ट्रंप का ग्रीनलैंड पर यू-टर्न: राहत की सांस लेता यूरोप, पर भू-राजनीतिक आशंकाएँ बरकरार
भूमिका
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शक्ति, भूगोल और संसाधनों का संगम अक्सर अप्रत्याशित संकटों को जन्म देता है। ग्रीनलैंड जैसे दूरस्थ, विरल आबादी वाले लेकिन रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र आज वैश्विक महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा के केंद्र में हैं। जनवरी 2026 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को लेकर अपनाए गए आक्रामक रुख और उसके बाद अचानक लिए गए यू-टर्न ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि समकालीन विश्व व्यवस्था में स्थिरता से अधिक अनिश्चितता स्थायी तत्व बनती जा रही है।
ट्रंप का यह कदम भले ही तत्काल यूरोप के लिए राहत लेकर आया हो, लेकिन इसने ट्रांस-अटलांटिक संबंधों, NATO की एकता और आर्कटिक क्षेत्र की भविष्य की राजनीति को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
ग्रीनलैंड: भूगोल से परे रणनीति
ग्रीनलैंड केवल बर्फ से ढका एक विशाल द्वीप नहीं है; यह 21वीं सदी की भू-राजनीति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुका है। उत्तर अटलांटिक और आर्कटिक महासागर के संगम पर स्थित यह क्षेत्र अमेरिका, यूरोप और एशिया—तीनों के रणनीतिक हितों से जुड़ा है।
शीत युद्ध के दौरान अमेरिका ने यहां थुले एयर बेस (अब पिटुफिक स्पेस बेस) स्थापित कर सोवियत संघ पर निगरानी रखी थी। आज वही क्षेत्र मिसाइल चेतावनी प्रणालियों, अंतरिक्ष निगरानी, दुर्लभ खनिजों, ऊर्जा संसाधनों और उभरते आर्कटिक समुद्री मार्गों के कारण और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। जलवायु परिवर्तन के चलते जैसे-जैसे बर्फ पिघल रही है, वैसे-वैसे ग्रीनलैंड की रणनीतिक और आर्थिक उपयोगिता कई गुना बढ़ती जा रही है।
ट्रंप की महत्वाकांक्षा और टकराव की राजनीति
डोनाल्ड ट्रंप के लिए ग्रीनलैंड कोई नया विषय नहीं है। 2019 में अपने पहले कार्यकाल के दौरान ग्रीनलैंड को “खरीदने” की इच्छा जताकर वे पहले ही कूटनीतिक विवाद खड़ा कर चुके थे। उस समय डेनमार्क द्वारा इस प्रस्ताव को “हास्यास्पद” बताए जाने के बाद मामला शांत हो गया था, लेकिन ट्रंप की सोच बदली नहीं थी।
दूसरे कार्यकाल (2025–26) में ट्रंप ने इस मुद्दे को कहीं अधिक आक्रामक रूप में उठाया। राष्ट्रीय सुरक्षा, चीन के आर्कटिक विस्तार, दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला और ऊर्जा संसाधनों को आधार बनाकर उन्होंने ग्रीनलैंड पर “पूर्ण अमेरिकी नियंत्रण” की बात कही। शुरुआती बयानों में सैन्य विकल्प को पूरी तरह खारिज न करना यूरोपीय राजधानियों के लिए गहरी चिंता का विषय बन गया।
डेनमार्क और ग्रीनलैंड की संसदों ने एक स्वर में स्पष्ट किया कि ग्रीनलैंड न तो बिकने के लिए है और न ही उसके लोग अपनी पहचान छोड़ना चाहते हैं। इस टकराव ने NATO सहयोगियों के बीच अभूतपूर्व तनाव पैदा कर दिया।
दावोस में यू-टर्न: टकराव से समझौते की ओर
जनवरी 2026 में विश्व आर्थिक मंच (WEF), दावोस के मंच से ट्रंप का रुख अचानक बदला हुआ नजर आया। NATO महासचिव मार्क रुट्टे के साथ बैठक के बाद उन्होंने बल प्रयोग से इनकार करते हुए ग्रीनलैंड को लेकर एक “फ्रेमवर्क समझौते” की बात कही।
