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Rising Attacks on Hindu Minorities in Bangladesh: Global Silence and Human Rights Concerns

The Silent Genocide: Persecution of Hindus in Bangladesh and the Moral Failure of the Global Community In an age where conflicts in Gaza, Ukraine, and other flashpoints command the world’s attention, a quieter yet deeply disturbing humanitarian crisis continues to unfold next door to India — in Bangladesh. Since the political upheaval and resignation of Prime Minister Sheikh Hasina in August 2024, reports of violence against the Hindu minority have escalated dramatically. Killings, arson attacks, vandalism of temples, forced displacement, economic boycotts, and intimidation have become frighteningly frequent. According to figures cited by Indian authorities, more than 2,200 incidents of violence against Hindus were recorded in 2024 alone , with similar patterns continuing through 2025 and into 2026. Independent reports corroborate these trends: homes torched, idols desecrated, businesses looted, and families compelled to flee ancestral lands. Yet, despite the mounting evidence, the w...

Afghanistan–Pakistan Border Conflict 2025: Implications for India’s Diplomacy and Security | UPSC Analysis

अफगानिस्तान–पाकिस्तान सीमा संघर्ष 2025: भारत की कूटनीति और सुरक्षा पर प्रभाव | UPSC विश्लेषण

प्रस्तावना

अक्टूबर 2025 में अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच डूरंड रेखा पर हुआ सैन्य संघर्ष दक्षिण एशिया की सुरक्षा परिदृश्य को गहराई से प्रभावित करने वाली घटना है। इस झड़प में दर्जनों सैनिकों की मौत, सीमा पार हमले, और प्रमुख व्यापारिक मार्गों की बंदी ने न केवल दोनों देशों के बीच अविश्वास को गहरा किया, बल्कि भारत सहित क्षेत्रीय शक्तियों के लिए भी नई रणनीतिक चुनौतियाँ प्रस्तुत कीं।
यह संघर्ष केवल एक “सीमाई घटना” नहीं है — यह डूरंड रेखा विवाद, तालिबान शासन की वैचारिक प्रकृति, पाकिस्तान की सुरक्षा नीति, और भारत की क्षेत्रीय रणनीति के बीच अंतर्संबंधों का प्रतिबिंब है।


1. संघर्ष का सारांश और रणनीतिक परिप्रेक्ष्य

अफगान तालिबान और पाकिस्तान के बीच संघर्ष की नवीनतम कड़ी अक्टूबर 2025 में तब उभरी जब पाकिस्तानी हवाई हमलों(10 अक्टूबर को TTP के वरिष्ठ नेता नूर वली मेहसूद को टारगेट करके) के जवाब में तालिबान ने “बदले की कार्रवाई” करते हुए कई सीमा चौकियों पर हमला किया। तालिबान के अनुसार, 58 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए, जबकि पाकिस्तान ने दर्जनों अफगान लड़ाकों की मौत का दावा किया। इसके बाद पाकिस्तान ने तोरखम और चमन जैसे प्रमुख सीमा बिंदु बंद कर दिए, जिससे व्यापार और मानवीय सहायता ठप हो गई।

यह टकराव दो स्तरों पर देखा जा सकता है:

  • सैन्य स्तर पर — सीमा पर नियंत्रण, टीटीपी (Tehrik-e-Taliban Pakistan) के ठिकानों पर कार्रवाई, और प्रतिशोधी हमले।
  • राजनीतिक स्तर पर — तालिबान की संप्रभुता की घोषणा बनाम पाकिस्तान की “रणनीतिक गहराई” की नीति।

2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: डूरंड रेखा का विवाद

1893 की डूरंड रेखा (Durand Line) ब्रिटिश भारत और अफगान अमीर अब्दुर रहमान खान के बीच की गई एक प्रशासनिक रेखा थी।
1947 में पाकिस्तान की स्थापना के बाद से ही अफगानिस्तान ने इस सीमा को मान्यता नहीं दी — यह मानते हुए कि यह पश्तून जनजातीय क्षेत्र को कृत्रिम रूप से विभाजित करती है, कारण यह है कि इस क्षेत्र में बार्डर के दोनों ओर पश्तून आबादी रहती है।
अफगान दृष्टिकोण: यह रेखा औपनिवेशिक विरासत है और राष्ट्रीय संप्रभुता का उल्लंघन करती है।
पाकिस्तानी दृष्टिकोण: यह एक अंतरराष्ट्रीय मान्य सीमा है, जिसकी सुरक्षा आवश्यक है।

