-कौन से सुधार आवश्यक हैं।

  2. निबंध विषय:
    “वैश्विक शासन में समानता और प्रतिनिधित्व की पुनर्स्थापना: संयुक्त राष्ट्र सुधार की दिशा में भारत की भूमिका।”

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