ट्रंप की कनाडा पर 100 प्रतिशत टैरिफ की धमकी: अमेरिकी 'प्रथम' नीति का नया आयाम
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया धमकी, जिसमें उन्होंने कनाडा पर 100 प्रतिशत आयात शुल्क लगाने की बात कही है, वैश्विक व्यापार की जटिलताओं को उजागर करती है। यह घटना न केवल अमेरिका-कनाडा जैसे निकट पड़ोसी राष्ट्रों के बीच उभरते तनाव को दर्शाती है, बल्कि चीन के साथ बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सहयोगी देशों की भूमिका पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है। ऐसे समय में जब वैश्विक अर्थव्यवस्था महामारी के बाद के पुनरुत्थान और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं से जूझ रही है, इस प्रकार की एकतरफा घोषणाएं अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था की स्थिरता को चुनौती देती हैं।
धमकी का तत्काल प्रसंग
24 जनवरी 2026 को ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में कहा कि यदि कनाडा चीन के साथ कोई समझौता करता है और अमेरिका में चीनी वस्तुओं के प्रवेश के लिए 'ड्रॉप ऑफ पोर्ट' बनता है, तो अमेरिका कनाडाई सभी उत्पादों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगा देगा। उन्होंने कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी को 'गवर्नर' संबोधित करते हुए लिखा, "यदि गवर्नर कार्नी सोचते हैं कि वे कनाडा को चीन के लिए 'ड्रॉप ऑफ पोर्ट' बनाकर अमेरिका में सामान भेजने की अनुमति देंगे, तो वे गंभीर भूल कर रहे हैं।" यह भाषा न केवल अपमानजनक है, बल्कि कनाडा की संप्रभुता को चुनौती देती प्रतीत होती है, जो अमेरिका की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति की आक्रामक अभिव्यक्ति है।
इस धमकी का उल्लेखनीय पहलू यह है कि मात्र एक सप्ताह पहले ट्रंप ने कार्नी के चीन के साथ व्यापारिक समझौते को 'अच्छा' और 'उचित' बताया था। यह विरोधाभास ट्रंप की विदेश नीति की अप्रत्याशितता को रेखांकित करता है, जहां निर्णय अक्सर घरेलू राजनीतिक दबावों या रणनीतिक पुनर्विचार से प्रभावित होते हैं। कनाडा की ओर से चीन के साथ हालिया वार्ताएं मुख्यतः कृषि उत्पादों, जैसे कि रेपसीड (कैनोला) पर लगे चीनी प्रतिबंधों को हटाने पर केंद्रित हैं, जो कनाडा की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं।
व्यापारिक निर्भरता और विविधीकरण की दुविधा
कनाडा की स्थिति समझने के लिए उसके आर्थिक ढांचे को देखना आवश्यक है। कनाडा का लगभग 75 प्रतिशत निर्यात अमेरिका पर निर्भर है, जिसमें ऑटोमोबाइल, ऊर्जा संसाधन और वन उत्पाद प्रमुख हैं। अमेरिका के साथ बढ़ते व्यापारिक विवादों—जैसे कि पूर्व में स्टील और एल्युमिनियम पर लगे टैरिफ—ने कनाडा को अपनी व्यापारिक निर्भरता को विविधीकृत करने के लिए प्रेरित किया है। चीन के साथ निकटता बढ़ाना इसी रणनीति का हिस्सा है, जो न केवल नए बाजार खोलता है बल्कि अमेरिकी नीतियों के एकतरफा प्रभाव से बचाव भी प्रदान करता है।
ट्रंप की आशंका 'ट्रांसशिपमेंट' की है, अर्थात चीन की वस्तुएं कनाडा के माध्यम से अमेरिकी बाजार में प्रवेश कर पहले से लगे चीनी टैरिफ को चकमा दे सकती हैं। यह चिंता वैध हो सकती है, लेकिन यूएसएमसीए (संयुक्त राज्य-मेक्सिको-कनाडा समझौता) जैसे मौजूदा ढांचों में उत्पत्ति के नियम और सीमा निगरानी पहले से ही इस समस्या का समाधान प्रदान करते हैं। धमकी का उपयोग नियमों को लागू करने के बजाय राजनीतिक दबाव बनाने का माध्यम बनता दिखाई देता है।
आर्थिक और राजनीतिक निहितार्थ
यदि यह धमकी अमल में आती है, तो इसके परिणाम व्यापक होंगे। कनाडा की अर्थव्यवस्था, जो पहले से ही मुद्रास्फीति और आपूर्ति श्रृंखला बाधाओं से प्रभावित है, गंभीर संकट में पड़ सकती है। निर्यात में गिरावट से रोजगार हानि, उत्पादन में कमी और निवेश की कमी हो सकती है। दूसरी ओर, अमेरिका भी इससे अछूता नहीं रहेगा। कनाडाई कच्चे माल—जैसे कि तेल और लकड़ी—पर निर्भर अमेरिकी उद्योगों में लागत बढ़ेगी, जो अंततः अमेरिकी उपभोक्ताओं को प्रभावित करेगी। उत्तरी अमेरिका की एकीकृत अर्थव्यवस्था में ऐसा कदम पारस्परिक हानि का कारण बनेगा, जो वैश्विक व्यापार युद्ध की याद दिलाता है।
राजनीतिक दृष्टि से, यह घटना अमेरिका की सहयोगी राष्ट्रों पर बढ़ते दबाव को दर्शाती है। चीन के उदय को रोकने की अमेरिकी रणनीति में मित्र देशों की स्वतंत्र विदेश नीति को सीमित किया जा रहा है। कनाडा जैसे देशों के लिए यह दुविधा है: अमेरिका की मित्रता बनाए रखें या अपनी आर्थिक हितों की रक्षा करें। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर, जैसे कि जी-7 या डब्ल्यूटीओ, इस प्रकार की कार्रवाइयां नियम-आधारित व्यवस्था की विश्वसनीयता को कमजोर करती हैं।
व्यापक वैश्विक प्रभाव
इस घटना का असर केवल उत्तर अमेरिका तक सीमित नहीं है। वैश्विक स्तर पर, यह चीन-केंद्रित प्रतिस्पर्धा को तीव्र कर सकता है, जहां देशों को पक्ष चुनने के लिए मजबूर किया जा रहा है। विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए, जैसे कि भारत, यह एक सबक है: व्यापारिक विविधीकरण और मजबूत क्षेत्रीय समझौतों की आवश्यकता। भारत, जो अमेरिका और चीन दोनों के साथ संतुलित संबंध रखता है, ऐसी स्थितियों में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करने पर ध्यान दे सकता है।
निष्कर्ष
ट्रंप की धमकी अमेरिकी विदेश नीति की निरंतरता में एक और अध्याय जोड़ती है, जहां व्यापार को हथियार बनाया जाता है। हालांकि यह घरेलू राजनीतिक लाभ प्रदान कर सकती है, लेकिन दीर्घकाल में यह सहयोग की भावना को क्षति पहुंचाती है। स्थायी समाधान धमकियों में नहीं, बल्कि संवाद और पारस्परिक हितों पर आधारित समझौतों में निहित है। वैश्विक अर्थव्यवस्था की स्थिरता के लिए, बड़े शक्तियों को अपनी नीतियों में संतुलन और समावेशिता अपनानी होगी, अन्यथा अनिश्चितता का बोझ सभी को उठाना पड़ेगा।
With Washington post Inputs
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