यूजीसी की समता नियमावली 2026: उच्च शिक्षा में समानता की चुनौतियाँ और छात्र असंतोष की लहर
भूमिका
27 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) मुख्यालय के बाहर छात्रों का एकत्र होना उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक नई बहस का प्रारंभ था। ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समता को बढ़ावा देने संबंधी नियमावली, 2026’ के खिलाफ यह शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन समानता के नाम पर कैंपसों में संभावित विभाजन और असंतुलन की आशंका को व्यक्त कर रहा था। प्रदर्शनकारियों का मुख्य तर्क था कि ये नियम अस्पष्ट, एकतरफा और दुरुपयोग के लिए प्रवृत्त हो सकते हैं, जिससे अकादमिक स्वतंत्रता और सामाजिक सद्भाव प्रभावित हो सकता है।
यह घटना केवल एक प्रशासनिक नियम से जुड़ी नहीं है, बल्कि यह उच्च शिक्षा नीति, सामाजिक न्याय, प्रक्रियात्मक निष्पक्षता और संस्थागत संतुलन के बीच उभरते तनाव को उजागर करती है।
नियमावली की पृष्ठभूमि और संदर्भ
यह नियमावली 2012 के पुराने दिशा-निर्देशों को प्रतिस्थापित करती है, जिन्हें अब बाध्यकारी रूप दिया गया है। इसका मूल उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति, धर्म, लिंग, विकलांगता, जन्म स्थान आदि आधारों पर भेदभाव को रोकना है। हाल के वर्षों में कुछ संवेदनशील मामलों और उच्चतम न्यायालय के निर्देशों ने यूजीसी को अधिक मजबूत तंत्र बनाने के लिए प्रेरित किया। 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित ये नियम राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के समावेशिता के सिद्धांत से प्रेरित हैं।
सरकार और यूजीसी का दावा है कि ये प्रावधान वंचित वर्गों—विशेषकर अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी)—को सुरक्षित और निष्पक्ष वातावरण प्रदान करेंगे। हालांकि, व्यापक हितधारक परामर्श की कमी ने नियमों की व्यावहारिकता पर सवाल उठाए हैं।
प्रमुख प्रावधान और उनकी संरचना
नियमावली संस्थागत स्तर पर भेदभाव-विरोधी ढांचा स्थापित करने पर केंद्रित है। मुख्य प्रावधान निम्न हैं:
- सभी उच्च शिक्षा संस्थानों में इक्विटी कमेटी का गठन अनिवार्य, जिसमें एससी, एसटी, ओबीसी, महिलाओं और विकलांग व्यक्तियों के प्रतिनिधि शामिल होंगे।
- इक्विटी स्क्वाड और एंबेसडरों का नेटवर्क, जो परिसर में निगरानी, जागरूकता और शिकायतों की प्रारंभिक जांच करेंगे।
- भेदभाव की शिकायतों के लिए समर्पित हेल्पलाइन और त्वरित निवारण प्रक्रिया, जिसमें शिकायतकर्ता की गोपनीयता सुनिश्चित की जाएगी।
- गैर-अनुपालन पर सख्त दंड, जैसे यूजीसी फंडिंग में कटौती, नए कार्यक्रमों पर रोक या संस्थान की मान्यता वापसी।
ये प्रावधान सैद्धांतिक रूप से सराहनीय हैं, क्योंकि वे भेदभाव की जड़ों को संबोधित करते हैं और संस्थानों को जवाबदेह बनाते हैं। फिर भी, परिभाषाओं की व्यापकता और कार्यान्वयन की जटिलता ने विवाद को जन्म दिया है।
छात्रों की चिंताएँ और आपत्तियाँ
प्रदर्शनकारी छात्रों—मुख्यतः सामान्य श्रेणी से—का मानना है कि नियमावली असंतुलित और दुरुपयोगी है। उनकी प्रमुख आपत्तियाँ निम्न हैं:
- प्रक्रियात्मक न्याय का संकट — शिकायतकर्ता की गोपनीयता बनाए रखते हुए आरोपी पर प्रमाण का बोझ डालना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों से विचलन माना जा रहा है, जिससे निर्दोष व्यक्तियों का उत्पीड़न संभव है।
