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Rising Attacks on Hindu Minorities in Bangladesh: Global Silence and Human Rights Concerns

The Silent Genocide: Persecution of Hindus in Bangladesh and the Moral Failure of the Global Community In an age where conflicts in Gaza, Ukraine, and other flashpoints command the world’s attention, a quieter yet deeply disturbing humanitarian crisis continues to unfold next door to India — in Bangladesh. Since the political upheaval and resignation of Prime Minister Sheikh Hasina in August 2024, reports of violence against the Hindu minority have escalated dramatically. Killings, arson attacks, vandalism of temples, forced displacement, economic boycotts, and intimidation have become frighteningly frequent. According to figures cited by Indian authorities, more than 2,200 incidents of violence against Hindus were recorded in 2024 alone , with similar patterns continuing through 2025 and into 2026. Independent reports corroborate these trends: homes torched, idols desecrated, businesses looted, and families compelled to flee ancestral lands. Yet, despite the mounting evidence, the w...

UPSC Current Affairs: 10 May 2025

 भारत-पाक तनाव और G7 की अपील: वैश्विक शांति की कठिन परीक्षा

प्रस्तावना: एक चिंगारी जो विश्व को झकझोर रही है

9 मई 2025 को, विश्व के सात सबसे शक्तिशाली देशों के समूह G7 (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, कनाडा, जापान) ने भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव पर चिंता जताते हुए “तत्काल तनाव कम करने” और “अधिकतम संयम” की भावुक अपील की। यह अपील तब आई, जब भारत ने “ऑपरेशन सिंदूर” के तहत पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में आतंकवादी ठिकानों पर सटीक सैन्य कार्रवाई की। इस कार्रवाई ने न केवल दक्षिण एशिया को, बल्कि पूरे विश्व को सांसें थामने पर मजबूर कर दिया। आखिर, यह तनाव केवल दो पड़ोसियों का झगड़ा नहीं, बल्कि वैश्विक शांति के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका है।

G7 का बयान: शांति की पुकार

G7 के विदेश मंत्रियों ने एकजुट होकर कहा:  

“भारत और पाकिस्तान, दोनों परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं। हम दोनों से आग्रह करते हैं कि वे संयम बरतें और तनाव को तुरंत कम करें, ताकि क्षेत्रीय और वैश्विक शांति बनी रहे।”  

यह बयान केवल शब्दों का समूह नहीं था। G7 ने चेतावनी दी कि यह संकट वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति और व्यापार को अस्थिर कर सकता है, खासकर तब जब यूक्रेन और मध्य-पूर्व पहले से ही अशांति के भंवर में फंसे हैं। यह एक तरह से विश्व समुदाय की चेतावनी थी: “सावधान, यह आग सबको जलाकर राख कर सकती है!”

G7 क्यों चिंतित है?

G7 की बेचैनी के पीछे कई ठोस कारण हैं, जो इस तनाव को वैश्विक मंच पर गंभीर बनाते हैं:

परमाणु खतरे का साया: भारत और पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार हैं। अगर यह तनाव युद्ध में बदला, तो परमाणु तबाही की आशंका किसी डरावने सपने से कम नहीं।  

एशिया में अस्थिरता का जाल: अफगानिस्तान, ईरान और चीन जैसे पड़ोसी देश पहले से ही अशांति का केंद्र हैं। भारत-पाक तनाव इस आग में और घी डाल सकता है, जिसका असर पूरे एशिया और विश्व पर पड़ेगा।  

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संकट: भारत हिंद महासागर में व्यापार का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। तनाव बढ़ने से तेल की आपूर्ति, टेक्नोलॉजी निर्यात और वैश्विक निवेश खतरे में पड़ सकते हैं।  

मानवता पर मंडराता खतरा: युद्ध की स्थिति में लाखों लोग बेघर हो सकते हैं, और मानवाधिकारों का उल्लंघन एक नई त्रासदी को जन्म दे सकता है।

भारत का रुख: आतंकवाद के खिलाफ बुलंद आवाज

भारत ने G7 की शांति अपील का स्वागत तो किया, लेकिन अपनी स्थिति को पूरी मजबूती से रखा। विदेश मंत्रालय ने कहा:  

“ऑपरेशन सिंदूर कोई आक्रमण नहीं, बल्कि आत्मरक्षा का कदम था। हमने उन आतंकवादी ठिकानों को नष्ट किया, जो हमारे नागरिकों की जान ले रहे थे। भारत शांति चाहता है, लेकिन आतंकवाद को बर्दाश्त नहीं करेगा।”  

भारत का यह रुख साफ है: आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई उसका संप्रभु अधिकार है, और वह इसमें कोई समझौता नहीं करेगा। यह एक तरह से विश्व समुदाय को संदेश था कि भारत अपनी सुरक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाएगा।

पाकिस्तान का जवाब: आक्रोश और कूटनीति

पाकिस्तान ने भारत की कार्रवाई को “अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन” करार दिया और संयुक्त राष्ट्र से हस्तक्षेप की मांग की। इस्लामाबाद ने अपने वायु क्षेत्र को पूरी तरह बंद कर दिया, जिससे दक्षिण एशिया का हवाई यातायात ठप हो गया। यह कदम न केवल भारत, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए आर्थिक और रणनीतिक चुनौती बन गया है।  

वैश्विक समुदाय की भूमिका: कौन कहां खड़ा है?  