इस बदलाव के साथ ही ट्रंप ने यूरोप के आठ प्रमुख देशों पर लगाए जाने वाले प्रस्तावित टैरिफ को भी रोक दिया, जिन्हें 10% से बढ़ाकर 25% तक ले जाने की चेतावनी दी गई थी। यह फैसला यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं के लिए राहत भरा था, जो पहले से ही वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं से जूझ रही थीं।
हालांकि ट्रंप ने इस संभावित समझौते को “अनंतकालिक” बताया, लेकिन इसकी शर्तें, स्वरूप और कानूनी आधार पूरी तरह अस्पष्ट रहे। यही अस्पष्टता यूरोप की सतर्कता का मूल कारण है।
यूरोपीय दृष्टिकोण: राहत के साथ अविश्वास
यूरोपीय नेताओं की प्रतिक्रिया संतुलित लेकिन सतर्क रही। डेनमार्क ने स्पष्ट किया कि उसकी संप्रभुता और ग्रीनलैंड के लोगों के आत्मनिर्णय से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। नीदरलैंड्स, इटली और अन्य देशों ने टैरिफ रोकने का स्वागत किया, लेकिन दीर्घकालिक संवाद और स्पष्टता की आवश्यकता पर जोर दिया।
यूरोप में यह धारणा मजबूत हुई है कि ट्रंप की विदेश नीति व्यक्तिगत शैली, घरेलू राजनीतिक दबाव और अचानक निर्णयों से संचालित होती है। इससे NATO की विश्वसनीयता और सामूहिक सुरक्षा ढांचे पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। ग्रीनलैंड प्रकरण ने यूरोप को अपनी स्वतंत्र रक्षा क्षमताओं और आर्कटिक नीति पर गंभीरता से पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित किया है।
व्यापक निहितार्थ: आर्कटिक की नई भू-राजनीति
ग्रीनलैंड विवाद एक बड़े वैश्विक परिदृश्य का संकेत है। आर्कटिक अब केवल वैज्ञानिक शोध का क्षेत्र नहीं रह गया है; यह ऊर्जा, व्यापार, सैन्य प्रतिस्पर्धा और वैश्विक शक्ति संतुलन का नया केंद्र बन रहा है। चीन स्वयं को “निकट-आर्कटिक राज्य” घोषित कर चुका है, जबकि रूस पहले से ही क्षेत्र में सैन्य उपस्थिति मजबूत कर रहा है।
ऐसे में अमेरिका और यूरोप के बीच किसी भी प्रकार का अविश्वास केवल बाहरी शक्तियों को लाभ पहुँचा सकता है। ट्रंप का यू-टर्न इस बात का संकेत है कि दबाव और सामूहिक प्रतिक्रिया अब भी अमेरिकी नीति को प्रभावित कर सकती है, लेकिन यह स्थायी आश्वासन नहीं देता।
निष्कर्ष
ट्रंप का ग्रीनलैंड पर यू-टर्न तत्काल संकट को टालने वाला कदम जरूर है, लेकिन यह किसी स्थायी समाधान की गारंटी नहीं देता। यह प्रकरण दर्शाता है कि 21वीं सदी की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में छोटे क्षेत्र भी बड़े संघर्षों का केंद्र बन सकते हैं।
यूरोप के लिए यह एक चेतावनी है कि वह अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और रक्षा क्षमताओं को मजबूत करे। अमेरिका के लिए यह सीख है कि सहयोगियों के बिना वैश्विक नेतृत्व संभव नहीं है। यदि प्रस्तावित फ्रेमवर्क समझौता पारदर्शिता और आपसी सम्मान पर आधारित होता है, तो यह NATO के भीतर नए सहयोग का मार्ग खोल सकता है; अन्यथा, ग्रीनलैंड भविष्य में फिर किसी बड़े भू-राजनीतिक संकट का केंद्र बन सकता है।
With Washington post Inputs
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