- व्यापक और अस्पष्ट परिभाषा — भेदभाव की परिभाषा इतनी विस्तृत है कि साधारण अकादमिक मतभेद या व्यक्तिगत विवाद भी जांच का विषय बन सकते हैं, जिससे कैंपसों में अविश्वास और भय का माहौल बनेगा।
- वर्गीय असंतुलन — वंचित वर्गों पर विशेष फोकस सराहनीय है, लेकिन सामान्य श्रेणी के छात्रों के लिए समान सुरक्षा या कमेटी में अनिवार्य प्रतिनिधित्व की कमी ने इसे भेदभावपूर्ण बताया है।
- अकादमिक स्वतंत्रता पर प्रभाव — निरंतर निगरानी से खुला संवाद, बहस और रचनात्मक असहमति प्रभावित हो सकती है, जो शिक्षा की गुणवत्ता को कमजोर करेगी।
ये चिंताएँ दर्शाती हैं कि समता का लक्ष्य जटिल है, जिसमें सुरक्षा और निष्पक्षता दोनों का संतुलन आवश्यक है।
विरोध प्रदर्शन का विस्तार और स्वरूप
दिल्ली का प्रदर्शन अकेला नहीं था; यह देशव्यापी असंतोष का हिस्सा बना। लखनऊ, जयपुर, पटना, रांची और अन्य शहरों में छात्रों ने सड़कों पर उतरकर ज्ञापन सौंपे और नारेबाजी की। सोशल मीडिया पर #NoToUGCDiscrimination जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं।
प्रदर्शन मुख्यतः शांतिपूर्ण रहे, लेकिन इनमें युवा ऊर्जा और वैचारिक दृढ़ता स्पष्ट थी। छात्र संगठनों ने नियमावली की पूर्ण वापसी या संशोधन की मांग की, जिसमें सामान्य श्रेणी के लिए भी समान सुरक्षा सुनिश्चित हो।
राजनीतिक और सामाजिक निहितार्थ
यह विवाद शिक्षा से आगे जातिगत राजनीति और सामाजिक न्याय की गहन बहस में बदल गया है। एक पक्ष इसे ऐतिहासिक अन्यायों के सुधार के रूप में देखता है, जो वंचित समूहों को सशक्त बनाएगा। दूसरा पक्ष इसे नए विभाजन का स्रोत मानता है, जहाँ सामान्य वर्ग खुद को हाशिए पर महसूस कर रहा है।
मौलिक प्रश्न यह है: समता क्या केवल संरक्षण तक सीमित है, या इसमें सभी के लिए समान प्रक्रियात्मक न्याय भी अनिवार्य है? राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएँ ध्रुवीकृत हैं, जबकि कुछ संगठन नियमों को अपर्याप्त बताकर और मजबूत सुरक्षा की मांग कर रहे हैं।
कारण-परिणाम विश्लेषण
कारण — न्यायिक दबाव, संवेदनशील मामलों से प्रेरित भावनात्मक आवश्यकता और व्यापक डेटा-आधारित अध्ययन की कमी ने नियमों को विवादास्पद बनाया।
संभावित परिणाम — कैंपसों में ध्रुवीकरण, प्रशासनिक बोझ में वृद्धि, छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव और अकादमिक स्वतंत्रता का क्षरण। लंबे समय में यह शिक्षा की समग्र गुणवत्ता और सामाजिक सद्भाव को प्रभावित कर सकता है।
आगे की संभावनाएँ
यदि संवाद और पुनर्विचार नहीं हुआ, तो असंतोष राष्ट्रव्यापी आंदोलन में बदल सकता है। सरकार और यूजीसी के लिए छात्रों, शिक्षकों और नागरिक समाज को शामिल कर संतुलित संशोधन का अवसर है। उच्चतम न्यायालय में दाखिल याचिकाएँ निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। अंततः, एक निष्पक्ष और समावेशी दृष्टिकोण ही सच्ची समता सुनिश्चित करेगा।
निष्कर्ष
यूजीसी की समता नियमावली 2026 समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है, लेकिन इसकी वर्तमान रूपरेखा व्यावहारिक और नैतिक चुनौतियाँ प्रस्तुत करती है। दिल्ली और देशभर में छात्र विरोध इस बात की याद दिलाता है कि शिक्षा नीतियाँ केवल सरकारी अधिसूचना नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक संवाद का परिणाम होनी चाहिए। सच्ची प्रगति तभी संभव है, जब समता सभी के लिए निष्पक्षता, सुरक्षा और सद्भाव का पर्याय बने, न कि नए विभाजन का स्रोत।
With The Hindu Inputs
Comments
Post a Comment