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Rising Attacks on Hindu Minorities in Bangladesh: Global Silence and Human Rights Concerns

The Silent Genocide: Persecution of Hindus in Bangladesh and the Moral Failure of the Global Community In an age where conflicts in Gaza, Ukraine, and other flashpoints command the world’s attention, a quieter yet deeply disturbing humanitarian crisis continues to unfold next door to India — in Bangladesh. Since the political upheaval and resignation of Prime Minister Sheikh Hasina in August 2024, reports of violence against the Hindu minority have escalated dramatically. Killings, arson attacks, vandalism of temples, forced displacement, economic boycotts, and intimidation have become frighteningly frequent. According to figures cited by Indian authorities, more than 2,200 incidents of violence against Hindus were recorded in 2024 alone , with similar patterns continuing through 2025 and into 2026. Independent reports corroborate these trends: homes torched, idols desecrated, businesses looted, and families compelled to flee ancestral lands. Yet, despite the mounting evidence, the w...

India–UAE Defence Partnership Deepens: Strategic Significance of Major General Yousef Mayouf Saeed Al Halami’s Visit to India (27–28 October 2025)

भारत–संयुक्त अरब अमीरात रक्षा संबंधों का सुदृढ़ीकरण: मेजर जनरल यूसुफ मायूफ सईद अल हलामी की भारत यात्रा (27–28 अक्टूबर 2025) का विश्लेषण

परिचय

वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में जब हिंद–प्रशांत क्षेत्र से लेकर पश्चिम एशिया तक शक्ति-संतुलन लगातार पुनर्गठित हो रहा है, तब भारत और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) जैसे उभरते मध्य शक्तियों के बीच रक्षा सहयोग विशेष महत्त्व प्राप्त करता है। 27 से 28 अक्टूबर 2025 के बीच यूएई थल सेना प्रमुख मेजर जनरल यूसुफ मायूफ सईद अल हलामी की भारत यात्रा इस रणनीतिक समीकरण की नयी परतों को उजागर करती है। इस यात्रा का केंद्र सैन्य प्रशिक्षण, रक्षा-उद्योग सहयोग, खुफिया साझेदारी और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे साझा मुद्दे रहे।
भारत के लिए यह यात्रा उस व्यापक नीति का हिस्सा है जिसके अंतर्गत देश खाड़ी क्षेत्र में न केवल ऊर्जा-आपूर्ति की सुरक्षा बल्कि समुद्री व्यापार मार्गों की रक्षा और सामरिक साझेदारी को मजबूत कर रहा है। वहीं, यूएई के लिए भारत एक ऐसा साझेदार है जो उसे तकनीकी नवाचार, मानव संसाधन और रणनीतिक संतुलन प्रदान करता है।


ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और रणनीतिक अभिसरण

भारत–यूएई संबंधों का इतिहास केवल व्यापार और प्रवासी भारतीय समुदाय तक सीमित नहीं रहा। 2017 में अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख मोहम्मद बिन ज़ायेद अल नहयान की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने अपने संबंधों को “समग्र रणनीतिक साझेदारी” (Comprehensive Strategic Partnership) का दर्जा दिया। यह कदम केवल प्रतीकात्मक नहीं था, बल्कि इसने रक्षा, साइबर सुरक्षा, आतंकवाद-निरोध और खाड़ी सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग की आधारशिला रखी।

2019 में हुई संयुक्त रक्षा सहयोग समिति (JDCC) की पहली बैठक और 2022 में रक्षा उद्योग सहयोग पर हुए समझौता ज्ञापन ने इस दिशा को संस्थागत रूप प्रदान किया। इन समझौतों ने दोनों देशों की सेनाओं के बीच नियमित अभ्यास, तकनीकी आदान-प्रदान और प्रशिक्षण कार्यक्रमों की संभावनाओं को सुदृढ़ किया।

2025 की यह यात्रा ऐसे समय में हुई जब अरब सागर, अदन की खाड़ी और लाल सागर क्षेत्र में भू-राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी है — हूती विद्रोहियों की समुद्री गतिविधियाँ, अफगानिस्तान में अस्थिरता, और इजरायल–गाज़ा संघर्ष जैसे कारकों ने समुद्री सुरक्षा को अत्यंत संवेदनशील बना दिया है। इस संदर्भ में भारत और यूएई का सामरिक समन्वय क्षेत्रीय स्थिरता के लिए निर्णायक हो सकता है।


यात्रा के प्रमुख बिंदु और परिणाम

मेजर जनरल अल हलामी की दो दिवसीय भारत यात्रा में नई दिल्ली में कई उच्चस्तरीय वार्ताएँ हुईं। उन्होंने थल सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी, रक्षा स्टाफ प्रमुख (CDS) जनरल अनिल चौहान, और रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की। चर्चाओं में कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर सहमति बनी —

1. संयुक्त सैन्य अभ्यास और प्रशिक्षण

दोनों पक्षों ने द्विपक्षीय थल सेना अभ्यास “डेजर्ट साइक्लोन” को और व्यापक बनाने तथा “ज़ायेद तलवार” ढांचे के अंतर्गत त्रि-सेवा अभ्यासों की संभावनाओं पर चर्चा की। इसके अतिरिक्त, सैन्य अधिकारियों के आपसी प्रशिक्षण और अनुभव-साझाकरण को नियमित करने की योजना बनी, ताकि दोनों सेनाओं में परिचालन क्षमता का समन्वय बढ़े।

