आतंकवाद का बदलता स्वरूप: शिक्षित वर्ग की संलिप्तता और नीतिगत परिवर्तनों की आवश्यकता
परिचय
आतंकवाद एक वैश्विक चुनौती है जो समय के साथ अपने रूप, रणनीतियों और भागीदारों में परिवर्तन करता रहा है। पारंपरिक रूप से, आतंकवाद को अशिक्षित या आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों से जोड़ा जाता था, जहां गरीबी, अशिक्षा और सामाजिक असंतोष मुख्य कारक माने जाते थे। हालांकि, हाल के वर्षों में, 'व्हाइट कॉलर टेररिज्म' का उदय एक नई प्रवृत्ति को इंगित करता है, जहां शिक्षित पेशेवर—जैसे डॉक्टर, इंजीनियर, वकील और प्रोफेसर—आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्त पाए जा रहे हैं। भारत के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह द्वारा 'व्हाइट कॉलर टेररिज्म' पर जताई गई चिंता, विशेष रूप से दिल्ली के रेड फोर्ट में हुए कथित कार बम धमाके के संदर्भ में, जहां आरोपी पेशेवर डॉक्टर थे और उनके पास RDX पाया गया, इस मुद्दे की गंभीरता को रेखांकित करती है। यह लेख इस प्रश्न की जांच करता है कि क्या आतंकवाद का स्वरूप अब शिक्षित वर्ग तक पहुंच चुका है और क्या इसे रोकने के लिए नीतियों में बदलाव आवश्यक है। यह विश्लेषण ऐतिहासिक संदर्भ, empiric साक्ष्य और नीतिगत सिफारिशों पर आधारित है।
आतंकवाद के बदलते स्वरूप का ऐतिहासिक और empiric विश्लेषण
आतंकवाद के इतिहास में, शिक्षित व्यक्तियों की संलिप्तता कोई नई बात नहीं है, लेकिन इसकी आवृत्ति और प्रभाव में वृद्धि हुई है। 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, जैसे कि अल्जीरियाई स्वतंत्रता संग्राम या वियतनाम युद्ध के दौरान, कई शिक्षित बुद्धिजीवी और पेशेवरों ने चरमपंथी आंदोलनों में भाग लिया। हाल के दशकों में, वैश्विक स्तर पर इस प्रवृत्ति का विस्तार हुआ है। उदाहरणस्वरूप:
9/11 हमलों का संदर्भ: संयुक्त राज्य अमेरिका में 2001 के हमलों में शामिल कई अल-कायदा सदस्य इंजीनियरिंग और मेडिकल बैकग्राउंड वाले थे। मोहम्मद अत्ता, मुख्य पायलट, एक शहरी नियोजन विशेषज्ञ था। डिएगो गैम्बेटा और स्टेफन हर्टोग के अध्ययन (2016, "Engineers of Jihad") में पाया गया कि इंजीनियरों की आतंकवादी समूहों में अत्यधिक प्रतिनिधित्व है, जो उनकी तकनीकी कुशलता और निराशा से प्रेरित होने का संकेत देता है।
यूरोपीय और मध्य पूर्वी उदाहरण: आईएसआईएस (ISIS) में शामिल होने वाले कई यूरोपीय नागरिक उच्च शिक्षा प्राप्त थे। ब्रिटेन के 'जिहादी जॉन' (मोहम्मद एम्वाजी) एक कंप्यूटर प्रोग्रामर था। ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन के एक रिपोर्ट (2015) के अनुसार, आईएसआईएस के 20% से अधिक भर्ती उच्च शिक्षा प्राप्त थे, जो सोशल मीडिया और प्रचार के माध्यम से रेडिकलाइजेशन को दर्शाता है।
भारतीय संदर्भ: भारत में, लश्कर-ए-तैयबा और इंडियन मुजाहिदीन जैसे समूहों में शिक्षित युवाओं की संलिप्तता बढ़ी है। 2008 के मुंबई हमलों में शामिल डेविड हेडली एक शिक्षित अमेरिकी-पाकिस्तानी था। हाल ही में, राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) द्वारा पकड़े गए कई संदिग्ध आईआईटी और मेडिकल कॉलेजों के पूर्व छात्र रहे हैं। रक्षामंत्री सिंह का उल्लेखित बयान इस प्रवृत्ति को मजबूत करता है, जहां 'व्हाइट कॉलर' पेशेवरों की भागीदारी न केवल तकनीकी सहायता प्रदान करती है बल्कि सामाजिक विश्वसनीयता भी बढ़ाती है।