संयुक्त राष्ट्र: महासचिव ने “गंभीर चिंता” जताई है, लेकिन अभी तक कोई आपात बैठक नहीं बुलाई गई।  

चीन और रूस: चीन ने दोनों पक्षों से संयम बरतने को कहा, जबकि रूस ने भारत के आतंकवाद विरोधी रुख का समर्थन किया।  

OIC (इस्लामिक सहयोग संगठन): मुस्लिम देशों के इस संगठन ने पाकिस्तान का पक्ष लेते हुए भारत की कार्रवाई की जांच की मांग की।

यह स्थिति दिखाती है कि वैश्विक मंच पर देश अपने हितों और गठजोड़ के आधार पर बंटे हुए हैं।  

क्या है असली चुनौती?

यह तनाव केवल भारत और पाकिस्तान का द्विपक्षीय मामला नहीं रहा। यह वैश्विक शांति, अर्थव्यवस्था और मानवता के लिए एक जटिल चुनौती बन चुका है। G7 का बयान एक कूटनीतिक दबाव है, जो दोनों देशों को वार्ता की मेज पर लाने की कोशिश करता है। लेकिन भारत का आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रुख और पाकिस्तान का आक्रामक जवाब इस रास्ते को मुश्किल बना रहे हैं।  

आवश्यक है कि दोनों देश संयम, वार्ता और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के जरिए इस तनाव को कम करें। यह न केवल दक्षिण एशिया, बल्कि पूरे विश्व की शांति और स्थिरता के लिए जरूरी है।  

निष्कर्ष: शांति की राह पर कदम

भारत-पाक तनाव और G7 की अपील हमें यह याद दिलाती है कि आज की दुनिया में कोई भी संकट स्थानीय नहीं रहता। यह एक ऐसा दौर है, जहां एक छोटी सी चिंगारी वैश्विक आग बन सकती है। भारत और पाकिस्तान को चाहिए कि वे कूटनीति और संवाद का रास्ता चुनें, ताकि न केवल क्षेत्रीय, बल्कि वैश्विक शांति का मार्ग प्रशस्त हो।  

UPSC के लिए प्रमुख बिंदु:  

GS Paper 2: अंतरराष्ट्रीय संबंध, G7 की कूटनीतिक भूमिका, भारत की विदेश नीति।  

GS Paper 3: आतंकवाद विरोधी रणनीति, राष्ट्रीय सुरक्षा, परमाणु जोखिम।  

निबंध: “आतंकवाद बनाम संप्रभुता: भारत की रणनीतिक चुनौतियां”।

प्रश्न चिंतन के लिए:  

क्या भारत का आतंकवाद विरोधी रुख वैश्विक शांति के लिए खतरा है या समाधान?  

G7 जैसे समूह क्षेत्रीय संकटों में कितने प्रभावी हैं?

यह लेख न केवल तनाव की गंभीरता को दर्शाता है, बल्कि पाठकों को वैश्विक परिदृश्य में भारत की भूमिका पर सोचने के लिए प्रेरित करता है।

2-भारत-पाकिस्तान युद्धविराम समझौता: एक नई आशा की किरण

10 मई 2025 का दिन भारत-पाकिस्तान संबंधों के इतिहास में एक स्वर्णिम पृष्ठ जोड़ने वाला साबित हुआ, जब दोनों देशों ने नियंत्रण रेखा (LoC) पर पूर्ण युद्धविराम की घोषणा की। भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री की इस घोषणा को पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री व विदेश मंत्री इशाक डार, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी समर्थन देकर इसे वैश्विक स्तर पर मजबूती प्रदान की। यह समझौता न केवल दोनों देशों के बीच तनाव को कम करने की दिशा में एक साहसिक कदम है, बल्कि दक्षिण एशिया में शांति और स्थिरता की नई संभावनाओं को भी जन्म देता है।

पृष्ठभूमि: तनाव से संवाद की ओर

2024 के अंत और 2025 की शुरुआत में ही नियंत्रण रेखा पर बार-बार होने वाले युद्धविराम उल्लंघनों और भारत की 'ऑपरेशन सिंदूर' जैसी सैन्य कार्रवाइयों ने दोनों देशों के बीच तल्खी को चरम पर पहुंचा दिया था। विशेष रूप से 7-8 मई 2025 को पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में आतंकी ठिकानों पर भारत के लक्षित हमलों ने स्थिति को और जटिल कर दिया। कूटनीतिक रास्ते बंद होने की कगार पर थे, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय, खासकर अमेरिका के दबाव और मध्यस्थता ने दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

युद्धविराम समझौते की मुख्य विशेषताएं

यह समझौता कुछ ठोस और स्पष्ट बिंदुओं पर आधारित है, जो इसे पहले के समझौतों से अधिक प्रभावी बनाते हैं:

तत्काल प्रभाव से शांति स्थापना: दोनों देशों की सेनाएं नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर गोलीबारी को पूरी तरह बंद करेंगी। यह कदम सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए राहत का सबब बनेगा।

संयुक्त निगरानी तंत्र: युद्धविराम की निगरानी के लिए दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच एक प्रत्यक्ष संवाद तंत्र स्थापित किया जाएगा। यह तंत्र पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करेगा।

आतंकवाद पर सख्ती की उम्मीद: भारत ने हमेशा से आतंकवाद को अपनी प्रमुख चिंता बताया है। इस समझौते में पाकिस्तान से यह अपेक्षा की गई है कि वह अपनी धरती से आतंकी गतिविधियों को समर्थन देना बंद करे।

अमेरिका की कूटनीतिक भूमिका

अमेरिका ने इस समझौते को संभव बनाने में एक कुशल मध्यस्थ की भूमिका निभाई। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कई दौर की गुप्त बातचीत (बैकचैनल डिप्लोमेसी) के जरिए दोनों देशों को एक मंच पर लाने में सफलता हासिल की। यह न केवल अमेरिका की दक्षिण एशिया में बढ़ती कूटनीतिक सक्रियता को दर्शाता है, बल्कि क्षेत्रीय शांति के लिए उसकी प्रतिबद्धता को भी रेखांकित करता है।

भारत के लिए अवसर

इस समझौते से भारत को कई रणनीतिक और आर्थिक लाभ मिलने की संभावना है:

आंतरिक सुरक्षा पर ध्यान: सीमाओं पर शांति भारत को जम्मू-कश्मीर में विकास कार्यों, बुनियादी ढांचे और सामाजिक एकीकरण पर अधिक ध्यान देने का मौका देगी।

कूटनीतिक मजबूती: भारत ने अपनी सैन्य ताकत और कूटनीतिक चातुर्य का उपयोग करते हुए बिना किसी रियायत के यह समझौता हासिल किया, जो उसकी वैश्विक छवि को और मजबूत करता है।

आर्थिक प्रगति: शांतिपूर्ण माहौल विदेशी निवेशकों और उद्योगों के लिए भारत को और आकर्षक बनाएगा, जिससे 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' जैसे अभियानों को बल मिलेगा।

पाकिस्तान की चुनौतियां

पाकिस्तान के लिए यह समझौता कई चुनौतियों के साथ आता है:

सैन्य-नागरिक तालमेल: पाकिस्तान की सेना और सरकार के बीच नीतिगत समन्वय की कमी इस समझौते के कार्यान्वयन में बाधा बन सकती है।

आतंकवाद पर कार्रवाई: अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेषकर भारत, पाकिस्तान से आतंकी संगठनों के खिलाफ ठोस और दिखाई देने वाली कार्रवाई की उम्मीद करेगा।

छवि सुधार का दबाव: यह समझौता पाकिस्तान के लिए अपनी वैश्विक छवि को सुधारने का एक अवसर है, लेकिन यह तभी संभव होगा जब वह अपनी प्रतिबद्धताओं पर खरा उतरे।

भविष्य की संभावनाएं और आशंकाएं

सकारात्मक संभावनाएं:

द्विपक्षीय संवाद का नया दौर: यह समझौता व्यापार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और लोगों के बीच संपर्क को बढ़ाने का आधार तैयार कर सकता है।

क्षेत्रीय स्थिरता: दक्षिण एशिया में शांति से अफगानिस्तान और अन्य पड़ोसी देशों को भी लाभ होगा।

वैश्विक समर्थन: अंतरराष्ट्रीय समुदाय का समर्थन दोनों देशों को इस समझौते को मजबूत करने के लिए प्रेरित करेगा।

प्रमुख आशंकाएं:

पिछले समझौतों का इतिहास: पाकिस्तान ने अतीत में युद्धविराम समझौतों का बार-बार उल्लंघन किया है, जिसके कारण भारत में विश्वास की कमी है।

आतंकवाद का खतरा: यदि पाकिस्तान आतंकी गतिविधियों पर लगाम नहीं कसता, तो यह समझौता अल्पकालिक साबित हो सकता है।

चीन का प्रभाव: चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) और अन्य रणनीतिक साझेदारियां इस समझौते की प्रगति को प्रभावित कर सकती हैं।

निष्कर्ष: शांति की ओर एक सतर्क कदम

भारत-पाकिस्तान युद्धविराम समझौता 2025 एक ऐतिहासिक कदम है, जो उपमहाद्वीप में शांति की नई उम्मीद जगाता है। यह समझौता उस समय और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जब दोनों देशों के बीच युद्ध की आशंका अपने चरम पर थी। हालांकि, इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि पाकिस्तान अपनी प्रतिबद्धताओं को कितनी गंभीरता से लागू करता है और भारत अपनी रणनीतिक सतर्कता के साथ शांति की दिशा में कितना आगे बढ़ता है। यह समझौता न केवल दोनों देशों, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के लिए एक सुनहरा अवसर है, बशर्ते इसे विश्वास, पारदर्शिता और सहयोग के साथ लागू किया जाए।



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