2. रक्षा औद्योगिक सहयोग

भारत के DRDO और यूएई के EDGE ग्रुप के बीच सहयोग पर विशेष बल दिया गया। दोनों देशों ने काउंटर-ड्रोन सिस्टम, मानवरहित जमीनी वाहन (UGVs) और निर्देशित ऊर्जा हथियार जैसे क्षेत्रों में सह-विकास और सह-उत्पादन की संभावनाओं पर विचार किया। यह साझेदारी भारत की “आत्मनिर्भर भारत” नीति और यूएई की “मेड इन एमिरेट्स” औद्योगिक पहल के अनुरूप है।

3. क्षमता निर्माण एवं सैन्य शिक्षा

दोनों देशों ने रक्षा अध्ययन संस्थानों के बीच नियमित आदान-प्रदान कार्यक्रमों को संस्थागत रूप देने पर सहमति व्यक्त की। भारतीय राष्ट्रीय रक्षा महाविद्यालय (NDC) और अबू धाबी के एमिरेट्स सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज एंड रिसर्च (ECSSR) के बीच संयुक्त पाठ्यक्रम और शोध परियोजनाएँ प्रारंभ करने की योजना है।

4. क्षेत्रीय सुरक्षा और खुफिया साझेदारी

वार्ताओं में आतंकवाद, समुद्री डकैती, और साइबर हमलों जैसी उभरती चुनौतियों से निपटने के लिए खुफिया साझेदारी को सशक्त बनाने पर भी सहमति बनी। विशेष रूप से हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में समुद्री डोमेन जागरूकता (Maritime Domain Awareness) पर साझा निगरानी तंत्र विकसित करने का प्रस्ताव रखा गया।

हालांकि इस यात्रा में कोई नया औपचारिक समझौता घोषित नहीं हुआ, लेकिन सूत्रों के अनुसार 2026–2028 के लिए रक्षा सहयोग का एक रोडमैप तैयार किया गया है, जिसमें प्रशिक्षण, औद्योगिक साझेदारी और खुफिया सहयोग के ठोस कदम शामिल हैं।


विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण

(क) परिचालन समन्वय

यूएई की थल सेना अपने आधुनिक त्वरित-तैनाती मॉडल और नेटवर्क-केंद्रित युद्धक दृष्टिकोण के लिए जानी जाती है। भारत की सेना भी थिएटराइजेशन और नेटवर्क-सक्षम ऑपरेशन की दिशा में तेजी से बढ़ रही है। इस संदर्भ में दोनों सेनाओं के बीच संयुक्त आरएंडडी (Joint R&D) एआई-सक्षम युद्धक्षेत्र प्रबंधन, डेटा लिंक प्रणाली और रोबोटिक युद्ध तकनीकों में परस्पर लाभकारी सिद्ध हो सकती है।

(ख) कूटनीतिक संकेत

यह यात्रा उस समय हुई जब लाल सागर और अदन की खाड़ी में हूती विद्रोहियों की गतिविधियाँ बढ़ी हुई हैं। ऐसे समय में यह यात्रा भारत और यूएई के बीच नौवहन स्वतंत्रता (Freedom of Navigation) के प्रति साझा प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है। यह यूएई जैसे खाड़ी देशों को भारत की “विश्वसनीय सुरक्षा भागीदार” (Reliable Security Partner) की भूमिका के प्रति विश्वास प्रदान करती है।

साथ ही, यह भारत की Act West Policy को भी सशक्त बनाती है — जिसके तहत भारत पश्चिम एशिया में केवल ऊर्जा या प्रवासी संबंधों तक सीमित न रहकर एक सुरक्षा सहयोगी की भूमिका निभाना चाहता है।

(ग) चुनौतियाँ और सीमाएँ

हालांकि प्रगति स्पष्ट है, परंतु कुछ संरचनात्मक चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं —

  • भारत रक्षा साझेदारी में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (ToT) पर जोर देता है, जबकि यूएई की प्राथमिकता तत्काल हथियार खरीद पर अधिक केंद्रित है।
  • यूएई अमेरिका के Integrated Air and Missile Defence System का हिस्सा है, जिससे भारत–यूएई सहयोग को महाशक्ति प्रतिद्वंद्विता के जाल में फँसने का जोखिम बना रहता है।
  • नौकरशाही प्रक्रियाएँ और रक्षा अनुबंधों की स्वीकृति में विलंब भी द्विपक्षीय परियोजनाओं की गति को प्रभावित कर सकता है।

निष्कर्ष

मेजर जनरल यूसुफ मायूफ सईद अल हलामी की भारत यात्रा ने भारत–यूएई रक्षा संबंधों को केवल प्रतीकात्मक संवाद से आगे बढ़ाकर संरचित, संस्थागत और परिणामोन्मुख सहयोग के नए चरण में प्रवेश कराया है।
संयुक्त प्रशिक्षण, सह-विकास और क्षेत्रीय सुरक्षा परामर्श की दिशा में उठाए गए कदम दोनों देशों को ऐसे साझेदार के रूप में स्थापित करते हैं जो केवल परस्पर लाभ ही नहीं, बल्कि व्यापक क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भी उत्तरदायी हैं।

भारत के लिए यह साझेदारी खाड़ी क्षेत्र में उसकी रणनीतिक गहराई (Strategic Depth) को बढ़ाती है, जबकि यूएई के लिए भारत एक ऐसा विश्वसनीय सहयोगी है जो उसे तकनीकी, मानव और सामरिक क्षमताओं में मजबूती प्रदान करता है।
भविष्य में यदि दोनों देश राजनीतिक इच्छाशक्ति और संस्थागत समन्वय को बनाए रखते हैं, तो यह साझेदारी पश्चिम एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र में एक नए सुरक्षा प्रतिमान (Security Paradigm) की नींव रख सकती है।


संदर्भ

  • प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो, भारत सरकार (28 अक्टूबर 2025)
  • यूएई रक्षा मंत्रालय वक्तव्य (28 अक्टूबर 2025)
  • The Hindu रिपोर्ट

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