यह विवाद केवल भूगोल नहीं, बल्कि पश्तून राष्ट्रवाद, उग्रवाद और पहचान की राजनीति से भी जुड़ा हुआ है।


3. संघर्ष के मूल कारण

(क) टीटीपी और “रणनीतिक गहराई” की विफलता

पाकिस्तान ने 1990 के दशक में “रणनीतिक गहराई” (Strategic Depth) की नीति के तहत तालिबान को समर्थन दिया, ताकि भारत के खिलाफ एक मित्रवत अफगान शासन तैयार हो।

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ के “लाल मस्जिद अभियान (2007)” और अमेरिका समर्थित “War on Terror” में पाकिस्तान की भागीदारी के विरोध में कई स्थानीय तालिबान गुटों ने मिलकर TTP का गठन 2007 में किया।

TTP की विचारधारा और उद्देश्य:

पाकिस्तान में इस्लामी शरीयत कानून लागू करना।

पाकिस्तानी सेना और राज्य को “अमेरिका का सहयोगी” कहकर उसके खिलाफ जिहाद छेड़ना।

अफ़ग़ान तालिबान की विचारधारा से प्रेरित, परन्तु उसका एजेंडा पाकिस्तान-केंद्रित है।

धार्मिक चरमपंथ और पश्तून राष्ट्रवाद का मिश्रित स्वरूप।


लेकिन 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद TTP अपने आपको ज्यादा सुरक्षित और मजबूत समझने लगा — अब टीटीपी पाकिस्तान पर ही हमले कर रहा है, जबकि काबुल सरकार उन पर नियंत्रण नहीं रख पा रही या नहीं रखना चाहती। जिसके कारण पाकिस्तान ने अफगानिस्तान पर TTP जैसे उग्रवादी समूहों को शरण देने का आरोप लगाया है।

पाकिस्तान कि उक्त नीति इस बात का प्रतीक है कि “प्रॉक्सी” समूहों पर आधारित सुरक्षा नीति अंततः आत्मघाती साबित होती है।

(ख) डूरंड रेखा का अस्वीकार

तालिबान शासन ने कभी औपचारिक रूप से डूरंड रेखा को स्वीकार नहीं किया। सीमा पर बाड़ लगाने और पाकिस्तानी गश्त को अक्सर “अतिक्रमण” कहा गया है।
यह अस्वीकार पाकिस्तान के लिए सुरक्षा दुविधा (Security Dilemma) का रूप ले चुका है।

(ग) क्षेत्रीय प्रभाव और भारत कारक

अफगान विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी की हाल की नई दिल्ली यात्रा और भारत के साथ पुनः संपर्क बढ़ाना पाकिस्तान के लिए असुविधाजनक है।
इससे यह संकेत मिला कि तालिबान शासन अब पाकिस्तान के प्रभाव से बाहर निकलकर बहुध्रुवीय कूटनीति अपनाना चाहता है।
यह पाकिस्तान की “पारंपरिक सामरिक स्थिति” को कमजोर करता है और भारत के लिए अवसर प्रस्तुत करता है।


4. संघर्ष के प्रभाव

(क) क्षेत्रीय सुरक्षा पर प्रभाव

  • सीमा पर हिंसा से दक्षिण एशिया की सामूहिक सुरक्षा संरचना अस्थिर होती है।
  • पाकिस्तान को अब दो मोर्चों पर खतरा है — पूर्व में भारत और पश्चिम में अफगानिस्तान
  • इससे पाकिस्तान की सैन्य और आर्थिक स्थिति और कमजोर होगी, जिससे क्षेत्रीय असंतुलन की संभावना बढ़ती है।

(ख) मानवीय और आर्थिक प्रभाव

  • तोरखम और चमन जैसे व्यापारिक मार्गों के बंद होने से अफगानिस्तान की नाजुक अर्थव्यवस्था पर प्रतिदिन करोड़ों डॉलर का असर पड़ा।
  • सीमा पर हजारों शरणार्थी और ट्रक फंसे, जिससे मानवीय संकट गहरा गया।

(ग) कूटनीतिक प्रभाव

  • कतर और सऊदी अरब जैसे मध्यस्थ देशों को हस्तक्षेप करना पड़ा, लेकिन केवल अस्थायी शांति बनी।
  • यह संघर्ष इस्लामी जगत के भीतर सत्ता-संतुलन की नई रेखाएं खींचता है — जहां सऊदी, कतर और ईरान की भूमिका प्रतिस्पर्धी हो रही है।

