अमेरिका का विश्व स्वास्थ्य संगठन से अलगाव: वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था पर खतरा
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) से संयुक्त राज्य अमेरिका का औपचारिक अलगाव एक ऐसा कदम है जो न केवल बहुपक्षीय सहयोग की नींव को हिला रहा है, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा की संरचना को भी कमजोर कर रहा है। 22 जनवरी, 2026 को प्रभावी हुए इस निर्णय ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को स्तब्ध कर दिया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के प्रारंभ में ही जारी कार्यकारी आदेश के एक वर्ष बाद यह अलगाव हुआ, जिसका आधार कोविड-19 महामारी के दौरान डब्ल्यूएचओ की कथित विफलताएं बताई गई हैं। लेकिन क्या यह निर्णय अमेरिकी हितों की रक्षा करेगा, या वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों को और जटिल बनाएगा?
अमेरिका और डब्ल्यूएचओ का संबंध ऐतिहासिक रूप से गहरा रहा है। 1948 में स्थापित इस संगठन के संस्थापक सदस्य के रूप में अमेरिका ने न केवल वित्तीय योगदान दिया—जो कुल बजट का लगभग 18 प्रतिशत था—बल्कि तकनीकी विशेषज्ञता और नेतृत्व भी प्रदान किया। महामारी निगरानी, वैक्सीन विकास और वैश्विक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में अमेरिका की भूमिका अपरिहार्य रही है। हालांकि, 2020 में ट्रंप प्रशासन ने महामारी प्रबंधन को लेकर डब्ल्यूएचओ पर आरोप लगाते हुए अलगाव की प्रक्रिया शुरू की थी, जिसे बाइडेन प्रशासन ने 2021 में उलट दिया। अब 2025 में ट्रंप की वापसी के साथ यह मुद्दा पुनः उभरा है, जो अमेरिकी राजनीति में 'अमेरिका फर्स्ट' नीति की निरंतरता को दर्शाता है।
अमेरिकी प्रशासन का तर्क मुख्य रूप से डब्ल्यूएचओ की 'संस्थागत कमजोरियों' पर केंद्रित है। विदेश विभाग के अधिकारियों का कहना है कि संगठन ने कोविड-19 के प्रारंभिक चरण में पारदर्शिता नहीं दिखाई, चीन के प्रभाव में आकर समय पर चेतावनी नहीं दी और संरचनात्मक सुधारों में असफल रहा। इसके परिणामस्वरूप, अमेरिका ने 2024-25 के लिए बकाया योगदान (लगभग 260-278 मिलियन डॉलर) का भुगतान रोक दिया है। प्रशासन का दावा है कि यह कदम अमेरिकी करदाताओं के हितों की रक्षा करेगा और द्विपक्षीय तथा क्षेत्रीय साझेदारियों को मजबूत करेगा। लेकिन यह दृष्टिकोण बहुपक्षीय संस्थाओं की आवश्यकता को नजरअंदाज करता है, जहां वैश्विक समस्याओं का समाधान सामूहिक प्रयासों से ही संभव होता है।
डब्ल्यूएचओ की प्रतिक्रिया में चिंता और अपील का मिश्रण है। महानिदेशक टेड्रोस अधनोम घेब्रेयेसस ने अमेरिका से पुनर्विचार करने का आग्रह किया है, यह कहते हुए कि 'विश्व की स्वास्थ्य सुरक्षा एकजुटता पर निर्भर है'। अमेरिकी योगदान की कमी से संगठन को गंभीर वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा है—प्रबंधन टीम में 50 प्रतिशत और कुल कर्मचारियों में 25 प्रतिशत कटौती हो चुकी है। वैश्विक स्वास्थ्य विशेषज्ञ, जैसे जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के लॉरेंस गोस्टिन, इसे अमेरिकी कानून और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का उल्लंघन मानते हैं। बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन जैसे संस्थानों ने चेतावनी दी है कि इससे महामारी निगरानी और प्रतिक्रिया तंत्र कमजोर होंगे, जो विकासशील देशों को विशेष रूप से प्रभावित करेगा।
इस अलगाव के वैश्विक प्रभाव दूरगामी हैं। डब्ल्यूएचओ इन्फ्लुएंजा स्ट्रेन चयन, वैक्सीन समन्वय और आपातकालीन स्वास्थ्य सहायता में केंद्रीय भूमिका निभाता है। अमेरिका के बाहर होने से डेटा साझाकरण और सामूहिक प्रतिक्रिया में कमी आएगी, जो भविष्य की महामारियों—जैसे नई वायरस उत्पत्ति या जलवायु परिवर्तन से जुड़े रोगों—को बढ़ावा दे सकती है। अमेरिका के लिए भी यह जोखिमपूर्ण है, क्योंकि संक्रामक रोग सीमाओं का पालन नहीं करते। द्विपक्षीय सहयोग भले ही अल्पकालिक राहत दे, लेकिन डब्ल्यूएचओ जैसी बहुपक्षीय व्यवस्था का विकल्प नहीं बन सकता।
अंततः, यह निर्णय अमेरिकी अलगाववाद की व्यापक प्रवृत्ति को रेखांकित करता है, जो पेरिस जलवायु समझौते और ईरान परमाणु समझौते जैसे अन्य क्षेत्रों में भी दिखाई देती है। वैश्विक चुनौतियां—चाहे स्वास्थ्य, जलवायु या अर्थव्यवस्था—एकाकी प्रयासों से नहीं सुलझ सकतीं। अमेरिका को अपनी भूमिका पर पुनर्विचार करना चाहिए, अन्यथा यह अलगाव न केवल डब्ल्यूएचओ को, बल्कि समूचे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को कमजोर करेगा। वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा की मजबूती के लिए सहयोग अपरिहार्य है, और इसकी अनदेखी मानवता के लिए महंगी साबित हो सकती है।
With Reuters Inputs
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