empiric डेटा से स्पष्ट है कि आतंकवाद अब केवल 'अशिक्षित' या 'गरीब' वर्ग तक सीमित नहीं है। पीटर बर्गन के "United States of Jihad" (2016) में तर्क दिया गया है कि शिक्षा और आर्थिक स्थिरता रेडिकलाइजेशन को रोकने में अपर्याप्त हैं; इसके बजाय, वैचारिक असंतोष, पहचान संकट और ऑनलाइन प्रचार मुख्य कारक हैं। विश्व बैंक के एक अध्ययन (2020) के अनुसार, उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों में रेडिकलाइजेशन की दर विकासशील देशों में 15-20% तक पहुंच सकती है, विशेष रूप से जहां राजनीतिक अस्थिरता या सांस्कृतिक संघर्ष मौजूद हैं।
यह बदलाव कई कारकों से प्रेरित है:
1. डिजिटल रेडिकलाइजेशन: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (जैसे टेलीग्राम, ट्विटर) शिक्षित युवाओं को आसानी से प्रभावित करते हैं। एफबीआई रिपोर्ट्स (2022) दिखाते हैं कि 70% रेडिकलाइजेशन ऑनलाइन होता है।
2. सामाजिक-आर्थिक असंतुलन: उच्च शिक्षा के बावजूद बेरोजगारी या असमानता निराशा पैदा करती है, जो चरमपंथ की ओर ले जाती है।
3. वैचारिक आकर्षण: शिक्षित व्यक्ति अक्सर जटिल विचारधाराओं (जैसे इस्लामिक स्टेट की 'कैलिफेट' अवधारणा) से आकर्षित होते हैं, जो उन्हें 'उद्देश्यपूर्ण' जीवन प्रदान करती प्रतीत होती है।
नीतिगत परिवर्तनों की आवश्यकता
इस बदलते स्वरूप को रोकने के लिए मौजूदा नीतियां अपर्याप्त हैं, जो मुख्य रूप से सीमा सुरक्षा, सैन्य कार्रवाई और आर्थिक विकास पर केंद्रित हैं। निम्नलिखित परिवर्तन आवश्यक हैं:
1. शिक्षा और रेडिकलाइजेशन रोकथाम: स्कूल और विश्वविद्यालयों में क्रिटिकल थिंकिंग और मीडिया लिटरेसी को शामिल करें। भारत में, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) को विस्तारित कर रेडिकलाइजेशन मॉड्यूल जोड़ें। यूरोपीय संघ की 'Prevent' रणनीति (2005) एक मॉडल हो सकती है, जहां शिक्षकों को संदिग्ध व्यवहार की पहचान सिखाई जाती है।
2. डिजिटल निगरानी और काउंटर-नैरेटिव: सरकारों को सोशल मीडिया कंपनियों के साथ सहयोग बढ़ाना चाहिए। भारत की IT एक्ट (2000) को अपडेट कर AI-आधारित मॉनिटरिंग शामिल करें। साथ ही, काउंटर-प्रचार अभियान चलाएं, जैसे कि अमेरिका का 'Think Again, Turn Away' प्रोग्राम।
3. सामाजिक-आर्थिक हस्तक्षेप: शिक्षित युवाओं के लिए रोजगार और मेंटरिंग प्रोग्राम विकसित करें। भारत में, 'स्किल इंडिया' को रेडिकलाइजेशन-प्रूफ बनाने के लिए मनोवैज्ञानिक समर्थन जोड़ें।
4. अंतरराष्ट्रीय सहयोग: संयुक्त राष्ट्र के काउंटर-टेररिज्म फ्रेमवर्क के तहत, शिक्षित टेररिज्म पर फोकस करें। भारत FATF (Financial Action Task Force) के माध्यम से फंडिंग ट्रैकिंग को मजबूत कर सकता है।
इन परिवर्तनों की अनुपस्थिति में, 'व्हाइट कॉलर टेररिज्म' बढ़ सकता है, क्योंकि शिक्षित व्यक्ति अधिक परिष्कृत हमलों (जैसे साइबर टेररिज्म) को अंजाम दे सकते हैं। हालांकि, नीतियां मानवाधिकारों का सम्मान करें, ताकि सामान्य शिक्षित नागरिकों पर अनावश्यक दबाव न पड़े।