5. भारत के दृष्टिकोण से विश्लेषण

(क) सुरक्षा परिप्रेक्ष्य (GS Paper 3)

भारत के लिए यह संघर्ष निम्न कारणों से महत्वपूर्ण है:

  1. पश्चिमी सीमा पर अस्थिरता भारत की आंतरिक सुरक्षा और कश्मीर क्षेत्र की संवेदनशीलता को प्रभावित कर सकती है।
  2. पाकिस्तान की सेना यदि दो मोर्चों में उलझती है, तो भारत को सीमित सामरिक राहत मिल सकती है।
  3. लेकिन अस्थिर अफगानिस्तान में आईएस-के (ISIS-K) और अन्य आतंकी समूहों के पुनर्सक्रिय होने का खतरा भी बढ़ता है।

(ख) कूटनीतिक परिप्रेक्ष्य (GS Paper 2)

भारत ने 2021 के बाद से तालिबान के साथ संपर्क बनाए रखा, पर औपचारिक मान्यता नहीं दी
मुत्तकी की नई दिल्ली यात्रा इस बात का संकेत है कि भारत “संपर्क बनाए रखते हुए सावधानी की नीति” (Engagement without Recognition) अपना रहा है।
यह नीति भारत को अफगानिस्तान में मानवीय सहायता, शिक्षा और विकास परियोजनाओं के माध्यम से पुनः प्रभाव स्थापित करने में मदद करती है।

(ग) रणनीतिक परिप्रेक्ष्य

  • अफगान-पाक तनाव से भारत को काबुल के साथ संतुलित संबंध विकसित करने का अवसर मिलता है।
  • चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) इस अस्थिरता से प्रभावित हो सकता है, जिससे भारत की उत्तरी रणनीतिक स्थिति को अप्रत्यक्ष लाभ हो सकता है।
  • भारत के लिए यह समय है कि वह चाबहार पोर्ट और अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) जैसी परियोजनाओं को पुनर्जीवित करे, ताकि अफगानिस्तान तक पहुंच पाकिस्तान पर निर्भर न हो।

6. व्यापक भू-राजनीतिक निहितार्थ

कारक संभावित परिणाम
डूरंड रेखा विवाद स्थायी समाधान के बिना सीमाई हिंसा जारी रहेगी
टीटीपी की सक्रियता पाकिस्तान के अंदरूनी अस्थिरता बढ़ेगी
तालिबान की भारत-झुकाव नीति पाकिस्तान की “रणनीतिक गहराई” समाप्त होगी
चीन का दृष्टिकोण बीआरआई परियोजनाएं जोखिम में
मध्य एशिया का प्रभाव क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन में नया ध्रुव बन सकता है

7. UPSC परीक्षा दृष्टिकोण

GS Paper 2 विषय – अंतरराष्ट्रीय संबंध, भारत की पड़ोसी नीति, कूटनीति और विदेश नीति।
GS Paper 3 विषय – आंतरिक सुरक्षा, सीमापार आतंकवाद, और क्षेत्रीय स्थिरता।
संभावित प्रश्न:

  1. “अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा विवाद दक्षिण एशिया की सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था को कैसे प्रभावित करता है?”
  2. “टीटीपी और डूरंड रेखा विवाद पाकिस्तान की रणनीतिक गहराई नीति की विफलता को कैसे दर्शाते हैं?”
  3. “भारत की ‘संपर्क बिना मान्यता’ नीति अफगानिस्तान में स्थिरता को कैसे संतुलित कर सकती है?”

8. निष्कर्ष

अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर अक्टूबर 2025 का संघर्ष यह दर्शाता है कि औपनिवेशिक विरासत, आतंकवाद और रणनीतिक अविश्वास का मिश्रण आज भी दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
भारत के लिए यह समय है कि वह

  • कूटनीतिक रूप से सक्रिय,
  • आर्थिक रूप से निवेशक, और
  • रणनीतिक रूप से संतुलित भूमिका निभाए।

यदि भारत अपनी “Neighbourhood First” नीति को स्थिरता और पारदर्शिता के साथ आगे बढ़ाता है, तो यह संघर्ष भारत के लिए जोखिम नहीं, बल्कि अवसर बन सकता है — क्षेत्रीय शांति के एक नए प्रतिमान के रूप में।


With Times of India Inputs 

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