निष्कर्ष
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा हाल ही में उजागर की गई 'व्हाइट कॉलर टेररिज्म' की वास्तविकता—जहाँ जीवन बचाने वाले डॉक्टरों के हाथों में 'Rx' के बजाय RDX आ जाता है—केवल एक घटना नहीं, बल्कि एक घातक संकेत है। 10 नवंबर 2025 को दिल्ली के लाल किले के निकट हुए आत्मघाती कार बम विस्फोट में 15 निर्दोष लोगों की जान लेने वाला मुख्य आरोपी डॉ. उमर उन नबी, और उसके साथ जुड़े अन्य डॉक्टर (मुजम्मिल गनाई, अदील अहमद, शाहीन सईद आदि), यह साबित करते हैं कि शिक्षा और पेशेवर योग्यता अब चरमपंथ से सुरक्षा की गारंटी नहीं रही।
यह बदलाव आतंकवाद के स्वरूप में एक मौलिक परिवर्तन दर्शाता है: पहले जहां गरीबी और अशिक्षा को मुख्य ईंधन माना जाता था, वहीं अब उच्च शिक्षित, मध्यम वर्गीय पेशेवर ऑनलाइन रेडिकलाइजेशन, वैचारिक निराशा और विदेशी हैंडलर्स के प्रभाव में आकर राष्ट्र-विरोधी कृत्यों को अंजाम दे रहे हैं। यह प्रवृत्ति न केवल भारत, बल्कि वैश्विक स्तर पर बढ़ रही है, जैसा कि 9/11, आईएसआईएस भर्तियों और अन्य अध्ययनों से प्रमाणित है।
यदि हम इस खतरे को नजरअंदाज करते हैं, तो परिणाम विनाशकारी होंगे—साइबर टेरर, जैविक हथियारों का खतरा और समाज में गहरा अविश्वास। इसलिए, मौजूदा नीतियाँ अब अपर्याप्त हैं। आवश्यक है एक बहुआयामी, आक्रामक और दूरदर्शी रणनीति:
- शिक्षा में केवल ज्ञान नहीं, बल्कि नैतिकता, चरित्र-निर्माण और क्रिटिकल थिंकिंग को अनिवार्य बनाना,
- डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर काउंटर-नैरेटिव और AI-आधारित निगरानी को मजबूत करना,
- शिक्षित युवाओं के लिए लक्षित मनोवैज्ञानिक समर्थन, रोजगार और सामाजिक एकीकरण कार्यक्रम चलाना,
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'व्हाइट कॉलर टेररिज्म' को नई श्रेणी में शामिल कर सहयोग बढ़ाना।
यह समय केवल प्रतिक्रिया का नहीं, बल्कि सक्रिय रोकथाम और मूल कारणों के उन्मूलन का है। यदि हम आज नहीं जागे, तो कल 'डॉक्टरों द्वारा लिखी गई मौत' की कहानियाँ और अधिक सुननी पड़ सकती हैं। राष्ट्र की सुरक्षा अब केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि हर शिक्षित मन के भीतर तय होनी चाहिए। यह चुनौती जितनी भयावह है, उतनी ही निर्णायक कार्रवाई की मांग करती है—क्योंकि ज्ञान के साथ यदि चरित्र नहीं, तो वही ज्ञान सबसे बड़ा हथियार बन जाता है।
संदर्भ
- Gambetta, D., & Hertog, S. (2016). Engineers of Jihad: The Curious Connection between Violent Extremism and Education. Princeton University Press.
- Bergen, P. (2016). United States of Jihad: Investigating America's Homegrown Terrorists. Crown.
- Brookings Institution. (2015). "ISIS in the West: The New Faces of Extremism".
- World Bank. (2020). "Pathways for Peace: Inclusive Approaches to Preventing Violent Conflict".
- United Nations Counter-Terrorism Centre. (2022). Reports on Digital Radicalization.
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